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मेरी सदा-एक अधूरी परन्तु सच्ची प्रेम कहानी

Posted On: 15 Feb, 2012 Others,न्यूज़ बर्थ में

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मेरी सदा-एक अधूरी परन्तु सच्ची प्रेम कहानी

‘मेरी सदा’ आज की परिवेश की एक अधूरी परन्तु सच्ची प्रेम कहानी है. जहाँ एक तरफ आदमी चाँद पर पहुँच गया है, वही दूसरी तरफ कुछ लोग अपने घरों से निकलना नहीं चाहते. यह कहानी है मेरी, ‘अन्जानी और अनिल’ की. हम जो एक दुसरे से वादा किये थे, जीवनभर साथ निभाने और एक साथ सामाजिक कुरीतियों से लड़ने का. मैं उसे अन्जानी कहकर बुलाता हूँ और इससे ज्यादा उसका व्यक्तिगत परिचय देने से इन्कार करता हूँ क्योंकि मैं नहीं चाहता कि वह जो बलिदान अपनों की खातिर दी है, विफल जाये. पर मैं यह जरुर चाहता हूँ कि जिस दर्द में हम दोनों जी रहे हैं, उस दर्द को हमारे अपनो के साथ-साथ वो सारे लोग महसूस करें जो झूठी शान, ईज्जत और मर्यादा कि खातिर हम बच्चों को ग़मों के सागर में झोक देते हैं. यदि हम बच्चे अपनो की इज्जत और मर्यादा का ख्याल रखते हुए अपना रिश्ता निभाते हैं, तो उन्हें भी हमारी भावनाओं का क़द्र करते हुए समाज के सम्मुख आना चाहिए. जब हमारा धर्म, भगवान और कानून अपना जीवनसाथी चुनने और घर बसाने का अधिकार देते हैं तो इसे पूर्ण करने के लिए आपका आशीर्वाद साथ क्यों नहीं? इसका मतलब या तो धर्म, भगवान और कानून गलत हैं या फिर हमारी झूठी शान, इज्जत और मर्यादा…

मेरी सदा-एक अधूरी परन्तु सच्ची प्रेम कहानी मेरी सदा-एक अधूरी परन्तु सच्ची प्रेम कहानी

अन्जानी सिर्फ एक नाम नही अपितु यह प्यार, संस्कार, परिश्रम, समझदारी, बुद्धिमता, जिम्मेदारी और सबसे बड़ी बात त्याग की जीती जागती मूरत है. जिसे मैं अपने ख्यालों में बसाये हुए बड़ा हुआ. कभी सोचा नहीं था कि सपने भी यूँ सच हुआ करते हैं. पर उससे मिलने के बाद पता चला कि यदि आपकी चाहत सच्ची हो तो आसमान से तारे टूटकर जमीं पर गिर जाया करते हैं और उससे बिछड़ने के बाद पता चला कि जबतक हमारा समाज और अपने न चाहे तबतक खुदा लाख कोशिश कर ले, दो दिल कभी एक नहीं हो सकते. अन्जानी अपनी चार बहनों में सबसे छोटी और दो भाइयों से बड़ी है. वह बचपन में बहुत ही नटखट और शरारती थी. वह जिंदगी के हरेक पल को अपने अर्थों में जीना चाहती थी. लडको की तरह छोटे-छोटे बाल रखना, boys ड्रेस पहनना और साइकिलिंग उसके शौक हुआ करते थे. परन्तु वह ज्यों-ज्यों बड़ी होती गयी त्यों-त्यों उसे अपने घर की जिम्मेदारियों का एहसास होता गया. यूँही वक्त गुजरता गया और साथ ही साथ एक-एक करके तीनों बड़ी बहनों की शादियाँ होती गयी. कब बचपन की दहलीज पार की, उसको इस बात की खबर तक नहीं हुई. अपनी पढाई के साथ-साथ घर की सारी जिम्मेदारियां उस पर आ पड़ी. घर के सारे काम, झाड़ू-पोछा से लेकर चूल्हा-चाकी तक वह खुद करती. यहाँ तक की घर के सभी सदस्यों के कपडे इकटठा करके साफ करती. इसके साथ-साथ रातों को जागकर सूत काटा करती ताकि घर को आर्थिक रूप से मदद मिल सके. कारण घर की आर्थिक स्थिति का सही न होना. चूँकि वह जीवन में आगे बढ़ना चाहती थी इसलिए पापाजी ने उसकी पढाई यह सोचकर जारी रखी कि यदि पढ़-लिख लेगी तो अपनी बिरादरी में कोई ठीक-ठाक लड़का देखकर उसके हाथ पिल्ले कर दूंगा और अपनी आखिरी जिम्मेदारी से भी मुक्त हो जाऊंगा. आख़िरकार लड़किया माता-पिता के लिए बोझ या जिम्मेदारी ही तो होती हैं जिससे वो जल्द से जल्द मुक्ति चाहते हैं. यह हमारे समाज का वास्तविक रूप है जहाँ एक तरफ हम औरत को देवी का दर्ज़ा देते हैं वही दूसरी तरफ उसे दासी या क़र्ज़ समझते हैं. वैसे पापाजी को फक्र था कि उनके पास बेटी के रूप में एक बेटा हैं. मगर किस बात का……. यक़ीनन जब तक हमें अपना स्वार्थ सिद्ध करना होता है तो हर रिश्ता अच्छा लगता है. पर वही….

मेरी सदा-एक अधूरी परन्तु सच्ची प्रेम कहानी

मेरी सदा-एक अधूरी परन्तु सच्ची प्रेम कहानी

मैं अपने चार भाइयों और एक बहन में तीसरे नंबर का हूँ. भैया और दीदी की शादी कब की हो चुकी हैं. पर मैं अबतक शादी नहीं किया क्योंकि मैं पहले कुछ बनना चाहता था. वरना यदि घर वालों का बस चलता तो मैं अभी दो बच्चों का बाप होता. चूँकि मेरे विचार बचपन से ही कुछ हट कर थे, अतः मैं अपने घर के साथ-साथ गाँव का भी आँख का तारा था. मेरे ऊपर घर की कोई जिम्मेदारी नहीं थी. बस खाना, पीना, सोना, पढ़ना और……कुछ नहीं. मैं अक्सर एकांत में बैठकर, चिंतन और मनन किया करता था; इस ब्रह्माण्ड और इसके रहस्यों को लेकर. ऐसे ही लोगों की भीड़ में में खुद को तलाशता हुआ बड़ा हुआ. मेरे इस प्रकृति को लेकर मेरे घर वाले हमेशा चिंतित रहे. उन्हें लगता था कि मैं कहीं सन्यासी हो जाऊंगा. जो कि एक घर के लिए अभिशाप हैं. यदि कोई सन्यासी बन जाता है तो उसके घरवालों के लिए इससे कोई बड़ी डूब मरने वाली बात नहीं हो सकती. वही यदि चोर या डाकू बन जाता है तो एक बाप फक्र के साथ सीना तानकर चलता है. यह हमारे समाज का एक ऐसा कटु सत्य हैं जिसे हम स्वीकार नहीं करना चाहते, पर इससे हम इंकार भी नहीं कर सकते हैं. मैं इसकी परवाह किये बिना चाहता था कि इन सामाजिक कुरीतियों और अंधविश्वासों के विरुद्ध एक अभियान चलाया जाय जो भारतीय संस्कृति को अन्दर ही अन्दर खोखला करते जा रहे हैं. यह समाज का एक अभिन्न हिस्सा बनकर ही संभव था क्योंकि यदि कीचड़ को साफ करना है तो उसमे उतरना ही पड़ेगा. पर इसके लिए मुझे अपने पैरों पर खड़ा होना था क्योंकि माता-पिता के कन्धों पर बैठकर बचपन का सफ़र तो तय किया जा सकता है परन्तु जवानी का बोझ ढ़ोया नहीं जा सकता. ये बात उस समय और महत्वपूर्ण हो जाती है जब आप उस प्रणाली के खिलाफ जा रहे हो जिसका आप एक अभिन्न हिस्सा हो. वरना आपके पैरों से कब जमीं खीच ली जाएगी आपके मस्तिष्क तक को इसकी भनक नहीं होगी. वो दिन भी आ गया जब मैं ५ जून, २०१० को अतिरिक्त कार्यक्रम अधिकारी के पद पर नियुक्त हुआ. फिर मानों मेरे सपनों को पंख लग गया. इधर मैं अपना अभियान शुरू करने में लग गया, उधर घरवालें मेरी शादी के लिए दबाव बनाने लगे. पर मैं चाहता था कि मेरा जीवनसाथी ऐसा हो जो एक अच्छी बीवी के साथ-साथ एक अच्छी बहूँ और एक अच्छी माँ बन सके. चूँकि मेरा सफ़र काँटों भरा था इसलिए मैं नहीं चाहता था कि मुझसे कोई ऐसी चूंक हो जिससे मैं जीवनभर पारिवारिक बेड़ियों में बंध जाऊ. रिश्तें आते गए पर मायूसी के सिवाय मेरे हाथों कुछ नहीं लगा. ऊपर से यह जात-पाति की सीमायें. उफ़….हम आदम जाति के ही हैं या फिर कुत्तों और बिल्लियों की तरह हमारी भी….कोई विशेष पहचान हैं.

