साधना के पथ पर

अद्य की स्याही

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मेरी सदा-एक शिकायत

Posted On: 9 Feb, 2012 Others,न्यूज़ बर्थ में

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मेरी सदा-एक शिकायत किसी व्यक्ति विशेष अथवा समूह विशेष से नहीं है परन्तु शिकायत है. हाँ एक शिकायत है.

बलि प्रथा Bali PrathaHONOUR KILLINGDomestic Violenceअसहाय इज्जतदहेज़ प्रथा

मेरी सदा: एक शिकायत है बलि प्रथा के प्रति जिसके कारण बेजुबान पशुओं की धर्म और भगवान के नाम पर बलि दी जाती है.एक शिकायत है दहेज़ प्रथा के प्रति जिसके कारण बहन और बेटियों की अर्थी सजायी जाती है. एक शिकायत है उस समाज के प्रति जहाँ लोग एक तरफ ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की बात करते है और दूसरी तरफ अपने घरों को बाटते चले जाते हैं.एक शिकायत है उस समाज के प्रति जहाँ जमीन, नदियों और आसमान के साथ-साथ रिश्तों को भी बाट दिया गया है. एक शिकायत है उस समाज के प्रति जहाँ राम और रहीम की उपासना तो की जाती है पर उनके द्वारा बताये मार्ग का अनुसरण नहीं किया जाता. एक शिकायत है उस समाज के प्रति जहाँ ओनर किल्लिंग के नाम पर दो दिलों के अरमानों को बेरहमी से कुचला जाता हैं. एक शिकायत है उस परंपरा के प्रति जिसके कारण आये दिन मासूम जिंदगियां मौत को गले लगा रही हैं और फिर भी मानवता सोयी हुई है. एक शिकायत है उस परंपरा के प्रति जिसके कारण एक बाप अपनी बेटी की खुशियों का गला घोटने को तैयार है पर उसके खुशियों में शामिल नहीं हो सकता. एक शिकायत है उस परंपरा के प्रति जिसके कारण एक माँ अपनी बेटी को इस लिए बेरहमी से मारती है क्योंकि वो किसी दुसरे जाति के लड़के से शादी करना चाहती है. एक शिकायत है उस परंपरा के प्रति जिसके कारण एक बेटी अपने माता-पिता के खुशियों के खातिर अपने प्यार का बलि दे देती है और अपनी सिसकियों को चहारदीवारी के अन्दर कैद कर लेती है. एक शिकायत है उस परंपरा के प्रति जिसके कारण माता-पिता अपने उन बच्चों की जान लेने को तैयार हो जाते है जिनके कभी एक छोटी-सी तकलीफ से उन्हें रात भर नींद नहीं आती थी. एक शिकायत है उस शान और मर्यादा से जो किसी के जीवन लेने से बढ़ती है और एक जीवन देने से घटती है. एक शिकायत है उस असहाय इज्जत से जो दो दिलों के मिलने से मिट्टी में मिल जाती है और दो दिलों के तोड़ने से आसमान पे रोशन होती है. हाँ मुझे एक शिकायत है आपसे और ….खुद से.

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32 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jagojagobharat के द्वारा
April 3, 2012

अनिल जी बलि प्रथा का विरोध अवश्य किया जाना चाहिए किन्तु जहा तक आप अन्य जाती के लड़के से प्रेम विवाह की बात पर सिकायत है तो ऐसा लगता है की लोगो को अपनी जाती अपने समाज और अपने धर्म के व्यति से सम्बन्ध बनाना चाहिए जिसके कई व्य्गयानिक तथ्य भी है अन्यथा कई भयंकर परिणाम भी सामने आये है वही जिस प्रकार के चित्रों का आपने दर्शन करवाया इससे यही महसूस होता है की समाज में फैली कुरितियो के अब दिन लड़ने वे है परन्तु ऐसा हिंदुस्तान में रहने वाले प्रतेक नागरिक के ऊपर लागु किया जाना चाहिए

