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अद्य की स्याही

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ऐ आदम की औलादों इंसान बनो

Posted On: 29 Jan, 2012 न्यूज़ बर्थ में

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ऐ आदम  की औलादों इंसान बनो ,

जिस मातृभूमि पे जन्म लिया,

उसका सम्मान बनों;

प्राणी तो हर प्राणी है, इंसान नहीं है ,

तू भी तो इंसान है कोई शैतान नहीं है;

फिर क्यों तेरे दिमाग में शैतानियत छाई,

जिसने तेरा इंसानियत में आग लगायी.

आखिर कब तक चलेगा ये आपस की लड़ाई,

अब बंद करो खून की होली मेरी भाई;

मत बनो एक दुसरे के खून के प्यासें,

बहुत मिली चुकी मिट्टी में निर्दोषों की लाशें.

एक दुसरे को जानो इंसानियत को पहचानों,

आपस का झगडा छोडो इस मिट्टी की बात मानों;

बहुत हो चूका अब मत कर अपने धर्मों का अपमान,

इंसानियत के लिए बन दो जिश्म वो एक जान .

अल्लाह ने इंसान को इंसान बनाया,

वो तू ही है जो इंसान को शैतान बनाया;

तेरे ही कारन लाखों घर बर्बाद हुआ है

जिससे तू आज शैतान हुआ है.

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11 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

April 11, 2012

दोस्त नमन नहीं करना है बल्कि साथ देना है…….

ajay kumar pandey के द्वारा
April 11, 2012

प्रिय बड़े भाई अलीन जी कविता अच्छी लगी हम आपकी बात समझे हैं और कसम खाते है की हम किसी के सामने नहीं झुकेंगे में आपसे एक अनुरोध करता हूँ की आप लेख की प्रति कौरिएर करना क्योंकि यहाँ k ४/५६ में स्पीड पोस्ट नहीं आते हैं मैंने जो पता दिया है उस पर आप कौरिएर करना में आपकी सोच को नमन करता हूँ कल समर्थन नहीं दे पायेंगे क्योंकि कल हमें स्कूल जाना है मेरे में यमुना जी के आलेख पढ़कर बदलाव आ गया अब highschool में अत्तेंदेंस का चक्कर है फिर कल जो होगा स्कूल में आप को जरुर बताएँगे धन्यवाद

pawansrivastava के द्वारा
April 11, 2012

मैं आपकी सोंच को नमन करता hoon

rajhans के द्वारा
April 10, 2012

नमस्कार अलीन जी! बहुत सुंदर रचना. धार्मिक उन्माद नाम की मुसीबत के इतने स्तर हैं कि उन्हें पहचानना मुश्किल है, समाधान के लिए तो फिर पता क्या करना होगा. मेरे लेखन का एक क्षेत्र धार्मिक समाज भी है. मैंने धर्म को उस मृत-संजीवनी के रूप में पाया है, जो हमें घर आँगन से लेकर अपने अंतर-मन में भी मिल जाती है सिर्फ उसे पहचानने की जरुरत है, हाँ अगर सही न पहचान सके तो ये वो तलवार बन जाती है, जो मानव नहीं मानवता को काट डालती है.

    April 10, 2012

    सादर अभिनन्दन! मैं भी धार्मिक उन्माद और साम्प्रदायिकता का घोर विरोधी हूँ. फिलहाल इस मंच पर अभी जाति-प्रथा और honour killing के विरुद्ध में लिखता हूँ…. आपकी प्रतिक्रिया का हार्दिक आभार.

April 9, 2012

हाँ मित्र, रचना तो पुरानी ही है. वो चेक कर रहा था कि प्रवचन का आखिरी भाग कैसे पोस्ट करूँगा कि दुबारा पब्लिक हो सके. आपको अच्छा लगा , मुझे ख़ुशी हुई.

MAHIMA SHREE के द्वारा
April 9, 2012

अलीन जी नमस्कार , पुरानी रचना लगती है , शायद आपने किसी आलेख के साथ इसे भी डाला था…खैर जो भी है….. बेहद गंभीर , धिकारती और ललकारती आज के परिवेश के अनुरूप , समाज को आईना दिखाती …. बहुत बधाइयाँ आपको…..

ANAND PRAVIN के द्वारा
February 2, 2012

अलीन जी, बहुत सुन्दर शुरुआत, तेज़ और धार दोनों है आपकी कविता में उम्मीद है ये दिया काफी प्रकाश देगा आदम तो इन्शान नहीं बन सकता बस कोशिश करेंगे की आदम की औलादों को इंसान बनाने की अच्छा लेख के लिए बधाई

yogi sarswat के द्वारा
February 2, 2012

बहुत सुन्दर रचना अलीन जी ! कृपया अपने विचार मेरे लेख पर भी जरूर दीजिये ! धन्यवाद ! http://yogensaraswat.jagranjunction.com/2012/01/30/

abodhbaalak के द्वारा
January 29, 2012

अनिल जी बहुत ही सुन्दर रचना, लेकिन आज जो ढूंढ रहे हैं वो विरले ही मिलता है, आदम की औलाद में इंसानियत अब ……………. ऐसे ही लिखते रहें http://abodhbaalak.jagranjunction.com

    अलीन के द्वारा
    January 31, 2012

    Abodhbalak Ji! हौशला आफजाई के लिए शुक्रिया…


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