मेरी सदा-एक अधूरी परन्तु सच्ची प्रेम कहानी

अचानक मुझे उन दिनों का ख्याल आया जब मुझे गेस्ट लेक्चर देने का शौक हुआ करता था. आज भी मुझे वो दिन याद है जब मैं MBA-1st सेमेस्टर का छात्र था. एक इंटर कौलेज के ११ वीं क्लास में पर्सोनालिटी डेवलोपमेंट पर लेक्चर दे रहा था. एक लड़की जो सबसे पीछे बैठे सवाल पे सवाल किये जा रही थी उसका सवाल पूछने का ढंग और उसका जवाब जानने की जिज्ञासा, उसे उस क्लास में सबसे अलग कर रही थी. यह मेरे साथ पहली बार नहीं हुआ कि कोई मेरे सामने सवाल रख रहा हो. परन्तु मैं पहली बार किसी लड़की से इतना प्रभावित हुआ. मैं एक घंटे के उस पीरियड में उसे पूरी तरह भाप गया. शायद मेरी जीवनसाथी की तलाश उस तक आकर ख़त्म हो रही थी. उससे मिलने के बाद मुझे यकीं हो चला कि आज भी कुछ लोग ऐसे हैं जो औरों से हटकर सोचते हैं. पर अफ़सोस इस बात का था कि सबसे पीछे वाली सीट पर बैठे होने के कारण, उसका चेहरा देख नहीं पाया. रात भर उसके सवाल मेरे कानों में गूंजते रहे. एक पल के लिए मैं उसे अपना जीवनसाथी बनाने को भी सोच लिया परन्तु मैं अभी उस लायक नहीं था. जो खुद दूसरों के पैरों पे खड़ा हो वो भला दूसरो को क्या सहारा देता. अतः मैं उस मुलाकात को दिल के किसी कोने में छुपाकर अपने जीवन के आगे का सफ़र शुरू किया. लगभग तीन साल हो चले थे पर आज भी वह दिल की किसी कोने में जिन्दा थी. शादी का ख्याल आते ही पुराने घाव की तरह उभर आई. समस्या ये थी कि उसके बारे में मुझे ज्यादा कुछ मालूम न था. अतः खुद को ऑफिस के काम में व्यस्त कर लिया.

मेरी सदा-एक अधूरी परन्तु सच्ची प्रेम कहानी मेरी सदा-एक अधूरी परन्तु सच्ची प्रेम कहानी

जब वो ११ वीं क्लास में थी तो उस समय एक मेरा दोस्त उसके कालेज में अध्यापक हुआ करता था. एक दिन मैं उसके साथ उसके क्षेत्र में था. बातों ही बातों में, मैं उसके सामने उस लड़की का जिक्र किया. पता चला कि वह कही आस ही पास रहती है. उससे मिलने के लिए अपने दोस्त से आग्रह किया. अगले ही पल हम दोनों उसके घर पर थे. वह हमें देखते ही पहचान गयी और अपने घर पर हम दोनों का स्वागत की. मैं उस चेहरे को पहली बार देख रहा था, जीतनी वो दिमाग से तेज थी उतना ही स्वभाव और विचारों से सरल. उससे बातों के दौरान पता चला कि वो अब B.Sc. 2nd year की छात्रा है. उसके बारे में इससे अधिक नहीं जान सका क्योंकि उस आधे घंटे की मुलाकात के दौरान बस उसे देखता ही रहा. दूसरी बार उससे मिलने के बाद ऐसा लगा जैसे कि मेरा इंतजार ख़त्म हो गया हो. वहां से निकलते समय मैंने उसे अपना कान्टेक्ट नंबर यह कहकर दिया कि भविष्य में कभी भी किसी प्रकार कि सलाह की जरुरत पड़े तो मुझे याद करे. मैं आये दिन उसके फोन का इंतजार करता रहा. पर मायूसी के सिवाय मुझे कुछ् हाथ नहीं लगा. उस मुलाकात के लगभग दो महीने हो चले थे. साथ ही उसके फोन आने की आस भी ख़त्म हो चली थी. संयोगवश एक दिन जब मैं अपने ऑफिस में था, सेल फोन का रिंगटोन बजा. रिसीव करने पर पता चला कि वो कोई और नहीं बल्कि अन्जानी है. जो आज कुछ जानी पहचानी लग रही थी. मेरे पूछने पर कौन बोल रहा है. उधर से जवाब आया, “पहचानिए, कौन?” चूँकि मेरी किसी लड़की से जान पहचान नहीं थी. अतः मैं उसे पहचान लिया. वो आश्चर्य चकित थी कि मैं उसे पहचान कैसे लिया. मैंने उससे कहा कि मेरे लाइफ में कोई ऐसी लड़की नहीं जो मुझसे पूछे ‘कौन ?’ मैं उस दिन बहुत खुश था, शायद वो भी. सामान्य परिचय के साथ हम दोनों अपनी बातें इस आशय के साथ बंद किये कि भविष्य में यूँही हमारी बातों का सिलसिला चलता रहेगा. दो दिनों के बाद उसका फोन आया. चूँकि मैं उसे किसी भी अँधेरे में रखना नहीं चाहता था. अतः उस दिन मैं उसके सामने अपनी शादी का प्रस्ताव रखना मुनाशिब समझा. शायद उसे भी मेरे जैसे किसी जीवन साथी की तलाश थी. लेकिन वो जन्म से क्षत्रिय थी और मैं वैश्य. भले ही भारतीय समाज में धर्म, भगवान और कानून दो दिलों को अपना जीवनसाथी चुनने का अधिकार देते हो. परन्तु आज भी राधा-कृष्ण को पूजने वाले इस रुढ़िवादी समाज में यह एक गुनाह है. एक ऐसा गुनाह जिसे रोकने के लिए हमारा समाज धर्म, कानून और इमान सबको ताक पर रख देता है. चूँकि मैं इन परम्पराओं की परवाह नहीं करता जो मानव को मानव से अलग करता हो, अतः मैं अपने फैसले पर अडिग था. बस उसे इस पर विचार करना था क्योंकि एक औरत किसी की बीबी के साथ-साथ किसी की बेटी और बहन भी होती है. वैसे भी दुनिया के सारे रिश्ते एक औरत को ही तो निभाने होते हैं. हम पुरुषों को क्या हैं; अपने स्वार्थ के लिया सारे रिश्तों को बांधें रखते हैं और परंपरा, शान और इज्जत के नाम पर उसकी आहुति देते रहते हैं. हम जो करें, वो सब सही और एक औरत करें वो गलत. इन सबका ध्यान रखते हुए उसने कहा, ” हमें इस विषय पर सोचने के लिए कुछ वक़्त दीजिये.” मैंने कहा, “ठीक है आप सोच समझकर मुझे जवाब दीजियेगा.”

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आज भी मुझे नवम्बर महीने की ५ तारीख याद है जब मुझे उसका जवाब “हाँ” में मिला …उस दिन २०१० की दिवाली थी. हम दोनों बहुत खुश थे क्योंकि बचपन से हम जो ख्वाब संजो के चले थे वो सच होने चला था. एक तरफ गलियों और चौराहों पर पटाखें छुट रहें थे. वही दूसरी तरफ दो दिलों में आरमानों की फुलझरियां फुट रहीं थी. जमीं पर दीप जल रहे थे और आसमान पे तारे चमक रहे थे. धरती से लेकर आसमान तक, चारों तरफ उजाला ही उजाला था, कहीं किसी अँधेरे का नामों निशान तक नहीं. ऐसा लग रहा था मानों भगवान आसमान से धरती पर खुशियों की बारिस कर रहा हो. इस दुनिया से अनभिज्ञ हम दोनों को यकीं हो चला था कि ईश्वर ने हम दोनों को एक-दूजे के लिए बनाया गया है. चूँकि उसकी स्नातक की पढाई चल रही थी. अतः हम दोनों में सहमति हुई कि पढाई ख़त्म होने के बाद पैरेंट्स के सामने अपनी बात रखेंगे. अगर उन्होंने एक बार में हा कहा तो हा वरना ना. तबतक हम दोनों एक अच्छे दोस्त की तरह रहेंगे और कुछ नहीं. परन्तु कुछ चीजों पर हम इंसानों का बस नहीं चलता. सेल फोन से बातें करते-करते हम दोनों एक दुसरे से इतना घुल-मिल गए कि खुद को पति-पत्नी समझने लगे. अगर एक दिन भी बात ना हो तो हमें चैन नहीं मिलता और हमेशा हमें इस बात का डर बना रहता कि यदि मम्मी-पापा हमारे रिश्तें को सहमति प्रदान नहीं किये तो फिर हम एक-दुसरे के बिना कैसे रहेंगे. इसलिए हम दोनों फैसला किये कि यदि हम साथ जी नहीं सकते तो साथ मरेंगे परन्तु ना ही आत्महत्या करेंगे और ना ही अपनों से भागेगे. बस उनसे हमें दो ही चीज चाहिए या तो जिंदगी या फिर मौत. अन्जानी बोला करती थी, ” अनिल! हम आपसे बहुत प्यार करते हैं. हम आपके बिना मर जायेंगे.” मैं उससे बस इतना ही कहता था, ” प्यार अपने आप में बहुत बड़ा होता हैं. उसमे अलग से कोई विशेषण लगाने कि आवश्कता नहीं होती.” हमें बस अपने रिश्ते को एक साथ निभाना है.” दिन पर दिन हम दोनों का एक दुसरे के प्रति प्यार बढ़ता ही गया और साथ ही हमें अपने घरों की इज्जत और मर्यादा का ख्याल भी. हम कभी ऐसा काम नहीं किये जिससे कि हमारे माता-पिता का सर शर्म से निचा हो या हम दोनों भविष्य में उनका सामना ना कर पायें. अतः हम दोनों जितना मानसिक रूप से एक-दुसरे के नजदीक थे, उतना ही शारीरिक रूप एक दुसरे से दूर.


