साधना के पथ पर

अद्य की स्याही

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सूफ़ी ध्यान श्री


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नास्तिकों के संवैधानिक अधिकारों का हनन

Posted On: 24 Oct, 2016  
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में

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मुझसे शिकायत क्यों?……

Posted On: 1 Sep, 2015  
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Others में

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जगत माता या चण्डालिन है ये…

Posted On: 1 Sep, 2015  
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Religious social issues हास्य व्यंग में

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आरक्षण …एक सामाजिक अवरोध

Posted On: 1 Sep, 2015  
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Others social issues हास्य व्यंग में

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अँधों के अँधेपन का फायदा

Posted On: 1 Sep, 2015  
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Religious social issues हास्य व्यंग में

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वो जो पत्थरों में प्राण फुँकते हैं

Posted On: 25 Aug, 2015  
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Religious lifestyle social issues में

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गर चिराग मेरे मज़ार पर जला होता

Posted On: 22 Mar, 2014  
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social issues कविता में

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ईश्वर निंदक सब जग सारा-१

Posted On: 21 Mar, 2014  
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Religious social issues न्यूज़ बर्थ में

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जरुर आऊंगा (संस्मरण)

Posted On: 8 Feb, 2014  
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Others Special Days lifestyle में

8 Comments

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: swadhapandey swadhapandey

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

मैंने अपने मन को बचाते हुए उस थाने के दीवान से वही कहानी आधी सच्ची और आधी झूठी कह डाली जिसे कुछ देर पहले उन सिपाहियों को सुनाया था जो मुझे यहाँ बैठा गए. बात कुछ ऐसी थी कि खुलती तो फिर दूर तक जाती. लोग नमक-मिर्च लगाकर मजा लेते और रुसवाई जो होती वह अलग से. इस अनचाहे परिस्थिति के लिए मन तैयार नहीं था. अतः जो कोई कुछ पूछता उसको घुमाता रहा. नतीजा निकलने की बजाय उनके सिकंजे में और फसता गया. बहरहाल वह मेरी पूरी बात सुनकर मेरे साझे में आ गया. दीवान ने कहा तुम सो जाओ. सुबह साहब से विनती करके तुम्हें छुड़ा दूंगा.उसकी बाते सुनकर जान में कुछ जान आयी. परन्तु नयनों में नींद नहीं आयी. वह मंजर बार-बार मेरे आखों के सामने नाच रहा था जिसके कारण मुझे यह दिन देखना पड़ रहा था. बार मैं खुद को कोस रहा था क्या जरुरत थी सिपाहियों से भिड़ने की? कुछ ही घंटों में कितना कुछ बदल चूका था. अभी सुबह की ही बात थी कितने हसीं सपने बुनकर चला था जिसे रात की काली चादर में हकीकत में तब्दील होते देखना चाहता था. यहाँ तो सब कुछ उल्टा होता गया…जो हु सो हुआ ! आगे की संभालिए ! बढ़िया पोस्ट

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

वस्तुपरक, किन्तु वस्तुपरकता की गम्भीरता में गंभीरता की जगह हास्य-व्यंग्य का विचित्र मिश्रण, फिर भी अत्यंत पठनीय और बेहतर संस्मरण -- " जीवन में पहली बार हुआ था कि बिना पैसा के उस जीप में बैठकर यात्रा कर रहा था. कमबख्त दो-तीन घंटे के सफ़र में तीनों त्रिलोक घूम लिया था. अब कुछ और घुमने के लिए बचा ही नहीं था. मेरा मन शांत और सर नीचे झुका हुआ था. इसी दौरान उनमें से जाने किसने गाली देते हुए मेरे गाल पर जोर की एक थप्पड़ मारी. ऐसा लगा मानों तीनों लोकों की यात्रा वहीँ ख़त्म हो गयी हो और मैं अपने गंतव्य जगह पर पहुँच गया हूँ. लगभग २ घंटे की जिल्लत भरी जिंदगी जीने के बाद अब कुछ और बाकी नहीं रह गया था." ... हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

१. तुहमतें चन्द अपने ज़िम्मे धर चले किसलिए आये थे हम क्या कर चले ज़िंदगी है या कोई तूफ़ान है हम तो इस जीने के हाथों मर चले क्या हमें काम इन गुलों से ऐ सबा एक दम आए इधर, उधर चले दोस्तो देखा तमाशा याँ का बस तुम रहो अब हम तो अपने घर चले आह!बस जी मत जला तब जानिये जब कोई अफ़्सूँ तेरा उस पर चले शमअ की मानिंद हम इस बज़्म में चश्मे-नम आये थे, दामन तर चले ढूँढते हैं आपसे उसको परे शैख़ साहिब छोड़ घर बाहर चले हम जहाँ में आये थे तन्हा वले साथ अपने अब उसे लेकर चले जूँ शरर ऐ हस्ती-ए-बेबूद याँ बारे हम भी अपनी बारी भर चले साक़िया याँ लग रहा है चल-चलाव, जब तलक बस चल सके साग़र चले 'दर्द'कुछ मालूम है ये लोग सब किस तरफ से आये थे कीधर चले. ------मीर

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

क्या हमारे पास पहनने को वस्त्र और आभूषण, चलने के लिए लम्बी गाड़ियाँ, भविष्य की सुरक्षा के लिए बैंक बैलेंस और रहने के लिए आलिशान भवन का होना, हमारे विकास को दर्शाता है या रोशनी में नहाती लम्बी-लम्बी सड़के या फिर ऊँची-ऊँची इमारतों के साथ-साथ तकनीकि रूप से दक्ष प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया का होना? व्यक्ति और समाज के विकास के लिए शिक्षा और ज्ञान को एक प्रमुख घटक माना गया है, जिसे पाकर कोई डाक्टर, कोई इन्जीनियर, कोई आई.ए.एस. के पदों को सुशोभित करता है; क्या इससे विकास को परिभाषित किया जा सकता हैं? यह सारी सुख सुबिधायें जिसका उपयोग, हम जीवन पर्यंत अपने बाहरी स्वरुप को निखारने में करतें हैं, भौतिकता के प्रतीक मात्र है. हम अपनी कमजोरियों और कमियों को छिपानें के लियें, कभी धार्मिक, कभी न्यायिक, कभी आर्थिक तो कभी राजनीतिक प्रणाली को दोषी साबित करने में लगे रहते हैं. पर यह हम भूल जाते है की ये सारी प्रणालियाँ सामाजिक प्रणाली का एक अंग हैं, जिसके हम अभिन्न अवयव है. अलीन साब , आज के समय में ये चीजें जो आपने ऊपर लिखी हैं वो ही विकास और योग्यता का मापदंड हैं और होनी भी चाहिए ! क्या एक टॉप जब तैयार होती है तो उसको कोई अनपढ़ तैयार करता है ? राकेट जब आध्मान का सीना चीरता हुआ जाता है तब क्या वो मन की आवाज से जाता है , नहीं न ? भौतिक वादी होने में कोई बुराई नहीं है यदि आप किसी और को नुक्सान नहीं पहुंचा रहे हैं तो !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

स्पष्ट है कि व्यक्ति और समाज के बाहरी स्वरुप के साथ-साथ आतंरिक स्वरुप का निर्माण होना परम आवश्यक है. यह तभी संभव है जब हमारे अन्दर आंतरिक जागरूकता हो. तब जाकर व्यक्ति और समाज के विकास को सही अर्थों में परिभाषित किया जा सकता है. जिससे विकास कि सही नीव डाली जा सकती है. फिर भारत को ही नहीं अपितु पुरे विश्व को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथ निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाया जा सकता है और ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की भावना को साकार रूप दिया जा सकता है. वरना वसुधैव कुटुम्बकम की भावना बहुत दूर की चीज है, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथ निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने की परिकल्पना सदैव ही एक प्रश्न चिन्ह बनी रहेगी.सार्थक लेख.बधाई.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

कदम मिलाकर चलना होगा बाधाएँ आती हैं आएँ घिरें प्रलय की घोर घटाएँ पावों के नीचे अंगारे सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ निज हाथों में हँसते-हँसते आग लगाकर जलना होगा कदम मिलाकर चलना होगा हास्य-रुदन में, तूफानों में अगर असंख्यक बलिदानों में उद्यानों में, वीरानों में अपमानों में, सम्मानों में उन्नत मस्तक, उभरा सीना पीड़ाओं में पलना होगा कदम मिलाकर चलना होगा उजियारे में, अंधकार में कल कहार में, बीच धार में घोर घृणा में, पूत प्यार में क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में जीवन के शत-शत आकर्षक अरमानों को ढलना होगा कदम मिलाकर चलना होगा सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ प्रगति चिरंतन कैसा इति अब सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ असफल, सफल समान मनोरथ सब कुछ देकर कुछ न माँगते पावस बनकर ढ़लना होगा। कदम मिलाकर चलना होगा। कुछ काँटों से सज्जित जीवन, प्रखर प्यार से वंचित यौवन, नीरवता से मुखरित मधुबन, परहित अर्पित अपना तन-मन, जीवन को शत-शत आहुति में, जलना होगा, गलना होगा। कदम मिलाकर चलना होगा। ...................श्री अटल विहारी बाजपेयी

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

जो बीत गयी सो बात गई! १.जीवन में एक सितारा था, माना, वह बेहद प्यारा था, वह डूब गया तो डूब गया ; अम्बर के आनन् को देखो, कितने इसके तारे टूटे, कितने इसके प्यारे छूटे, जो छुट गए फिर कहाँ मिले; पर बोलो टूटे तारों पर कब अम्बर शोक मनाता है! जो बीत गयी सो बात गई! २.जीवन में वह था एक कुसुम, थे उस पर नित्य निछावर तुम, वह सुख गया तो सुख गया; मधुबन की छाती को देखो, सूखीं कितनी इसकी कलियाँ, मुरझाई कितनी बल्लरियां, जो मुरझाईं फिर कहाँ खिलीं; पर बोलो सूखे फूलों पर कब मधुवन शोर मचाता है; जो बीत गयी सो बात गई! ३.जीवन में मदु का प्याला था, तुमने तन-मन दे डाला था, वह टूट गया तो टूट गया; मदिरालय का आँगन देखो, कितने प्याले हिल जाते हैं, गिर मिटटी में मिल जाते हैं, जो गिरते हैं कब उठते हैं; पर बोलो टूटे प्यालों पर कब मदिरालय पछताता है! जो बीत गयी सो बात गई! ४.मृदु मिटटी के हैं बने हुए, मधुघट फूटा ही करते हैं, लघु जीवन लेकर आए हैं, प्याले टुटा ही करते हैं, फिर भी मदिरालय के अन्दर मधु के घाट हैं, मधुप्याले हैं, जो मादकता के मारे हैं, वे मधु लुटा ही करते हैं; वह कच्चा पीने वाला है जिसकी ममता घाट-प्यालों पर, जो सच्चे मधु से जला हुआ कब रोता है, चिल्लाता है! जो बीत गयी सो बात गई! ---हरिबंश राय बच्चन

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

पास मेरे जो तुम आओ तो कोई बात बने पास आकर दूर ना जाओ तो कोई बात बने नफरत से प्यार क्यों करते हो इस कदर प्यार से प्यार करो तो कोई बात बने उम्र सारी तमाम कि सौदेबाजी मे अब तो एक रिश्ता कायम करो तो कोई बात बने गिरे हुए पर तो हँसते है दुनिया मे सभी गिरतों को तुम संभालो तो कोई बात बने रोने से कंहा हासिल किसी को कुछ होता है जरा किसी के साथ मुस्कुराओ तो कोई बात बने. ख्वाबों कि राख पर बैठ हाथ मलने से क्या हासिल इक नया ख्वाब किसी आँख मे तुम सजाओ तो कोई बात बने. जिन घरो मे सदियों से छाया है अँधेरा वंहा एक दीपक तुम जलाओ तो कोई बात बने. हिंसा गर सारा जमाना तुमसे करे तो क्या अहिंसा तुम बापू सी करो तो कोई बात बने.

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

सादर आभार!................................दरअसल लिखने और लिख जाने में बहुत अंतर होता है. यहाँ मैं लिखा नहीं बल्कि मुझ द्वारा लिख गया है......................इसमे मेरी कोई अपनी सोच नहीं सिवाय अनुभव के..................यदि लिखना चाहूँ तो हर १० मिनट में एक कहानी लिख डालूं. कुछ लोग मेरे इस गुण से भलीभांति परिचित है. जैसे कि कविता का सृजन कर पोस्ट करता है तो कमेन्ट के रूप में मैं तत्काल एक कविता का सृजन करता हूँ..............परन्तु वह कविता उतनी ही झूठी है जीतनी की जिसको कमेन्ट किया हूँ उसकी कविता........................हम जो कुछ भी सोचते हैं, लिखते हैं खुद( भ्रम, अहंकार, सम्मान, विश्वास इत्यादि) को बचाकर. इस प्रकार जो लिखते है अपना की भावना से ग्रसित होता है परन्तु जब कुछ हम द्वारा लिख जाता है. वहाँ अपना ख़त्म हो जाता है. हम सिर्फ माध्यम रह जाते हैं किसी रहस्य या सत्य को पहुँचाने के ..........................हार्दिक आभार!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

मान्यवर, क्या आप बतायेंगे कि सृष्टि का सम्पूर्ण सत्य क्या है और इसे आजतक कौन कौन जान पाया है? लोगों ने इसी तरह के शब्दों का प्रयोग करके गुरु, सदगुरु, धर्मगुरु, पैगम्बर, मसीह आदि बनकर ठगा है। लोगों ने ठगने के लिये अपने अपने अपने ईश्वर की कल्पना भी कर ली और उस ईश्वर से मिलने का दावा भी किया। अपने अपने नियम और कानून बनाकर उन्हें ईश्वरीय नियम घोषित कर दिया। मान्यवर, पाखंड का वास्तविक अर्थ सत्य का खंड करना यानि को झूठ की हथोड़ी से तोड़ना। तर्क और बुद्धि को अस्वीकार कर, आस्था, अंधश्रद्धा और अंधविश्वास आदि को उनपर आरोपित करना। मान्वयर, आप मुझे वह क्यों बनाना चाहते हैं जो है ही नहीं। आप जिसपर विश्वास करके उसे दुष्प्रचारित करते हैं उससे आपको फर्क पड़े या न पड़े, लेकिन उसका समाज एवं विश्व पर किसी न किसी रुप में दुष्प्रभाव जरूर है। आप जिन आँखों बात कर रहे हैं वह संभवतः अज्ञान ही है। मान्यवर श्रद्दा और विश्वास स्वतंत्र चिंतन में बाधक होते हैं। मान्यवरस, क्या आप बतायेंगे कि समय किसने और कब बनाया?

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

मान्यवर, क्या आप बतायेंगे कि सृष्टि का सम्पूर्ण सत्य क्या है और इसे आजतक कौन कौन जान पाया है? लोगों ने इसी तरह के शब्दों का प्रयोग करके गुरु, सदगुरु, धर्मगुरु, पैगम्बर, मसीह आदि बनकर ठगा है। लोगों ने ठगने के लिये अपने अपने अपने ईश्वर की कल्पना भी कर ली और उस ईश्वर से मिलने का दावा भी किया। अपने अपने नियम और कानून बनाकर उन्हें ईश्वरीय नियम घोषित कर दिया। मान्यवर, पाखंड का वास्तविक अर्थ सत्य का खंड करना यानि  को झूठ की हथोड़ी से तोड़ना। तर्क और बुद्धि को अस्वीकार कर, आस्था, अंधश्रद्धा और अंधविश्वास आदि को उनपर आरोपित करना। मान्वयर, आप मुझे वह क्यों बनाना चाहते हैं जो है ही नहीं।  आप जिसपर विश्वास करके उसे दुष्प्रचारित करते हैं उससे  आपको फर्क पड़े या न पड़े, लेकिन उसका समाज एवं विश्व  पर किसी न किसी रुप में दुष्प्रभाव जरूर है। आप जिन आँखों बात कर रहे हैं वह संभवतः अज्ञान ही है। मान्यवर श्रद्दा और विश्वास स्वतंत्र चिंतन में बाधक होते हैं। मान्यवरस, क्या आप बतायेंगे कि समय किसने और कब बनाया?

