साधना के पथ पर

अद्य की स्याही

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वो निकला था ...

Posted On: 6 Feb, 2012 न्यूज़ बर्थ में

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वो निकला था जहां में एक आग बनकर,

किस्मत देखों उसकी, रह गया राख बनकर.

बचपना था उसके अन्दर, जो हरकते करता बच्चों की,

शायद गलत फहमी थी  उसे, अपने शैतान होने की.

काश उसे ये मालूम होता, यह जहां है शैतानो का,

जहाँ उठता है ज़नाजा, धर्म के नाम पर अरमानों का.

 

वो निकला था जहां में एक आग बनकर

 

यहाँ कही नाम बिकते हैं, कही ईमान बिकते हैं,

जब कुछ न हो पास, रहीम और राम बिकते हैं.

सत्य को पुजनेवालें, सत्य से कहीं कोशों दूर,

जिनको लूटने चला वक्त के हाथों एक मजबूर.

कहीं अच्छा था हम इंसानों से, वो जन्म से शैतान,

उसकी फितरत शैतानियत, पर हम तो जन्म से इंसान.

 

सत्य को पुजनेवालें, सत्य से कहीं कोशों दूर

 

जब अवगत हुआ हकीकत से अपना जोश खो दिया,

हसीं आई खुद की मासूमियत पे, नासमझी पर रो दिया.

तबतलक बहुत देर हो चली, यहाँ आकर मजाक बन गया,

बनकर निकला था जो आग, हमारे हाथों खाक बन गया.

 

बनकर निकला था जो आग, हमारे हाथों खाक बन गया.

(चित्र गूगल इमेज साभार )

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38 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

October 31, 2012

सादर प्रणाम! इसमे आश्चर्य की क्या बात है…..? यह भारत भूमि अनेक रत्नोवाली है उनमे से आप भी एक बहुमूल्य रत्न है…………….हाँ…………हाँ…………..हाँ……………! जी मैंने कहीं इस बात का उल्लेख किया हूँ कि मूलतः कवि और शायर ही हूँ जो १३ वर्ष कि उम्र से कलम उठाया, हाँ मुझे अलंकर, रस, छंद का कोई ज्ञान नहीं है .मैं अपने ही लय और गति में लिखता जाता हूँ………….और आजतक उसमे बदलाव नहीं किया ! आलेख तो बस पिछले दो सालों से लिख रहा हूँ………..सच पूछिये तो अभी तक अपना बेस्ट रचनाएँ सार्वजनिक नहीं किया क्योंकि आज-कल साहित्य चोरों की संख्या बढ़ती ही जा रही है,,,,,,,,एक बार बचपन में एक पत्रकार को अपनी रचना पब्लिश करने के लिए दिया था……..पर उसने उसे अपने नाम से पब्लिश कर दिया. अतः मैं अपनी रचनाओं को सार्वजनिक नहीं करता था. वो तो आप लोगों की मेहरबानी है कि आप लोगो के बीच कुछ रचनाएँ ला पता हूँ……उस समय एक शेर लिखा था वो याद आ रहा है गौर फरमाएं,,,,,,,,,,, कुछ लोग अपना गलत पहचान देते हैं कि गैरों के शेरों को अपना नाम देते हैं, कुछ लोग ऐसे भी हैं यारों जो किसी लायक नहीं;फिर भी लोग उन्हें इनाम देते हैं…………… अब सवाल यह उठता है कि चोट बहुत बचपन में लगी है ? तो आपने सच पहचाना क्योंकि जिस क्षेत्र में रहता हूँ. देखा हूँ राजपूत और ब्राहमणों का अत्याचार जिसके भुक्तभोगी दलित और पिछड़े हैं………….बदलाव तो बहुत हुआ है पर आज भी बहुत कुछ वैसे ही है………….यहाँ दोष किसी जाति विशेष का नहीं है बल्कि मानव स्वभाव का है जो स्वार्थ, सत्ता और वर्चस्व के अधीन होकर…….सारी सीमायें पार कर जाता है……….अतः मैं मानसिक और बौद्धिक विकास का समर्थन करता हूँ………..आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया का हार्दिक आभार……………!

jlsingh के द्वारा
October 31, 2012

अनिल जी, नमस्कार! झकझोर कर रख दिया आपने ! मैं भी थोड़ा कमजोर दिल ही हूँ. कई बार पढ़ने के बाद प्रतिक्रिया दे रहा हूँ. आश्चर्य है, आप तेरह साल की उम्र में ऐसी कविताएँ लिखने लगे थे! यानी ‘चोट’ बहुत बचपन में ही लगी थी ज़माने से!