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चूँकि उसका घर रेलवे स्टेशन के पास पड़ता है. अतः एक दिन ऑफिस के सारे काम ख़त्म करने के बाद शाम के करीब ६ बजे की ट्रेन पकड़कर, उसे सरप्राइज देने के लिए रात को ११ बजे पहुंचा. जब उसका फोन आया तो ना जाने कैसे वो महसूस कर ली कि मैं उसके आस-पास हूँ. उसने कहा, ” अनिल, आप कही आस ही पास हो. मेरा दिल झूठा नहीं हो सकता है. आप सच बताओं कि कहा हो और मेरे घर के सामने आओ.” फिर क्या था, अगले ही पल मैं उसके घर के नीचे और वो छत के ऊपर थी. वह बहुत खुश थी जो मैं उससे मिलने के लिए आधी रात को इतने दूर से आया था. यह हम दो प्रेमियों कि पहली मुलाकात थी. मानो जमीं और आसमान का मिलन जो मिलकर भी कभी मिल नहीं पाते. उन दिनों कड़ाके कि ठण्ड पड़ रही थी और उस दिन मुझे पूरी रात स्टेशन पर कापते हुए बितानी पड़ी. अन्जानी ने कहा, ” अनिल ! आओ और घर से चादर ले जाओ. सुबह जल्दी मुझे वापस कर देना.” परन्तु मैंने कहा, “रहने दो अन्जानी! इस ठंडी रात का एक अपना ही मजा है.” उसने पूछा कि आपने खाना खाया है. उसका दिल रखने के लिए, मैंने कहा कि हाँ, खा कर चला हूँ, तुम सो जाओ. उस स्टेशन पर कुछ खाने को भी नहीं था कि मैं खाता. पूरी रात पेट में चूहें कूदते रहे और बाहर, कुत्ते भौंकते रहे. वो ठंडी रात मुझ पर इस कदर कहर बरसा रही थी. मानों मेरे साथ-साथ पूरी दुनिया काप रही हो. मेरे शारीर को स्पर्श करने वाली ठंडी हवा. मेरे नशों में दौड़ रहे लहू को जमा रही थी. सड़के खामोश थी और दूर-दूर आदम जाति का नामों निशान तक नहीं था. वहां मेरे सिवा बस दो-चार रेलवे के स्टाफ मौजिद थे और रह-रह कर गुजरने वाली कुछ ट्रेने. रेलवे स्टाफ सरकारी ड्रेस में ऐसे प्रतीत हो रहे थे. मानो यमराज द्वारा भेजे गए देवदूत जो मुझे अपने साथ ले जाने आये हो. गुजरती हुई ट्रेने मानों स्वयं यमराज जो समय-समय पर आकर स्थिति का जायजा ले रही हो. ऐसा लग रहा था, पूरी दुनिया से मानव जाति का अंत हो चूका है और मैं, वो आखिरी इंसान जो अपनी मौत की राह देख रहा हो. उस कड़ाके की ठंडी रात में करवटे बदलते रहा परन्तु नींद नहीं आई. जीवन में पहली बार मैं अपनी रात घर से बाहर किसी स्टेशन पर कापते हुए बिताया. फिर सुबह की पहली ट्रेन से ऑफिस को लौट आया. चूँकि अन्जानी को मेरा वहाँ आना अच्छा लगा. अतः उसकी ख़ुशी के लिए अक्सर रातों को मिलने जाने लगा. वो पहले की तरह या तो खिड़की पर होती थी या फिर छत के ऊपर. वो पल हमारे जिंदगी के सुनहले पल थे जिसे हम दोनों चाहकर भी भुला नहीं सकते. दिल में तो बहुत ख्वाइश होती थी कि हम एक दुसरे को गले लगाये. परन्तु हमारी ख्वाइश हर बार ही हमारे सिने में दफ़न हो जाती थी. करीब होकर भी हम दोनों के दरमियाँ एक फासला था जिसे न ही वह ख़त्म करना चाहती थी और न ही मैं. ऐसा नहीं था कि वो ईंट और पत्थरों से बनी दीवारें या सलाखों से सजी खिड़कियाँ हमारे प्यार से मजबूत थी. पर हाँ, एक चीज थी जो हमारे प्यार से भी मजबूत थी और वो थी हमारे घर की मर्यादा और अपनों की इज्जत, जो हमें विरासत में मिली थी. हमें इस बात का गर्व था कि हम अपने माता-पिता के संतान हैं. साथ ही इस बात का एहसास कि हमारी जिंदगी हमारे पैरेंट्स द्वारा दी गयी एक ऐसी सौगात है, जो हमारी तो है परन्तु हमेशा उनके साथ जुडी हुई है. एक ऐसा रिश्ता जिसे हम चाहकर भी तोड़ नहीं सकते क्योंकि हम जहाँ भी रहे और जिस हाल में रहे, हमेशा इससे बंधे हुए हैं. वे हरपल हमारे साथ है; चाहें वो हमारी ख़ुशी हो या गम. यह अलग बात है कि हम उनके साथ हैं या नहीं. वो हमारे जन्म के साथ भी है और मृत्यु के बाद भी. परन्तु यह भी तो सत्य है कि सौगात किसी का भी हो लौटाई नहीं जाती.