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के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

आपको क्या लगता है कि मैं बुरा मानता हूँ नहीं बिलकुल नहीं क्योंकि मैं अच्छा और बुराई से परे हूँ. अब आप जानना चाहेंगे कि फिर मैं इतना-अनाप सनाप क्यों बोलता रहता हूँ? कारण हम दुनिया से खुद को छुपाने के लिए भले ही कोई भी आवरण लगा ले परन्तु जब खुद के साक्षी होंगे तो यह खुद से नहीं छुपा पाएंगे. मैं जो कुछ दूसरों को कहता हूँ अप्रत्यक्ष रूप से अनिल कुमार "अलीन" को कहता हूँ जितना दुसरे तिलमिलाते है मेरी बातों से उससे कहीं ज्यादा अनिल कुमार "अलीन" तिलमिलाता है. क्योंकि वह समझता है कि मैं उसे जानता ही नहीं बल्कि मैं तो उसके नश-नश से वाकिफ हूँ और मुझे देखकर अक्सर भागने की कोशिश करता है मगर अफ़सोस दुसरे तो भागने में कामयाब हो जाते हैं पर यह मुझसे कैसे भागेगा? मैं तो दूसरों के बारे में बहुत कम जान पाता हूँ क्योंकि वो तो किसी न किसी तरह भाग जाते हैं और बेटा अनिल कुमार "अलीन" मेरी पकड़ में आ जाते हैं. अतः जोर-जोर से हँसने लगता हूँ कि अनिल कुमार अलीन से गन्दा, अहंकारी, मुर्ख तो कोई है ही नहीं. इस प्रकार खुद के अच्छे होने की गलतफहमी दूर करता हूँ.................................. हाँ..................हाँ.................................... ' ट

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

दी, आपने सही कहाँ..................सच तो यही है कि अक्सर लाइफ टाइम वैलिडिटी ही धोखा दे जाती है…अतः धोखा हैम सबके लिए इतना बड़ा हो गया है वरन यह तो एक मामूली चीज है. जो कौड़ियों की भांति हर गली और मोहल्लों में मिलती है..................................... दी! सच तो यह है कि मैं कभी किसी से दूर हुआ ही नहीं था और न ही होना चाहता था. यह बात अपनी प्रेम कहानी में स्वीकार भी किया हूँ. मैं तो बस एक नया रिस्ता जोड़ने में लगा हुआ था.....वैसे भी रिस्ते जोड़ने के लिए होते हैं और तोड़ने के लिए.................वे लोग मुर्ख और जाहिल होते हैं जो माता-पिता के लिए प्रेम को, या फिर प्रेम के लिए माता-पिता का त्याग करते हैं...................दो साल पहले माता जी की रीढ़ की हड्डी टूट जाने के कारन ठीक से चल-फिर नहीं पाती थी और हाथ से एक गिलास पानी भी नहीं उठता था. पिछले एक सालो से उनके साथ एक और समस्या हो गयी कि उनके पेशाब में जलन होने लगा. अतः शादी के ७-८ महीने बाद उनको अपने पास ही बोला लिया और यहीं से इलाज कर रहा हूँ. जांच के बाद पता चला कि उनके दाहिने किडनी में २२ एमएम का सिस्ट है. दवा चल रहा है..................और काफी सुधार हैं उनके हालत में. यह अनजानी के दिन-रात सेवा का असर है कि आज वो ठीक से चल-फिर पाती है. इतना ही २५-३० किलो वजन भी उठा सकती है और पहले की तरह मेरी धुलाई भी कर सकती हैं. वैसे ही अपने पैरों के निचे मुझे दाबकर...........परन्तु अब उतना नहीं कर सकती क्योंकि कुछ बड़ा हो गया हूँ मैं न. इसलिए मैं भी अपने बड़ा होने कुछ फायदा उठता हूँ उनको उनको हाथी उपनाम से चिढ़ाकर और वो मुझे चूहा कहकर चिढ़ाती हैं. कहती हैं, " चूहा! यदि पकड़ में आ गए तो पैर से मसल दूंगी" परन्तु उनको क्या मालुम कि यह चूहा समय से आगे निकल गया है...............हाँ............हाँ..............हाँ..................बहुत दिनों के बाद इधर का रुख हुआ...........उसके लिए हार्दिक आभार!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

आदरणीय,                    शीर्षक की जरुरत तब पड़ती है जब हम जबरदस्ती लिखते हैं. यहाँ तो बस मुझसे लिखा गया है. एस लेख में बताया भी हूँ कि मैं पेन और कापी धुंध रहा था "अँधेरे" पर कुछ लिखने के लिए परन्तु मुझसे कुछ और हो गया....जो मेरे दिमाग में था ही नहीं...................................... तौलिया.....................हाँ..................हाँ............................सोचा तो मैं भी यही था पर मेरे साथ एक समस्या ये है कि जिस एरिया में मेरी पोस्टिंग है यहाँ झाड फूंक करने वाले बहुत है. पर मैं सबसे अनजान हूँ यदि मैं अपने कर्मचारियों से कहता हूँ तो किसी बाबा को लेते आओ...................तो पता चला कि दस बाबा दरवाजे पर आकर चिल्लाने लंगेंगे कि साहब मुझसे झाड-फूंक करवा लो.............तब तो हुई बहुत बड़ी समस्या. दस झाड फूंक वालों का सामना करने से बेहतर है कि एक आत्मा का सामना कर लिया जाय........................आप आये बहार आई ..........हार्दिक आभार!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

दिनेश आस्तिक जी,आप सृष्टि का सम्पूर्ण सत्य नहीं जानते हैं.जितना जानते हैं,उसी आधार पर कह रहे हैं,इसीको पाखंड कहते हैं.पाखंड का अर्थ है-सत्य का एक खंड़मात्र जिसने पाया हो.सम्पूर्ण सत्य नहीं.यदि सम्पूर्ण सत्य आप जानते तो ईश्वर की तरह मौन हो जाते.आप फिर किसी सत्य की तलाश में नहीं निकलते बल्कि कोई खोजी व्यक्ति आप की तलाश में निकलता.मई भी सम्पूर्ण सत्य नहीं जानता हूँ,लेकिन जो मैंने अपनी आँखों से देखा है,उसपर मै अटूट विश्वास करता हूँ.आप मेरे विश्वाश पर विश्वास करें या न करें,उससे मेरे ऊपर कोई फर्क नहीं पड़ता है.आप ने अज्ञानता,मानसिक बीमारी और नशे कि बात की है तो सौभाग्य से मुझे ऐसा कोई रोग नहीं है.बल्कि मै तो जिन्हे ये रोग लगा है,उसकी हेल्प करता हूँ कि वो रोगमुक्त हो जाये.जहाँ तक आप ने ईश्वर की बात की है तो ईश्वर,जीव और माया तीनो का अस्तित्व इस सृष्टि में सदैव से रहा है और सदैव रहेगा.ये कभी सूक्ष्म रूप में रहते हैं तो कभी स्थूल रूप में.मै अपना रिसर्च जरी रखता हूँऔर आप अपना.बीच बीच में मिलते रहेंगे.याद करने के लिए आभार.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

आदरणीय दिनेश आस्तिक जी,आप सृष्टि का सम्पूर्ण सत्य नहीं जानते हैं.जितना जानते हैं,उसी आधार पर कह रहे हैं,इसीको पाखंड कहते हैं.पाखंड का अर्थ है-सत्य का एक खंड़मात्र जिसने पाया हो.सम्पूर्ण सत्य नहीं.यदि सम्पूर्ण सत्य आप जानते तो ईश्वर की तरह मौन हो जाते.आप फिर किसी सत्य की तलाश में नहीं निकलते बल्कि कोई खोजी व्यक्ति आप की तलाश में निकलता.मई भी सम्पूर्ण सत्य नहीं जानता हूँ,लेकिन जो मैंने अपनी आँखों से देखा है,उसपर मै अटूट विश्वास करता हूँ.आप मेरे विश्वाश पर विश्वास करें या न करें,उससे मेरे ऊपर कोई फर्क नहीं पड़ता है.आप ने अज्ञानता,मानसिक बीमारी और नशे कि बात की है तो सौभाग्य से मुझे ऐसा कोई रोग नहीं है.बल्कि मै तो जिन्हे ये रोग लगा है,उसकी हेल्प करता हूँ कि वो रोगमुक्त हो जाये.जहाँ तक आप ने ईश्वर की बात की है तो ईश्वर,जीव और माया तीनो का अस्तित्व इस सृष्टि में सदैव से रहा है और सदैव रहेगा.ये कभी सूक्ष्म रूप में रहते हैं तो कभी स्थूल रूप में.मै अपना रिसर्च जरी रखता हूँऔर आप अपना.बीच बीच में मिलते रहेंगे.याद करने के लिए आभार.

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Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा December 4, 2013 मुनिवर आप मामले की गंभीरता को समझ नहीं रहे हैं.. ख़राब टेप रिकॉर्डर की तरह एक ही धुन सुनाने लगते हैं आप..मुझे मेरे बचपन के मित्र चमन की याद आ रही है वो रोज़ मेरे यहाँ ताश खेलने आता था रोज़ लड़ाई हो जाती थी उसकी किसी न किसी से, रोज़ बोल के जाता था कि अब कल नहीं आऊंगा, लेकिन फिर अगले दिन तय समय पर आ जाता था…!! ज्ञानी को इतनी गंभीरता शोभा नहीं देती है…!! मैं आपकी दिल से इज्ज़त करता हूँ…आप बेकार में क्रोधित हो जाते हैं… ब्रह्म चर्चा सुंदर है लेकिन हर वक़्त ब्रह्म चर्चा उचित नहीं है…!! और आप को बता दूं जो मैं कर रहा हूँ वो अति प्राचीन तिब्बतन ध्यान विधि है ‘अतिशयोक्ति’ किसी बात को उस पॉइंट तक पहुंचा दो जहाँ उसका रूपांतरण हो जाये…जैसे पानी का कोथनांक 100 d c होता है जहाँ पहुँच पर पानी भाप बन जाता है उसकी तरह विवाद का भी कोथनांक होता है…!! लगता है तिब्बत के बारे में आप बहुत कम जानते हैं…!! खैर..!! “मुझे आप से बात करने में कोई रूचि नहीं है.इसीलिए आप भी जबदस्ती बातचीत न करें.” रूचि कैसे होगी आपकी, लेकिन क्या करें…मेरी भी मज़बूरी है… कल अनील कह रहा था ‘ये कैसे सद्गुरु हैं यार…?’ मैंने कहा जैसे भी अच्छे हैं…इनको इनके जैसे बने रहने दो…जैसे आसाराम के बात लोगों की साधू शब्द पर से श्रधा उठ गया उसी तरह धीरे धीरे सद्गुरु शब्द का जो सम्मोहन है लोगों के भीतर हो भी इनके मद्ध्यम से टूट जाएगा…मैं भी जानबुझ कर अपने नाम में सूफ़ी जोड़ लिया… लोग शब्द से सम्मोहित हो जाते हैं… ज़रुरत है कि शोब्दों को नए अर्थ दे दिए जाएँ…ताकि लोग इसके भार से मुक्त हो जाए… शायद आप नहीं जानते आप का सद्गुरु होना मेरे लिए कितना उपयोगी है…ये सब मेरा ही कमाल है कि सोनम जी ने आपको डांट दिया था…वर्ना इस देश के लोगों में इतनी कहां हिम्मत की सदगुरुओं को डांट दे…अगर होता तो आज इस देश की ये दुर्दशा नहीं होती….!! ..................................................................................................................................................................................................................................................................................................प्रिय सूफी जी,सादर प्रेम,=१=सबसे पहले आप ने अपने बचपन के मित्र चमन की बात की है.न मै अब बचपने में हूँ.न ही मै ताश खेलता हूँ और न ही लड़ाई करता हूँ.इसीलिए चमन की बात छोड़िये.=२=आप ने कहा है,ज्ञानी को इतनी गंभीरता शोभा नहीं देती है…!! मैं आपकी दिल से इज्ज़त करता हूँ…आप बेकार में क्रोधित हो जाते हैं… ब्रह्म चर्चा सुंदर है लेकिन हर वक़्त ब्रह्म चर्चा उचित नहीं है…!! और आप को बता दूं जो मैं कर रहा हूँ वो अति प्राचीन तिब्बतन ध्यान विधि है ‘अतिशयोक्ति’ किसी बात को उस पॉइंट तक पहुंचा दो जहाँ उसका रूपांतरण हो जाये…जैसे पानी का कोथनांक 100 d c होता है जहाँ पहुँच पर पानी भाप बन जाता है उसकी तरह विवाद का भी कोथनांक होता है…!!=क्रोधित आप भी हो जाते हैं.लेकिन आप स्वीकार नहीं करते हैं.आप अपने क्रोध पर बड़ी चालाकी से ध्यान विधि का आवरण चढ़ा देते हैं.जबकि अनिल जी क्रोध है भी तो जाहिर कर देते हैं.रही बात दिल से इज्जत करने तो इस मंच पर जितने भी ब्लॉगर है,सबकी दिल से मै इज्जत करता हूँ.=४=आप ने कहा है-कल अनील कह रहा था ‘ये कैसे सद्गुरु हैं यार…?’मैंने इस बात को आपसे कई बार कहा है कि मै किसी से नहीं कहता हूँ कि मुझे सद्गुरु मानो.जो मानते हैं सो मानते हैं.आप से या अनिल जी से या दिनेश जी से कौन कहता है कि मानिये.इसीलिए ये प्रश्न ही मूर्खतापूर्ण है.आप सूफी हैं या नहीं हैं,इस पर मैंने कभी बहस की है.करना भी नहीं चाहता,क्योंकि मुझे इस बात में कोई दिलचस्पी नहीं हुई की आप वास्तव में सूफी हैं या नहीं हैं.जो बात आप की पसंद आएगी,उसकी मै तारीफ करूँगा,जो नहीं पसंद आएगी,उसकी आलोचना करूँगा.आप निश्चिन्त रहिये मै "सद्गुरु" शब्द का मान हमेशा कायम रखूँगा.आप अपनी चिता कीजिये.=५=अपने कमेंट में आप ने कहा है-आसाराम के बाद लोगों की साधू शब्द पर से श्रधा उठ गया.एक आसाराम के गलत होने से सरे साधू गलत नहीं हो जाते हैं.जिनकी साधुओं पर श्रद्धा वो हमेशा रहेगी.ऐसी बातें केवल वो लोग कर रहे हैं जिनकी साधुओं पर श्रद्धा पहले भी नहीं थी.आप को याद होगा कि आसाराम को गलत मैंने शुरू में ही कहा था.आपने तो बाकायदा एक लेख लिखा था-"गलत नहीं हैं आसाराम" आप ने उन्हें भगवत्ता को उपलब्ध बताया था,जिसकी मैंने आलोचना की थी.आप जो कहे वो ठीक,दूसरे जो कहें वो गलत,पहले ये बचपना छोड़िये.=6=आप ने अपने कमेंट में कहा है-सोनम जी ने आपको डांट दिया था…आप हमेशा लड़ने-भिड़ने वाली बात क्यों करते हैं.सोनम जी ने मुझे क्या कहा और मैंने सोनम जी को क्या कहा ये दो चार बार पढ़ लीजिये.मैंने कभी आप से कहा कि सोनम जी ने आप को क्या कहा.आप कहते हैं कि सोनम जी ने सद्गुरुओं को डांट दिया.आप जैसा झूठा आदमी मैंने नहीं देखा.सोनम जी ने सूफी को क्या कहा ये आप क्यों नहीं बोलते हैं.आप सब ने सोनम जी अच्छे लेख की बुराई की,जबकी मैंने सच्चाई की तारीफ की और जागरण परिवार को भी बहुत अच्छा लगा तभी तो "बेस्ट ब्लॉगर आफ दी वीक" चुना है,वो न चुनते तो मुझे आश्चर्य होता.अंत में आप सबसे मेरा निवेदन है कि इतना बहस करने की बजाय मै यहाँ आकर प्रिय अनिल जी का कोई लेख पढ़ लूँ वो बेहतर है.उनका लेख जितनी बार पढ़िए कुछ न कुछ विचारने को मिलता है.उनके नए लेख की मुझे प्रतीक्षा है.

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आदरणीय अनिल जी,सूफी जी और दिनेश आस्तिक जी,आप लोग मेरी पूरी बात सुन लिया कीजिये,फिर आप लोग कमेंट करें तो ज्यादा अच्छा होगा.मैंने संक्षेप में कहा था-"आदरणीय सूफी जी,आप भले आत्मा के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते हों,परन्तु मैंने अपनी इन आँखों से आत्मा को देखा है.आप को विश्वास हो न हो उससे मुझ पर कोई फर्क नहीं पढता है,परन्तु मै १०० प्रतिशत यकीन करता हूँ,और सदैव करता रहूँगा,क्योंकि मै आँखों देखि कह रहा हूँ." १=आत्मा-परमात्मा को आँखे बंद करके समाधी की अवस्था में महसूस करना.आत्मा के द्वारा आत्मा-परमात्मा का साक्षत्कार.इस विषय को छोड़ दीजिये.मै इसकी बात नहीं कर रहा हूँ. २=मैंने इन आँखों से आत्मा को देखा है,इसीलिए मै मृत्यु के बाद भी जीवन और आत्मा के अस्तित्व पर उतना ही यकीन रखता हूँ,जितना कि नज़र आते हुए इस संसार पर.अब मेरी पूरी बात सुन लीजिये.मैंने अपनी आँखों से एक भटकती हुई आत्मा को देखा था,तबसे मृत्यु के बाद भी जीवन है ,इस पर मेरी उतनी ही दृढ आस्था हो गई है,जितनी कि अपने अस्तित्व पर.पूरी घटना मै जल्द ही ब्लॉग पर लाऊंगा. ३=मै जानता हूँ कि विज्ञानं अभी मत्युपरांत जीवन जारी रहने की बात स्वीकार नहीं करता है.विज्ञानं कहता है कि मरने के बाद शरीर और मन नहीं रहता है,इसीलिए मरने और शरीर जला दिए जाने के बाद जीवन असम्भव है.परन्तु विज्ञानं की बात सही नहीं है.मरने और शरीर जला देने के वावजूद भी सूक्ष्म शरीर,मन,बुद्धि,चित्त,अहंकार और आत्मा आदि रहते हैं.मरता-जलाता पंचतत्व है सूक्ष्मतत्व विदयमान रहता है.हमारा स्थूल जीवन भले ख़त्म हो जाये ,परन्तु सूक्ष्म रूप से जीवन जारी रहता है.वो चलता,फिरता,बोलता,बतियाता है,परन्तु उसकी इच्छा है कि किसको दिखाई देगी और किससे बात करेगी.लोग इसे भूत-प्रेतों का अस्तित्व कहते हैं,परन्तु मै इसे जीवात्मा का अस्तित्व कहता हूँ,जबकि इस समय जबकि इस समय शरीर और जीवात्मा दोनों साथ हैं. ४=प्रिय सूफी जी,आप कोशिश करते है प्रयोग करने कि,परन्तु असफल रहते हैं.सरिता जी के ब्लॉग पर मै और टिपण्णी नहीं करना चाहता,लेकिन आप की कुछ बातों का जबाब आप की ग़लतफ़हमी दूर करने के लिए मै जरुर देना चाहूंगा.प्रिय अनिल जी से क्षमा चाहते हुए क्योंकि ये उनका ब्लॉग है,मै सूफी जी का एक कमेंट यहाँ सरिता जी के ब्लॉग पर का दे रहा हूँ.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

मृत्यु के बाद जीवन है या नहीं..................और जीवन के बाद मृत्यु है कि नहीं .......................दोनों ही भ्रम है..........झूठ है.....................यदि कोई व्यक्ति अपने जन्म और म्रत्यु का साक्षी हो तो यह बात स्वीकार करने योग्य है. यदि जन्म लिया हुआ बच्चा यह बताये कि मैं जन्म लिया हूँ तो बात समझ में आती है. यदि बात जन्मे को नहीं पता (जो अपने जन्म का साक्षी नहीं), वो दूसरों कैसे पता हो सकता है. अतः यह भ्रम है......झूठ है.................! यदि मृत्यु है तो इसके बारे में जो जिन्दे है वो कैसे बताएँगे यह तो बात किसी मुर्दे से पूछनी चाहिए. क्योंकि अपनी मृत्यु का साक्षी तो वही है न. अतः किसी दुसरे को मरता हुआ देखकर हम स्वीकार करें की मृत्यु है या फिर हमें भी मरना है तो यह एक झूठ है, खुद के साथ धोखा है. हकीकत तो यह है कि हम पैदा ही नहीं हुए तो मरने का सवाल ही नहीं उठता,................