MAHIMA SHREE के द्वारा
February 22, 2012

अलीन जी नमस्कार बेहद गंभीर रचना , थोडा उदास कर गयी…..सच है..पर शैतान अलग से पैदा नहीं होते , हम इन्सान ही अपनी क्रूरता और लालच में शैतान बन जाते है…ईश्वर ने तो बस इन्सान की रचना की है..

    February 22, 2012

    सादर अभिवादन! सच कहा आपने….इस रचना को इस मंच पर लाने की मेरी सोच, आपके कमेन्ट से सार्थक और सफल हुई…

munish के द्वारा
February 21, 2012

बहुत अच्छी पंक्तियाँ. बहुत अच्छी कविता …… ! ज़रा इन पंक्तियों पर गौर कीजिये काश उसे ये मालूम होता, यह जहाँ है शैतानो का, जहाँ उठती है अर्थी, धर्म के नाम पर अरमानो का. मेरे विचार से अर्थी के स्थान पर “जनाजा” कर दें ज्यादा अच्छा लगेगा :)

    munish के द्वारा
    February 21, 2012

    “जहां उठता है ज़नाजा धर्म के नाम पर अरमानों का ” कुछ इस तरह लिखिए :)

    February 21, 2012

    मुनीश जी आपकी बात गौर करने योग्य, मैं भी पहले यही सोचा था. चुकी ‘जहां’ शब्द स्त्री लिंग है. अतः उसके निचे की पंक्ति को स्त्री लिंग बनाने के लिए मुझे ‘जनाजा’ की जगह ‘अर्थी’ यूज करना पड़ा. हा परन्तु अर्थी के साथ ‘उठती’ शब्द नहीं होना चाहिए था. अतः हम इसको बदलकर ‘सजती’ कर देता हूँ. दरअसल अबतक जो भी मैं कविता पोस्ट किया हूँ, वो तेरह वर्ष की उम्र में लिखा हूँ. शायद इसलिए कही न कही कुछ कमी सी रह गयी होगी. आशा करता हूँ कि अब आपको कोई शिकायत नहीं होगी. …..आपके बहुमूल्य सुझाव का हमेशा स्वागत है …

    munish के द्वारा
    February 22, 2012

    आदरणीय अनिल जी, ये तो केवल एक सुझाव दिया था कोई गलती नहीं ढूंढी …..!, क्योंकि लेखन कार्य में लेख लिखते समय क्या मनोदशा है इसका समझ पाना मुश्किल कार्य होता है और लेखक अपने मनोभावों के आधार पर ही शब्दों का संचयन करता है इसलिए ये गलती ढूंढना नहीं है वरन केवल एक सुझाव था…….! मेरे विचार में आप अपनी इस पंक्ति को फिर से पढें और सोचें की “सजती” करने के बाद क्या पंक्तियाँ लयबद्ध बन गयीं हैं…..?

    February 22, 2012

    लीजिये जनाब! अभी लयबद्ध कर देते हैं……..सादर अभिवादन.

Rakesh के द्वारा
February 11, 2012

अलीन जी , अच्छी रचना. थोडा vyathit कर deti है. एक salah dena chahta hu, galat lage तो maaf karna. pahale shabd mat bhariye, भाव एक पन्ने पर लिख लीजिये, और फिर अगर जुगलबंदी नहीं भी हो प् रही है तो भी ऐसे ही लिख दीजिये. मई ऐसा इसलिए कह रहा हूँ, की कई जगह आपकी कविता में मुझे भाव नहीं समझ में आया. दूसरी बात, जब हम किसी का दर्द भी लिख रहे हो, तो उसे पढ़ के लोग उसके लिए कुछ कर सकने की आस जगा सके, न की और ज्यादा ‘give up’ कर दे. हो सकता है, छोटा मुह बड़ी बात हो, इस गुस्ताखी के लिए क्षमा.

    अलीन के द्वारा
    February 12, 2012

    राकेश जी, सादर अभिनन्दन! कविता का भाव समझ में नहीं आया. इसके लिए माफ़ी चाहूँगा. आपकी कविताओं में समस्या और समाधान दोनों मिल जाता हैं. जो कि बहुत ही अच्छी बात है. मेरी कविताओं में हमेशा समाधान को तलाशती समस्या ही पाएंगे क्योंकि मैं चाहता हूँ कि हम सभी मिलकर, समाधान निकालें ताकि वो प्रभावी और स्थिर हो. मैं चाहकर भी ऐसा नहीं लिख सकता मेरी अपनी मज़बूरी है. आप यदि इस कविता का विश्लेषण करंगे तो पाएंगे कि मैं कही भी शैतान के लिए कुछ करने कि आश नहीं जगाया हूँ, हाँ पर उससे हमदर्दी जरुर हैं. हम इंसानों से कहीं बेहतर एक शैतान हैं.जो सोचने और विचारने पर मजबूर करता है कि………………………………….. मैं चाहुगा कि अब आप सभी अपने हिशाब से भाव भर लीजिये. मेरा काम था लिखना, भाव तो आप ही निकालेंगे सर जी. क्षमा मांगकर हमें शर्मिंदा न करें. एक बार और कोशिश करें, शायद भाव मिल जाएँ. आपकी स्वतंत्र प्रतिक्रिया का आभार…..