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हमारी मुलाकातों और सेल फोन पर बातों का सिलसिला चलता रहा. एक-एक दिन बस इस इंतजार में कटते रहे कि एक दिन वो भी घड़ी आएगी जब हमारे बीच के सारे फासले मिट जायेंगे. फिर वह, मैं और हमारे सपने जो अपने साथ-साथ अपने घरवालों के लिए देखें थे. हमारे पैरेंट्स और उनके गोद में खेलते हमारे दो फुल से बच्चे. इतना सब कुछ कितना अच्छा लगता है. हम दोनों की बातों का सिलसिला दिन प्रतिदिन बढ़ता ही गया. बातें करते-करते अक्सर शाम से सुबह हो जाती. घंटों बातें करने के बावजूद भी हमारी बातें अधूरी रह जाती. बस यह आलम था हमारी बातों और रातों का कि होठों तक पानी कि बूंद आते-आते हम प्यासे रह जाते थे. हम दोनों अपनी बातों में एक हकीकत की दुनिया बसा रखे थे जिसे सपनों से कहीं दूर छुपायें फिरते. उसमें हमारा दो कमरों का छोटा सा घर; जिसमे हमारे फुल जैसे दो बच्चे ‘श्रेयांस और अलीना’ हस्ते हुए नज़र आते थे. अक्सर अन्जानी मुझे ‘श्रेयांस का पापा’ और मैं उसे ‘श्रेयांस की मम्मी’ कहकर बुलाता था. एक बार की बात है जब मैं लम्बी यात्रा से घर को लौटा. थके होने के कारण, जल्दी खाना खाकर सो गया. रात को करीब १ बजे श्रेयांस की मम्मी का मिस काल आई. गहरी नींद में होने के कारण मैं उसका जवाब नहीं दे सका. उसने मेसेज किया, “श्रेयांस के पापा, आप सो गएँ हैं क्या? प्लीज, उठिए न. हमें आपसे बातें करनी है. ” जब मैं मेसेज को पढ़ा उस समय रात को सवा दो हो रहें थे. वो दिन जब कभी याद आतें हैं तो आखों से आंसू छलक उठते हैं. ऐसे जाने कितने ही हशीन पल हैं जो हम अपने आँखों में संजों के रखे हैं. यक़ीनन भगवान ने हम दोनों को एक-दुसरे के लिए बनाया था. पर हम शायद भूल गए थे कि इस संसार में उसके अलावा भी एक शक्ति हैं जो उसकी सत्ता को चुनौती दे रही हैं और वो है ‘इंसान.’ हमने अपना रिश्ता बाखुदा निभाया और साथ ही अपने घरों कि मर्यादाएं भी. पर हमें मालूम न था कि जिन घरों का हम इतना ख्याल कर रहे हैं उनमे रहने वाले हमारे अपने एक दिन हमारे खुशियों का गला घोंट देंगे. आखिर वो दिन भी आ गया जब एक तरफ हम और दूसरी तरफ हमारे अपने. सबसे पहले हमारे रिश्तें की खबर, मेरे घरवालों को हुई. यह बात है १४ जनवरी, २०११ की. मेरे अपने सभी एक तरफ और दूसरी तरफ मैं. सबकुछ हिंदी फिल्मों की तरह लग रहा है, है न. परन्तु रीयल लाइफ उतना ही टफ होती है. यह उस समय और टफ हो जाती हैं जब हमारे अपने झूठी शान और मर्यादा के लिए अपने और पराये का एहसास कराने लगते हैं, जो रिश्तें निभाने की सबक दिया करते थे वो रिश्ता तोड़ने की बात करते हैं. जिसे हम चाहकर भी नहीं तोड़ सकते क्योंकि इस संसार में कुछ ऐसी चीजे हैं जिसकी कोई कीमत नहीं लगायी जा सकती. उनमे से माँ-बाप का प्यार सर्वोपरि होता है. परन्तु जिंदगी देने वाला जिंदगी का फैसला करने लगे तो निश्चय ही प्यार व्यापर में बदल जाता है. जब हमारे माता पिता अपने हक़ की दुहाई देते हैं तो आंसुओं से आँखें भर जाती है. उस समय मरने के सिवा कोई रास्ता नज़र नहीं आता जब अपने कहते हैं, “एक लड़की के लिए अपने माता-पिता को ठुकरा रहें हो.” जिस प्यार को हम इबादत समझते हैं वो अब एक गुनाह और अभिशाप की तरह लगने लगता है. यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि यहाँ प्यार का मतलब सिर्फ एक लड़की के प्यार से नहीं है. यदि यह सचमुच गुनाह है तो हम सभी गुनाहगार हुए. हम उन्हें कैसे समझाएं कि एक व्यक्ति विशेष के लिए हम उनका साथ नहीं बल्कि वो हमारा साथ छोड़ रहें हैं और हमें झोक देते हैं ग़मों के सागर में जहाँ हम तडपते हैं, रोते हैं, चिलाते हैं और जब कोई रास्ता नज़र नहीं आता तो मजबूर होकर मौत को गले लगते हैं. हम तो हरेक रिश्तें को निभाना चाहते हैं क्योंकि रिश्तें जोड़ने के लिए होते हैं तोड़ने के लिए नहीं. बस मैं वही कर रहा था.

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आखिर वो दिन भी आ गया जब अन्जानी के घरवालों को भी इस बात की भनक हो गयी जब मेरे द्वारा दिया गया सेल फोन पकड़ा गया. फिर वही हुआ जो अक्सर दो दिलों के साथ होता है. उसे मारने-पीटने के साथ-साथ डराया और धमकाया गया. उनकी मम्मी ने मुझे फोन करके ढेर सारी गलियों के साथ, यह चेतवानी दी कि यदि हम इस रिश्ते को आगे बढ़ाते है तो वो हमारी बोटी-बोटी करके चील और कौवों को दे देंगी. पर हमें इस बात की चिंता नहीं थी क्योंकि आज कल चील और कौवें दीखते ही कहाँ हैं. परन्तु इस बात की फिक्र जरुर थी कि यदि हमारे बोटियों के सड़न से प्रदुषण फ़ैल गया तो कहीं कोई और जीव विलुप्त न हो जाये. वैसे हम इंसानों की यह फितरत सी हो गयी है कि न हम चैन से रहेंगे और न दूसरों को रहने देंगे. आखिर हमारे क्रिया कलापों से कुछ तो पता चलना चाहिए हमारी संस्कृति और सभ्यता का. वो ऊपर वाला भी देखता होगा तो उसे अपनी इस कृति पर पछतावा होता होगा. जिसे उसने क्षमा, दया, प्रेम, विवेक, भावना और मह्तावाकंक्षा जैसे आभूषणों से सजाकर इस धरती पर यह सोचकर भेजा था कि उसके द्वारा बनायीं गयी मानव जाति सर्वोत्तम कृति हैं. परन्तु हम इंसान यहाँ आकर …….छोडिये जाने भी दीजिये साहब, मैं भी कहा अपनी कहानी को छोड़कर फिलोसफी करने लगा. तो कहाँ थे हम……..हाँ याद आया. हम दोनों अपने घर और मर्यादा कि खातिर सबकुछ सहते गए. ये बात थी १८अप्रैल, २०११ कि सुबह लगभा ७:३० कि. मैंने उनकी मम्मी को बताया, “हमारे बीच ऐसा कुछ नहीं है जिससे आप लोगों का सर शर्म से नीचा हो. हम दोनों एक-दुसरे से शादी करना चाहते हैं और वो भी आपकी रजामंदी से.” मगर वो हमारी एक भी बात सुनने को तैयार नहीं थी. मुझसे नफ़रत का वहां वो आलम था कि यदि अन्जानी अपने जुबान से मेरा नाम ले ले तो उसके होठों पर मेरा नाम आने से पहले उसके मुंह पर जोड़ की पड़ती थी. सचमुच यकीं नहीं होता कि आज शिक्षा और ज्ञान का व्यापक स्वरुप होने के बावजूद कहीं न कहीं नैतिकता और मौलिकता में कमी सी रह गयी है और मानव जीवन का उद्देश्य कहीं परम्पराओं, जिम्मेदारियों और मान-मर्यादा में सिमट कर रह गया है. मैं अन्जानी से मिलने उसके कोचिंग क्लास पर गया. वह मुझे देखकर मुस्कुरा रही थी. शायद इसलिए कि उसके जख्म और दर्द को देखकर मेरे आखों में आंसू न निकले क्योंकि उसे पता था कि मैं बहुत ही भावुक हूँ. वह हसतें हुए बोली, ” अनिल! सब कुछ ख़त्म हो गया.” उसकी जुबान से यह शब्द सुनकर मेरी आँख भर आई. हूँ…………कभी-कभी कितना मजबूर हो जाता है इंसान जब जीवन के संघर्ष में अपनों के विरुद्ध खड़ा होना पड़ता है और वो भी अपने माता-पिता के. जो उसपर गुजर रह थी, मैं अच्छी तरह समझ सकता था क्योंकि यह सब मुझ पर भी तो बीत चुका था. अन्जानी नहीं चाहती थी कि उसकी वजह से मेरी जान जाये. बस वो इतना चाहती थी कि मैं जहाँ रहूँ, सही सलामत रहूँ. अतः वह मुझसे फासला बनाना बेहतर समझी.