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

जी, शुक्रिया! आपत्ति आदरणीय शब्द पर नहीं बल्कि उसके उपयोग पर हैं. जब हम किसी के पोस्ट पर जाते हैं तो उससे सीधे रूबरू होते हैं.  जैसे मैं आपकी पोस्ट पर गया तो या तो आपको मुझे आदरणीय बोलना चाहिए या फिर राजेंद्र जी. परन्तु यदि मैं आपको आदरणीय राजेंद्र जी बोल रहा हूँ तो आपका सम्मान नहीं बल्कि अपमान है. यदि किसी को सीधे सम्मान दे रहे हैं तो उसके नाम के साथ आदरणीय लगाना अनौचित्य है. हाँ यदि किसी थर्ड व्यक्ति के सामने हो या फिर कई लोगो के साथ हो तो किसी स्पेसिफिक व्यक्ति के लिए कोई चीज है तो ऐसा कर सकते हैं. जागरण जंक्शन पर सम्पादक महोदय के पहिले आदरणीय उपयोग किया क्योंकि वहाँ आप, सम्पादक महोदय और मैं तीन लोग थे. मेरा संबोधन सम्पादक महोदय को था, अतः वहाँ ऐसा कहना उचित था. परन्तु यह तो और अशोभनीय हो जाता है जब हम कहते है कि फलाने-फलाने मेरे लिए आदरणीय है. इसका मतलब कि वह आदरणीय नहीं है और सिर्फ हम कर रहे हैं या फिर औरों से खुद को श्रेष्ठ साबित करने के लिए कर रहे हैं. आप बार-बार भागने की बात क्यों करते हैं? बहस हमेशा अनावश्यक ही होती है और यहाँ बहस नहीं बल्कि शिष्टाचार और विनम्रता क्या है? इस पर प्रकाश डाला जा रहा है.

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

मुनिवर, मुझे दादा-ए-सुखन असदउल्ला खां मिर्ज़ा ग़ालिब की याद आ रही है, "बक रहा हूँ जूनू में क्या क्या कुछ, कुछ न समझे ख़ुदा करे कोई" .... मुनि उवाच, "परन्तु मैंने अपनी इन आँखों से आत्मा को देखा है." ये तो ऐसा हो गया जैसे कोई कुत्ता कहे कि मैंने अपने इन मुंह से अपनी पूछ को पकड़ा है... अगर आपने आत्मा को देखा है तो फिर आप कौन हैं...??? आपने आत्मा को देखा मतलब आत्मा 'ऑब्जेक्ट' हुआ फिर सब्जेक्ट कौन है...??? जिसने देखा वो कौन है...आँख है...? शरीर है...?? कौन है...आप कौन हैं...??? "शब्दों की बाजीगरी में आप माहिर हैं." क्यों सुनी सुनाई बातों को दोहरा रहे हैं...??? "मात्र बौद्धिक कसरत करते रहते हैं" मैंने कहीं मज़ाक में कह दिया और आप गाँठ बांध कर बैठ गए...?? वही बात मुझे क्यों सुनते हैं जो मैं खुद कहता हूँ...?? मेरी ही बातों को दोहराने लगे हैं आप आज कल...!! जैसे, "वो भी आधा सच है और आधा झूठ." .... "मेरा अनुभव यदि आप के लिए अन्धविश्वास है" पहले तो आप किताबी बातों को दोहराने में कुशल थे लेकिन आज कल वो भी ठीक से नहीं हो रहा है आप से....बौखलाहट में कुछ से कुछ बोल रहे हैं...!! "इस विषय पर बहस करने से कोई फायदा नहीं है" ये बात अगर समझ में आ गयी है तो एक महीने से आप इसे दोहरा भी रहे हैं और बहस भी किये जा रहे हैं...ऐसा क्यों...??

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

आदरणीय अनिल जी,सबसे पहले तो आप को बधाई और जागरण जंक्शन को धन्यवाद,अब आप के नाम पर क्लीक करने से आप की साईट खुल रही है.ये पाठकों के लिए बहुत अच्छा है.आप ने आदरणीय शब्द पर जो बात कही है,वो सबके लिए नहीं लागू होती है.पूरा संसार इस शब्द को प्रयोग करता है.ये एक शिष्टाचार और विनम्रता की बात मानी जाती है.अर्थ का अनर्थ तो कुछ भी किया जा सकता है.आप कह रहे हैं कि आदर बातों से ,आँखों से झलकता है.क्या आदरणीय शब्द से नहीं झलकता है.सभी इस मंच पर एक जैसी बुद्धि के नहीं हैं.मेरी समझ से आदरणीय शब्द पर आप लोगों की आपत्ति ब्यर्थ है और जो उसका अर्थ आप ने लगाया है वो भी अर्थ का अनर्थ किया गया है.आप लोग करें या न करे लेकिन जो लोग इस शब्द का प्रयोग कर रहे हैं उन्हें करने दीजिये,इसमें आप की आपत्ति में मुझे कोई बुद्धमानी नज़र नहीं आती है.आप ने स्वयं जागरण जंक्शन के संपादक महोदर के लिए आदरणीय शब्द का प्रयोग किया है.व्यक्तित्व में दोहरा मापदंड मत अपनाइये.शब्दों की बाजीगरी मुझे पसंद नहीं है.आप लोगों से अनावश्यक बहस करने से अच्छा है कि मैं आप लोगों के लेख पढ़कर चुपचाप चलें जाऊँ.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

आदरणीय सूफी जी,आप भले आत्मा के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते हों,परन्तु मैंने अपनी इन आँखों से आत्मा को देखा है.आप को विश्वास हो न हो उससे मुझ पर कोई फर्क नहीं पढता है,परन्तु मै १०० प्रतिशत यकीन करता हूँ,और सदैव करता रहूँगा,क्योंकि मै आँखों देखि कह रहा हूँ.शब्दों की बाजीगरी में आप माहिर हैं.अपनी ही कही हुई बात को अपनी सुबिधानुसार आप उलटते-पुलटते रहतें हैं और मात्र बौद्धिक कसरत करते रहते हैं.मेरे पास जो है वो मेरा अनुभव है और आपके पास जो है वो आप का ज्ञान है और वो भी आधा सच है और आधा झूठ.मेरा अनुभव यदि आप के लिए अन्धविश्वास है तो आप का कहा हुआ सारा ज्ञान भी मेरी दृष्टि में सच नहीं है.अपने अनुभव से परखने पर जो सच लगेगा सिर्फ वही मेरे कम का है.इस विषय पर बहस करने से कोई फायदा नहीं है.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

माफ़ करियेगा...............................................राजेंद्र जी..............................................किसी के प्रति यदि आदर है तो उसे हरेक जगह चिल्ला-चिल्लाकर कहने की कोई जरुरत नहीं...............वो तो बातों से, आखों से झलकता है...................यदि आदरणीय सभी है तो इस बात को कहकर अनादर करने की क्या जरूरत.........! इसका मतलब यह कि सामने वाला आदर के योग्य नहीं है हम जबर्दस्ती उसकी आदर कर रहे हैं या फिर यह हमारा अहंकार है जो कहता हैं कि हम आदर करते हैं और दूसरे नहीं. यह भी तो कहाँ जा सकता है कि सभी आदरणीय हैं. अब इस वाक्य में सामने वाला मोहताज़ नहीं कि उसे कोई आदरणीय कहें या न कहें. जैसे कि माता-पिता हम उनके आदर करे या न करें...........परन्तु वो हमारे लिए आदरणीय है. जब हम किसी को यह कहते है कि हम आदर करते है उनका तो जाने-अनजाने में अनादर करते हैं क्योंकि हम दिखाना चाहते हैं कि जिसका आदर कर रहे हैं हम उससे श्रेस्ठ है जबकि दूसरे वाक्य से यह इंगित होता है कि सामने वाला हमसे श्रेष्ठ है.....आप तो सवयम बुद्धिजीवी है.......खुद इस बात निर्णय लीजियेगा.

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

आदरणीय! आपको अच्छा लगा यह बात तो समझ में आती है. परन्तु आप का कहना, "लेख को पढ़कर या पढ़ते हुए इसकी सत्यता पर विचार किया जाये तो इसमें सच्चाई नज़र आती है." मान्यवर सत्यता पर कभी विचार नहीं क्या जाता जो सत्य है उस पर विचार करने की क्या जरूरत? क्या सूरज को देखने का बाद कोई यह कहेगा कि इस पर विचार करूँगा. नहीं न.............................. सत्य तो यही है कि यह लेख या फिर दुनिया का कोई भी बाह्य ज्ञान( चाहे किताबों से, ग्रंथों से या व्यक्तियों से) सब झूठ है जब तक कि आप खुद उसके साक्षी नहीं हो जाते. जब तक कि वह आपका अनुभव या अनुभूति नहीं बन जाता. चूँकि यह लेख मेरी अनुभूति है. अतः यह सिर्फ मेरे लिए सत्य है और आपके लिए एक झूठ ................................................

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

आदरणीय सूफी ध्यान मुहम्मद जी,आप अपनी मर्जी से जो चाहे कहें लेकिन इस मंच के सभी ब्लोगेर मेरे लिए आदरणीय हैं,वो चाहे आप हों,सरिता जी हों,अनिल जी हों या कोई भी क्यों हो.ये मेरे संस्कार हैं.आप के संस्कार आप के कमेंट से झलक रहा है.ये आप कि भाषा हो सकती है,मेरी नहीं.अपने भीतर कुछ प्रेम पैदा कीजिये.आप ही के भीतर बैठकर कोई आप को खाये जा रहा है,जिसका आप को पता भी है और नहीं भी है.आदरणीय अनिल जी की "मेरी सदा-एक अधूरी परन्तु सच्ची प्रेम कहानी" वही पढ़ लीजिये.मै तो बहुत भावुक हो गया था पढ़कर.एक अच्छी प्रेम कहानी से मुड़ फ्रेश हो जायेगा और कुछ प्रेममय स्मृतिया भी आप की ताजी हो जायेगीं.अब मै जा रहा हूँ गीता पर कुछ लिखने.आप की आलोचना का इंतजार रहेगा,जिसमे कभी-कभी कोई कीमती चीज भी मिल जाती है.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

मुनिवर क्रोध में आपका विवेक समाप्त हो गया है लगता है..."कहते हैं की विचार इसान की छवि होते हैं" कोई कहता है और आप मान लेते हैं...??? "मुझे अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है की वो बेहद ख़राब है" कब तक अफ़सोस और क्रोध के द्वन्द में फसे रहिएगा...?? या तो क्रोध से मुक्त हो जाइये या अफ़सोस से...!! "और अनिल जी से मै क्यों डरूंगा ?" ये तो आप जाने कि आप उनसे क्यों डरते हैं...इस पर ध्यान कीजिए...!! "मै नहीं भी ये सब करता तो भी चलता रहता,उससे क्या फर्क पड़ता ? " सवाल सुन्दर है, खुद से पूछें...शयद जड़ तक पहुँच पाएं.... "जागरण जंक्शन से आग्रह मैंने अपने विवेक से दिया था" झूठ बोल रहे हैं आप ऐसा आपने अनील के द्वारा खॊचारे जाने पर किया...उससे त्रस्त हो कर किया...!! "बचपन से मेरी आदत है कि " सभी आदत बेहोशी से पैदा होते हैं...यही नहीं बहुत आदत आपमें बच्चों जैसी है...बचपना बरक़रार है...बच्चों जैसा होना चाहिए संत को, बचपना अच्छी बात नहीं...!! "ञान को परखने का मेरा अपना ही एक अलग तरीका है." एक ही इसलिए है क्योंकि तरीका सदैव उधार होता है...बोध को जगाइए...कबतक तरीके की बैशाखी के सहारे चलते रहेंगे...??? "जरुर आप से शिकायत करेंगे " शौक से कीजिए मेरी साड़ी बातें आपत्तीजनक होती हैं...!! "आदरणीय सरिता जी के इस ब्लॉग पर न करें" सुन्दर राजनीती है, अगर सरिता जी आदरणीय हैं तो क्या अनील जी लतरणीये हैं..लात खाने योग्य हैं जो उनके ब्लॉग पर ऐसी बाते करेंगे आप...??? "आपस में लड़ना-भिड़ना ही आप का शौक और घटिया राजनीती है" मुझे तो किसी से कोई लड़ाई नहीं है, लोग खुद अपनी बचाव में मुझ से लड़ने लगते हैं...!!! राजनीति तो मेरे खून में... I love it.

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

"आप की बाते आधा सच और आधा झूठ हैं.मृत्यु को झूठ मानने का अर्थ है कि कोई हमेशा के लिए नहीं मरता है.मृत्यु के उस पार फिर जीवन है" महानुभाव- मैं कोई तार्किक, विचारक या पंडित नहीं हूँ, जो झूठ और सच का खेल खेलूं...'न तो बातें आधी सच होती हैं न ही आधी गलत'... बात की उपयोगिता उसके सन्दर्भ पर निहित होता है... यहाँ न तो इस बार है न उस पार है... आप कहते खुद को भक्त हैं और फेक रहे हैं कवियों की तरह- बच्चन जी कहते हैं, 'इस पार प्रिय तुम हो मधु है, उस पार न जाने क्या होगा...' कवि की अज्ञानता क्षमा योग्य है, लेकिन आपको क्षमा नहीं किया जा सकता है...जब मैं कहता हूँ कि आप सुनी सुनाई बातों को दोहरा रहे हैं तो आब बुरा मान जाते हैं, मुंह फुला लेते हैं...जीवन और मृत्यु अभी और यहीं है, 'हम हमेशा वहीँ रहते हैं जहाँ कोई भविष्य कभी हमें ले कर जाएया...' अस्तित्व में कोई भविष्य नहीं होता, अस्तित्व खंडो में नहीं बंटा है, कोई इस पार या उस पार नहीं है, जो है यही है और यहीं है...सब नगद है...कल कोई नहीं मरता है, ऐसा नहीं है कि किसी दिन आप मौत से किसी मोड़ पर मिलेंगे...सब यहीं पर है, मिला ही हुआ है... न तो यहाँ बाद है और न ही पहले..मृत्यु के बात और मृत्यु के पहले ये सब हिन्दुओं की काव्यात्मक धारणा है...सुन्दर है, लेकिन सत्य नहीं...!! न जानना गलत नहीं है लेकिन न जानने की कोशिश करना खतरना है... आपकी ज्ञान ही आपको भटका रही है ...!! दूसरी बात- अगर आपकी तैयार हो तो थोड़ी और गहरी बात कह दूं- आत्मा जैसी कोई चीज़ नहीं होती है, सदियों से बुद्धों को आत्मा के झूठ का सहारा लेना पड़ा है...और सहारा इसलिए लेना पड़ा क्योंकि ये सहायक है, अगर किसी से ये कह दिया जाये कि कुछ नहीं बचेगा तो घबरा जाएगा...चलेगा ही नहीं, इसीलिए गुरु करुणावश साधक से आत्मा के बचने की बात करता है...| "आत्मा एक शरीर छोड़कर दूसरा नया शरीर धारण करती है" ये तो नितांत अज्ञानता वाली बात हो गयी...क्या आप सोचते हैं कि कहीं कोई बना बनाया शरीर का पुतला रखा होता है जिसमे आत्मा प्रवेश कर जाती है...?? शरीर और आत्मा दो चीज़े नहीं है..वो एक ही हैं...कहीं कुछ नहीं बचता है...और जो बचता है वो आप नहीं हैं, न ही आत्मा है...'वो बस है' वो सदा था सदा रहेगा....उसका आपसे कोई लेना देना नहीं है...अस्तित्व में पुनुरुक्ति नहीं होता है...जब एक लहर गिरती है तो वो सदा के लिए समाप्त हो जाती है...सागर फिर नए लहर के रूप में उठता है...जैसे सागर के लिए कोई लहर ख़ास नहीं है उसी प्रकार आप भी अस्तिव के लिए ख़ास नहीं है...यहाँ आपको बचाने की चिंता किसी को नहीं है...'आपके होने या न होने से कोई भेद नहीं पड़ता', बचाने की आकांक्षा अहंकार की आकांक्षा है...अहंकार ने ही आत्मा की इज़ाद की है, दिल बहलाने के लिए ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है 'चलो ऐसे नहीं तो वैसे तो बचेंगे', ... ये जो पुनर्जन्म की धारणा है वो भी missunderstood concept है..कभी बाद में इस विषय पर चर्चा करूँगा...!!