    April 3, 2012

    जी आपने बिलकुल सही कहाँ…परन्तु यह वैर्गीकरण जन्म से नहीं होना चाहिए कर्म से होना चाहिए. और इसी का उल्लेख हैं. यह जरुरी नहीं है की ब्रह्मण का लड़का ही ब्राहमण होगा….गधे और घोड़े की शादी एक साथ नहीं हो सकती. यह दोनों दो गुणों के प्रतीक हैं उसी प्रकार यदि कोई दो विपरीत गुणों का व्यक्ति हो तो उसकी शादी नहीं हो सकती…….वैसे भी एक लड़की के इजाजत के बिना शादी करना गुनाह हैं. यह हमारा धर्म भी कहता हैं और विवेक भी. यदि हम इंसान है तो कुछ तो फर्क होना चाहिए गलत और सही की पहचान करने में. वास्तविक जीवन में क्या होता हैं किसी से छुपा नहीं हैं……..बहुत दिनों के बाद मेरे ब्लाग पर आपका आगमन बहुत अच्छा लगा ……हार्दिक आभार.

JAMALUDDIN ANSARI के द्वारा
February 21, 2012

अलीन जी नमस्कार, आप द्वारा उठाये गए मुद्दे वाकई विचारणीय हैं ! आज हमारा समाज इतना धर्मांध हो गया है कि वास्तविक धर्म को नहीं समझ पा रहा है ; धर्म सच्चा मार्ग दिखाता है , लेकिन आज धर्म को इन्सान अपने स्वार्थो कि पूर्ति के लिए अपने हाथ कि कठपुतली बना दिया है !

    February 21, 2012

    अस्सलाम वल्लेकुम, जनाब! मेरी बातों को बल मिला….. हार्दिक आभार.

February 17, 2012

अलीन जी नमस्कार ! बहुत भावनात्मक और दर्दनाक शिकायत है…बहुत ही संवेदनशील मुद्दे उठाए हैं आपने इस लेख के माध्यम से….अच्छा प्रयश। सराहनीय !!

    अलीन के द्वारा
    February 17, 2012

    डॉ साहब, सादर प्रणाम! आपकी इस सराहना का …हार्दिक आभार!

sadhana thakur के द्वारा
February 16, 2012

बहुत ही भयावक चित्र ,,दिल दहल गया अलीन जी ……..

    अलीन के द्वारा
    February 16, 2012

    SADHANA JI, सादर नमस्कार ! जरा आप ही सोचिये साधना जी, यदि चित्र देखने मात्र से दिल दहल गया तो उनपे क्या गुजरती होगी जो इससे होकर गुजरते होंगे. ‘मेरी सदा-एक शिकायत’ के लिए आपका विशेष आभार!

abhishektripathi के द्वारा
February 14, 2012

सादर प्रणाम! मैं मतदाता अधिकार के लिए एक अभियान चला रहा हूँ! कृपया मेरा ब्लॉग abhishektripathi.jagranjunction.com ”अयोग्य प्रत्याशियों के खिलाफ मेंरा शपथ पत्र के माध्यम से मत!” पढ़कर मुझे समर्थन दें! मुझे आपके मूल्यवान समर्थन की जरुरत है!

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
February 13, 2012

बहुत ही सुन्दर आलेख,अलीन जी.आपकी शिकायत वाजिब है.हमारा समाज कई तरह की कुरीतियों से ग्रस्त है.लोग परम्परा और लोकाचारों की वजह से भी इस तरह की कुरीतियों के भागीदार बनते हैं.हर समाज में समय के अन्तराल में परिवर्तन जरूर होता है.यदि एक विकासशील समाज में कुरीतियों और अन्धविश्वास को प्रश्रय मिलने लगे तो उसका पतन तो अवश्यम्भावी है. आभार सहित, ……..राजीव

    अलीन के द्वारा
    February 13, 2012

    आदरणीय राजीव सर, सादर प्रणाम! आपने मेरे विचारों को सराहा और समर्थन किया….आपका आभार. ऐसे ही मेरे पक्ष और विपक्ष में अपना विचार देते रहिये. आपका अनुज, अलीन