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मैंने उसे समझाया, ” अन्जानी! हम सिर्फ अपने लिए नहीं जी रहे हैं. हम जी रहे हैं अपने आने वाले कल के लिए जहाँ किसी मोड़ पर हमारे बच्चे ‘श्रेयांस और अलीना’ अपने मम्मी-पापा का इंतजार कर रहे हैं. जब हम एक दुसरे के जीवनसाथी हैं तो हमें एक साथ आने वाले मुश्किलों का सामना करना होगा. भले ही हमारी जिंदगी दो पल की क्यों न हो पर वह पल हमें एक साथ गुजरना है. यदि हम ऐसा न कर सके तो हमारा रिश्ता एक गाली बनकर रह जायेगा और हमेशा के लिए हमें बदचलन और आवारा का नाम दिया जायेगा. हमें अपने रिश्तें को एक पाक अंजाम तक पहुँचाना है और इसके लिए चाहे हम इस दुनिया में रहें या न रहें. हाँ हमारी सोच रहे और इसके साथ ही ‘अन्जानी और अनिल’ का प्यार. ” उसे मेरी बात कुछ-कुछ समझ में आने लगी थी. एक बार फिर हम दोनों ने अपने आने वाले कल के लिए, आज को भुलाकर एक नयी उड़न के लिए खुद को तैयार किये. इस दौरान मैं अपने पैरेंट्स को मना लिया. मगर उसके पैरेंट्स अभी तक हमारे रिश्तें के लिए तैयार नहीं हुए और यह मानकर चल रहें थे कि हम दोनों का रिश्ता ख़त्म हो चूका है. एक दिन अचानक उनको खबर हुई कि आज भी हम दोनों के बीच बातों का सिलसिला कायम है. मम्मी ने एक बार फिर उसकी पिटाई की जिससे उसका चेहरा बुरी तरह बिगड़ गया. उससे भी जी नहीं मना तो रस्सी से उसका गला कस दिया. फिर भी अन्जानी बेजान पत्थरों की भाति सबकुछ सहती गयी. बस इतना ही बोल सकी, “मुझे जो करना था, वह कर दी. अब आपको जो करना है, करिए.” कभी-कभी एक माँ कितना निर्दयी हो जाती है की अपने जिगर के टुकड़े की जान की प्यासी बन जाती है, इस बात का यकीं नहीं होता. अन्जानी छटपिटाती रही परन्तु मम्मी ने गले से रस्सी का फंदा नहीं निकाला. वो तो गनीमत थी कि उनकी दीदी ने हस्तक्षेप करकर अन्जानी की जान बचायी. नहीं तो उस दिन एक माँ के हाथों अनर्थ हो जाता और ममता हमेशा के लिए अभिशापित हो जाती. जब मैं एक बार फिर अन्जानी से मिलने उसके कोचिंग क्लास गया तो उसके चेहरे पर पड़े घावों और गर्दन पर पड़े रस्सी के निशान से सारा माज़रा समझ गया और मैं चाहकर भी अपने आँखों से छलकते आंसुओं को रोक न सका. परन्तु आज भी उसके चेहरे पर पहले की भाति एक हँसी थी. जितना मजबूत वो है, मैं नहीं क्योंकि वो हरेक परिस्थितियों का हँसकर सामना करती है. सचमुच वह उस समय इस दुनिया में सबसे अधिक समझदार और शक्तिशाली औरत लग रही थी. जिसे मैं अपनी पत्नी के रूप में पाया था. अन्जानी ने कहा, “अब कुछ नहीं हो सकता. यदि हम दोनों शादी करते हैं तो हमारे अपने हमारे साथ-साथ खुद को मार देंगे. ऐसा उनका कहना है और फिर हम अपना रिश्ता निभाकर क्या करेंगे कि हमारे वजह से कोई अपना इस दुनिया में न रहे.” यक़ीनन यह एक महान सोच थी और उससे भी महान उसका त्याग जो अपने पैरेंट्स के लिए करने जा रही थी. शायद उसे पता नहीं था कि उसका त्याग पैरेंट्स के लिए नहीं बल्कि झूठी शान और मर्यादा के लिए था. यह भारतीय इतिहास में पहली बार होने जा रहा था कि कोई पतिव्रता पत्नी झूठी शान और मर्यादा के लिए अपने पति को छोड़ने को तैयार थी. काश ऐसी सोच हमारे बड़े विकसित करते तो आज हमारे बीच सामाजिक कुरीतियाँ इस कदर पैर नहीं पसारती. सचमुच उस दिन हमारे अपने कितने गलत थे और हमेशा गलत रहेंगे. क्योंकि वे झूठी शान और मर्यादा की खातिर हमारी जान लेने को तैयार थे और हम अपने रिश्ते को बचाने की खातिर अपनी जान देने को तैयार थे. उसे जितना अपनो से लड़ना था, उतना लड़ चुकी थी. अब और उसमे हिम्मत नहीं थी कि हमारे रिश्तें को जिन्दा रख सके. अन्दर ही अन्दर टूट चुकी थी. अन्जानी ने कहा, ” अनिल! हो सके तो मुझे कहीं से ज़हर लाकर दे दो क्योंकि इस समस्या का बस यही एक हल दिख रहा है.” मैंने कहा, “नहीं अन्जानी यदि मरना ही है तो हम साथ मरेंगे. परन्तु परिस्थितियों से भाग कर नहीं बल्कि लड़ते हुए.”


मेरी सदा-एक अधूरी परन्तु सच्ची प्रेम कहानीमेरी सदा-एक अधूरी परन्तु सच्ची प्रेम कहानी

अब सेल फोन पर हमारी बातें बंद हो चली थी. उन्ही दिनों एक बार अन्जानी का फोन आया भी तो मैंने उसे मना कर दिया. मुझे इस बात का डर था कि आज उसका गला दबाया गया है तो कल उसका गला काटा भी जा सकता है. अतः अब मैं उसके कोचिंग क्लास पर ही सप्ताह में एक बार मिल लिया करता था. उस दौरान मुझे शक था पर यकीं नहीं कि वो पूरी तरह से टूट चुकी है. आरमानों और खुशियों से सजे हमारी छोटी सी दुनिया को इसलिए उजाड़ दी ताकि हमारे अपनों का घर बसा रहे. अपने आसुओं को चहारदीवारी के अन्दर कैद कर ली ताकि उसकी सिसकियाँ बहार न जा सके. उसका कोचिंग क्लास न करने के कारण, अब मेरा उससे मिलना-जुलना भी बंद हो गया. उधर वह तडपती रही और इधर मैं. इसी दौरान जब मैं १७-२१अक्टूबर,२०११ के बीच ट्रेनिंग के लिए लखनऊ गया हुआ था. २०अक्टूबर,२०११ को लगभग शाम ६.३० बजे की बात है. ट्रेनिंग क्लास करके गेस्ट हाउस पहुंचा था. तभी अन्जानी का फोन आया, ” हम अब आप से शादी नहीं करना चाहते. कोई प्रयास मत करिए क्योंकि कोई फायदा नहीं होगा.” मैं यह सुनकर पागल सा हो गया. ऐसा लग रहा था, जैसे मेरे पैरों तलों से जमीं खींच ली गयी हो. मेरे रोने और चिल्लाने से उस कमरें की दीवारें गूंज उठी. मगर अफ़सोस इस बात का था कि मेरी करुण आवाज सुनकर वो धराशायी नहीं हुई. अन्जानी के घर के सारे सेल फोन स्विच ऑफ़ कर दिए गए. मुझे सारा मासला समझ में आने लगा. उसने तो अपने दिल पर पत्थर रखकर वो कह दी जो कभी सोची नहीं थी और अन्दर ही अन्दर घुटती रही. मैं अन्जानी के पापा से बात करने के लिए, उसके घर का नंबर डायल करता रहा. लगभग एक घंटे के बाद अन्जानी के घर का नंबर लगा और उनकी मम्मी से बात हुई. मैं उनसे विनती करता रहा कि वो हमें अलग न करें. परन्तु एक बार फिर मुझे गालियों और धमकियों के सिवाय कुछ न मिला. तब से लेकर आज तक रोज जीता हूँ और रोज मरता हूँ और किसी चमत्कार का इंतजार करता हूँ कि हमारे अपने अपनी रुढ़िवादी परम्पराओं को छोड़कर काश हमारे खुशियों के बारे में सोचें ताकि अपनी अन्जानी से बिछड़ा यह अनिल मिल जाये. नहीं तो अब जीने की आशा जाती रही ……………………………………………………………….Yet to be end.

मेरी सदा-एक अधूरी परन्तु सच्ची प्रेम कहानीमेरी सदा-एक अधूरी परन्तु सच्ची प्रेम कहानी

उसने तो अपने तड़प और दर्द के साथ जीना सीख लिया. पर मैं आज भी अंधेरों में रोशनी की तलाश करता फिरता हूँ. आज मैं अपने दर्द और तकलीफ को इसलिए वयां कर रहा हूँ ताकि अन्जानी से किया वादा पूरा कर सकू. इसके साथ ही मेरे दर्द को आप सभी महसूस कर सके. वैसे भी मैं इस दुनिया में अकेला नहीं हूँ जिसके साथ यह घटना घटित हुई है. हमारे जैसे जाने कितने ‘अन्जानी और अनिल’ हैं. जो आये दिन झूठी शान, मर्यादा और रुढ़िवादी परम्पराओं का शिकार हो रहे हैं. साथ ही उनकी प्रेम कहानी अधूरी रह जाती है. शायद आप भी उनमे से एक हो. फिर आप क्यों चाहते है कि जो आपके साथ हुआ, वह किसी और के साथ भी हो. हम इंसानों और जानवरों में फर्क ही क्या रहा. मैं नहीं चाहता कि जो अंजाम ‘अन्जानी और अनिल’ जैसे रिश्तों का होता आया हैं, भविष्य में उसकी पुनरावृति हो. हमें किसी व्यक्ति विशेष अथवा समूह विशेष से नाराजगी नहीं है बल्कि आपको हमारी खुशियों से नाराजगी है. हम किसी से कोई रिश्ता नहीं तोडना चाहते बल्कि आप अपने रिश्ते कि दुहाई देकर हमारा रिश्ता तोडना चाहते हैं. हमें आपकी जिंदगी जीने से कोई ऐतराज नहीं है. परन्तु हमें हमारी जिंदगी जीने का अधिकार चाहिए. आप भी सोचों आखिर कौन गलत है और कौन सही. एक तरफ कोई रिश्ता जोड़ना चाहता है और दूसरी तरफ कोई रिश्ता तोड़ना चाहता है.