    Rakesh के द्वारा
    February 12, 2012

    अलीन जी, सादर. ऐसा कुछ नहीं है की मेरी कविताये कोई समाधान बता रही है और अगर बता भी रह है तो लोग उनको मान लेंगे. अगर ऐसा होता तो कितने बड़े बड़े लोग बताने वाले आये जिनके चरणों की मै धूल भी नहीं, कुछ ख़ास परिवर्तन नहीं ला पाए और या तो अपनी कविता बदल दी या शराबी हो गए. मै आपकी बात से सहमत हू की हम सब को मिल के समाधान ढूँढना पड़ेगा और वाही प्रभावी होगा. अभिवादन.

अलीन के द्वारा
February 9, 2012

jagobhaijago…….उत्साह बढाने का शुक्रिया….

dineshaastik के द्वारा
February 9, 2012

रचना के साथ साथ चित्रों का सुन्दर समन्वय,  कृपया इसे भी पढ़े- नेता कुत्ता और वेश्या

    अलीन के द्वारा
    February 9, 2012

    दिनेश जी, हार्दिक अभिनन्दन…

jagobhaijago के द्वारा
February 8, 2012

महोदय, चित्रों के साथ शब्दों का इतना सुन्दर समन्वय करते हुए इतनी प्रेरक , मर्मस्पर्शी व काबिलेतारीफ बात कहने के लिए आपका हार्दिक अभिनन्दन…

nishamittal के द्वारा
February 8, 2012

बहुत सुन्दर प्रस्तुति और चित्र बधाई

    अलीन के द्वारा
    February 8, 2012

    आदरणीय निशा जी, सादर नमस्कार! आपकी प्रतिक्रिया पाकर गौरान्वित हुआ…

वाहिद काशीवासी के द्वारा
February 8, 2012

अच्छा प्रयास है आपका अलीन जी। बहुत ही अनछुआ विषय चुना आपने। साभार,

    अलीन के द्वारा
    February 8, 2012

    वाहिद साहब! आपको मेरी रचना अच्छी लगी, इसके लिया शुक्रिया.

yogi sarswat के द्वारा
February 8, 2012

अलीन जी फोटो ग्राफ्स के साथ अपनी बात को कहने की कला , और इतना बेहतर समन्वय ! वाह ! बहुत बढ़िया , लेकिन अक्रताले जी एक बात से सहमत हूँ , आखिरी वाला चित्र कहीं न कहीं दिल को दुखी कर जाता है ! http://yogensaraswat.jagranjunction.com/2012/02/07

    अलीन के द्वारा
    February 8, 2012

    योगी जी! सादर अभिवादन आपकी बातों से मैं भी सहमत हूँ. सच मानिये तो सिर्फ यह चित्र ही नहीं अपितु पूरी कविता दुखी करती हैं. कारण एक शैतान का मारा जाना क्योंकि हम इंसानों से वो कहीं अच्छा था. हम जो बाहर शैतान को ख़त्म करने के लिए ढूढ़ते रहते पर अपने अन्दर छुपे शैतान को ख़त्म नहीं कर पाते. मुझे इस शैतान कि मौत से जहाँ अफ़सोस हैं वही दूसरी तरफ खुद के इंसान होने पर दुःख भी……आपकी प्रतिक्रिया बहुत अच्छी लगी. यूँही मेरा हौशला बढ़ाते रहिये.

अलीन के द्वारा
February 7, 2012

akraktale जी, सादर अभिवादन! आपकी प्रतिक्रिया का हमेशा मुझे इंतज़ार रहता है….आपकी प्रति क्रिया पाकर खुसी हुई…..अंतिम पंक्ति आपको खटकी, इसके लिए माफ़ी चाहूँगा.पर उस अंक्ति को आप अपनी जगह से देख रहे है और मै अपनी जगह से, अतः आपका सवाल प्रासंगिक है. आपकी बातों से इत्तेफाक रखता हूँ. शायद जो मैं मेसेज देना चाहा हूँ वह आनंद जी और प्रदीप जी तक सुचारू रूप से पहुंचाने में कामयाब रहा. आपके प्रयोग से इस कविता का एक और स्वरुप विकसित हुआ इसके लिए आपका विशेष आभार…

abodhbaalak के द्वारा
February 7, 2012

अलीन जी मन को छू लेने वाली रचना, भाव विभोर करती, ऐसे ही लिखते रहें http://abodhbaalak.jagranjunction.com

