साधना के पथ पर

अद्य की स्याही

50 Posts

1446 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 8647 postid : 39

भारत एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथ निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य?

Posted On: 4 Feb, 2012 Others,न्यूज़ बर्थ में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

 भारत एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथ निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य?आइयें कुछ भी कहने से पहले, एक बार भारतीय संविधान की प्रस्तावना पर नज़र डालते है…”हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथ निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को: सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, अभिव्यक्ति, बिश्वास , धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिस्था और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ने के लिए दृढ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख २६ नवम्बर १९४९ ई० ( मिति मार्ग शीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत २००६ विक्रमी) को एतद्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मसमर्पित करते हैं.”
उपर्युक्त भारतीय संविधान की परिकल्पना पढ़ने और भारतीय समाज की वर्तमान स्वरुप का विश्लेषण करने के बाद हम पाते हैं कि भारतीय संविधान की परिकल्पना या तो किताबों में या फिर कुछ जुबानों पर रह गयी है. मुझे नहीं लगता कि भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथ निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने कि परिकल्पना पहली बार २६ नवम्बर १९४९ ई० को की गयी. वरन यह प्रयास आदि कल से ही किया जा रहा है. भारत को ही नहीं अपितु पूरे विश्व को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथ निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने की. तभी तो हमारे ग्रंथों में ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की बात कही गयी है अर्थात पूरे विश्व को एक परिवार बनाने की परिकल्पना जो की तभी संभव है जब पूरे विश्व को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथ निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाया जाय. जो कि आदि कल से लेकर अब तक कागजी और जुबानी रही है. इसका मात्र कारण मानवीय व्यव्हार का केन्द्रीयकरण न हो पाना है. जो कि एक जटिल प्रक्रिया है. जिसे सरल बनाने के लिए आदि काल से लेकर अब तक कई प्रयास किये गए. परिणामस्वरुप कई राष्ट्रों, धर्मों, संस्थाओं के साथ-साथ विचारों का उदभव हुवा और इसके साथ ही मानवीय व्यवहार की केन्द्रीयकरण की समस्या और भी जटिल होती गयी. नतीजतन सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक और धार्मिक असमानता पाँव पसारती गई और हम इंसान परिवर्तन के नाम पर अपना स्वार्थ सिद्ध करते आये. इसी असामनता की खाई को पाटने के लिए जगत गुरु शंकराचार्य, ईसामसीह, मुहम्मद साहब, महात्मा बुद्ध, गुरुनानक, संत कबीर, स्वामी विवेकानंद और महात्मा गाँधी जैसे विशिष्ट महापुरुषों द्वारा प्रयास किया गया परन्तु समस्याएं आज भी अपने मूल रूप में हैं. कारण स्पष्ट है कि जब कभी भी विचार परिवर्तन कि लहर चलती है तो हमें अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए एक और आधार मिल जाता है. फिर क्या है? धर्म, ईश्वर और समाज के नाम पर हम मानवीय मूल्यों को लूटने का धंधा प्रारंभ कर देते हैं.
अब मैं अपनी बात एक जीवन्त उदाहरण के साथ रखने जा रहा हूँ. जो कभी मेरे साथ घटित हुआ और अक्सर उन सभी के साथ घटित होता है जो विचारों का परिवर्तन चाहते है. यह उस समय की बात है जब मैं लगभग १० वर्ष का था. मेरे गाँव के कुछ बुद्धिजीवी लोग, जो सामाजिक विकास से कहीं दूर अपना विकास करने में लगे हुए थे, समाज के विकास पर विचार-विमर्श कर रहे थे. एक दुसरे के विचारों को काटने और अपने विचार को सही सिद्ध करने की होड़ में एक दुसरे पर छीटा-कसी किये जा रहे थे. तभी अचानक मैं उनके बीच पहुंचा और बोला, ” आज हम सभी स्वयं के विकास में लगे हुए है है. क्या ऐसी परिस्थिति में समाज का विकास संभव है? तब उन्होंने मेरे जाती विशेष को गली देते हुए कहा, “अभी तुम बच्चे हो और जीतनी तुम्हारी उम्र