मेरी सदा-एक अधूरी परन्तु सच्ची प्रेम कहानी(चित्र गूगल इमेज साभार )

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95 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

अजय यादव के द्वारा
September 17, 2012

नमस्ते सर जी, सादर प्रणाम जागरण जक्सन पर पहली कहानी यही पढ़ी थी बहुत लाजवाब ….एक फिल्म जैसी |हम सबकी कहानी एक जैसी हैं |एक रूपक हैं -तुम्हारे रूप की गंध और नेत्रों की मौन भाषा प्राणों में घुलकर जब फूल जैसी खिलती है तो आत्मा का संगीत उठता है , जिससे प्रेम -पंख उड़ने लगते हैं , उस आकाश में , जहां परमात्मा का सातवाँ द्वार है – परम आनंद का , ” सच्चिदानन्द ” का , और वहीँ सत्य , चेतना और आनंद एक होकर सम्पूर्ण श्रृष्टि में बिखरते है ,सूर्य किरण से , यही हमारे पुण्य की पराकाष्ठा है , प्रेम की निष्काम पुण्य-अंजलि | बहुत खूबसूरत लिखा आपने [डॉ अजय ,एम्स]

May 16, 2012

जी मार्मिक कहानी मैंने नहीं लिखी है, ज़माने की परम्पराओं और मर्यादाओं ने लिखी हैं. हमपर तो बस गुजरी है. आपको मेरी दर्द भरी प्रेम कहानी पढ़कर मजा आया इससे बढ़कर मेरे लिए क्या हो सकता है ….आपका हार्दिक आभार…….मैं चाहता हूँ कि यह लिंक आप अपने चाहने वालो को भी भेज दे ताकि वो लोग भी मजा ले ले. आख़िरकार अकेले मजा लेना अच्छी बात नहीं….हाँ……हाँ….हाँ….!

Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
May 16, 2012

अनिल जी, कहानी पद कर मजा आ गया . kintu मैंने आज आधी कहानी पड़ी है , आधी कल पडूंगा.

May 13, 2012

अलीन गफिर हम भी नहीं पर क्या करें, सब दिल का कुसूर है…..!

follyofawiseman के द्वारा
May 13, 2012

मुझसे पहले भी मोहब्बत का यही अंजाम था ‘कैस’ नाशाद था, ’हीर’ नाकाम था……

March 31, 2012

सादर प्रणाम! आपके विचार बहुत अच्छे लगे….आपने सही सलाह दी हैं ….मैं बस वही कर रहा हूँ……बस आप लोगों का आशीर्वाद चाहिए….

RaJ के द्वारा
March 31, 2012

आपकी खुद की अधूरी कहानी को अभी भी मंजिल की दरकार है \ मैंने १४ फरबरी[प्यार करने वालों का दिन] जिसका मेरा खुद का जन्म है के बारे में पता किया तो यह सच सामने आया कि JIN संत के जन्म दिन को इस रूप में मानते हैं वे इसी प्रकार के प्यार कने वालों की हर तरह मदद करते थे ……. शायद यह प्रेरणा उनकी जिंदगी के किसी अधूरे रिश्ते ने उन्हें दी \ जिंदगी जो HUMKO हमारा अगर न मिला तो कोशिश करो उनकी मदद की जो इसी झंझावत में फंसे है \ कई बार अपनी मुश्किलों को स्वयं नहीं सुलझाया जा सकता पर अन्य मुसीबत जदा लोगों की मदद करके जिंदगी को नै ताजगी जरुर दी जा सकती है

March 20, 2012

अजय भाई, अब वक्त आ गया है यह विचार करने का कि वास्तव में हमारे अपनों का सही मायने में सम्मान किस्मे हैं. उनकी बात मानकर गलत परम्पराओं का समर्थन करने में या उनके विचारधारा के खिलाफ बगावत करने में. शुरू से लेकर आजतक आप और मुझ जैसे लोग अपनों की सम्मान की खातिर वक्त के साथ समझौता करते आये और वो लोग परंपरा निभाने और मान-मर्यादा के नाम पर मानवता को ताड़-ताड़ करते आये. नतीजा आज हर गली और चौराहे पर मानवता नंगी खड़ी हुई है और फिर भी आप सम्मान की बात करते है. मैं बड़ों के सम्मान से पीछे नहीं हटता हु. परन्तु वो हरेक विचारधारा जो मानवता के खिलाफ हो उसका ना ही सम्मान कर सकता हूँ और ना ही समर्थन. आज इन रुढ़िवादी परम्पराओं के कारण जाने कितने मासूम अपनी जान गवा रहे हैं. एक जीवन का मूल्य क्या होता है? किसी मरते हुए के स्थान पर खुद को देखने के बाद ही पता चलेगा. ऐसे में यदि बगावत करने पर मुझे अपनो की नज़र में गुनाहगार होना पड़ता है तो यह गुनाह मानवता की खातिर १०० बार करूँगा.

March 19, 2012

जीवन चलने का नाम है, इस बात से इंकार नहीं करता. पर इस सफ़र में एक हमसफर की जरूरत होती है और हमसफ़र हर किसी को नहीं बनाया जाता. आपको शायद यकीं नहीं होगा मैं उन इंसानों में सा था जो अपने सकारात्मक इच्छाशक्ति से पत्थर को पिघला दे. हमेशा दुसरे को जीने का सिख दिया करता था. पर आज जब मुझ पर पड़ा है तो समझ में आ रहा है कि दूसरों को सिख देना कितना आसान है. यदि कोई गलत काम कर रहा हो और समाज और अपने उस पर अवरोध लगा रहा हो तो बात समझ में आती है. परन्तु यदि कोई शादी जैसे पवित्र बंधन के लिए अपनो और समाज का आशीर्वाद की इच्छा रख रहा हो और उसे नहीं मिल रहा हो तो इससे पता चलता है कि हमारा समाज कितना गर्त में. खुद को सरीफ कहने वाले ये सरीफ लोग, सराफत की आड़ में ऐसे-ऐसे कामों को अंजाम दे जाते है कि हमें उनका हिस्सा होने पर शर्म आती है. परन्तु जब हम समाजिक रूप से किसी से परिणय सूत्र में बंधना चाहते है तो हम जैसे इंसानों को इसके बदले में जो जिल्लत उठानी पड़ती है, उससे मानवता शर्म से सर झुका लेती है. यदि ऐसे में हम जैसे बच्चे कोई गलत कदम उठा लेते है तो हमेशा के लिए गुनाहगार हो जाते है. मैं भी गुनाहगार होना चाहता हूँ ताकि एक बार फिर लोग खड़े होकर किसी की बर्बादी का तमाशा देखे और तालिया बजाये. परन्तु किसी का तमाशा बनाने वाले इन तमाशाइयों को बेनकाब करके…..ताकि जो गुनाह मेरे जैसे नवयुवक करते आये है. उसकी पुनरावृति न हो और विचारों की ऐसी क्रांति हो जो छोटो के साथ-साथ बड़े भी इस पर विचार करे…..

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    March 19, 2012

    हमको भी गम ने मारा,तुमको भी गम ने मारा. इस गम को मर डालो…… अनिल भईया मैं आप के जज्बातों को समझता हूँ. कभी-कभी कुछ दर्द ऐसे होते हैं जिनको पीना पड़ता है. कभी किसी के लिए तो कभी किसी के लिए. हमारे लिए वो सर्वोपरि हैं, जिनसे हमारी पहचान है. जिनके कारण हम इस संसार में हैं. यदि हम उनका सम्मान करते हैं तो हम कभी भी ऐसा नहीं कर सकते जिससे उनको ठेस पहुंचे. भले ही यह उनका झूठा आत्म-सम्मान हो. फिर हममें और औरों में कोई फर्क ही नहीं रह जायेगा, जो सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए जीते हैं. रास्ते तो सिर्फ दो ही हैं. एक या तो तो हम दर्द को पी जाएँ या फिर बगावत कर दें. दोनों ही रास्ते आत्मघाती हैं. दोनों में ही हमारा नुकसान है. मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि मेरी भी कुछ कहानी ऐसी ही है. शायद यही कारण है कि मैं अपने आप को प्रतिक्रिया देने की स्थिति में नहीं पा रहा था. शायद यही कारण है कि मैं किसी को कोई नसीहत नहीं दे पाता. अपनी तो कहानी ही कुछ ऐसी हो गयी है…… ” हुए इस कदर मुहज्ज़ब कि घर का न मुंह देखा, कटी उम्र होटलों में, मरे हस्पताल जा कर.” अंत में यही कहूँगा “दुनिया में जितना गम है, मेरा गम उतना कम है”…….

ajaydubeydeoria के द्वारा
March 19, 2012

अनिल भाई ! आपकी इस मार्मिक कथा को मैंने कई बार पढ़ा है. लेकिन मैं क्या प्रतिक्रिया दूं यह सोच भी नहीं पाया. आज भी मैं अपने आप को प्रतिक्रिया देने की स्थिति में नहीं पा रहा हूँ. ये दर्द ही कुछ ऐसा है….. सिर्फ इतना कहूँगा……..जीवन चलने का नाम……चलते रहो सुबह-ओ-शाम……

Imran Ansari के द्वारा
March 17, 2012

सपनो के फ़रिश्ते तो जी रहते है हवा में, इंसान से मिलना है तो आके जमीन पे देख.

