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अख़बार की सुर्ख़ियों से

Posted On: 30 Jan, 2012 Others,न्यूज़ बर्थ में

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साल २०११ का आखिरी दिन यानि ३१ दिसम्बर, २०११ की सुबह ५ बजे की बात है.  आजमगढ़ बस स्टैंड पर मैं बलिया जाने वाली बस का इंतजार कर रहा था. तभी एक पेपर वाले की आवाज़ मेरे कानों तक पहुँची. मैंने चार रुपयें छुट्टे देकर एक पेपर की प्रति ली. मेरी एक खास आदत है कि मैं कोई भी पेज दो मिनट्स  से अधिक नहीं पढ़ता. युहीं पेजों के पलटने के दौरान, अचानक मेरी नज़र वाराणसी समाचार के एक घटनाक्रम पर जाकर ठहर गयी. वाराणसी के घोहना, शिवपुर के एक होमियोपैथ डाक्टर के पुत्र और बहु ने फाँसी लगा ली. उनके पास से मिले सुसाइड नोट्स से पता चलता है कि इस घटना के पीछे दहेज़ और प्रेम विवाह दोनों ही कारक हैं. जिसमे उक्त दम्पति ने परिजनों पर आत्महत्या के लिए प्रेरित करने का आरोप लगाया है. यक़ीनन इस खबर को विभिन्न लोगों ने विभिन्न तरह से लिया होगा; कुछ ने इसे गंभीरता से तो कुछ ने इसे मजाक में. पर कुल मिला जुलाकर नतीजा ये निकलता है कि ऐसी घटनाएँ आये दिन होती रहती हैं और हम इसके आदि से हो गए हैं और संबेदनहीन भी. कोई भी व्यक्ति आत्महत्या करने का सौख नहीं रखता है. पर यदि ऐसी घटनाएँ होती है तो संबंधित व्यक्ति कि मजबूरियों का अंदाजा लगाना मुश्किल है. आज दहेज़ प्रथा और ओनर किल्लिंग जैसे दानव, मानवीय भावनाओं और मूल्यों को निगलने के लिए मुख पसारे खड़े हैं. जो निश्चय ही मानवता के लिए अच्छी खबर नहीं है. ये घटनाएँ हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या मानवीय मूल्यों से बेशकीमती चंद सिक्के, झूठे शान और मर्यादाएं हैं जो अक्सर स्वार्थ के आगे बेबस नजर आती हैं. हम अपने स्वार्थ के लिए इन सबको दाव पर लगाने के लिए तैयार है. पर दो दिलों के खुशियों के लिए इसे तोड़ने के लिए तैयार नहीं है. जो हमारे गंदे मानसिक एवं सामाजिक स्तर को दर्शाता है.’वो गए अपनी बला’ से भले ही यह कहकर हम ऐसी घटनाओं से खुद को अलग-थलग करना चाहें. पर कहीं न कही हम इसके जिम्मेदार है और जिम्मेदार है, यह हमारा सामाजिक परिवेश. आये दिन हम इज्जत, मर्यादा, शान और समाज के नाम पर जो मानवीय भावनाओं के रौंदने का खेल खेल रहे हैं, उसे बंद करना ही होगा. नहीं तो वो दिन दूर नहीं जब मानवता हर गलियों और बाजारों में बिकती हुई नजर आएगी और कोई खरीदार नहीं मिलेगा. अब हमारे पास दो ही रास्ते हैं या तो हम अपने तन से शराफ़त के चोलें हटाकर समाज के सम्मुख आये या फिर उन लोगों को जीने का हक़ दे, जो अपनी जिंदगी अपने अर्थों में जीना चाहते हैं.

अंत में आपके सम्मुख एक सवाल रखना चाहता हूँ. यदि किसी से रिश्ता निभाने कि सजा मौत है तो एक रिश्तें को तोड़ने कि सजा क्या होनी चाहिए, हमें इस पर भी विचार करना होगा…

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9 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

munish के द्वारा
February 4, 2012

अनिलजी, वास्तव में दहेज़ का आतंक किसी आतंकवादी से कम नहीं है …….. ! केवल एक शब्द दहेज़ विभिन्न पक्षों के लिए विभिन्न मायने रखता है……… दहेज़ मांगने वालों के लिए भी ये स्टेटस सिम्बल होने के कारण आतंकित करता है और देने वाले तो रहते ही हैं.

    Rakesh के द्वारा
    February 4, 2012

    +१ तो मुनीश. अलीन जी, अच्छा मुद्दा उठाया है. पर इन सबका कोई जवाब नहीं है, जब अगली पीढ़ी इन सब भ्रांतियों को तोड़ कर आगे बढ़ेगी तभी कुछ हो सकता है.

    अलीन के द्वारा
    February 4, 2012

    राकेश जी! मुझे यह समझ में नहीं आता हैं कि हम हरेक समस्या का समाधान दूसरों से क्यों चाहतें हैं…

akraktale के द्वारा
February 3, 2012

अलीन जी नमस्कार, अवश्य ही उत्तर भारत में ये घटनाएं अधिक हैं मै ये नहीं कह रहा हूँ कि अन्य जगह पर स्थिति बिलकुल ठीक है. किन्तु कम है. कारण यह है कि उत्तर में दहेज़ का दानव अधिक पैर पसारे है. मै तो मध्य प्रदेश से हूँ और हमारे यहाँ के ग्वालियर के आस पास के इलाके में दहेज़ का भुत पूरी तरह से अपना प्रभाव बनाए है.इस प्रथा को तोड़ने के लिए युवाओं को ही आगे आना होगा क्योंकि दहेज़ आजकल स्टेटस सिम्बल बन गया है. प्रेम विवाह तो आजकल घर वालो कि राजा मंदी से आसानी से नियोजित विवाह में तब्दील हो रहे हैं इस लिए मेरी तो प्रेमियों से यही गुजारिश है कि घर में चर्चा कर सही राह चुने. सामाजिक विषय पर गहराई से चिंतन के लिए आपका आभार.

nishamittal के द्वारा
February 3, 2012

झूठे मान मर्यादा और प्रतिष्ठा के लिए बुजर्गों द्वारा नकारत्मक रुख अपनाना दुखद है,जिसके कारण न जाने कितनी जिंदगियां बर्बाद होती हैं.

yogi sarswat के द्वारा
February 2, 2012

अलीन जी , सच मानिये आजकल जो समाचार पत्र आते हैं वो किसी नोवेल के जैसे होते हैं ! मुख्या प्रष्ठ तो ठीक फिर देखिये क्या matter होता है ! लोकल पेज तो ऎसी घटनाओं से भरे होते हैं की घर से निकलते हुए दर लगता है ! different लेख लिखने के लिए धन्यवाद ! http://yogensaraswat.jagranjunction.com/2012/01/3

dineshaastik के द्वारा
February 2, 2012

आलेख में सच्चे आम  भारतीय पीड़ा मुखरित, सराहनीय एवं बधाई योग्य रचना। कृपया इसे भी पढ़े- नेता, कुत्ता और वेश्या

Sumit के द्वारा
February 1, 2012

बहुत अच्छा लेख http://sumitnaithani23.jagranjunction.com/2012/01/31/आम-आदमी-और-भिखारी/

    अलीन के द्वारा
    February 1, 2012

    सुमित जी, नमस्कार! प्रशंषा के लिए शुक्रिया…


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