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
February 12, 2012

हम सभी मिलकर, सामाजिक समस्याओं पर ऐसे ही सार्थक और सही विचार-विमर्श के साथ-साथ, इनके कारणों पर विश्लेषण करते हुए सही समाधान के लिए प्रयासरत हो. प्यार के नाम पर जो वैश्या वृति हमारे समाज में फ़ैल रही हैं. उसका विरोध मैं भी करता हूँ. पर यदि दो दिल परिणय सूत्र में बंधना चाहते तो उसे सफल बनाने के लिए हमारा आशीर्वाद उनके साथ होना चाहिए.. प्रिय अलीन जी नीचे प्रतिक्रिया नहीं जा पा रही थी इस लिए यहाँ लिखा सुन्दर विचार आप का ..बहुत हद तक आप ने भी माना की प्रेम सौहाद्र जो छिछोरेपन का रूप न लिए हो उसका समर्थन होना चाहिए अच्छाई का समर्थन हमेशा होना चाहिए हम सभी भी कोर्ट मैरिज या प्रेम विवाह के खिलाफ नहीं हैं लेकिन उसका चेहरा रूप हमारे समाज को माँ बाप के प्यार को ताक पर न रख दे प्रेम प्यार ये माँ बाप आप के भाई बहन का भी तो होता है केवल एक प्रेमिका या किसी लड़की का ही नहीं – अक्सर देखा जाता है की दो दिन नजरें चार हुयी और घर बार रिश्ते नाते गए भाड़ में ऐसा न हो ..जैसा हमने पहले कहा सम्मान आन बान शान बहुत ही प्यारी चीज है और ये अगर उस प्रेमी में भी असली सच में हुआ तो दुनिया की सारी दौलत रिश्ते छूट ही जाते हैं ..दूसरी तरफ आप देखेंगे तो पायेंगे हमारा रहन सहन खान पान भी बहुत काम का होता है जो जिन्दगी भर साथ निभाने में मदद करता है आप का कुछ और उनका कुछ और हुआ तो प्रभु ही बचाएं बड़ी मुश्किल होती है निभाने में ..जो प्यार से निभी जहां तक समझौता संभव हो उतना किया जा सकता है – हमारा या किसी माँ बाप का अपनी संतान से दुश्मनी नहीं होती वे अपने बच्चों से ही हारते हैं झुक जाते हैं बहुत कुछ स्वीकार कर लेते हैं तो क्या बच्चों का कोई दायित्व नहीं बीसों साल यों ही बिसरा देना चाहिए ? शुभ कामनाएं ..जय श्री राधे भ्रमर ५

    अलीन के द्वारा
    February 12, 2012

    भ्रमण जी, सादर अभिनन्दन! आपकी बातों से मुझे कभी भी इंकार नहीं है,…..हार्दिक धन्यवाद…जय हिंद, जय विश्व

klpruthi के द्वारा
February 12, 2012

आपने वर्तमान समाज का अच्छा चित्रण किया है और बहुत से पाठकों की प्रशंसा भी बटोरी है।  लेकिन मेरी विचारधारा कुच्छ भिन्न है। गोस्वामी तुलसी दास जी राम चरित मानस में लिखते हैं -कर्म प्रधान विश्व रचि राखा। जो जस करहिं तो तस फल चाखा॥ समाज में बिगाड़ आना हमारे ही  पिछले  जन्मों के कर्मों के  फलस्वरूप है। फिर यह भी कहा गया है कि -जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि। संसार में यदि बुरा हो रहा है तो अच्छा भी हो रहा है। आप अच्छाई को देखिये और उस बाबत लिखिये ताकि लोगों को अच्छा ही पढ़ने को मिले। कबीर साहिब के इस  दोहे पर विचार कीजिये - कबीरा तेरी झोंपड़ी गल कटियन के पास। जो करेंगे सो भरेंगे, तूँ क्यों  भया उदास॥ परमात्मा आपको हमेशा खुश रखे।  