    March 17, 2012

    सादर अभिवादन ….बहुत ही सुन्दर शेर है और सुझाव भी….हार्दिक आभार.

mataprasad के द्वारा
March 3, 2012

अलीन जी नमस्कार , आप की कहानी पढ़ी तो ……….. हमने सोचा था की इस संसार में ,अगर मेरी इच्छाओं को कोई पंख लगाने वाला है तो वो मेरे परेंट्स है जो भी मागा ,मिला महगी से महगी चीज गुम की कोई डाट -फटकार नही । ऐसा लगता था मैं ही अपने परेंट्स का सबसे अधिक चहेता हूँ । बड़ा गुमान था इस बात का । शायद इसी गुमान में किसी को वचन दे दिया की हम तुम्हे भी मांग लेंगे अपने मम्मी पापा से पर क्या पता था की मेरे से भी अधिक चहेता उनके लिए उनका समाज और समाज में उनकी इज्जत है। जिसके लिए वो मुझे भी खोने को तैयार है । क्या करता अपने लिए जीना छोड़ दिया हमने ।

    March 5, 2012

    सादर नमस्कार! …..क्या करता अपने लिए जीना छोड़ दिया हमने ।…..शायद इसीलिए आये दिन गलत परम्पराओं को बल मिल रहा है और पीढ़ी दर पीढ़ी इनकी जड़ें मजबूत हो रही है…..हमारे अपने जिस संकुचित अरिवेश में रहते है उसके अनुसार उनके विचार सही है. और जिस परिवेश में हम रहना चाहते हैं उसके अनुसार, हमारे विचार सही है. हम किसी व्यक्ति विशेष से नहीं लड़ रहें है, हम एक बुराई से लड़ रहें है. इसमें सिर्फ हमारी ही नहीं बल्कि हमारे अपनों की भी जीत है जिसे वो आज समझना नहीं चाहते. परन्तु यदि हम हारते है तो यह पूरी मानव जाति की हार होगी………सामाजिक बुराइयों के खिलाफ खुलकर सामने आइयें. बहुत जल्द ही मैं एक सेना बनाने जा रहा हूँ जिसका हरेक सिपाही अपने आप में एक सेनापति होगा, उसका अभिन्न अंग बनिए,,,,,

Singh Mahavir के द्वारा
February 27, 2012

अनिल जी, सामने शीर्षक देख कर पूरी प्रेम कथा को पढ़ा याद रखे आपके अहिंसा से अनजानी आप तक नहीं आने वाली….अगर सच मुछ एकसाथ ज़िंदगी जीने का ख्वाब देखा है …..तो देर मत कर करो……नहीं तो Dr. suraj ke तरह ग़ज़ल लिखते रह जाओगे……………..बस इतनी ही सलाह दूँगा… अगर आपको मेरी कोई बात गलत लगे या अन्यथा लगे तो कृपया क्षमा कीजियेगा

    March 5, 2012

    सादर नमस्कार! आपकी प्रतिक्रिया का हार्दिक आभार,……क्षमा मांगकर शर्मिंदा न करें

alkargupta1 के द्वारा
February 23, 2012

अनिल जी, सामने शीर्षक देख कर पूरी प्रेम कथा को पढ़ा बस बहुत ही छोटी सी प्रतिक्रिया देना चाहूंगी कि समय का इंतज़ार करें आपकी दुर्गम राहें अवश्य सुगम होंगी और सभी कुछ ठीक होगा ……शुभकामनाएं आपकी नयी पोस्ट पर कमेन्ट आर क्लोज्ड लिखा हुआ आ रहा है प्रतिक्रिया पोस्ट नहीं हो पा रही है….समाधान करें

    February 23, 2012

    सादर प्रणाम! आपकी बातों से मेरे इंतजार को बल मिला, शुक्रिया,,,, नयी पोस्ट के साथ ऐसा क्यों हो रहा है, मुझे भी कुछ समझ नहीं आ रहा, कुछ करता हूँ,,,,,,

jlsingh के द्वारा
February 22, 2012

प्रिय अनिल जी, नमस्कार! मेरी प्रतिक्रिया कहाँ गयी , मुझे पता नहीं अत: फिर से लिख रहा हूँ. आपकी प्रेम गाथा करुण है और आपकी लिखने की शैली काफी अच्छी है. आपने चित्रों के माध्यम से काफी जीवन्तता प्रदान की है. विशेष मैं क्या राय रखूँ …… नीचे बहुत सारे विद्वानों और अनुभवी लोगों ने अपनी राय रखी है पर आप किसी की राय से संतुष्ट नजर नहीं दिखते फिर तो यह दुखांत कहानी के रूप में पढी जायेगी….. मैं भी ईश्वर से कामना करता हूँ कि आपकी दुखांत कहानी किसी दिन सुखांत का रूप ले ले और वह सुखांत भी हम लोगों को पढने को मिले. सुन्दर अभिव्यक्ति!

    February 22, 2012

    सादर प्रणाम! ऐसी कोई बात नहीं है, सर. मैं सबकी प्रतिक्रिया से संतुष्ट हूँ. मैं ज्यादा कुछ नही कहा क्योंकि जो कहना है वो साड़ी बात अपनी कहानी में रख दिया हूँ. सच पूछिये तो कहानी, एक कहानी ही होती. हकीकत जिनपे गुजरती हैं वही समझतें. वैसे भी अभी अन्जानी अपने बहुत से दर्द और तकलीफ को मुझसे छुपायी हैं जिसके बारे में मुझे भनक तक नहीं. पर हाँ वह सब महसूस कर सकता हूँ. अभी तो इस कहानी में अन्जानी के साथ जो बुरा-भला हुआ, बस वही दर्शाया हूँ. मेरे साथ क्या हुआ और कैसे जीवन व्यतीत करता हूँ …..छोडिये फिर कभी….वैसे भी मेरी कहानी का अभी end बाकी है. तबतक उत्सुकता बनायें रखिये…………… आप सभी का , अलीन

    February 22, 2012

    आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया का सादर आभार!

February 21, 2012

अनिल भाई नमस्कार ! क्या कहूँ….बिलकुल निःशब्द हो गया हूँ….अपना अतीत तैरने लगा आँखों के सामने …..आप तो अपने पैरों पर खड़े हो ॥अनजानी को शौक से लेजार शादी कर लो…दो चार दिन के बाद सब सामनी हो जाता है…वर्ण देख लो इस मंच पर दिल टूटे हुए लोगों के रोने …जो आजीवन कभी खत्म ही नहीं होते…..भाग्यशालि हो की वो अभी तक जिंदा है….लेकिन पता नहीं अगला पल क्या होगा॥जब इंसान परेशान होता है तो कोई न कोई गलत कदम भी उठा सकता है और आप एक बगावत भरा कदम भी नहीं उठा सकते….याद रखे आपके अहिंसा से अनजानी आप तक नहीं आने वाली….अगर सच मुछ एकसाथ ज़िंदगी जीने का ख्वाब देखा है …..तो देर मत कर करो……नहीं तो मेरी तरह ग़ज़ल लिखते रह जाओगे……………..बस इतनी ही सलाह दूँगा…

    February 21, 2012

    डॉ साहब, सादर प्रणाम! आपकी प्रतिक्रिया का आभार! सच पूछिये तो आज कल मैं सिर्फ शायरी और ग़ज़ल ही लिखता हूँ. मगर कभी इस मंच पर लेकर नहीं आता. जिस दिन इस मंच पर लेकर आया ……तो खुदा ही जाने क्या होगा. अपनी छोटी लव स्टोरी और आप सभी की प्रतिक्रिया को देखकर एक अभी-अभी शेर तैयार हुआ है…गौर फार्मइएगा घर से निकला था, शहर को बेहाल देखकर, शहर हँसता है, आज मेरा हाल देखकर. अपनी ही तलवार है, अपनी गर्दन पर, लोग हैरत में है, यह कमाल देखकर कोई कैसे दीप जलाएं, इस अन्धेरें में, हर शख्श डरता है, ‘अलीन’ का हाल देखकर. हा.हा.हा………………………..साली यह जिंदगी भी….. मुझसे जाने क्या चाहती है. माफ़ कीजियेगा.