    अलीन के द्वारा
    February 7, 2012

    अबोधबालक जी, सादर नमस्कार! सिर्फ भाव विभोर होने से काम नहीं चलेगा. यह मत भूलिए की आपकी प्रतिक्रियों के साथ-साथ आपकी रचनाओं का भी इंतज़ार रहता है. अतः और हमें उससे महरूम न करिए….

akraktale के द्वारा
February 7, 2012

अलीन जी नमस्कार, शैतानियत पर चोट करती सुन्दर रचना.अंतिम चित्र वीभत्स है किन्तु प्रासंगिक है. मगर क्षमा करें अंतिम पंक्ति खटक रही है. क्यों ये आप की रचना की ही दो पंक्तिया पढ़ लें. उसकी फितरत शैतानियत, पर हम तो जन्म से इंसान बनकर निकला था जो आग, हमारे(खुद के) हाथों खाक बन गया. बधाई.

अलीन के द्वारा
February 7, 2012

Sinsera जी , सादर अभिवादन! …..आपकी सलाह पर विचार करूँगा……हौसला अफजाई के लिए शुक्रिया.

sinsera के द्वारा
February 6, 2012

अनिल जी नमस्कार, क्या बात कह बैठे आप . इस तरह की बातें सच्ची होते हुए भी काफी झकझोर डालती हैं. गलत treatment क्या से क्या कर जाता है, सच, इस का अंदाज़ ही नहीं होता. हाँ, ऐसी पोस्ट में ऊपर वार्निंग डाल दिया करें.. “कृपया कमज़ोर दिल वाले न पढ़ें.”

February 6, 2012

अलीन जी नमस्कार! बहुत ही हृदयस्पर्शी रचना …आपको ढेरों बधाइयाँ !!

    अलीन के द्वारा
    February 6, 2012

    डॉ साहब, सादर अभिवादन! आपका आशीर्वाद स्वरुप बधाइयाँ पाकर बहुत खुसी मिली.

ANAND PRAVIN के द्वारा
February 6, 2012

यहाँ कही नाम बिकते हैं, कही ईमान बिकते हैं, जब कुछ न हो पास, रहीम और राम बिकते हैं. वाह आलीन जी, क्या खूब कहा है आपने जीवन की सच्चाई है यह सब की शौक कह लीजिये या लाचारी मगर एक छोटी सी आग लपट का रूप ले सब कुछ जला देती है इस पर कुछ मेरी भी सुन लीजिये “बड़े मगरूर होकर चल रहें थे कल जो सडको पे, उन्हीं को आज दे कंधा चिता पर दे जलाया है” “अजीबो शौक थे उनके जबी तक सांस थी तन में, अभी है जल रहे ऐसे की जलना ही मनाया था”

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    February 6, 2012

    इसे कविता में भी पोस्ट करे ताकि ज्यादा लोग पढ़ सकें

    अलीन के द्वारा
    February 6, 2012

    जनाब प्रवीण साहब ! भाई आपका भी जवाब नहीं, मैं आपको माचिस की तिल्ली क्या थमाया? आपने तो पूरी बस्ती ही जला कर रख कर दी. ….बहुत खूब …अब कुशुरवार मुझे मत ठहरायिगा.

    अलीन के द्वारा
    February 6, 2012

    आपका सुझाव सर आखों पर…

अलीन के द्वारा
February 6, 2012

minujha जी, सादर नमस्कार! आपको मेरी कविता अच्छी लगी यह जानकर बहुत खुशी हुई. चित्र विचित्र लगे इसके लिए माफ़ी चाहूँगा…..आपकी बेशकीमती सुझाव का आभार.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
February 6, 2012

आलीन जी. आदाब उसकी फितरत शैतानियत, पर हम तो जन्म से इंसान. मन भर गया, शब्द नहीं हैं. फिर कभी.

    अलीन के द्वारा
    February 6, 2012

    आदरणीय प्रदीप जी, सादर नमस्कार! एक बार फिर आपके आशीर्वाद स्वरुप दो वचन पाकर गौरवान्वित हुआ…

minujha के द्वारा
February 6, 2012

यहाँ कही नाम बिकते हैं, कही ईमान बिकते हैं, जब कुछ न हो पास, रहीम और राम बिकते हैं. आपने लिखा तो बहुत अच्छा है अलीन जी,पर कृपया अन्यथा ना लेंगे , आपके  चित्र विचलित करने वाले है


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