    अलीन के द्वारा
    February 12, 2012

    सादर प्रणाम! आपकी पहली प्रति क्रिया का आभार. सच पूछिये तो मैं यहाँ प्रशंशा के लिए नहीं आया हूँ बल्कि आपकी तरह मैं भी चाहता हूँ कि समाज में विचारों का परिवर्तन हो और धर्म के तीनो आयाम कि तरफ हम सभी अग्रसर हो ताकि एक सुन्दर संसार का सपना साकार हो.बस अंतर इतना हैं की आप सब कुछ भाग्य पर छोड़ दिए हैं और मैं भाग्य पर छोड़ नहीं सकता..यूँही अपने अनमोल बचनों से मुझ पर कृपा बनाये रखिये…

    अलीन के द्वारा
    February 13, 2012

    klpruthi जी, सादर प्रणाम! समय के अभाव के कारण मैं अपनी पूरी बात नहीं रख सका. इसके लिए माफ़ी चाहूँगा. आपने कहा, “गोस्वामी तुलसी दास जी राम चरित मानस में लिखते हैं -कर्म प्रधान विश्व रचि राखा। जो जस करहिं तो तस फल चाखा. कबीर साहिब के इस दोहे पर विचार कीजिये – कबीरा तेरी झोंपड़ी गल कटियन के पास। जो करेंगे सो भरेंगे, तूँ क्यों भया उदास॥.” यदि यह सोचकर हम चुप बैठ जाये तो क्या एक जीवन जो चला जाता. वो वापस आ जायेगा? दूसरी बात इस पद्य के अनुसार यदि कोई किसी का जीवन लेता है तो उसका भी जीवन कोई न कोई जरुर लेता हैं. इसका मतलब कि एक जीवन और ख़त्म होगा. फिर समस्या का समाधान कहा हुआ. वो लोग जो समाजिक कुरीतियों, शान और मर्यादा के नाम पर जीव हत्या कर रहें हैं, मैं उनके लिए सजा की बात नहीं कर रहा हूँ. क्योंकि यदि खून के बदले खून कि बात करेंगे तो समस्या कभी ख़त्म नहीं होगी. बल्कि दिन प्रति दिन और बढ़ती ही जाएगी. मैं सिर्फ विचारों का परिवर्तन चाहता हूँ. यदि मेरे प्रयास से कही किसी एक का भी जीवन बचता हैं तो मैं समझूंगा की मेरा उद्देश्य सफल हो रहा है. अब आप कहेंगे कि जहाँ लाखों की जान जाती है. वहां किसी एक को बचने से क्या फर्क पड़ेगा? बहुत फर्क पड़ेगा और ये फर्क वही जीव बताएगा. जो मेरे प्रयास से जीवित बच जाये. आपके कहे अनुसार इन पद्यांशों पर विचार किया और चिंतन भी. मैं बस इतना ही अर्थ निकाल सका कि यह व्यक्तव्य विशेष परिस्थिति प्रधान हैं न कि हरेक परिस्थितियों में मान्य यदि कोई किसी को मार रहा है और हम यह सोचकर विरोध नहीं कर रहें है कि मारने दीजिये एक दिन उसे भी कोई मारेगा. तो फिर हम तो दोनों को मारने की तैयारी कर रहें. मैंने कभी वेद, कुरान और बाइबिल नहीं पढ़ा हूँ और न ही पढ़ना चाहूँगा क्योंकि मैं जनता हूँ उनसब में वहीँ लिखा हैं. जो आदि से लेकर अब तक हमारे समाज में घटित होता आ रहा है. तो फिर इन ग्रंथों को पढ़ने से क्या फायदा कि हम उससे कुछ सबक न ले. इसलिए मैं हरेक चीज से सीखने कि कोशिश करता हूँ और यह मुझ पर निर्भर करता है कि किसी कि दी हुई सीख को किस रूप में लेता हूँ………मेरी बातों को अन्यथा मत लीजियेगा क्योंकि मैं जो कुछ भी सीखता हूँ आप ही लोगों और इस समाज से. आज मेरी सदा आपके बीच है क्योंकि आप है. यदि आप न होते तो यह ‘मेरी सदा’ भी नहीं होती. मेरी बस इतनी ही विनती हैं कि आप सभी ऐसे ही मेरे पक्ष और विपक्ष में आपना विचार देते रहिये ताकि मेरा प्रयास सफल हो सके………………………………………………………एक बार फिर आपका हार्दिक अभिनन्दन