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

आदरणीय सूफी मुहम्मद जी,आप हमेशा ग़लतफ़हमी में क्यों जीते हैं.कहते हैं की विचार इसान की छवि होते हैं.अगर आप के विचारों को मै आप की छवि मान लूँ तो मुझे अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है की वो बेहद ख़राब है.आप ये बताइये की मैंने अनिल जी से लड़ाई कब की ? और अनिल जी से मै क्यों डरूंगा ? मै नहीं भी ये सब करता तो भी चलता रहता,उससे क्या फर्क पड़ता ? जागरण जंक्शन से आग्रह मैंने अपने विवेक से दिया था.अपने कुछ कमेंट में अनिल जी ने ऐसा करने का सुझाव भी दिया था.आप को विश्वास न हो तो मेरा लेख "जागरण परिवार से निवेदन" में उनके कमेंट पढ़ लें.आप हमेश आपस में लड़ाने-भिड़ने वाली बात क्यों करते हैं ?आप ने मेरे कमेंट में ये पढ़ा होगा-"बचपन से मेरी आदत है कि पांच रुपये की हांड़ी (मिटटी का बर्तन) भी लेता था खूब ठोंक बजाकर.आज भी वही आदत बरकरार है.किसी के ज्ञान को परखने का मेरा अपना ही एक अलग तरीका है.चाहे सूफी जी हों या अलीन जी,कुछ बातें उनकी सही होती हैं और कुछ गलत भी.उनकी सही बात का समर्थन करना चाहिए और गलत बात का विरोध.दुश्मनी क्या चीज होती है मै नहीं जानता." और जागरण जंक्शन वाले कमेंट में ये भी पढ़ा होगा-"उनके किसी लेख में कोई आपत्तिजनक बात होगी तो जरुर आप से शिकायत करेंगे और आप कार्यवाही भी कीजियेगा." आप कमेंट ध्यान से पढ़कर तब कमेंट किया कीजिये.आपस में लड़ना-भिड़ना ही आप का शौक और घटिया राजनीती है.आखिर में एक बात और वो ये की हम लोग ऐसे कमेंट आदरणीय सरिता जी के इस ब्लॉग पर न करें ,यही बेहतर है.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

१.)मृत्यु को झुठलाना मतलब जीवन का इंकार करना, जो मृत्यु को झूठ मानेगा उसका जीवन भी थोथा हो जाएया, उथला-उथला हो जाएया...जीवन का सारा मज़ा इसी बात में है कि एक दिन मरना है...आपका ये कहना कि 'जीवन या मृत्यु एक खूबसूरत झूठ है- निराशावादी लोगों को थोडा सुख ज़रूर पहुंचेगा...लेकिन सान्त्वना सत्य नहीं होता... इस तरह की जीवन और मृत्यु विरोधी धारणा ने इस देश को काहिल, आलसी और शिथिल बना दिया....लोगों को सुस्त बना दिया... २.) मेरे देखे जीवन और मृत्यु एक निरंतर साथ चलने वाली प्रिक्रिया है...हम प्रति पल मर रहे हैं और प्रतिपल नए हो रहे हैं, जीवन एक परवाह है जहाँ निर्माण और विध्वंस साथ चलता रहता है...३) ज़रुरत है कि हम मृत्यु के प्रति सजग हों, उसका चिंतन करें...क्योंकि जो शरीर हमें मिला हुआ है उसका मरना एक दिन तय है, तो उचित ये होगा कि हम इस शरीर का उपयोग कर लें...और इसका एक ही उपयोग है कि हम इससे आत्मवान हो जाएँ... ये बात बिलकुल गलत है "सत्य तो कोई और है जो इससे होकर गुजरता है" कोई इससे हो कर नहीं गुज़रता है, जो गुज़र सकता है उसका जन्म अभी नहीं हुआ है, जैसे बीज पेड़ हो सकता है, उसमे फूल खिल सकते हैं, खूशबू उठ सकती है, ये सब उसकी सम्भावना है लेकिन ज़रूरी नहीं कि हर बीज पेड़ हो जाए, उसी तरह हर मनुष्य आत्मवान हो सकता है, ये बस पॉसिबिलिटी है...सत्य नहीं...Hence, death or life cannot be taken for granted. और जो आत्मवान है उससे ये कहना कि तुम नहीं मरोगे बकवास है क्योंकि जब तक कोई होश पूर्वक मृत्यु में खुद न उतर कर देख ले वो आत्मवान नहीं हो सकता है, जो आत्मवान है वो सत्य को जनता है वो सत्य को जान कर ही आत्मवान हुआ है....हम अभी नींद में बेहोश हो जाते है मौत तो बड़ी बात है, नींद तो नींद दिन में भी विचारों से आच्छादित रहते हैं..., ४) उचित हो कि हम ये कहें कि ऐसा उपाय है ऐसी साधना है जिसके तहत 'हम होश पूर्वक मृत्यु में उतर सकते है...हम जान सकते हैं कि मौत क्या है, हम जान जान सकते हैं कि नींद क्या है, नींद में हमारे साथ क्या होता है... और एक बार जिसने नींद में होश कायम रख लिया वो मृत्य़ु को भी जान सकता है...ये देख सकता है कि मैं शरीर नहीं हूँ, ये बात मानने की नहीं है कि मैं शरीर नहीं हूँ मानने से खुछ नहीं होगा, बीज अगर मान भी ले कि मैं पेड़ हूँ उससे हो पेड़ नहीं हो जाएगा... ५) आपने सम्भावना को सत्य मान लिया है...जो खतरनाक है... लोगों को भटका सकता है, आम जीवन के संवेदनाओं को समाप्त कर सकता है...लोगों को उदासीन बना सकता है, हम पहले से ही बहुत ही सुस्त और उदासीन है... 'ये सच है कि आत्मा अमर है' लेकिन अभी हम आत्मा नहीं है, हम शरीर हैं, इसीलिए शोक मनाना उचित है...मौत से डरना तर्कसंगत है, डर समाप्त होने से आत्मअनुभव नहीं होता है अनुभव से डर समाप्त हो जाता है...!!! और हमेशा ज़िंदा ही मरता है, जो जितना ज़िदा होता है उतनी आसानी से मरता है, मुर्दे नहीं मारा करती अनील बाबू...मुर्दे नहीं मारा करते...!!

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

यकीन नही होता न. कुछ पल के लिए मुझे भी यकीन नहीं हुआ था. ऐसा लगा मानों आसमान को जमीन मिल गयी हो या फिर दो समान्तर रेखाएं कहीं दूर जाकर एक हो गयी हो. बात है परसों रविवार सुबह १० बजकर ५१ मिनट की. पिछले १५ दिनों से अँधेरे को लेकर अपना अनुभव शब्दों में व्यक्त करना चाह रहा था. वैसे ही जैसे कोई प्यासा अपनी प्यास को शब्दों में व्यक्त करना चाह रहा हो. इसका जिक्र मैं अपने मित्र संदीप झा से भी सेलफोन वार्ता में किया था. उसने कहाँ कि कोशिश करके देख लो. परन्तु समय के आभाव के कारण खुद को इसके लिए वक्त नहीं दे पा रहा था. परसों रविवार की छुट्टी थी और कुछ वक्त भी; माँ के लिए, मिसेज के लिए, अलीना के लिए और निश्चय ही कुछ खुद के लिए. अतः कागज़ और कलम की तलाश लिए बेडरूम में प्रवेश किया जहाँ मिसेज रो रही हमारी बेटी अलीना को चुप कराने में लगी हुयीं थी.अतः कागज और कलम को भूलकर वहीँ बैठ गया. तभी बेडरूम से लगे हुए बालकनी के रेलिंग से होते हुए एक आवाज आई, "राम-नाम सत्य है." सुबह के १० बजकर ५५ मिनट हो रहे थे. रेलिंग पर जहाँ मेरी माँ पहले से ही मौजूद थी, जाकर देखा चार व्यक्ति किसी एक को कंधे पर उठाये हुए चले जा रहे है और उनके पीछे तक़रीबन ७०-८० लोग भागे जा रहे हैं. ऐसा लग रहा था जैसे जिंदगी और मौत की घुड दौड़ लगी हो एक ऐसी दौड़ जिसमे किसी की जितने की कोई उम्मीद नहीं. एक सिरे पर जीत और दुसरे सिरे पर हार, पर क्या यह संभव है कि जीत हार में बदल जाए या हार जीत में बदल जाए? असंभव! या तो जीत होगी या फिर हार. कहीं कोई ऐसी बात तो नहीं जो इस जिंदगी और मौत से भी महत्वपूर्ण हो. खैर, इस बात से बेफिक्र था. अचानक मेरा ध्यान अपनी माता जी पर गया जो बगल में रखे मेरी तौलिया को अपने सर पर रखी हुई थी. मुझे भी जाने क्या हसीं-मजाक सूझी की, मैं उनसे बोला, "आप अपना तौलिया अपने सर पर रखिये, आप खुद को उस व्यक्ति के आत्मा से बचा लीं परन्तु यदि उस व्यक्ति की आत्मा तौलिये के सहारे मेरे सर पर सवार हो गयी फिर मैं तो गया काम से." यह कहकर जोर-जोर से हँसने लगा. तभी निचे से किसी की आवाज आई, "जिन्दा! मर गया और आपको हसीं सूझ रही है. पर जिस बात पर मैं हँस रहा था उसे बताना मेरे लिए मुश्किल था क्योंकि मुझे पता था कि वह बात उसके समझ के बाहर है. इससे बड़ा हास्यपद बात क्या होगी कि कोई जिन्दा हो और वह मर जाए, कोई प्रकाश हो अँधेरा हो जाए, या तो वह जिन्दा है या फिर मर गया हो, या तो प्रकाश है या फिर अँधेरा या यह दोनों एक झूठ हो और सत्य इससे अलग कुछ और. परन्तु सत्य यह भी है कि हम मृत्यु को सत्य मानकर जिंदगी को झूठ कर दिए हैं और सदियों से मृत्यु के इंतज़ार में मरे जा रहे हैं. सत्य तो यह है कि यह जीवन और मृत्यु किसी एक की दो अवस्थाएं वरना यदि यह सत्य होता तो दोनों का एक अपना अलग स्वरुप होता. ऐसे में कभी जिंदगी मौत में तब्दील नहीं होती. सत्य तो यह है कि यह बिलकुल झूठ है जैसे सुबह का शाम होना झूठ है. यह तो सूरज है जिसकी रोशनी धरती के जिस-जिस कोने पर पड़ेगी वहाँ सुबह और ठीक उसके विपरीत शाम होती है. परन्तु इन दोनों के बोच में ऐसी कई अवस्थाएं भी होती है जो सुबह से शाम की ओर अग्रसर होती है और फिर शाम से सुबह की ओर. आइये इसे एक और उदहारण से समझते हैं. जीवन और मृत्यु को यदि एक तराजू के दो पलरा मान लिया जाय तो हम देखते हैं कि कभी कोई पलारा भारी पड़ता है तो कभी कोई. दोनों में ही विरोधाभाष है और जहाँ नहीं है दोनों बराबर हो जाते हैं वहाँ विरोधाभास ख़त्म हो जाता है. परन्तु कभी भी एक पलरा दुसरे में तब्दील नहीं होता. यह जीवन-मृत्यु भी किसी तराजू के दो पलरे है जो कभी एक हो ही नहीं सकते, कभी एक दूसरा में तब्दील हो ही नहीं सकता और यदि हो जाए तो एक ख़त्म हो जाएगा. जैसे ही एक ख़त्म हुआ कि दुसरे को भी ख़त्म होना ही है. या नदी के दो किनारे जो कभी एक हो ही नहीं सकते. कभी भी कहीं भी मिल नहीं सकते. यह तो कोई मुसाफिर है जो इस पर से उस पार जाने का साक्षी होता है. यह सफ़र कुछ ऐसा है जैसे कोई यात्री एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन तक जाने के लिए उतनी दुरी का टिकट कटा कर बैठ जाता है और फिर सफ़र ख़त्म होते ही, टिकट की वैलिडिटी ख़त्म. फिर एक नए सफ़र के लिए नयी वैलिडिटी.ऐसा ही कुछ जीवन-मृत्यु है......एक खूबसूरत झूठ!..........सत्य तो कोई और है जो इससे होकर गुजरता है.... ............ बस यूँ समझ लीजिये परसो जिन भाई का राम-नाम सत्य हो गया. उनका सफ़र वही ख़त्म हो गया. फिर एक नए सफ़र के लिए उन्हें एक नयी वैलिडिटी की जरूरत पड़ेगी. भैया, अब उनके लिए आप लोग इस स्टेशन पर क्यों उतर गए? आपका स्टेशन अभी आना बाकी है. अतः आप सभी अपनी-अपनी बोगी में जाकर अपना स्थान ग्रहण करें. ट्रेन को हरी झंडी हो गयी है ..........आप सभी की यात्रा मंगलमय हो! (नोट- यह लेख पोस्ट न होने के कारण कमेंट के रूप में प्रेषित कर रहा हूँ.)

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

जब हम खुद को भुत से जोड़ते हैं तो उस समय के लये वर्तमान से मुंह मोड़ लेते हैं. चाहें वो एक पल के लिए हो या एक लम्बे समय के लिए. यदि हम खुद को भविष्य में ले जाते हैं जिसके बारे में हमारा कोई अनुभव नहीं. इसका मतलब कि हम खुद को उस रूप में देखना चाहते हैं जो हम हैं ही नहीं. एक शराबी शराब के नशे में एक साधू को साधू को जी भर गाली बकता रहा परन्तु साधू उससे कुछ नहीं बोला. अगले दिन जब शराबी उस साधू से मिला तो बोला प्रभु शराब के नशे में बहुत बड़ी गलती हो गयी. आपको गाली दे दिया मुझे माफ़ कर दीजिये. हँसतें हुए उस साधू ने कहाँ कहाँ जिसे तुम गाली दिए थे वो कोई और था, और मैं कोई और तो माफी का सवाल ही नहीं उठता. इसी प्रकार जो गाली दिया था वो कोई और, और तुम कोई और. तो फिर मैं तुमसे नाराज क्यों होऊ? यदि तुम वही हो तो जाओ उससे मीलों जिसे तुम गाली दिए क्योंकि मैं तो अब वो नहीं रहा..................महोदय क्या संभव है उस शराबी के लिए उस साधू के अतीत से मिलना और यदि वो इस प्रश्चाताप के लिए उसे भुत में ही खोजता रहा तो क्या उसका जीवन स्थिर नहीं हो गया? क्या वो जीते जी नहीं मे गया? एक व्यक्ति के पिता बहुत बीमार थे. उसके पास इलाज के लिए पैसा नहीं था. वह व्यक्ति अपने कर्म को भूलकर हमेशा यही सोचता रहता कि इतने पासे कहाँ से प् सकूँगा क्योंकि कोई भी व्यक्ति उसकी मादा करने को तैयार नहीं था. एक रात एक सपने में देखता है कि एक महीने बाद मैं लखपति बनाने वाला हूँ. अतः सबकुछ छोड़कर अपने भविष्य में खो गया. १५ दिनों के बाद उसके पिता की मृत्यु हो गयी. परन्तु वो आज भी उसी वक्त इंतज़ार कर रहा है कि वह लखपति बन सके. इसप्रकार खुद को भविष्य में कैद कर स्थिर कर दिया, मृत कर दिया.

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

---शालिनी जी ने सत्य ही कहा है.... ---- दिनेश जी हिंसा किसे कहते है क्या पता है.......... वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति........ युद्ध में शत्रु को मारना हिंसा नहीं है...... यदि सारे सैनिक युद्ध से डरकर ...सीमा से भागकर आजायें तो आपका क्या होगा.....उचित समय पर उचित कर्म ही कर्म है ......आपको गीता पढ़ने की अत्यंत आवश्यकता है , स्वयं नहीं किसी तात्विक ज्ञानी से इसका अर्थ समझिये ...... -----अनिल जी .... सही पूछा है ....गीता चाहे पढ़कर या बडे लोगों के अनुभव से सुनकर, सीखकर , जानकर समझें ..उसके बाद ही कर्म क्या है उसका ज्ञान होता है .....वकालत जानना आदि प्रोफेशनल कार्यों को कर्म नही कहते परन्तु उन्हें कैसे परमार्थ रूप में प्रयोग किया जाए उसे कर्म कहते हैं........... वास्तव में जिन्होंने किसी भी माध्यम से गीता-ज्ञान को जाना समझा नहीं है( सभी को गीता पढ़ने को न मिल पाती है न आवश्य है कि वे समझ पायें अतः वे अपने अनुभवी लोगों से समझते हैं , गीता पढ़ना आवश्यक नहीं गीता-ज्ञान जानना व उस पर चलना महत्वपूर्ण है )  वे सब कर्महीन ही हैं एवं अकर्म में लिप्त हैं यही तो आजकल के सामजिक द्वंद्वों का कारण है ......

के द्वारा: drshyamgupta drshyamgupta

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

जिनको पच्छिम में पागलखाने में डाल दिया जाता है उस तरह के लोगों को हमने यहाँ भारत में धर्मगुरु और ज्ञानी बना रखा है...माना की भारत एक उदार देश है लेकिन उदारता की भी एक हद होती है, अब ये सब बर्दाश्त से बहार की बात है...!! 'अपना अपना सोच' होना गलत नहीं है लेकिन जब आप अपने दिमाग के कूड़ा-कचड़ा को दुसरों के दिमाग में डालने लगते हैं तो दिक्कत पैदा हो जाती है, और जब सद्गुरु जी, अनील जी, जवाहर जी, दिनेश जी, मनोज जी या फिर रंजना जी जैसे उच्य स्तर के लोग इस तरह का काम कर रहे हो तो और भी मुश्किल पैदा हो जाती है...लोग आपको पढ़ते हैं आपको सम्मान देते हैं इसका ये मतलब तो नहीं कि आप लोगों के अज्ञानता का फायदा उठाएंगे...??? 'गीता को गलत कहना, समझ रहे हैं आप कितनी बेहूदगी की बात है', बोलने की आजादी है लेकिन गाली देने की नहीं...मैं किसी भी प्रकार के पागलपन के विरोध में हूँ, चाहे वो धार्मिक पागलपन ही क्यों न हो...!! मैं इस देश के प्रतिभावान युवकों और बुद्धिजीवियों से निवेदन करता हूँ कि वो आगे आएं और इन सड़क छाप पंडितों और ज्ञानियों को रास्ता दिखाने में मेरी मदद करें...!!! 