है उससे कहीं ज्यादा हमारा तजुर्बा. समाज का विकास तभी संभव जब हम अपने विकास के बारे में सोचें.” चुकी मैं बचपन से ही जातिप्रथा जैसे कुप्रथाओं में बिश्वास नहीं करता. अतः उनकी गली को नज़र-अंदाज़ कर दिया और वहां से मुंह लटकाएं हुए घर को चला आया. परन्तु एक बात मुझे खटकती रही कि कोई व्यक्ति स्वयं को बुद्धिमान साबित करने के लिए अभद्र शब्दों का उपयोग करता है तो निश्चय उसके ज्ञान एवं तजुर्बें पर शक होता है. खैर छोड़िये इन बातों को . वैसे भी मैं उनकी बातों से सहमत था कि समाज का विकास तभी संभव है, जब हम अपने विकास के बारे में सोचें. अतः इस बात का मेरे पास कोई जवाब नहीं था.परन्तु व्यक्ति के विकास कि परिभाषा को लेकर हम कही न कही एक ग़लतफ़हमी पाले हुए है. यही कारण है कि हम भौतिक रूप से आगे बढ़ते जा रहें है और मानसिक रूप से संकुचित होते जा रहे हैं. इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि समाज का विकास करना आज भी एक ज्वलंत मुद्दा है. एक जंजीर उतना ही मजबूत होती है जितनी कि उसकी एक कड़ी कमजोर होती है. समाज एक जंजीर है जिसकी कड़ी हम सभी है. यहाँ एक तरफ खुली और ठंडी रातों में नंगी सड़कों पर लोग भुखमरी और बीमारी से मर रहें है. वहीँ दूसरी तरफ एयर कंडीशनल कमरों में ५६ प्रकार के व्यंजन परोशें जा रहें हैं. ऐसी दशा में व्यक्ति और समाज का विकास निश्चय ही संदेह के घेरे में आता हैं.
क्या हमारे पास पहनने को वस्त्र और आभूषण, चलने के लिए लम्बी गाड़ियाँ, भविष्य की सुरक्षा के लिए बैंक बैलेंस और रहने के लिए आलिशान भवन का होना, हमारे विकास को दर्शाता है या रोशनी में नहाती लम्बी-लम्बी सड़के या फिर ऊँची-ऊँची इमारतों के साथ-साथ तकनीकि रूप से दक्ष प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया का होना? व्यक्ति और समाज के विकास के लिए शिक्षा और ज्ञान को एक प्रमुख घटक माना गया है, जिसे पाकर कोई डाक्टर, कोई इन्जीनियर, कोई आई.ए.एस. के पदों को सुशोभित करता है; क्या इससे विकास को परिभाषित किया जा सकता हैं? यह सारी सुख सुबिधायें जिसका उपयोग, हम जीवन पर्यंत अपने बाहरी स्वरुप को निखारने में करतें हैं, भौतिकता के प्रतीक मात्र है. हम अपनी कमजोरियों और कमियों को छिपानें के लियें, कभी धार्मिक, कभी न्यायिक, कभी आर्थिक तो कभी राजनीतिक प्रणाली को दोषी साबित करने में लगे रहते हैं. पर यह हम भूल जाते है की ये सारी प्रणालियाँ सामाजिक प्रणाली का एक अंग हैं, जिसके हम अभिन्न अवयव है. तो निश्चय ही कमी हमारे अन्दर है. आये दिन धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक और न्यायिक बदलाव के नाम पर, हम अपना स्वार्थ सिद्ध करते रहते हैं. इससे हमारा बाहरी स्वरुप तो मजबूत हो जाता है परन्तु आतंरिक रूप उतना ही कमजोर और खोखला होता जाता है. यही कारण है की जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद, ऑनर किल्लिंग, दहेज़ प्रथा, भ्रष्टाचार और अंधविश्वास के साथ-साथ धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक उन्माद पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होता रहता है. ऐसा गणतंत्र जिसके लोग गण (समूह) हित को नज़र अंदाज़ करते हुए, अपनी हित में लगे हुए हो तो निश्चय ही यह एक सोचनीय विषय है. ऐसे में भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथ निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने की परिकल्पना एक बेईमानी सी लगती है.
स्पष्ट है कि व्यक्ति और समाज के बाहरी स्वरुप के साथ-साथ आतंरिक स्वरुप का निर्माण होना परम आवश्यक है. यह तभी संभव है जब हमारे अन्दर आंतरिक जागरूकता हो. तब जाकर व्यक्ति और समाज के विकास को सही अर्थों में परिभाषित किया जा सकता है. जिससे विकास कि सही नीव डाली जा सकती है. फिर भारत को ही नहीं अपितु पुरे विश्व को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथ निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाया जा सकता है और ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की भावना को साकार रूप दिया जा सकता है. वरना वसुधैव कुटुम्बकम की भावना बहुत दूर की चीज है, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथ निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने की परिकल्पना सदैव ही एक प्रश्न चिन्ह बनी रहेगी.