अलीन के द्वारा
February 12, 2012

आदरणीय संतोष जी, सादर नमस्कार! आपके समर्थन से मेरे प्रयास को बल मिला…. आभार

Santosh Kumar के द्वारा
February 12, 2012

अलीन जी ,.नमस्कार आपकी सभी शिकायतें वाजिब हैं ,.बहुत सुन्दर प्रयास ,..हार्दिक साधुवाद

Piyush Kumar Pant के द्वारा
February 12, 2012

दहेज के लिए स्त्रियाँ आज भी जलायी जा रही है….. इसमे दोष किसी एक का न होकर दोनों पक्षो का है….. कई बार लड़की के माँ बाप कई बहानो से अपनी बेटी को धन या अन्य उपहार देते हैं…. और फिर उसकी देखा देखि अन्य लोग उसे ही परंपरा बना देते है…. और इस तरह इस परंपरा के नाम पर ये प्रथा एक नया रूप ले लेती है… कई बार हम लोग भी इस प्रथा का विरोध तब करते हैं जब ये हम से लिए जा रहा हो……. पर जब हम अपने घर के किसी लड़के की शादी कर रहे हों तो हम इसे परंपरा के नाम पर लेना चाहते हैं…….. जब तक इस तरह के दोहरे मापदंड चलते रहेंगे…….. ये हत्याएँ होती रहेंगी……..

    अलीन के द्वारा
    February 12, 2012

    आदरणीय पीयूष जी, सादर अभिनन्दन! आपने एक कटु सत्य कहा जिसे हम सभी स्वीकार नहीं करना चाहते. निश्चय ही इसी दोहरे मापदण्ड के कारण सामाजिक बुराइयाँ दिन प्रति दिन अपना पावँ पसारती जा रही है.

chaatak के द्वारा
February 11, 2012

प्रिय अलीन जी, सादर अभिवादन, आपकी शिकायतें पढ़ीं और शिकायत करने का अंदाज़ भी पढ़ा दोनों ही दिल को छू गए| आपके द्वारा की गई शिकायतों में से एक को मैंने अपनी एक कविता ‘बिटिया के प्रश्न’ में भी लिखा है लेकिन बात एकतरफा ही है यहाँ पर मैं भ्रमर जी की बात से सहमत हूँ| प्रेम और प्रेमियों के मामले में मैंने अपने विचार कुछ और लेखों में भी व्यक्त किये हैं शायद आपको अपने कुछ प्रश्नों के उत्तर मिल जाएँ| जीव हत्या के बारे में मैं आपसे अक्षरशः सहमत हूँ, जीव हत्या को दर्शाते इस चित्र को भी मैं देख नहीं सका| आपका प्रयास उत्तम है शुभकामनाये और बधाईयाँ!

    अलीन के द्वारा
    February 12, 2012

    आदरणीय चातक जी, सादर अभिनन्दन! आप मेरी बातों को समझने और भ्रमण जी की बातों से संतुष्ट होने के लिए बहुत आभार. ऐसे ही स्वतंत्र प्रतिक्रियाएं करते रहिये.

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
February 11, 2012

प्रिय अलीन जी अभिवादन और मंच पर आप का स्वागत है बहुत सी शिकायतें तो आप की वोट देने के काबिल लगीं जायज लगीं और वो होना नहीं चाहिए लेकिन कुछ में जो आप ने माँ बाप प्यार के सम्बन्ध में लिख डाला है उस पर बहुत ही गौर करने की जरुरत होती है और माहौल ऐसा बन जाता है की लोग कुछ भी कर डालते हैं सब को अपना मान सम्मान प्यारा होता है सर उठा के जीने की तमन्ना होती है जहां तक हो सके क्रोध को बचाना चाहिए लेकिन बेटा बेटी संतान को भी अपने घर परिवार माँ बाप इस समाज को समझ कर कोई कदम उठाना चाहिए ताकि ये स्थिति ही न पैदा हो जब आदमी के अपने ऊपर कुछ बीतता है तो वह उपदेश देने और असलियत को समझ पाता है ….बच्चे ये क्यों भूल जाते हैं की इसी माँ बाप ने उनके लिए अपना तन मन धन सब दिया है प्यार दिया है आज इस काबिल किया है ….कुछ प्रतिशत सम्हाला जा सकता है जय श्री राधे भ्रमर ५