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

मेरी सहमति प्राप्त है आपको, गीता समस्त ग्रंथों का सार निचोड़ है, जैसे हीरों में कोहिनूर है वैसे गर्न्थों में गीता...! गीता के बारे में मैं बस इतना कहूंगा, 'अगर ये ग्रन्थ आपको समझ न आए तो समझिये आपकी समझ कमज़ोर है, ग्रन्थ का इसमें कोई दोष नहीं है'. जब भी कोई गीता की निंदा करता है मैं व्यथित तो ज़रूर हो जाता हूँ, लेकिन निराश नहीं होता, आज न कल अनिल को भी गीता की महिमा समझ में आ जायेगी..क्योंकिं झूठ नपुंसक होता है, ज्यादा देर नहीं टिक सकता है,..!!! मनुष्य के दुर्भाग्य की कोई सीमा नहीं है, अँधा वजाय इसके की अपनी आँख ठीक कराये, प्रकाश को ही इंकार करने लगता है..!! अनील जी, सदगुरजी, दिनेश जी, रंजना जी, जवाहर जी जैसे लोगों का पुरजोर विरोध होना चाहिए, ये असामाजिक तत्व हैं..अपने शब्दों की जादूगिरी के दम पर लोगों को गुमराह कर रहे हैं, और लोगों के धार्मिक भावना को ठेस पहुंचा रहे हैं...!! हाथी बैठा भी रहेगा तो घोडा गधा से ऊँचा रहेगा, भारत कितना भी गिर गया आज भी धार्मिक मामलों में समस्त संसार का बाप है...'कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी' ..नास्तिकता रोग है...इसका इलाज़ होना चाहिए...!!!!

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

जे-जे परिवार के इतिहास में संभवतः, पहली बार है जब आपकी बातों से लग रहा है कि आप अपना बचाव कर रहीं है. शायद भाग रहीं है मुझसे नहीं पर यक़ीनन खुद से. आप कहना, "आप किसी बैनर तले प्रतियोगिता में भाग नहीं लेते या कभी नहीं लेते ??कृपया स्पष्ट कीजिये." इसमे स्पष्ट करने वाली कोई चीज नहीं. मेरी बाते स्पष्ट है फिर उस पर ध्यान द्जिये. हाँ मैं इतना जरुर कहना चाहूँगा कि मेरी प्रतिस्पर्धा खुद से है न कि औरों से. सफलता-असफलता, हार-जीत मेरे लिए कोई मायने नहीं रखता. यह एक सत्य है कि न मैं कभी हारा हूँ और न ही जीता हूँ. न कभी हार सकता हूँ न कभी जीत सकता हूँ. जी मैं सवाल देह के समर्थन या असमर्थन में नहीं उठाया हूँ. अतः इसकी बात करना एक बेईमानी होगी. मैं सवाल उठाया हूँ उस मानसिकता पर जो खुद को संस्कारी एवं पाक समझता है, मैं सवाल उठाया हूँ उस मानसिकता पर जो सच के आड़ में झूठ को सहारा देता है.................मैं सवाल उठाया हूँ गीता के सहारे सारे धार्मिक ग्रंथों पर जिसके दम पर लोग दावा करते है एक सभ्य और मर्यादित समाज की स्थापना का जो आज तक नहीं पूरा हुआ.

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

जब आपने ये ठान रखा है कि हर बात को काटना है तो फिर आपकी अडिगता की सफलता को नमस्कार....आप किसी बैनर तले प्रतियोगिता में भाग नहीं लेते या कभी नहीं लेते ??कृपया स्पष्ट कीजिये क्योंकि फ़िलहाल तो आप तर्क -कुतर्क की प्रतियोगिता में बढ़ चढ़ के हिस्सा लेते हुए दिख रहे हैं.. अरे हार-जीत से क्या डरना , हर कोई विजयी थोड़े ही हो जाता है..पर भाग ज़रूर लेना चाहिए , इससे अपना स्तर पता चल जाता है और हिम्मत बढ़ती है ...हाँ कोई साधू मानवीय देह से खिलवाड़ तभी कर पाता है जब देह खुद उसको ये अवसर मुहैया कराती है. ..जिसे नहीं कराना होता है वो विरोध में आवाज़ उठाता है..आसाराम के ऊपर इतने घिनौने आरोप के बाद भी कितनी औरतें उसके पक्ष में बोली थीं...आप उन्हें क्या नाम देंगे...??और थ्योरी कभी भी झूठ नहीं होती..अगर होती तो हम इस लैपटॉप द्वारा आपने विचारों का सेकंडों में आदान प्रदान न कर पाते...

के द्वारा: sinsera sinsera

सादर प्रणाम दी! यदि ऐसा है तो वह आपका परसेप्शन है, अनुभूति या अनुभव नहीं. यदि है तो यक़ीनन वह फैशन इधर नहीं. यहाँ तो आस्तिक होने या न होने का सवाल नहीं उठाया गया. कहीं आप यह तो नहीं कहना चाहती कि किताबों और ग्रंथों को सत्य कहना आस्तिकता है. कहीं आपका कहना यह तो नहीं कि सूरज के निकलने पर अँधेरा फ़ैल जाता है. तो मैं यह बात दूसरों के मानाने वाली हो सकती है मेरी नहीं. मैं कोई लेखक नहीं हूँ और न ही किसी दिए हुए टोपिक पर लिखता हूँ और न ही किसी लेखन प्रतियोगिता में भाग लेता हूँ. मैं बस वही लिखता हूँ जो मेरी अनुभव और अनुभूति है. क्या अटल है गीता और ग्रन्थ ....यह एक झूठ और गलतफहमी के सिवाय कुछ नहीं.......यह बस एक साधन है मात्र है ताकि इसके आड़ में हमारा स्वार्थ, सत्ता और वर्चस्व का कायम रहे हैं. जिसकी होड़ में दिन पर दिन अँधेरा फैलता जा रहा हैं, लोग एक-दुसरे को मार रहे हैं, काट रहे हैं, ......! यह एक आवलंबन हैं खुद को छुपाने का. जिसके आड़ में आसाराम जैसे साधू मानवीय भावनाओं के साथ-साथ देह से भी खिलवाड़ कर रहे हैं......................आप थ्योरी की बात ही मत करिए क्योंकि हर थ्योरी एक झूठ है ....................

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

सदर चरण स्पर्श! आपकी सारी बातों से इत्तेफाक रखता हूँ. मैं पुरे समाज को दोषी कतई नहीं ठहराया हूँ.....बस मैं शरीर के उस हिस्से पर चाकू चलाया हूँ जहाँ फोड़ा हो गया है. अतः आपरेशन अत्यंत आवश्यक है............वरना पूरा शरीर इसके चपेट में आ जायेगा. हाँ ऐसा करने से जुबान से आह और दर्द तो निकलेगा ही पर इसके लिए हाथ, पैर, नाक, कान, ह्रदय की फिक्र तो बंद नहीं किया जा सकता............ ............और यहाँ महत्वपूर्ण यह नहीं है कि मैं सही किया कि गलत बल्कि यहाँ यह महत्वपूर्ण है कि बुद्धिमान लोगों को सजग और सावधान करते हुए नव निर्माण के लिए प्रेरित किया जाय ताकि ....................अंत में आपकी सारी बातों से सहमत हूँ.............आपका प्यार और आशीर्वाद मिला............उसके लिए हार्दिक आभार.........आपकी बहु आपकी बहुत याद करती है. उसके तरफ से आपको सादर चरण स्पर्श और अजय को शुभ आशीर्वाद ...........आप सभी का , अनिल

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

जी, माफ़ करिए मैं समाज को बदलना नहीं चाहता बल्कि मैं उन बेकसूर लोगों को बचाने की कोशिश करता हूँ जो आये दिन इस समाज की मुर्खता से अपना अमुल्य जीवन गवा बैठते हैं............जहाँ तक रहा सवाल मेरी और अन्जानी की शादी का तो मूर्खों और स्वार्थ की वजह से गलत परंपरा का सपोर्ट नहीं करूँगा ...............और यह सिंह और गुप्ता इन्हीं मूर्खों का बनाया हुआ है. आपको लगता है कि मैं अपने संतानों की शादी इन मूर्खों में करूँगा नहीं बल्कि वहां करूँगा जहाँ वो बेहतर समझते हैं. वैसे भी यह जाति कुत्ते और बिल्लियों की होती है जैसे कि कुत्ता, बिल्ली, सूअर, चूहा, गदहा..............यह सब अलग-अलग जाति के हैं.....पर हम सबका एक जाति है और वो है मानव जाति ...................और आपने जो खुद समाज में प्रेम विवाह को देखा है उसे मैं आज से २० साल पहिले ही देख लिया था और यह सब-कुछ सोचसमझकर किया हूँ.हाँ यह जरुर चाहूँगा कि आप हमें भी देखिये ............दूसरी बात मैं अन्जानी से विवाह इसलिए नहीं किया कि मुझे उससे प्यार था बल्कि इसलिए किया क्योंकि यह समय और सत्य की मांग है...........क्योंकि यह हमारा धार्मिक और क़ानूनी अधिकार है जीवन साथी चुनने का........क्योंकि यह समाज की रुढ़िवादी परम्पराएँ फोड़े का रूप लेकर सडन पैदा कर रही हैं................अतः आपरेशन जरूरी हो गया है................!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

प्रिय बेटा अनिल नववर्ष की शुभकामनाओं सहित तुम्हें और अंजना को बहुत बहुत प्यार अजय ने तुम्हे जो जवाब भेजा है उसने मुझे पढ़कर सुनाया उसने जो भी आपको लिखा आपको बुरा भी लग सकता है मैंने उसे समझाया वो तुमसे बड़े हैं उनका अनुभव तुमसे ज्यादा है तुम बड़े भाई की बात को मानकर अपना जीवन सफल बनाओ हाँ में तुमसे बड़ी हूँ और तुम्हारी माँ समान हूँ तुम्हारा लेख मैंने पढ़ा उसमें तुमने समाज के सभी लोगों को एक नज़रिए से देखा है ऐसा नहीं है की समाज में सबके विचार एक जैसे हों हाँ ये बात और है की बच्चा जब एक विशेष वर्ण व्यवस्था में जन्म लेता है तो माता पिता उसे अपने समाज के रीती रिवाजों के बारे में बताते हैं और अपने ही समाज में बनायीं गयी व्यवस्था के अनुसार उसको उचित संस्कार देते हैं लेकिन बड़े होकर जब बच्चे अपनी मर्जी से दुसरे समाज को अपना लेते हैं तो जरुरी नहीं है की सभी उनके इस कार्य का विरोध करें कुछ लोग इसे भगवान् की मर्जी समझकर और इश्वर द्वारा बनाये गए उनके इस जोड़े को मान्यता दे देते हैं क्योंकि वह ये समझते हैं की जो शक्ति सृष्टि को चला रही है उस शक्ति के आगे कोई बड़ा छोटा नहीं है सब एक जैसे हैं और में भी येही कहूँगी की सबसे पहले हम सब भारतवासी हैं उसके बाद हम समाज के हैं तुमने जो भी किया वो गलत नहीं मेरा तुमको येही आशीर्वाद है तुम सुखपूर्वक अपना जीवन व्यतीत करो आगे कब आना होगा सूचित करना धन्यवाद तुम्हारी मात्र तुल्य श्रीमती पुष्पा पाण्डेय

के द्वारा: smtpushpapandey smtpushpapandey

आदरणीय अनिल भैया आज बहस कर ही लेते हैं पता चल ही जाएगा कौन सही है और कौन गलत आप सही हैं तो भी ठीक में गलत हूँ तो भी ठीक अब आप जरा सोचिये जब आप अंजना सिंह जी से शादी करने वाले थे तो समाज ने भी ऊँगली उठाई होगी और आपने जाती से बाहर प्रेम विवाह किया तो भी ऊँगली उठी होगी हाँ में मानता हूँ की आप समाज को बदलना चाहते हैं पर समाज को दोषी करार नहीं दिया जाता समाज को जागरूक करके बदला जा सकता है जब आपने अंजना से शादी करी तब भी तो समाज चौतरफा वार कर रहा होगा थु थु हो रही होगी कह रहे होंगे की देखो अनिल कितना गलत है प्रेम विवाह कर रहा है में अंजना जी को कुछ नहीं कह रहा हूँ क्योंकि वह मेरी भाभी हैं और मुझे हक़ नहीं बनता की में कोई गलत बात उनके लिए कहूं और आपको नाराज करना भी मेरा मकसद नहीं आपने भी गलत ही किया है अपनी जाती से बाहर शादी करके कोई सही काम नहीं किया है जो आप इतना इतरा रहे हैं सोचिये आप किस किसका मुह बंद करते समाज में याद कीजिये आप मान्यता पाने के लिए कैसे समाज से लड़ रहे थे इस शादी के लिए फिर समाज ही काम आया आपको मान्यता दिलवाने के लिए तब फिर इस शादी को आपके माता पिता ने स्वीकारा अब आगे को आपके बच्चे के लिए परेशानी होगी समाज ही कहेगा यह बच्चा गुप्ता समाज का नहीं है इसमें सिंह समाज का खून दौड़ रहा है समाज ही आपके बच्चे की शादी अपने गुप्ता समाज में नहीं होने देगा फिर आपके बच्चे को परेशानी होगी वह सोचेगा की किस समाज को अपनाए उसके लिए यह समस्या खड़ी होगी में ऐसे ही नहीं कह रहा हूँ मैंने यह खुद देखा है प्रेम विवाह के बाद क्या होता है बाकी आप खुद समझें लेख में आपकी बातें गलत हैं आप मानें या न मानें आप खुद ही अपने विषय पर ध्यान दें और समझें में क्या कहना चाहता हूँ बाकी आप खुद समझदार हैं धन्यवाद अजय कुमार पाण्डेय

के द्वारा: ajay kumar pandey ajay kumar pandey

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

आदरणीय अनिल जी शायद १९९८ - ९९ की बात है कानपुर में भारत और आस्ट्रेलिया का क्रिकेट मैच हो रहा था, और सचिन तेंदुलकर ताबड़ तोड़ बैटिंग कर रहे थे ............. ! उनकी बैटिंग से ऐसा लग रहा था की अभी उनका शतक लगा और अभी भारत जीता परन्तु जब सचिन करीब ८० रन के पास होंगे की बारहवां खिलाड़ी उनके लिए एक बोतल में पानी लेकर आया, और उसके बाद से सचिन अचानक ऐसे खेलने लगे जैसे टेस्ट मैच खेल रहे हों ........जो ८० रन उन्होंने ४० गेंदों में बनाए थे तो बाकी बीस रन बनाने में वो पूरी ६० गेंद खा गए..........! बाद में अखबारों के माध्यम से पता चला की तत्कालीन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मैच देखने आने वाले थे और सचिन के खेलने से ऐसा लग रहा था की कहीं भारत उनके आने से पहले ही न जीत जाए तो सचिन को थोडा धीरे खेलने को कहा गया था.................. ! ऐसा ही आपके लेख को पढ़कर लगा आपने शुरुआत बड़े ही प्रभावी ढंग से की लेकिन ये कौन मुख्यमंत्री है जिसके लिए आप का लेख प्रभावित हुआ..........!, और भैया आपकी हमसे क्या दुश्मनी है जो अपने अनुज को हमारे ब्लॉग पढने को नहीं कहा ........ ये कहिये की हमारे ही लेख पढें बस ........ :) बाकी सब बढ़िया है लगे रहिये........

के द्वारा: munish munish

के द्वारा: Sandeep Kumar Sandeep Kumar

जी, समाज या किसी एनी व्यवस्था को बदलने की जरुरत क्या है........................................हम खुद को बदल ले सब कुछ..........अपने आप बदलता चला जायेगा..............मैं यहाँ समाज को गलत साबित करने के लिए नहीं लिखता बल्कि मैं उस व्यवस्था की असिलियत सामने रखता हूँ जो खुद को अच्छा कहकर अन्य व्यवस्थाओं को दोषी ठहरा रही है. खुद परदे के पीछे नंगा नाच मचाई हुई है और अन्य व्यवस्थाओं को नंगा कह रही है ................जबकि हकीकत तो यह है कि सारी व्यवस्थाएं सामाजिक व्यवस्था से जन्मी हैं.......................तो स्वाभाविक सी बात है कि यदि किसी व्यवस्था में कमी है तो वो समाज की देन है......मतलब.वो हमारी दें है .................और आगे हम जाना चाहें तो ..................मतलब मेरी देन है................पर इस सत्य को स्वीकार करना कौन चाहता ? आप, मैं या थर्ड पर्सन ...........शायद कोई नहीं तो फिर सामने वाले को दोष देना खुद से एक बेईमानी होगी.............................आपका आगमन सुखद रहा ........हार्दिक आभार......................!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

एक तरफ एक लड़की द्वारा अपनी मर्ज़ी से शादी करने पर उसके बाप द्वारा उसे वैश्या का नाम दिया जाता है और दूसरी तरफ सबकुछ जानते हुए उसका हाथ किसी और के हाथ में देकर उसे वैश्या बनाया जाता है. हद तो तब होती है जब एक सगी माँ अपनी मर्ज़ी से शादीशुदा लड़की को इज्जत और समाज की दुहाई देकर उसके पति से रिश्ता तोड़ने को कहती है और दूसरी शादी करने के लिए प्रेरित करती है. इससे भी हद तब होती है जब उस लड़की के पेट में पल रहे बच्चे को गिराकर उसकी दूसरी शादी करने के लिए उस लड़की को मानसिक रूप से मजबूर करती है.” मित्रवर अनिल जी , ऐसे कई सवाल उभरते हैं समाज में , लेकिन निदान बहुत मुश्किल हो जाता है ! लेकिन अगर आप जिंदगी के हर लफ्ज़ में सवाल देखेंगे तो आपको हर जगह एक नया सवाल मिलेगा लेकिन उसका जवाब नहीं !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

प्रिय अनिल जी सादर,निरीह पक्षियों को क्यों पिंजरे में कैद किया होगा पता नहीं शायद किसी के एकांत को कम करने के लिए इसका उपयोग किया हो जिसका बाद में दुरूपयोग होने लगा. बन्दर को नचाना मदारी कि आजीविका है.फिर उसमे और हममे एक पट्टे का ही तो अंतर है हमारे गले में पट्टा नहीं है वरना तो हम भी उसी तरह उछल कूद कर रहे हैं.बुढापे में जो उसकी स्थिति है वही हमारी भी है. बात हम मुद्दे कि करें कि धर्म समाज किस तरह शोषण कर रहा है.समाज और धर्म सबका निर्माण का उद्देश्य अवश्य ही अपना वर्चस्व बढाने और अनुयाईयों को सुरक्षा देना, यही मकसद रहा होगा.मगर उसका दुरुपयोग होने लगा उसमे रुढिवादिता जुड गयी और फिर दुहाईयों का जोर हो गया. इसको हम आज के राजनेताओं को देखकर भलीभांति समझ सकते हैं.जिनको क्यों चुना जाता है आदि आदि.आज जन उनके विरुद्ध खडा होने लगा है कल समाज के विरुद्ध भी बातें होंगी. वक्त के साथ बदलाव भी होंगे.हाँ मगर मजबूरियाँ आज भी हैं मजबूरियाँ तब भी होंगी.