(चित्र गूगल इमेज साभार )

| NEXT

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (44 votes, average: 4.89 out of 5)
Loading ... Loading ...

27 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
January 28, 2014

क्या हमारे पास पहनने को वस्त्र और आभूषण, चलने के लिए लम्बी गाड़ियाँ, भविष्य की सुरक्षा के लिए बैंक बैलेंस और रहने के लिए आलिशान भवन का होना, हमारे विकास को दर्शाता है या रोशनी में नहाती लम्बी-लम्बी सड़के या फिर ऊँची-ऊँची इमारतों के साथ-साथ तकनीकि रूप से दक्ष प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया का होना? व्यक्ति और समाज के विकास के लिए शिक्षा और ज्ञान को एक प्रमुख घटक माना गया है, जिसे पाकर कोई डाक्टर, कोई इन्जीनियर, कोई आई.ए.एस. के पदों को सुशोभित करता है; क्या इससे विकास को परिभाषित किया जा सकता हैं? यह सारी सुख सुबिधायें जिसका उपयोग, हम जीवन पर्यंत अपने बाहरी स्वरुप को निखारने में करतें हैं, भौतिकता के प्रतीक मात्र है. हम अपनी कमजोरियों और कमियों को छिपानें के लियें, कभी धार्मिक, कभी न्यायिक, कभी आर्थिक तो कभी राजनीतिक प्रणाली को दोषी साबित करने में लगे रहते हैं. पर यह हम भूल जाते है की ये सारी प्रणालियाँ सामाजिक प्रणाली का एक अंग हैं, जिसके हम अभिन्न अवयव है. अलीन साब , आज के समय में ये चीजें जो आपने ऊपर लिखी हैं वो ही विकास और योग्यता का मापदंड हैं और होनी भी चाहिए ! क्या एक टॉप जब तैयार होती है तो उसको कोई अनपढ़ तैयार करता है ? राकेट जब आध्मान का सीना चीरता हुआ जाता है तब क्या वो मन की आवाज से जाता है , नहीं न ? भौतिक वादी होने में कोई बुराई नहीं है यदि आप किसी और को नुक्सान नहीं पहुंचा रहे हैं तो !

    January 28, 2014

    स्वागत है! बहुत दिनों के बाद आपका इधर आना हुआ और बताये कैसे हैं आप…………… हाँ…….हाँ……..आपको क्या लगता है कि तन की आवाज़ से होता है…………. मैं कहाँ भौतिकवाद और आधुनिक वातावरण का विरोध किया हूँ  मैं सिर्फ सवाल उठाया हूँ कि क्या यही विकास है……………………. यदि एक व्यक्ति की विकास की बात कि जाय तो ……………….जिस प्रकार शारीरिक, मानसिक, सामाजिक व अध्यात्मिक इन चारो रूप से स्वस्थ व्यक्ति ही स्वस्थ है उसी प्रकार उसका विकास भी चहुदिश होना चाहिए…………..यही चीज व्यक्ति के साथ-साथ…..समाज और देश पर भी लागु होते हैं………….आप आये हार्दिक आभार!

sadguruji के द्वारा
January 24, 2014

स्पष्ट है कि व्यक्ति और समाज के बाहरी स्वरुप के साथ-साथ आतंरिक स्वरुप का निर्माण होना परम आवश्यक है. यह तभी संभव है जब हमारे अन्दर आंतरिक जागरूकता हो. तब जाकर व्यक्ति और समाज के विकास को सही अर्थों में परिभाषित किया जा सकता है. जिससे विकास कि सही नीव डाली जा सकती है. फिर भारत को ही नहीं अपितु पुरे विश्व को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथ निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाया जा सकता है और ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की भावना को साकार रूप दिया जा सकता है. वरना वसुधैव कुटुम्बकम की भावना बहुत दूर की चीज है, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथ निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने की परिकल्पना सदैव ही एक प्रश्न चिन्ह बनी रहेगी.सार्थक लेख.बधाई.

Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
January 24, 2014

वो सब तो ठीक था लेकिन अटल विहारी का नाम सुन कर मुझे गुस्सा आ गया | तुम भी…??

    January 25, 2014

    महोदय, आप कहीं का गुसा कहीं और कर रहे हैं जिस पर किसी और का हक़ है……कृपया उनके साथ ऐसी बेइंसाफी न करे….सो आप उनकी चीज उन्हीं को वापस कर दे…..

January 23, 2014

कदम मिलाकर चलना होगा बाधाएँ आती हैं आएँ घिरें प्रलय की घोर घटाएँ पावों के नीचे अंगारे सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ निज हाथों में हँसते-हँसते आग लगाकर जलना होगा कदम मिलाकर चलना होगा हास्य-रुदन में, तूफानों में अगर असंख्यक बलिदानों में उद्यानों में, वीरानों में अपमानों में, सम्मानों में उन्नत मस्तक, उभरा सीना पीड़ाओं में पलना होगा कदम मिलाकर चलना होगा उजियारे में, अंधकार में कल कहार में, बीच धार में घोर घृणा में, पूत प्यार में क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में जीवन के शत-शत आकर्षक अरमानों को ढलना होगा कदम मिलाकर चलना होगा सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ प्रगति चिरंतन कैसा इति अब सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ असफल, सफल समान मनोरथ सब कुछ देकर कुछ न माँगते पावस बनकर ढ़लना होगा। कदम मिलाकर चलना होगा। कुछ काँटों से सज्जित जीवन, प्रखर प्यार से वंचित यौवन, नीरवता से मुखरित मधुबन, परहित अर्पित अपना तन-मन, जीवन को शत-शत आहुति में, जलना होगा, गलना होगा। कदम मिलाकर चलना होगा। ……………….श्री अटल विहारी बाजपेयी

aman kumar के द्वारा
January 22, 2014

आपकी भावना बहुत पवित्र है ….उच्च है ,  आभार

JAMALUDDIN ANSARI के द्वारा
February 6, 2012

अलीन भाई ; अस्सलाम वालैकुम , आप का लेख वाकई काबिले तारीफ है ; आप ने सही लिखा है – आये दिन धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक और न्यायिक बदलाव के नाम पर, हम अपना स्वार्थ सिद्ध करते रहते हैं. इससे हमारा बाहरी स्वरुप तो मजबूत हो जाता है परन्तु आतंरिक रूप उतना ही कमजोर और खोखला होता जाता है. यही कारण है की जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद, ऑनर किल्लिंग, दहेज़ प्रथा, भ्रष्टाचार और अंधविश्वास के साथ-साथ धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक उन्माद पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होता रहता है. ऐसा गणतंत्र जिसके लोग गण (समूह) हित को नज़र अंदाज़ करते हुए, अपनी हित में लगे हुए हो तो निश्चय ही यह एक सोचनीय विषय है. ऐसे में भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथ निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने की परिकल्पना एक बेईमानी सी लगती है.

    अलीन के द्वारा
    February 6, 2012

    जनाब jamaluddin साहब! मेरा लेख आपको पसंद आया . इसके लिए विशेष आभार.

Santosh Kumar के द्वारा
February 5, 2012

अलीन जी ,.बहुत सुन्दर आपके विचार ,.और बहुत अच्छे तरीके से आपने प्रस्तुत किया है आप निश्चित ही बधाई के पात्र हैं ,.हमारे गणराज्य में बहुत विद्रूपताएं हैं और इनके ज्यादा जिम्मेदार हमारे शासक हैं ,.बांटो और राज करो के फार्मूले के रहते हमें कल्पनाओं में ही जीना होगा ,.हम सबको मिलकर इनको जड़ों से उखाड़ना होगा ,.हालांकि समाज के अन्दर इसे बहुत से तत्व भी हैं जो पूर्वाग्रह ग्रसित हैं जैसे की आपने अपने बचपन की बात बताई ,.लेकिन हमें सतत प्रयत्नशील रहकर बेहतर भविष्य का निर्माण करना होगा ..हार्दिक आभार सहित