    अलीन के द्वारा
    February 12, 2012

    आदरणीय भ्रमण जी, सादर अभिनन्दन! मैं मान-सम्मान से इंकार नहीं करता हूँ , न ही मैं माता-पिता के उम्मीदों के विरुद्ध हूँ और न ही मैं arrange marriage के खिलाफ हूँ. परन्तु जो विचार धारा love marriage के खिलाफ हैं. मैं उसके विरुद्ध हूँ. यदि मेरी विचार धारा गलत हैं तो निश्चय ही हमारा धर्म, भागवान और कानून तीनो गलत हुए क्योंकि right to selection का अधिकार हमें, ये तीनों देते है. इसका मतलब या तो हमारी परम्पराएँ सही हैं या फिर हमारा धर्म, भागवान और कानून? प्यार के नाम पर जो वैश्या वृति हमारे समाज में फ़ैल रही हैं. उसका विरोध मैं भी करता हूँ. पर यदि दो दिल परिणय सूत्र में बंधना चाहते तो उसे सफल बनाने के लिए हमारा आशीर्वाद उनके साथ होना चाहिए. सर जी आखिर हम कब तक समाज को समझते रहेंगे. समाज को समझना ही हैं तो हम फिर क्यों अपने political, economical administrative etc. systems को दोष देते हैं. जब समाज में जाति-पाति, उंच-नीच, कुंठित मानसिकता जैसे बीज बोयेंगे तो निश्चय इसका प्रभाव, दुसरे systems पर पड़ेगा क्योंकि हरेक system इस social system का भाग हैं. हम इंसान दुनिया के सर्व श्रेस्ठ प्राणी हैं वो इसलिए क्योंकि हमारे पास विवेक और बुधि, जिसके बल पर हम असिलियत और अभिशाप में फर्क कर सके. मैं माँ-बाप के भूलने वालें बच्चों का समर्थन नहीं, कर रहा हूँ. मैं उन बच्चों का समर्थन कर रहा हूँ. जो अपने रिश्तों को इमानदारी से निभाना चाहते हैं. चाहें वो मेरे अपने हो या आपके अपने. वैसे इन सब केसों में कौन किसको भूलता हैं और कौन याद रखता हैं? इसका परिणाम और साक्ष्य का विश्लेषण करने के बाद पता चलता हैं. आप मेरी बातों को अन्यथा मत लीजियेगा. मैं यहाँ पर जीतने या हारने नहीं आया हूँ और न ही आपकी बातों का खंडन करने आया हूँ. मैं अपेक्षा करता हूँ कि हम सबके द्वारा बुराई का खंडन, वो चाहें किसी भी रूप में हो. आपने सच कहा कि आज जरूरत हैं असिलियत को समझने की. आप निश्चय ही मुझसे बड़े हैं, साथ ही सम्माननीय और अनुभवी भी. परन्तु मैं आपका अनुज होने के कारण, ज्येष्ठ के कंधे पर विरजमान होने का सौभाग्य प्राप्त हैं और मैं जो उन कन्धों से देख पा रहा हूँ, शायद आप उसे नहीं देख पा रहें है. अंत में मैं आपकी विचारों और भावनाओं का सम्मान करते हुए आशा करता हूँ कि आपके द्वारा मुझे यूँही समर्थन और स्वतंत्र प्रतिक्रिया मिलती रहेगी. ताकि हम सभी मिलकर, सामाजिक समस्याओं पर ऐसे ही सार्थक और सही विचार-विमर्श के साथ-साथ, इनके कारणों पर विश्लेषण करते हुए सही समाधान के लिए प्रयासरत हो. आपका, अनुज