के द्वारा: akraktale akraktale

अनुज,............पहले तो आप यह निश्चय करें कि आप को सच का साथ देना है फिर झूठ का....................आप जिस बात का समर्थन कर रहे हैं वो स्वार्थ और वर्चस्व से प्रेरित है जो कभी सच हो ही नहीं सकता................दूसरी बात इस आलेख मरें मैंने कहीं भी कुछ अपने तरफ से नहीं कहाँ..............बस वहीँ रखा हूँ सामने घटित हो रहा है ...............आप कि समस्या यह है कि आप अपने उम्र से कभी बहुत आगे चले जाते हैं और कभी बहुत पीछे.............आपको कितनी बार बोला हूँ कि आप वही विषय वास्तु पर ध्यान दीजिये जो आप के समझ के अन्दर है........................आपको बोला था न कि आप यमुना जी और आशीष जी के आलेख पढ़िए क्योंकि आपके लिए वह बहुत जरुरी हैं...................... चलिए अच्छे बच्चों कि तरह बड़े भाई की बात मानिये और काम पर लग जाएँ.......................और हाँ रश्मि मैडम से ध्यान हटाकर पढाई पर लगायें वरना जिस दिन आऊंगा पिटाई होगी........................शुभाशीष......................आपका भाई, अनिल

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

अनिल भैया नमन आपने लेख की शुरुआत तो अच्छी की पर जो आपने समाज के बारे में लिखा की समाज कहता है की एक लड़की की उसकी मर्जी के बगेर उसकी शादी करना गुनाह है और दूसरी तरफ हमारा समाज उसे वैश्या का नाम देता है और सब कुछ जानते हुए भी उसे दुसरे के हाथ में देकर उसे वैश्या बनाया जाता है हद तो तब होती है जब सगी माँ अपनी मर्जी से शादीशुदा लड़की को इज्जत और समाज की दुहाई देकर उसे रिश्ता तोड़ने को कहती है अनिल भैया यह बात सही है जो माँ उसे कहती है शादी अपने ही समाज में होनी चाहिए नहीं तो आगे चलकर बच्चों के लिए समस्या आ जाती है समाज कहता है की यह इस जाती का है हमारी जात का नहीं तो समाज स्वीकार ही नहीं करेगा अपने समाज के बाहर शादी करना तो गलत माना जाता है शादी अपने ही समाज में होनी चाहिए दुसरे समाज की लड़की हमारे अपने समाज में खप नहीं पाती हमारे रीति रिवाज अलग हों और उसके अलग यह तो उसके लिए भी खराब बात होगी खैर इसका में आपको एक उदाहरण देकर बताना चाहता हूँ पहाड़ी और देशी का अंतर पहाड़ियों में जनेउ संस्कार होता है विधिविधान से और जन्मदिन पर पूजा होती है और शादी के भी विधिविधान होते हैं देशी कहेगी हमारे रीती रिवाज करो यहाँ तो पहाड़ी के लिए समस्या होगी हाँ में मानता हूँ की आप मेरे प्रेरणास्त्रोत हैं ब्लॉग पर आने में आप ही ने मुझे मार्गदर्शन दिया उसी का नतीजा है की में आज अच्छे लेख लिख पा रहा हूँ सब आप की ही कृपा है और में आपको नाराज ही नहीं करूँगा पर आपने लड़की की माँ और समाज के बारे में जो भी बात लिखी है वह सरासर गलत है हिम्मत है तो सामने आकर बोलिए पीठ पीछे मत लिखिए बाकी आप खुद समझदार हैं मेरा मकसद आपको नाराज करना नहीं है बल्कि समझाना है यदि कोई ठेस पहुचे तो शमा कीजियेगा धन्यवाद आपका भाई अजय पाण्डेय

के द्वारा: ajay kumar pandey ajay kumar pandey

मित्र अनिल, लेख की शुरुआत बहुत ही अच्छी और रोचक थी....पर कुछ शिकायत है तुम से वो भी सुनो.. हा हा हा हा हा हा हा ...... जब भी बात समजा की होती है...तो उस में से दो लोग बहार हो जाते हैं...एक समाज के विरोध में या कभी-कभी सपोर्ट में बोलने वाला और दूसरा सुनने वाला, न तो बोलने वाला कभी ख़ुद को समाज का हिस्सा मानता है और न ही सुनने वाला ....समाज always remains as 3rd person...means जो वहां बात-चीत के दौरान मौजूद नहीं है.... और जो मौजूद नहीं उसके बारे में बोलना means पीठ पीछे शिकायत करना है..अरे हिम्मत है तो सामने आके बोलों न ...ये चोर की तरह पीठ पीछे क्यों बोलते हो.... हिम्मत है तो जिससे शिकायत है उससे सीधा बोलो... व्यक्ति को बदला जा सकता है समाज को नहीं .. या तो 'I' बदलता है या फिर 'YOU', He/she/they कभी नहीं बदलते हैं....इसीलिए जब भी आलोचना, शिकायत या फिर तारीफ़ करनी हो तो व्यक्ति की करो समाज की नहीं....जैसे मैं अभी तुमसे कर रहा हूँ....!!!!!

के द्वारा: Sandeep Kumar Sandeep Kumar

के द्वारा: अन्जानी- अनिल अन्जानी- अनिल

सादर प्रणाम! इसमे आश्चर्य की क्या बात है.....? यह भारत भूमि अनेक रत्नोवाली है उनमे से आप भी एक बहुमूल्य रत्न है................हाँ............हाँ..............हाँ...............! जी मैंने कहीं इस बात का उल्लेख किया हूँ कि मूलतः कवि और शायर ही हूँ जो १३ वर्ष कि उम्र से कलम उठाया, हाँ मुझे अलंकर, रस, छंद का कोई ज्ञान नहीं है .मैं अपने ही लय और गति में लिखता जाता हूँ.............और आजतक उसमे बदलाव नहीं किया ! आलेख तो बस पिछले दो सालों से लिख रहा हूँ...........सच पूछिये तो अभी तक अपना बेस्ट रचनाएँ सार्वजनिक नहीं किया क्योंकि आज-कल साहित्य चोरों की संख्या बढ़ती ही जा रही है,,,,,,,,एक बार बचपन में एक पत्रकार को अपनी रचना पब्लिश करने के लिए दिया था........पर उसने उसे अपने नाम से पब्लिश कर दिया. अतः मैं अपनी रचनाओं को सार्वजनिक नहीं करता था. वो तो आप लोगों की मेहरबानी है कि आप लोगो के बीच कुछ रचनाएँ ला पता हूँ......उस समय एक शेर लिखा था वो याद आ रहा है गौर फरमाएं,,,,,,,,,,, कुछ लोग अपना गलत पहचान देते हैं कि गैरों के शेरों को अपना नाम देते हैं, कुछ लोग ऐसे भी हैं यारों जो किसी लायक नहीं;फिर भी लोग उन्हें इनाम देते हैं............... अब सवाल यह उठता है कि चोट बहुत बचपन में लगी है ? तो आपने सच पहचाना क्योंकि जिस क्षेत्र में रहता हूँ. देखा हूँ राजपूत और ब्राहमणों का अत्याचार जिसके भुक्तभोगी दलित और पिछड़े हैं.............बदलाव तो बहुत हुआ है पर आज भी बहुत कुछ वैसे ही है.............यहाँ दोष किसी जाति विशेष का नहीं है बल्कि मानव स्वभाव का है जो स्वार्थ, सत्ता और वर्चस्व के अधीन होकर.......सारी सीमायें पार कर जाता है..........अतः मैं मानसिक और बौद्धिक विकास का समर्थन करता हूँ...........आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया का हार्दिक आभार...............!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

सादर चरण स्पर्श, नाना जी.....! जी, ऐसा कुछ भी नहीं है...........समाज में व्याप्त, सच्चा और झूठा गुरु की मान्यता और उसके कारण पर प्रकाश डाला हूँ...............मैं किसी भी ऐसे निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा हूँ जैसा की आप मेरे इस आलेख को पढ़ने के बाद व्यक्त किया है................हाँ इतना जरुर कहना चाहूँगा कि यदि ज्ञान देने वाला ही गुरु है तो संसार कि हरेक चीज और घटना गुरु है, वो चाहें अच्छी हो या बुरी हो.................क्योंकि संसार की हरेक चीज और घटना ज्ञान की स्रोत है........यदि ऐसे में हम किसी एक पर विचारों को स्थायी करके उसे श्रेष्ठ कहने लगे या पूजने लगे तो निश्चय ही हम उस परमपिता परमेश्वर की बाकि चीजों को तिरस्कृत कर रहे हैं...............ऐसे में यह हमारी प्रवृति हमारी मुर्खता और अज्ञानता की द्योतक है..............आपका प्यार और आशीर्वाद मिला..............हार्दिक आभार...........!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

एक शराबी के दो बेटे थे जो अक्सर अपने बाप को शराब के नशे में माँ को मारते-पीटते देखा करते थे. इस घटना को देखकर एक सोचता था कि शराब बहुत बुरी चीज है क्योंकि इसे पीने के बाद आदमी होश में नहीं रहता कि वो क्या कर रहा है. दूसरा सोचता था कि बड़ी ही मजेदार चीज है पीने के बाद आदमी क्या चौके-छक्के लगाता है. वो समय भी आता है जब दोनों बड़े होते है और वैसा ही बनते है जैसा वो सोचा करते थे. एक घटना का दो अलग व्यक्तियों पर अलग-अलग प्रभाव यह दर्शाता है कि गुरु सच्चा और झूठा नहीं होता………..या तो वो सिर्फ सच्चा होता है या सिर्फ झूठा या फिर गुरु के घटित होने कि घटना सच और झूठ से परे है…………. आपने जो उदहारण दिया है मित्रवर अलीन जी , सार्थक बात कहता है ! जैसा हम सोचते हैं , हमेशा तो नहीं किन्तु अधिकांशतः हम वैसे ही बनते हैं ! बहुत प्रभावी लेखन ! शादी के बाद तो आपके लेखन में दिनोदिन निखार आ रहा है , हहाआआआआआ

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

हमें आपके प्रति कर्तव्यों और दायित्वों का पूरा बोध हैं परन्तु भागवान के लिए इसके नाम पर हमारी खुशियों और अधिकारों का हनन मत करिए. झूठी मान-मर्यादा और अहंकार ने हम जैसे बहुतों को काल के गाल में भेज दिया. भगवान् के लिए अब आप सभी इस अमानवीय कुकृत्य को बंद करिए…………..आने वाले दिनों में हमारे साथ क्या होगा यह तो बताना मुश्किल है परन्तु हम आशा करते हैं कि जो भी होगा मानवता और हम जैसे बच्चों के हित में होगा. हम आशा करते हैं कि हमारी सदा उन माता-पिता के ह्रदय तक जरुर पहुंचेगी जो झूठे शान और मर्यादा के नाम पर अपने बच्चों के खुशियों का गला घोटते हुए उन्हें मौत के मुँह में झोक देते हैं जहाँ अंधेरों और दर्द- चीख के सिवा कुछ और नज़र नहीं आता. यदि हमारे प्रयास से एक भी माता-पिता अपने संतानों की खिशियों के लिए उन्हें आशीर्वाद देते और गले लगाते हैं, यदि इस प्रयास से एक भी जीवन हम बचाने में कामयाब रहे…………….तो हम समझेंगे कि हमारी कहानी आपके बीच लाने की सफल रही……………! मित्रवर आज तुम्हारी करनी और कहनी एक सी प्रतीत होती है ! आप जैसा कहते हैं , वैसा ही करते हैं ! आप सच्चे मानवदूत हो ! बहुत बहुत शुभकामनाएं

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

अनिल आलीन जी, नमस्कार! जैसा की हमने आपकी पहली पोस्ट में वादा किया था की दूसरे भाग के आने और पढ़ने के बाद अपनी बात लिख रह़ा हूँ! सो आज कहना चाह रहा हूँ---आपकी यह बात बहुत अच्छी लगी कोई आदमी 'जैसा सोचता है वैसा ही हो जाता है!' या इसे और सुधार कर कहे की 'जैसा सोचता है,वैसा ही करता है,और वैसा ही हो जाता है!' बाकी गुरु के बारे में आपके विचारों से अलग नहीं हूँ,पर सकुच्चित और विस्तृत परिभाषा करनी होगी स्वार्थों के संबंधों के कारण जिस आदमी से हमारा कारज संपन्न हो जाता है हम आजकल ऊसी को गुरु मानते है,जब काम निक्कल जाता है तो काहे का गुरु और कैसा गुरु ? अब के गुरु, गुरु न होकर 'गुरु घंटाल' ही है या फिर 'गूरूऊऊऊ ..."

के द्वारा: pitamberthakwani pitamberthakwani

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

सादर नमस्कार! किसी को गुरु बनाने से कोई गुरु नहीं हो सकता.........यह सिर्फ हमारा स्वार्थ है और कुछ नहीं............आदमी के विवशता और इच्छा से गुरु का कोई सम्बन्ध नहीं............................! आदरणीय आप एक बार फिर भटक रहे हैं.स्वार्थ, सत्ता, और वर्चस्व कोई सिखाने की चीज नहीं है बल्कि हमारी मानसिक उपज है..................गुरु तो ऐसा कुछ सिखाता ही नहीं बल्कि हम अपनी इन्ही इच्छाओ के अनुसार गुरु का चुनाव करते हैं जो कि हमारी अज्ञानता, मुर्खता और लालचपन को दर्शाता है................मृत्यु, विवशता, मोक्ष आप कुछ ऐसे शब्दों का आप इस्तेमाल किये हैं कि मुझे लगता है. हरेक पर एक नया आलेख लिखना चाहिए................! परन्तु मेरी एक ख़राब आदत है कि मैं आख बंद करके नहीं लिखता और न ही किताबों को पढ़कर क्योंकि काफी हद तक बचपन में किताबे पढ़ चूका हूँ..............अब तो सिर्फ मन और मानसिकता को पढ़ने की कोशिश करता हूँ जो वक्त के साथ स्थिर नहीं रहता तो फिर किसी विचार को स्थिर करके उसकों सड़ाने की जरूरत क्या है..............! और इन सबके के लिए मन की सीमा से पार जाना पड़ता है जो कि किसी भी मानव के लिए बहुत मुश्किल काम है..........अतः वक़्त बहुत लगता है एक ऐसे विचार को नव जीवन देने की जो सच्चाई के काफी करीब हो..........! देखिये इन शब्दों पर कब लिखता हूँ....................हाँ यदि दो-तीन महीने तक कुछ नहीं लिखा इन पर तो मैं चाहूँगा कि आ मुझे याद दिलाएं क्यंकि इन शब्दों पर नए शिरे से विचार-विमर्श कि अति आवश्यकता है...............................आपके आगमन से नव विचारों को बल मिलता है...............हार्दिक आभार...................!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

चन्दन जी गुरु...................अपने आप में पूर्ण शब्द है ...........इसमे किसी भी प्रकार की अतिश्योक्ति और विशेषण की आवश्यकता नहीं होती................यदि ऐसा करते हैं.................तो निश्चय ही हम इसकी अपूर्णता को दिखाते हैं......! अतः छोटा गुरु और बड़ा गुरु .............सच्चा गुरु और झूठा गुरु ऐसा कुछ नहीं होता है..........यह तो हमारे मन की उपज है................वह तो हमारे इच्छाओं या अंध विश्वासों का बनाया हुआ..........इसे समझाने के लिए हमें विश्वासों और सीमाओं से उठना होगा.................अभी आपने हालात का जिक्र किया न...............बस यही तो गुरु है ......लेकिन यह तो व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है कि वह किस हालात में क्या सीखता है.......................लगता है आपने आलेख ध्यान से नहीं पढ़ा.............या फिर मेरी बाते आप तक पहुँच नहीं पाई...............चलिए अगले भाग में सरल और सहज करने की कोशिश करूँगा..............