    अलीन के द्वारा
    February 5, 2012

    संतोष जी, आपकी बात को काटने के लिए माफ़ी चाहूँगा. आपने शायद लेख को ध्यान से नहीं पढ़ा…इसके जिम्मेदार हमारे शासक नहीं अपितु हम हैं क्योंकि शासकों से हम नहीं बल्कि वो हमसे है….बाकि बातों से आपके सहमत हूँ. ऐसे ही आपके अनमोल कमेंट्स का हमेशा इंतजार रहेगा…

sinsera के द्वारा
February 5, 2012

अनिल जी नमस्कार, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथ निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने का सपना अगर इतनी आँखों में है तो फिर कौन रोक सकता है. गणतंत्र दिवस के बाद “Beating the Retreat” के रूप में काफी अच्छा लेख. बधाई…..

    अलीन के द्वारा
    February 5, 2012

    sinsera ji, नमस्कार! एक बार फिर आपका आभारी हुआ जो आपने मेरे लेख को सराहा.

manojjohny के द्वारा
February 5, 2012

अलीन जी, आपने बहुत सही कहा है कि,”…… धर्म, ईश्वर और समाज के नाम पर हम मानवीय मूल्यों को लूटने का धंधा प्रारंभ कर देते हैं.” ” धर्म, ईश्वर और समाज के नाम पर हम मानवीय मूल्यों को लूटने का धंधा प्रारंभ कर देते हैं.” बहुत खरी खरी लिखी आपने। बहुत बहुत धन्यवाद।

    अलीन के द्वारा
    February 5, 2012

    मनोज जी! हौशला अफजाई का शुक्रिया….

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
February 5, 2012

सुन्दर आलेख. बधाई ! अलीन जी.

    अलीन के द्वारा
    February 5, 2012

    राजीव जी ! आपकी अनमोल प्रशंषा का आभार…

akraktale के द्वारा
February 5, 2012

अलीन जी नमस्कार, आपने वसुधैव कुटुम्बकम और धर्म निरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य की बात की है जो सर्वथा काल्पनिक ही रही हैं और रहेंगी. हाँ हमें उसके नजदीक बने रहने के लिए प्रयत्नशील अवश्य ही रहना चाहिए. आपने गणतंत्र की मनोहर झाकियों पर प्रसन्नता व्यक्त की है उसका एक उदाहरण म.प्र. के देवास जिले की झांकी में एक आठ दस वर्ष के लड़के को रूपये का लालच दे कर ठंडे पानी के नल के निचे नहलाने के लिए बैठा दिया.आपको यदि आश्चर्य होता है की हमारा गणतंत्र इतना पुराना है तो होना ही चाहिए. हम लोकतंत्र के नाम पर छः दशकों से सिर्फ वोट वोट ही तो खेलते आ रहे हैं. लोकतंत्र का हमारे लिए बस इतना ही तो अर्थ रह गया है.सच्चाई की परते खोलता सुन्दर आलेख.

    अलीन के द्वारा
    February 5, 2012

    akraktale जी, सादर नमस्कार! यदि हम सभी मिलकर प्रयास ही करें तो ये बहुत होगा. वैसे देवास जिले की घटना सचमुच शर्मशार करने वाली है. जो सोचने पर मजबूर करती है की हम लोकतांत्रिक गणराज्य में…..

nishamittal के द्वारा
February 5, 2012

सार्थक विचारणीय आलेख अलीन जी.

    अलीन के द्वारा
    February 5, 2012

    शुभ प्रभात! निशा जी….धन्यवाद.

अलीन के द्वारा
February 5, 2012

प्रदीप जी, शुभ प्रभात! आपका साथ पाकर धन्य और आभारी हुआ…

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
February 4, 2012

जनाब अलीन साहब, आदाब अर्ज. बहुत सुन्दर स्पष्ट लेख, मैं चाह कर भी ऐसा नहीं लिख सकता. इसकी बधाई. हम लोग साथ साथ चलेंगे. ठीक. बधाई,

ANAND PRAVIN के द्वारा
February 4, 2012

बहुत अर्थपूर्ण लेख, भारत एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथ निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बने इसकी कल्पना हम भी करेंगे लिखते रहिये

    अलीन के द्वारा
    February 4, 2012

    आनंद जी..कल्पना नहीं हमें प्रयास करना होगा और ये तभी संभव है जब…..


topic of the week



latest from jagran