shashibhushan1959 के द्वारा
February 9, 2012

मान्यवर अलीन जी, सादर ! मुझे भी शिकायत है उन से जो अपने माता-पिता की मान-प्रतिष्ठा का ख़याल किये बिना नासमझी में कोई कदम उठाते हैं, मुझे भी शिकायत है उन से जो अपने कर्तव्य को भूलकर क्षणिक आवेश में अपने जन्मदाता और पालनकर्ता की उम्मीदों पर पानी फेर देते हैं, मुझे भी शिकायत है उन से जो एक नए रिश्ते के लिए अपने सभी पुराने रिश्तों को भूल जाते हैं, और वे यह नहीं सोचते की जिस माँ ने कितने कष्ट सहकर उन्हें जन्म दिया, पालन पोषण किया, उनके रिश्ते तोड़ने से उसके दिल पर क्या गुजरेगी, मुझे भी शिकायत है उन से जो अपने कथित प्यार के कारण अपने सहोदर भाई-बहन तक को भूलने पर उतारू हो जाते हैं. अलीन जी, शिकायतों की नहीं श्रद्धा प्रेम और विश्वास की ज्यादा जरूरत है.

    अलीन के द्वारा
    February 10, 2012

    आदरणीय शशिभूषण जी, सादर अभिनन्दन! आपकी पहली प्रतिक्रिया पाकर धन्य हुआ. आपकी भी शिकायत जायज हैं. आपने सच कहा, “मुझे भी शिकायत है उन से जो अपने माता-पिता की मान-प्रतिष्ठा का ख़याल किये बिना नासमझी में कोई कदम उठाते” सच में वो अपने माता-पिता के नज़र में गुनाहगार हुए. जैसा कि आपने कहा नासमझी में कदम उठाते हैं. फिर उनको क्या कहेंगे जो समझदार होकर इस प्रतिक्रिया का जवाब किसी के मौत के साथ देते हैं. फिर उन महान मान-प्रतिष्ठा वालों और इन नासमझों में अंतर ही क्या रह गया है? मैं किसी व्यक्ति विशेष को दोषी नहीं ठहरा रहा हूँ. पर जो बुराई हैं उसका खंडन होना चाहिए. वो चाहे मेरे पास हो या किसी और के पास. आपने सच कहा, ” मुझे भी शिकायत है उन से जो अपने कर्तव्य को भूलकर क्षणिक आवेश में अपने जन्मदाता और पालनकर्ता की उम्मीदों पर पानी फेर देते हैं.” यक़ीनन हमें अपने कर्तव्य को नहीं भूलना चाहिए. परन्तु किसी से उम्मीद करना भी तो गुनाह हैं क्योंकि जहाँ श्रद्धा, प्रेम और विश्वास हो, वहां इसका कोई जगह नहीं होता. आपने सच कहा, ” मुझे भी शिकायत है उनसे जो एक नए रिश्ते के लिए अपने सभी पुराने रिश्तों को भूल जाते हैं, और वे यह नहीं सोचते की जिस माँ ने कितने कष्ट सहकर उन्हें जन्म दिया, पालन पोषण किया, उनके रिश्ते तोड़ने से उसके दिल पर क्या गुजरेगी.” सच पूछिए तो किसी भी रिश्ते को तोड़ना गुनाह हैं क्योंकि यह जोड़ने के लिए होते हैं तोड़ने के लिए नहीं. परन्तु यदि किसी से रिश्ता निभाने पर कोई रिश्ता तोड़ रहा हैं तो गुनाहगार कौन हुआ? आपने सच कहा, “मुझे भी शिकायत है उन से जो अपने कथित प्यार के कारण अपने सहोदर भाई-बहन तक को भूलने पर उतारू हो जाते हैं.” सच में, जो ऐसा करता होगा गुनाहगार है. पर हमें यह सोचना होगा और साथ ही इस बात पर मनन भी करना होगा कि आखिर गुनाहगार कौन है? वो जो एक रिश्ता निभाना चाहता है या फिर वो लोग जो किसी के रिश्ता निभाने से रिश्ता तोडना चाहते है. मैं आपकी बात का समर्थन करता हूँ कि आज हमें शिकायतों की नहीं, श्रद्धा प्रेम और विश्वास की ज्यादा जरूरत है केवल सामाजिक कुरीतियों से ग्रसित मान-प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए ही नहीं अपितु इससे कहीं बढ़कर मानवीय मूल्यों की रक्षा के लिए. यदि अब भी आपको लगता हैं कि मैं आपकी भावनाओं को ठेस पहुचाया हूँ. तो एक बेटा अपने पिता के सम्मुख घुटनों के बल पड़ा हैं, जो चाहें सजा दीजिये. परन्तु इस आवाज़ को बंद करने की सजा मत दीजियेगा… आपसे बाते करके मुझे बहुत अच्छा लगा जैसे कि किसी अपने से बात कर रहा हूँ. शायद एक बाप का दिल ऐसा ही होता है, ऊपर से सख्त परन्तु दिल में उतना ही प्यार. आज एक बार फिर कोई रुला दिया परन्तु ख़ुशी इस बात की, वो कोई गैर नहीं अपना निकला. मैं इस रिश्तों को जरुर निभाना चाहूँगा जो आपके मेरे बीच हैं क्योंकि किसी चीज को बनाने में बर्षों लग जातें हैं. चाहें वो एक व्यक्ति को बनाने की बात हो या एक रिश्ते को. बिगड़ने में क्या जाता हैं….एक लम्हा ही काफी होता है. सच में रिश्तें बनाने के लिए होते तोड़ने के लिए नहीं. आपका, अलीन.