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

प्यार अगर थामता न पथ में उंगली इस बीमार उम्र की हर पीड़ा वैश्य बन जाती, हर आँसू आवारा होता ! मन तो मौसम सा चंचल है सबका होकर भी न किसी का अभी सुबह का, अभी शाम का, अभी रुदन का, अभी हंसी का और इस भौरे की गलती क्षमा न यदि ममता कर देती ईश्वर तक अपराधी होता पूरा खेल दुबारा होता! प्यार अगर थामता न पथ में उंगली इस बीमार उम्र की ++++++++++++++++++++++++++++++++++++++ जीवन क्या हैं एक बात जो इतनी सिर्फ समझ में आये- कहे इसे वह भी पछताए सुने इसे वह भी पछताए मगर यही अनबुझ पहेली शिशु सी सरल सहज बन जाती अगर तर्क को छोड़ भावना के संग किया गुजारा होता प्यार अगर थामता न पथ में उंगली इस बीमार उम्र की ++++++++++++++++++++++++++++++++++++ जाने कैसा अजब शहर यह कैसा अजब मुसाफिरखाना भीतर से लगता पहचाना बाहर से दीखता अनजाना जब भी यहाँ ठहरने आता, एक प्रश्न उठता है मन में कैसा होता विश्व कहीं यदि कोई नहीं किवारा होता प्यार अगर थामता न पथ में उंगली इस बीमार उम्र की +++++++++++++++++++++++++++++++++++ हर घर आँगन रंग मंच है औ' हर एक साँस कठपुतली प्यार सिर्फ वह डोर कि जिसपर नाचे बादल, नाचे बिजली तुम चाहे विश्वास न लाओ, लेकिन मैं तो यह कहूँगा प्यार न होता धरती पर तो सारा जग बंजारा होता.....! गोपालदास ' नीरज'

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

भ्रमर भाई नमस्कार मैंने जो कहा वो सब मेरा ही कहा हुआ नही है । जो टेक्निकल बातें है वो प्रि-सायंस की किताबों की बात है । ११+४ के समय सब डिग्री का पहला साल प्रि- होता था आज १०+२+३ के जमाने में १२वीं कक्षा हो गई है । कुंभार वाली बात तो अनिल भाई ने समजा दी । और मेरी नीचे की टिप्प्णी में --अनुकुल बाते--- लिखा है उस में बात का विस्तार कर दो । बात सिर्फ बोलने सुनने वाली बात नही है । आदमी के आसपास का पूरा परिवेश है । --काल का पहिया घुमें भैया ---ये कवियों की कल्पना है । और माया संस्क्रुति का केलेंडर भी समय के पहिये पर था जो २१/१२/२०१२ खतम हो गया । उनके पहिये ने २१/१२/२०१२ को एक पूरा चक्र काट लिया । ईस तारिख के बाद मौजुदा ब्रह्मांड का नाश और नव निर्माण हो जाना चाहिए था पर नही हुआ । ज्यादा जानना हो तो ईस विषय का मेरा लेख पढ लो । --टाईम वेव थियरी ----कभी ये सच नही हुई और ईस के चक्करमें कई सटोरियों के घर बरबाद हो गये । ---टाईम लाईन या समय की रेखा---- ये अबतक सही रही है । गोल गोल नही गुमती । गुजरा समय वापस नही आता है । जो गुजर गया वो गया, भूल जाओ । मेरा एक पात्र ईस लाईन को ले के कुदरत से उलज पडा था । धरती-पुत्र ;- हे मित्र, हम मानवियों ने एक “समय रेखा” बनाई है । अनंत से शुरु होती है अनंत पर खतम होती है । बिच में शून्य है जीसे हम वर्तमान कहते है, शून्य से माईनस साईड में भूतकाल है, प्लस साईड भविष्य है । भूतकाल की लाईन ईतनी लंबी है की उस के कोइ ना कोइ एक बिंदु पर आप का जनम हुआ होगा, आपने ये ब्रह्मांड रचाया होगा । और भविष्य लाईन भी ईतनी लंबी है की कोइ एक बिंदु पर आप ये ब्रह्मांड मिटा देंगे और खूद भी मिट जायेंगे । हम लोगों ने आप को भी समय के दायरे में ले लिया है । हमने साबित कर दिया “समय बडा बलवान” । कूदरत ;- अरे ओ चींटी, कुए के मेंढक, तालाब की मछली । जो चीज है ही नही उस से मुझे अपने दायरे में लेना चाहते हो ? अरे ओ महाबली, तू अपनी ही लाईन देख, जीरो पे खडा है । आधी सेकंड पिछे देखता है तो भूत है, आधी सेकंड आगे देखता है तो भविष्य है । तेरा वर्तमान किधर है । टर्निंग पोईंट है सिर्फ जीरो सेकंड का ? अगली एक सेकंड में तू जीएगा या मरेगा तूझे पता ही नही । धरती-पुत्र ;- मुझ पर गुस्सा करने से काम नही चलेगा,मित्र । आपको मुझे समजाना पडेगा सही क्या है । कुदरत ;- क्या सही क्या गलत तूम मानव ही तय कर लेते हो फिर मैं क्यों ? धरती-पुत्र ;- हम तो क्षण-जीवी जंतु है, हमारी बात छोडीये, अपनी कहें, विश्वास तो आप की बात का ही करुंगा । कुदरत ;- समय है ही नही तो ये समय रेखा नही है सिर्फ घटनाक्रम दर्ज करने का पैमाना मात्र है । घटनाये जो घटती है वो पूर्व घटना का परिणाम है । मैजुद घटना आनेवाली घाटना का बीज है । ईस में मेरा या समय का कोइ रोल नही है । धटनाओं पर तो किसीका अधिकार नही । मेरा या ब्रह्मांड का जन्म घटना ही तो थी । आप को कोइ घटना अच्छी नही लगती तो मुझे दोष देने दौडते हो, “ कुदरत का कहेर”, “कुदरत रुठ गई”, “कुदरत का खेल” । क्या मैं बच्चा हुं जो खेलने लगुं ? क्या मैं शैतान हुं जो कहेर करुं ? मुझे किस से रुठना है ? अब ये लंबा और विषयांतर हो जाता है रुकता हुं ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

सादर प्रणाम! आप अभी-तक सुख-दुःख में ही पड़े हुए हैं और पड़ा रहना चाहते हैं...अतः इसे समझना उतना ही मुश्किल हैं जितना की अँधेरी रात में किसी को सूरज को देखने का दावा करना.................आप क्यों जबरदस्ती किसी बात को कहना चाहते हैं? ______________________________________________________________________ यहाँ सुखी और दुखी रहने की बात तो किया ही नहीं तो फिर आपकी बाते साडी अन्याय संगत हैं...........मैं मल्हार राग गा रहा हूँ तो आप राग भैरवी.............! यह क्या बचपना हैं.....? ______________________________________________________________________ "उस कुम्हार को अच्छे सिग्नल क्यों नही मिल जाते बरसात में ताकि सुखी हो जाए ?? " क्योंकि वह अपने इच्छाओं और स्वार्थ से बंधा हैं...... ______________________________________________________________________ "परिस्थितियाँ स्वतः पैदा होती हैं काल प्रभावी बाई बलशाली है और किसी के लिए ये लाभ दायक तो किसी के लिए हानिकारक हो जाता है " कुछ परिस्थितिया स्वतः पैदा होती हैं और कुछ पैदा की जाती हैं......यदि इच्छा हैं ही नहीं तो लाभदायक और हानिकारक होने का सवाल ही नहीं पैदा होता.....चाहें परिस्थितियां कैसी भी हो ...... _______________________________________________________________________ "यदि इच्छाओं का परिणाम है तो आओ अच्छी इच्छा करना सब को कहें सब आज सुखी हो जाएँ...हाँ सुख दुःख में समान रहने की चेष्टा कर सहना –झेलना सीख जाएँ हम तो कुछ बात बने …जैसे इंजेक्शन लगायें दर्द का दर्द तो होता है अहसास नहीं होता वही अनिल जी ………" .........और हमारे इस इच्छा से यदि सभी सुखी नहीं हुए तो फिर क्या? दुःख होगा कि नहीं...........! आप अब भी वही राग अलाप रहे हैं...और यह इंजेक्शन एक्सपायरी डेट का हो तो फिर......दर्द बढ़ जाना असंभावी हैं.......क्यों? और मैं कहीं भी सुख और दुःख में रहने कीबात किया ही नहीं तो फिर आप सबको सुखी क्यों बनाना चाहते हैं.......... _______________________________________________________________________. 'काल फिर अपनी स्थिति बदल देता है तब तक काल चक्र तो चलता रहता है …' कल अपनी सामान गति से चलता रहता हैं तो इसे स्थिति बदलने का सवाल ही कहाँ उठता यह सब हमारे सोच और इच्छाओं का परिणाम हैं...........यह दो बिन्दुओं का अन्तराल हैं जिसे हम असमानता का नाम देते हैं वरना ................समय कभी असमान हो ही नहीं सकता ................................................................................................ आपके राधे-कृष्ण का कहीं जिक्र नहीं हुआ क्या बात हैं............लगता हैं मुझे देखकर उनका दर्द बढ़ जाता हैं.............हाँ......हाँ....... ________________________________________________________________________

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

अच्छी विचारधारा वाली पोस्ट के लिए बधाई अनिल 'अलीन ' जी ....यह सुख-दुःख परिस्थितियों से जुड़े हमारे इच्छाओं का परिणाम हैं.जब इस सफ़र में सुख और दुःख हैं ही नहीं तो इसे स्थायी बनाकर रोना और हँसना क्या? तो क्यों न इस जीवनरूपी सफ़र में आने वाले ठहराव और बेशकीमती समय को कुछ ऐसे कामों में लगाया जाय जो जिंदगी से बहुत करीब हो. भरोदिया जी ने समझाया आप ख़ुशी हुए सुख हुआ क्योंकि जो आप चाहते हैं वही कोई बोला या हुआ जब चीजें अपने मुवाफिक हो जाएँ सुख उपजता है …. उन्होंने कहाँ दिमाग से सिग्नल मिलते हैं जैसे वही बन जाता है कभी सुख कभी दुःख ....पर ऐसा नहीं है बंधू उस कुम्हार को अच्छे सिग्नल क्यों नही मिल जाते बरसात में ताकि सुखी हो जाए ?? क्यों आप या हम अच्छे अच्छे अहसास कर ख़ुशी नहीं रह लेते जीवन भर ....कभी दुखी हो खिन्न मन फिर क्रोध गुस्सा और न जाने क्या क्या ............... इस सफ़र में सुख दुःख है ही नहीं ये मिथ्या है ….सुख दुःख कोई पदार्थ नहीं है जो हमें दिखे ये हमारे अहसास हैं .....हम जैसा भोगते हैं वही अनुभव हमारा मष्तिष्क हमें कराता है ...एक तरफ आप ही उदाहरण दे कर समझा रहे हैं की ये सब हैं आप इसे इच्छाओं का परिणाम बता रहे हैं ऐसा नहीं है ये परिस्थितिजन्य है और कोई कारक है इसका परिस्थितियाँ स्वतः पैदा होती हैं काल प्रभावी बाई बलशाली है और किसी के लिए ये लाभ दायक तो किसी के लिए हानिकारक हो जाता है एक ही कारक दो लोगों के लिए अलग है ये सत्य है एक के लिए दुःख दूजे के लिए यही i सुख बन जाता है , दो लोग साथ में पढ़ते हैं खाते हैं रहते हैं एक खुश हो जाता है कुछ बन जाता है दूजा कुछ सारे संसाधन सामान हों तब भी भिन्नता ...कुछ तो है जो अलग अलग निर्देशित कर रहा है हमारे आप के लिए इन सब को ...यदि नहीं तो क्यों हम नियंत्रित कर के समान नहीं हो जाते.. यदि इच्छाओं का परिणाम है तो आओ अच्छी इच्छा करना सब को कहें सब आज सुखी हो जाएँ ....हाँ सुख दुःख में समान रहने की चेष्टा कर सहना --झेलना सीख जाएँ हम तो कुछ बात बने ...जैसे इंजेक्शन लगायें दर्द का दर्द तो होता है अहसास नहीं होता वही अनिल जी .........काल फिर अपनी स्थिति बदल देता है तब तक काल चक्र तो चलता रहता है ..... ये दुःख सुख और धुप छाँव यों ही होती रहेगी .........प्यारे दोस्त ......... सूखे दुखे समे कृत्वा लाभा लाभौ जया जयो ..आओ ऐसे बनें भ्रमर 5

के द्वारा: surendra shukla bhramar5 surendra shukla bhramar5

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

दुख या सुख कोई पदार्थ नही जो जमीन पर हो और कीसी को लग जाये । संसार में तो क्या प्राणी के अंदर भी नही है । जीसे हम दुख सुख समजते वो हर प्राणी के दिमाग के एक छोटे से खाने में उत्पन्न हुआ एहसास मात्र है । और ये एहसास ईन्द्रियो द्वारा भेजे गये संदेश( आंदोलन ) द्वारा उत्पन्न होता है । नीम का पत्ता खा लिया तो तकलिफ या दुख का एहसास । कान द्वारा आते संगीत के सुर के आंदोलन सुख पहुचाता है , भैंसासुर दुख पहुंचाता है । रोते हुए बालक को उठा कर एक लय से उसे हिलाते हैं तो जो आंदोलन उस के दिमाग तक जाता है वो उसे सुकुन दिलाता है । वो शान्त हो जाता है या सो जाता है । काम क्रिडा तो शुध्ध आंदोलन ही है, ज्यादा बताने की जरूरत नही । आदमी नाम के प्राणी में उस के दिमाग के मेमरी विभाग में छुपी पूरानी यादें, ईच्छा, उस की मानसिकता भी असर करती है । कोइ बात सामने आती है तो दिमाग का विस्लेषण विभाग ईस बात को मेमरी मे रही बातों से तुलना करता है । और उस के अनुसार सिगनल भेज देता है सुख दुख विभाग को । तो ये एहसास टेमपररी है । पोजिटिव सिगनल मिलता रहता है तब तक सुख होता है । सिगनल नेगेटीव मिलता है तब दुख होता है । ये लो चलता ही रहेगा । क्यों की आदमी के सामने अनुकुल बाते आती रहे वो संभव नही ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

बस इसी से निकलने की तो बात कर रहा हूँ.................! यहाँ इच्छाओं से परे जाने की बात कह रहा हूँ और आप को अपनी सीट और रिज़र्वेशन की पड़ी हैं............वही बात कि जहाज का पक्षी................................! एहसास शब्द इसी लिए उपयोग किया ताकि मैं अपनी बात को सिद्ध कर सकू.............जबकि हकीकत तो यह है कि जहाँ दुःख और सुख होगा वहां एहसास होना संभावी हैं.............ऐसे में हमें खुद को भुलाना ही होगा वरना दाग तो कहीं और पड़ेगे ही ................इस संसार में, सुख और दुःख से भी बहुत कुछ हैं क्यों न उसकी तलाश किया जाय ....................और यदि हमें लगता हैं कि उसकी तलाश में कहीं भी कोई एहसास है तो समझ जाना चाहिए कि हम अपने सुख-दुःख से नहीं निकल पाए हैं......... मतलब इच्छाओं से परे नहीं जा पायें हैं..........मतलब स्वार्थ ही स्वार्थ.......................... गंभीरता................और जहाँ गंभीरता हो वहां जीवन तो बनावटी फूल की तरह हैं............!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

सादर प्रणाम, काली मैया! यदि जिंदगी के फिलोसफी को समझना है काली मैया जी तो रिज़र्वेशन की बजाय साधारण बोगी में सफ़र कीजिये. किसी का इंतजार महलों में करने के बजाय ठंडी रात में प्लेटफोर्म पर कीजिये, किसी के दर्शन की चाहत लिए हुए आग की तरह तपते फर्श पर रात भर बिता कर देखिये.......कभी दूसरों को समझना हैं तो खुद को भुलाकर देखिये..............लगता है ...........आप तो सच में गंभीर. अरे दी, टेंशन मत लीजिये............मैं तो मजाक कर रहा था और पूरी जिंदगी मजाक में ही बिताता हूँ पर औरों की नज़र में यह गंभीर हो जाता हैं तो इसमें मेरी क्या खता.............लगता है आप फिर गंभीर हो गयी. हे भगवन ! आपका तो ऊपर वाला ही मालिक है............चलिए जल्दी से चाय उठाइए वरना ठंडी हो जाएगी..................

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

प्रिय अनिल जी नमस्कार, आपके आलेख लिखने का उद्देश्य बहुत अच्छा था किन्तु आपके आलेख की भूमिका सराहनीय नहीं कही जा सकती क्योंकि इसमें विरोधाभास आपके लिखे इस वाक्य से साफ़ झलकता है."हकीकत तो यह है कि संसार में सुख-दुःख जैसी कोई चीज है ही नहीं. यदि परिस्थिति हमारे अनुकूल है तो सुख वरना दुःख. इस प्रकार सुख-दुःख न ही स्थायी है और न ही समानान्तर." मेरा तो स्पष्ट मानना है की संसार में सुख और दुःख दोनों मौजूद हैं. मगर सुख दुःख सबके अपने होते हैं हाँ ये हो सकता है की आपका सुख मेरा ना हो और मेरा दुःख आपका ना हो. जीवन एक सफ़र ही तो है और मै आपकी बातों से पूरी तरह सहमत हूँ की जीवन सफ़र में हम किसी की भलाई के लिए जो भी कर सकते हैं जरूर ही करना चाहिए यह किसी के लिए संतोष की बात हो सकती है और हमारे लिए सुकून की. यह सब सफ़र में ही करना है किसी ठहराव का इन्तजार नहीं करना है. आपके मन में आयी इस सुन्दर भावना के लिए आपकी मानवता के लिए. आभार.