akraktale के द्वारा
February 9, 2012

अनिल जी नमस्कार, वीभत्स चित्र लगाना भी कोई अच्छी बात नहीं है.खैर,आपको उपयुक्त लगा होगा. सार्थक सोच को दर्शाता आलेख.मगर कुछ सामाजिक विडंबनाएं है.

    अलीन के द्वारा
    February 9, 2012

    akraktale जी,सादर अभिनन्दन! वीभत्स चित्र लगाने के लिए माफ़ी चाहूँगा. अनुज समझकर माफ़ करे. परन्तु यदि यह देखने मात्र से इतना वीभत्स लग रहा है तो जरा आप ही सोचिये जिनपे गुजरता है उनको…….आपकी स्वतंत्र प्रतिक्रियाओं का हमेशा स्वागत.

ANAND PRAVIN के द्वारा
February 9, 2012

अलीन जी, नमस्कार मुझे बहुत उत्सुकता हो रही है ये जाने के लिए की आपकी उम्र क्या हो रही है, क्यूंकि आपकी जो सिकायत है वो बरी ही ऊँची सोच को दर्शाती है, बस एक अनुरोध है की चित्र लगाते समय हम जैसे कमजोर लोगों का भी ख्याल रखें. काफी अच्छा लेख आपका

    अलीन के द्वारा
    February 9, 2012

    आनंद जी, सादर अभिवादन! आपकों मेरा लेख अच्छा लगा. इसके लिए शुक्रिया. जहाँ तक मेरी उम्र का सवाल है. वो आप 14 feb, 2012 को जान जायेंगे. जब मैं ‘मेरी सदा’ एक अधूरी परन्तु सच्ची प्रेम कहानी पोस्ट करूँगा और साथ ही मेरा काम की भी जानकारी हो जाएगी. वैसे किसी व्यक्ति के बारे में जानने का आपका यह अंदाज मुझे अच्छा लगा. दूसरी बात आप से कहीं ज्यादा कमजोर मैं भी हूँ. परन्तु क्या करू…..एक बार फिर आपका धन्यवाद.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
February 9, 2012

मुझे शिकायत है खुद से , की मैं ऐसा क्यों नहीं लिख पाता. दहलाने वाला चित्र. सोचने को मजबूर करता लेख. बधाई.

    अलीन के द्वारा
    February 9, 2012

    आदरणीय प्रदीप जी , सादर नमस्कार! आपके आशीर्वाद स्वरुप दो वचन मेरे लिए आग में घी का काम करते हैं जिसके लिए मैं हमेशा आभारी हूँ…


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