के द्वारा: akraktale akraktale

ईश्वर, एक ऐसा शब्द और विषय जो सदैव ही चर्चा और शोध का विषय रहा है..............परन्तु यह चर्चा और शोध दोनों से परे हैं ......हम जो कुछ भी इसके प्रति विचार रखते हैं . वो किसी न किसी विचार धारा के पक्ष या विपक्ष में, न कि किसी प्रमंकिता पर......तो इस पर चर्चा और शोध दोनों ही बेईमानी सी लगती है............ जहाँ तक मेरे दर्शन से जुड़े होने का सवाल है तो मैं बचपन से ही आस-पड़ोस के क्रिया-कलापों का अध्ययन और विश्लेषण कर रहा हूँ पर मैं कोई दार्शनिक नहीं हूँ...........! मैं यह बात अपनी प्रेम कहानी में भी स्पष्ट किया हूँ कि मैं अक्सर एकांत में बैठकर, चिंतन और मनन किया करता था; इस ब्रह्माण्ड और इसके रहस्यों को लेकर.....पर मैं कोई ज्ञानी नहीं हूँ.......! मैं ऐसा नहीं था, मैं वैसा नहीं था. मैं उसके जैसा हूँ तो मैं उसके जैसा नहीं हूँ........! ऐसा कुछ नहीं हैं............कुछ भी तो नहीं ................. इससे पहले कि आने वाले दिनों में अपनी अधूरी कहानी को पूरी का करूँ ..........इससे पहले एक बार फिर आप लोग यह कहानी पढ़े .............क्योंकि हो सकता है कि मैं दुबारा लिखने के लिए इस धरती पर बचु ही नहीं..................तो आप ही में से किसी को मेरी कहानी को अंजाम देना होगा...........! फिल मरने से पहले क्या मरना ...............! आप सभी जिंदगी का मज़ा लीजिये.................आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद् अपना बेशकीमती समय देने के लिए..............!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

मित्र अनिल  तुम  स्वीकृत  करना, भेज  रहा मैं शुभ  आशीष। जो मन  है वही लिखा है, दी उड़ेल  मन में जो टीस।। खेल  रहे हैं आप अनिल जी हम  लोंगो से कोई खेल। सोच  आपकी समझ  न  आये, नहीं किसी से खाती मेल।। सिद्ध  आप क्या करना चाहें, और आपका क्या उद्देश? हैं रहस्यमयि प्रतिक्रियायें, समझ  न पाये यहाँ दिनेश।। करना बस  मुझको विरोध  ही, लिया आपने ऐसा ठान। बुरा न मानो बात कहूँ इक, बुद्धि पर अपनी अभिमान।। जिस  रस्ते पर आप हैं चलते, मुझको लगता है भटकाव। उस  मंजिल  पर नहीं है मंजिल, वापस  पूर्व  राह पर आव।। शब्द जाल  में आप फँसे हैं, उससे कुछ  न हासिल  होय। व्यर्थ  जिन्दगी उसमें जाती,फँसा हुआ   इससे में जो कोय।। लक्ष्य आप कुछ  इंगित करते, किन्तु राह पकड़ते ओर। मन  पतंग  को उड़ा रहे हैं, और छोड़ दी उसकी डोर।। उम्मीदें थी तुमसे भारी, तोड़ी, हुई, सभी बेकार। जागे को क्या कोई जगाये, तुम  जागोगे कौन  प्रकार।। भ्रम  का नशा तुम्हें है शायद, या केवल  मेरा अनुमान। हो सकता है सही तुम्हीं हो, यह हो मेरा थोथा ज्ञान।। तुम  तो हो विपरीत  अनिल  के, हुये पुराने क्यों गुण  लुप्त। भ्रमित  किया क्या तुम्हें किसीने, या फिर गुण  वह गये है सुप्त।। बड़़ी बड़ी थी बातें पहिले, आज  न  दिखता उनका अंश। मुझको तो लगता है ऐसा, उन्हें सर्प  ने लिया है दंश।। विषय  आपका बदल  गया है, चाल  ढाल  लिखने का ढ़ंग। अनिल  नहीं हो ओर कोई तुम, यह सच  है न समझे व्यंग।। बातें तो परिवर्तन की थीं, उनमें आया है बदलाव। समझ  न आया मुझकों भाई, क्यों विचार में है बिखराव।। लिखते अब जो भ्रमित करे मन, पहले जन पीड़ा की बात। मुश्किल  ही परिवर्तन आये, मुझको तो होता है ज्ञात।। पहिले मेरी सोच यही थी, टिका है आशा से आकाश। अब लगता वह सोच व्यर्थ  थी, टूटा गया मेरा विश्वास।। बातें करते बड़ी बड़ी तुम, उनके प्रति नहीं गंभीर। कहीं निशाना लगा रहे हो, और कहीं लगते हैं तीर।। हाव भाव  प्रिय  अनुज  तुम्हारे, मुझको तो न लगते ठीक। पहिले तुम  जैसा लिखते थे, अब  लिखते बिल्कुल  विपरीत।। मुक्त शब्द की माया से हों, सत्य धरातल  रखिये पैर। यह भ्रम, छल, माया, है जादू, जिस  जग  में करते हो सैर।। मैं भी तो भटका था पहिले, किन्तु अब है पश्चाताप। भटक  गया था बहुत  दूर में, निकला था पर अपने आप।। ये अध्यात्मक  दार्शनिक  बातें, सच्चाई से कोसों दूर। अभी दूर तक  तु्म  न  पहुँचे, इनसे बाहर आय  हजूर।। बड़े बड़े सपने देखे थे, तुमको लेकर मैंने मित्र। वैसे ही वह टूट गये हैं, जैसे टूटे काँच  का चित्र।।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

आप क्या सचमुच  ही कोई संत  बनने जा रहे हो? आप क्या करने चले थे, क्या ये करने जा रहे हो? शब्दों का यह जाल  फेंका, जानकर हम  मछलियाँ हैं, जग  के डर की बात  करते, खुद ही डरने जा रहे हो। वाणी यह ओशो की लगती, आपकी ऐसी नहीं थी,  क्षेत्र में अध्यात्म के ये , क्या उतरने जा रहे हो? बात  करिये आम जन की, आप  करते उच्चतर की, इस  तरह क्या आप दुनियाँ, को बदलने जा रहे हो? अनिल  भाई, आपकी यह उच्चस्तरीय  दार्शनिक  एवं अध्यात्मक  के रस  से पगी हुई बातें, हमें सत्य  एवं मूल  उद्देश्य  से भटका सकती हैं। बाबाओं का शब्दों का जाल  ऐसा होता है कि हम  कुछ  भी नहीं समझ  पाते फिर भी अपनी अज्ञानता को छिपाने के लिये इनकी हाँ  में हाँ मिला देते हैं। भाई मुझे तो कुछ  भी समझ  नहीं आया। मुझे लगता है कि यह अनुपयोगी है अतः इसे समझने की भी जरूरत  नहीं है। 

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

यह दर्शन, अध्यात्म  विषय है रोग  भायनक, लग  न जाये अनिल  तुम्हें मैं हूँ आशंकित। जो तलाशते भटक  रहे हो तुम  इस  जग  में, उसका तो अस्तित्व नहीं है , यह है निश्चित। ऐसी ऐनक  कौन लगा रक्खी है तुमने, देख  और की कमियाँ जो तुम  हुये अचंभित। सत्य झूठ  को तुम  उल्टा ही समझ  रहे हो, शब्द और परिभाषाओं में उलझे किंचित। तुम  आरोप लगा देते हो जो मन आये, चाह पूर्णतः हो सच्चाई से वह वंचित। यह चुराई क्या रचना तुमने प्रश्न  किया था? यह आरोप आपको क्या देता है शोभित? तुम  अलोचना करते मन खुश  होता मेरा, दुख  होता आधार  बिना करते आरोपित। तुमको दिखती सभी जगह कमियाँ ही कमियाँ, कमियाँ क्यों हैं कर न पाते तुम  निर्धारित। कभी कभी सच  कहते हो मन मान  रहा है, कहीं कहीं भाषा लिख  देते  आमर्यादित। चाह रहा मैं, क्या? तुम  इसकी जरा न सोचो, चाह तुम्हारी क्या है? इसको करते इंगित! मेरे तुम  भटकन  की चिन्ता करों अनिल  न, भटक  रहे तुम  इससे मैं ज्यादा हूँ चिंचित। रूढ न जाओ   डर है यह प्रतिक्रिया पढ़कर, निश्चित  और स्वाभाविक  है कि होना क्रोधित।

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के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

इसमें कोई शक नहीं है . आदरणीय प्रदीप सर की विनम्रता और ह्रदय की विशालता से कोई भी अनभिज्ञ हो ... उनके मन में सब के लिए मान , प्यार और आशीर्वाद है / मैं तो जब से जागरण से जुडी हुई उसी दिन से उनका आशीर्वाद बरसा रहा है .. और आकस्मिक वर्षा की तरह नहीं की कभी बरसा कभी नहीं बरसा .. बस अनवरत बरस रहा है और जानती हूँ कभी नहीं थमेगा / उनका व्यक्तित्व तो जागरण के आँगन में उस विशाल बरगद की तरह है जिसकी छावं में हमसब छोटे पछी की तरह निर्भीक होकर चचाहते रहते है ... चलो आपके बहाने आदरणीय प्रदीप सर के प्रति हमसब अपनी कृतज्ञता और और उनके के लिए जो मन में श्रधा हहै उसे वयक्त करने का मौका मिला / आपका बहुत -२ धन्यवाद / अपने स्टाइल में ही सही पर बहुत दिनों बाद .. आपने कुछ अच्छा लिखा / बधाई

के द्वारा: MAHIMA SHREE MAHIMA SHREE

अलीन भैया नमन हाँ आपने कहा की पढ़ाने के और भी रास्ते हैं में आपका अनुज हूँ और आप मेरे बड़े भाई और आप मेरे से उम्र में बड़े भी हैं और अनुभवी भी पर यह सब dialog उनकी डिंग ही सही पर मेरे लिए यह उपदेश का काम करते हैं और रूचि मैडम सभी को यह dialog बोलकर शिक्षित करके एक अच्छा विद्यार्थी बनाती हैं मुझे रूचि मैडम अच्छी लगती हैं और मेरी उनके प्रति श्रद्धा है और उनके यह कथन मेरे लिए उपदेश का काम करते हैं भले ही वो मुझसे कुछ कहती नहीं पर यह dialog मेरे लिए उपदेश के समान हैं क्योंकि रूचि मैडम जैसी शिक्षिका के इन्ही उपदेशों पर चलकर में कुछ बना हूँ वो मुझसे बातें भी करती हैं और अच्छी राह दिखाती हैं उनके यह dialog मेरे लिए उपदेश का काम करेंगे और आगे भी यह मेरे मूलमंत्र बने रहेंगे धन्यवाद

के द्वारा: ajay kumar pandey ajay kumar pandey

सादर प्रणाम, सर! अब मैं यहाँ क्या लिखूं..जब आपको न मुझपर विश्वास है और न खुद पर कि आप सामने से बात कर सके....बाकि मेरी भी बात आपतक मेल से पहुँच ही चुकी होगी....फ़िलहाल एक ग़ज़ल आप भी पढ़े... तुम्हारे पाँवों के नीचे कोई ज़मीं नहीं, कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यकीं नहीं. मैं बेपनाह अँधेरा को सुबह कैसे कहूँ, मैं इन नज़ारों का अँधा तमाशबीन नहीं. तुम्हीं से प्यार जताएं तुम्हीं को खा जायें, अदीब यों तो सियासी हैं पर कमीन नहीं. तुझे कसम है खुदी को बहुत हलाक न कर, तू इस मशीन का पुर्जा है, मशीन नहीं. बहुत मशहूर है आयें ज़रूर आप यहाँ, ये मुल्क देखने के लायक है, हसीं नहीं. जरा से तौर तरीकों में हेर-फेर करो, तुन्हारे हाथ में कालर हो, आस्तीन नहीं..............दुष्यंत कुमार…!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

सादर प्रणाम! आपकी बाते सुनकर .....दुष्यंत कुमार जी की कुछ पंक्तियाँ याद आ गयी........ ! कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं, गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं. अब तो इस तलब का पानी बदल दो, ये कँवल के फुल कुम्हलाने लगे है! कल भी एक बात कहा था और आज भी वही बात कहूँगा.................कल भी व्यक्तिहत नहीं था और आज भी व्यक्तिगत नहीं.............! व्यक्तिगत तो वो होते हैं जो मान-मर्यादा को लेकर चिल्लाते रहते हैं. परन्तु यह कोई भीख मांगने की चीज नहीं की एक मांगे और दूसरा उसे झोली में दाल दे....या फिर एक के देने पर दूसरा देते रहे...कृपया मान-मर्यादा का व्यापर बंद करिए और स्पष्ट रूप से अपने दिल की अभिव्यक्ति करिए...! मुझे किसी की भी बातों से दिल नहीं दुखता. पहिले भी बोला था और आज भी कहता हूँ क्षमा मांगकर आप लोग मुझे शर्मिंदा न किया करें.................! वैसे भी मेरा दिल तो अनजानी के पास है तो दुखने का सवाल ही नहीं उठता........!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

भाई ताजमहल मैं भी जा चुका हूँ, लेकिन वहाँ चिखेरू और पखेरू के बारे में किसी ने नही ंबताया। आपसे अनमाल जानकारी मिली, इसके लिये आभार। इतिहास में भी इनका कहीं नाम नहीं है। यदि इन्होंने सचमुत ताजमहल का उद्घाटन किया है तो इन्हें भी वही सम्मन मिलना चाहिये जो हमारे उद्घाटन करने वाले नेताओं को मिलता है। भाई उन बुढ्ढ़े महोदय का कहीं पता नहीं चला। उनके पैर तोड़े या नहीं। या फिर पहिले से ही टूटे हुये थे। अरे भाई ये व्यक्तिगत बातें छोड़िये। एक तरफ तो कहते हो हमें सम्मान अपमान से कोई फरक नहीं पड़ता तथा दूसरी और वही बातें लिये बैठे रहते हो। सच है भाई हम सबकी करनी और कथनी में बहुत अंतर हैं। हम सब झूठे अहंम को लेकर जीते हैं। कुछ नहीं होने वाला, कुछ नहीं बदलेने वाला। हम अपने आपको तो बदल नहीं पा रहे। बात करते हैं दुनियाँ को बदलने की। अपने से बाहर निकलिये। दूसरे को शिक्षा न देकर, पहले खुद को शिक्षा दीजिये। इसी तरह के आलेखों की भरमार देखकर मन दुखी हो गया इसलिये कुछ कड़े एवं व्यंगात्मक शब्दों का इस्तेमाल कर दिया है। दिल दुखा होगा उसके लिये क्षमा चाहता हूँ।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

माफ़ करियेगा...चन्दन जी मेरी किसी से भी तीखी नोख-झोक नहीं हैं.....सिर्फ विचारों से ही और वो भी कभी गंभीरता, तो कभी व्यंग्य; तो कभी हास्य रूप में. परन्तु सामने वाले के लिए यही मुश्किल होता है कि आखिर मैं कब गंभीर हूँ, कब व्यंगात्मक रूप में हूँ और कब हास्य रूप में. मैं इस मंच पर एक बात देखा हूँ कि मेरी हर बात को गंभीरता से लेकर मुझ पर व्यक्तिगत टिप्पड़ी कि गयी और आगे भी कि जाएगी. परन्तु मैं व्यक्तिगत टिप्पड़ी कल भी नहीं किया था और कल भी नहीं करूँगा......! यदि कोई मेरी बैटन को तोड़ मोड़कर रखता है तो वह उसकी समस्या हैं........हाँ एक बात और जहाँ कुछ ज्यादा चीनी हो जायेगा तो वहां नमकीन चलाना जरुरी हो जाता है.....बाकि सब ठीक-थक है....प्रेम से रहिये और इसी तरह प्रेम बाटते रहिये.....परन्तु जहाँ कहीं कुछ दिखने की कोशिश करंगे तो वह मेरे नज़रों से नहीं बच सकता........हाँ.....हाँ....हाँ...! यह मजाक में नहीं..गंभीर होकर कह रहा हूँ....!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

आदरणीय jj , नमस्कार आज सुबह से आलेख “अन्ध्रेरे के आधार पर विकास करता झारखण्ड ” जिसने आपने featured ” में डाला हुआ है जिसे सुश्री खुसबू जी ने अपने विचार कह के पोस्ट किया हुआ है … वो पूरा का पूरा आलेख टाइप (चोरी ) किया हुआ है प्रथम पैर को छोड़ के … सीर्फ आकड़ा होता तो मैं आपके संज्ञान में नहीं लाती क्योंकि इस तरह के आलेख के लिए आकडे कहीं न कहीं से उठाने होते है . पर चुकी महोदया ने पूरा आलेख ही चोरी का टाइप कर दिया है और संदर्भ भी नहीं दिया है … तो सवाल उठाना स्वाभविक है / आपके जानकारी के लिए बता दू इस आलेख की लेखिका अनुपमा जी है .. जो मर्ज कुछ , दवा कुछ ” के नाम से “तहलका ” के अंक 31may2012 में प्रकाशित है .. चूँकि आप ने सुबह से इसे फीचर किया हुआ है और कल को आप इसे बेस्ट ब्लॉग अफ डी विक भी कर देंगे … तो जानना चाहती हूँ आपकी नजर में ये कहाँ तक उचित है .. क्या जो अपनी स्वरचित और लिखित लेख लिखते हैं क्या उनके साथ नाइंसाफी नहीं होगी .. तो फिर हम भी क्यों मेहनत करे … http://kg16.jagranjunction.com/2012/05/23/%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%86%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a4%b0

के द्वारा: MAHIMA SHREE MAHIMA SHREE

अलीन भैया नमन सबसे पहले आपसे एक बात कहना चाहता हूँ की आप मुझे पाण्डेय जी न कहकर अजय भैया कहिये क्योंकि मुझे पाण्डेय जी शब्द बिलकुल अच्छा नहीं लगता स्कूल की अलग बात है क्योंकि वहां सब मेरे दोस्त हैं तो वो मुझे पाण्डेय जी कह भी दें तो चलेगा उ का है न भैया हम कहत रहे थे की हमका पाण्डेय जी कहकर संबोधन नाही देवत का है की उ हमका अच्छो न लागत तो कृपा कर पाण्डेय जी संबोधन नाही देवत हम आपक इस ब्लॉग पर आपन एक पोस्टक प्रचार करन आवत हैं उ का है की हमर एक पोस्ट लिखत अनमोल जल का महत्व और उसको बचाने के कुछ रास्ते अवश्य पढ़त और आपण मार्गदर्शन देवत हमुक कृतार्थ करत यह बोली अवधि भाषा है भैया जी वैसे में उत्तराखंड का हूँ मैंने यह भाषा विशेष आपके लिए लिखी है आशा है आप इसे पढ़कर नाराज नही होंगे मेरा यह लेखन रूचि मैडम को याद करके शुरू होता है रूचि मैडम को प्रणाम करके ही मेरे आलेख ख़तम होते हैं आप नाराज न हों बस येही प्रचार आपके ब्लॉग में करन आवत धन्यवाद आपका बबुवा अजय पाण्डेय

के द्वारा: ajay kumar pandey ajay kumar pandey

मैं किसी भी शब्दों में बदलाव करने का अधिकारी नहीं हूँ पाण्डेय जी, वह तो सब कुछ समाज की दें हैं मैं तो बस उसे उठाकर सामने रख देता हूँ. वैसे उसमे जो कुछ संसोधन किया गया है वो नवभारत टाइम्सद्वारा किया गया. एक बार आपको पहिले ही बोल चूका हूँ किमुझे अपनी प्रशंसा बिलकुल पसंद नहीं है और यह भी बोला हूँ कि मेरी कोई भी पोस्टिंग बच्चों के लिए नहीं होती...इसलिए आप इसे न पढ़े...आप यमुना मैम, मीनू दी, डिंडा जी इत्यादि के आलेख पढ़िए....आपके लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होंगे. उनकी शैली, शब्दों और विचारों का अनुकरण करिए क्योंकि वही आपको मानसिक रूप से मजबूत बना सकते हैं. यदि मेरी शैली अभी से अनुकरण करने की कोशिश करंगे तो समाज का हित करने की जगह अहित करने लंगेंगे......!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’