    February 21, 2012

    एक बात aur………… आज बहुत दिन के बाद हंसा हूँ, मजा आ गया जनाब! शुक्र है की रात थी. अगर दिन होता तो शायद किसी पागल खाना में ही दीखता………हा.हा.हा……………………………….

smtpushpapandey के द्वारा
February 21, 2012

आदरणीय अनिल कुमार जी यदि आप अविवाहित है तो आपको अपने प्रेम मैं कभी न कभी सफलता जरुर मिलेगी क्योंकि सच्चा प्रेम कभी असफल नहीं होता अपनी कोशिशें जारी रखिये लेकिन यदि आपका विवाह हो चूका है तो आप अपने प्रेमी का रूप अपनी पत्नी में भी देख सकते है क्योंकि यदि प्रेम असफल हो जाता है और विवाह किसी दुसरे के साथ हो जाता है तो हमें उसे भी उतना ही प्रेम करना चाहिए जितना हम अपने प्रेमी को करते है इससे इश्वर प्रसन्न होते है और दुसरे जनम में प्रेमी का साथ जरुर मिलता है आशा करती हूँ की आप मेरी इस बात में गौर फरमाएंगे धन्यवाद

    February 21, 2012

    सादर नमस्कार! आपकी सूझ-बुझ भरी प्रतिक्रिया का सादर आभार…..

Aakash Tiwaari के द्वारा
February 21, 2012

अनिल जी, आपकी कहानी आपके जीवन की एक-एक बात दिल को जख्म देती चली गयी…इतना दर्द हुआ आपकी कहानी को पढ़कर की व्यक्त नही कर सकता..मुझसे अच्छा आपके दर्द को शायद ही कोई जान सकता.. है….बस एक सलाह देना चाहता हूँ..अगर वो ज़िंदा है तो किसी भी तरह अपना लो वरना कभी हस नहीं पाओगे…मुझसे ज्यादा भाग्यशाली है आप की वो अभी जिन्दा है और आप शादी के लायक है…क्या होगा थोडा बवाल होगा….हो जाने दीजिये….अगर आप उसे अपना नहीं सके तो जिंदगी में कभी किसी को दोष मत दीजियेगा…अगर वो आपकी न हो पाई तो आप जिम्मेदार होंगे…. आकाश तिवारी

    February 21, 2012

    आकाश जी, सादर अभिवादन! आपकी बातों से लगता है कि मेरी कहानी ने आपका कोई पुराना जख्म तरों-ताज़ा कर दिया…..आखिर यह सिर्फ मेरी ही कहानी नहीं है. आपके और मेरे जैसे जाने कितने इस दुनिया में होंगे और जाने कितने नहीं होंगे, उन सबकी है ……इसलिए यह लड़ाई हम सब की हैं. अतः सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध मेरे आवाज में अपनी आवाज मिलाइये ताकि जो हम पर बीती हैं. वो किसी और पर न बीतें. इस जागरूकता अभियान का हिस्सा बनिए…. पर याद रहें हमारा हथियार अहिंसा है….क्योंकि यदि हम हिंसा का सहारा लेंगे तो उनके और हमारे विचारों में कोई फर्क नहीं रह जायेगा.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
February 20, 2012

आदरणीय अलीन जी, सादर अभिवादन. ऐसे कई ताजे प्रकरण हैं मेरे सामने , मैं उनकी मदद नहीं कर पाया , लड़की ने मजबूर हो कर मना कर दिया. जाती पांति पूंछे न कोई हरी का भजे सो हरि का होई . भाव , प्रस्तुतीकरण सराहनीय. आदरणीय अनिल जी , पुनः अभिवादन उपरोक्त टिपण्णी के साथ मैंने आप से संवाद किया था. सारी बात इसमे शामिल है सिर्फ सलाह देने के. मैंने सलाह क्यों नहीं दी क्योंकि निर्णय स्वयं लेना चाहिए . निर्णय पर अमल करना निर्णय लेने वाले को ही पड़ता है और वो अपनी सारी स्थिति से वाकिफ होता है. मैं क्षत्रिय हूँ पर कबीर विचार धारा का हूँ. मैंने अपने बच्चों की शादी करने के पूर्व उनसे पूंछ लिया था की अगर कहीं और शादी करना हो तो पहले बता दो बाद की खिच खिच ठीक नहीं. लड़का लड़की योग्य होना चाहिए . ये किताबी बात नहीं कर रहा हूँ आप बच्चों से तस्दीक कर सकते हैं. आज के ज़माने में मरिड लाइफ हद से हद १० साल की है. केवल उसे ही सुखी बनाना है. बाकि तो निभाना है. ये तो आज की बात है कई किस्से मैंने अंतर जातीय देखे वो सफल हुए पर उन्होंने साहस किया. और क्या कहूं. ईश्वर आप को साहस दे.

    February 20, 2012

    सादर प्रणाम! मैं आपकी प्रथम प्रतिक्रिया से ही भाप गया था कि आप एक अच्छे इंसान हैं और आज आपकी बातों ने सिद्ध कर दिया कि आप एक अच्छे पिता भी हैं. बस आप का आशीर्वाद चाहूँगा ताकि मुझ से कोई गुनाह न हो….

    PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
    February 20, 2012

    ये बात मैंने अपनी बेटियों से भी की थी और जहाँ बिचवानी करनी होती है तो बगैर लिहाज के लड़के एवं लड़की से अकेले मैं पूंछ लेता हूँ फिर वैसी ही व्यवस्था देता हूँ.

    February 21, 2012

    …….इस दुनिया में आप जैसे विचारधारा के भी कुछ इंसान है, यह सुनकर अच्छा लगता है. शायद इसीलिए तो कहीं न कही किसी न किसी रूप में, मानवता जिन्दा है.

D33P के द्वारा
February 20, 2012

अलीन जी मैंने आपकी आप बीती पढने के बाद सोचा और बहुत सोचा .इसे क्या कहा जाये कायरता या अपने बड़ों का सम्मान .जिस दर्द से आप और आपकी प्रेयसी गुजर रहे है ,उसका जरा सा अहसास भी जिन अपनों में नहीं है ,उनसे आप क्या उम्मीद कर रहे है ?आज भी हमारे समाज में रुदिवाद और जातिगत भेदभाव जिन्दा है और उन पर आप जैसो की बलि चढाई जाती है !उन्होंने आपको जिन्दगी दी है इसलिए अगर आप उनका सम्मान कर सकते है तो वो आपने अंश का ,.अपनी संतान की खुशियों से इतने बेगाने कैसे हो सकते है .मगर ये सच है जिसका आप सामना कर रहे है !!अलीन जी हो सकता है मै गलत हूँ पर शायद आपको भी हर बात को दरकिनार करते हुए “अनजानी” को अपने साथ हमराह बनाने के लिए सहमत कर लेना चाहिए ,हो सकता है भविष्य में सब कुछ सामान्य हो जाये अगर नहीं भी हो तो आप दोनों ख़ुशी ख़ुशी अपनी जिन्दगी गुजर सकते है और परिवार की वृधि के साथ खुशियाँ प्राप्त कर सकते है ! अगर आपको मेरी कोई बात गलत लगे या अन्यथा लगे तो कृपया क्षमा कीजियेगा

    February 20, 2012

    सादर नमस्कार! आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया का आभार. क्षमा मांगकर शर्मिंदा न करें.

    D33P के द्वारा
    February 22, 2012

    अलीन जी आपकी आपबीती पर आपके ब्लाग परिवार का दिल द्रवित है ,सबकी शुभकामनाये आपके साथ है ,सबको प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद देने की !बजाय कोई ठोस कदम उठाकर अपनी जिन्दगी को नयी राह देकर सबको अपनी ख़ुशी में शामिल कीजिये और अपनी “अनजानी ” को अपनी पहचान बना लीजिये

    February 22, 2012

    कुछ सवालों के जवाब वक़्त के पिटारे में कैद होते है जिसका जवाब न ही हमारे पास होता है और न ही सामने वाले के पास …..बस एक-एक दिन जिन्दगी से जूझ रहा हूँ. वैसे आप लोगो की फिक्र जायज है……..काश आप लोगों की तरह हमारे पैरेंट्स भी सोचते…..

Rakesh के द्वारा
February 19, 2012

अलीन जी, सदर नमस्कार. बहुत ही मार्मिक वर्णन. बहुत सुन्दर ‘Presentation’. चित्रों के साथ साथ कहानी बहुत निखर के आती है. अगर ये कहाँ सच्ची है तो मै और भी दुखी हो गया. कभी एक शेर पढ़ा था याद नहीं है किसका है लिखा रहा हूँ: “अब यह भी नहीं ठीक हर जख्म भुला दे, कुछ जख्म कलेजे से लगाने के लिए हैं.” अब इस रचना को मै बधाई के तौर पर तो नहीं देखूंगा, भगवन करे ऐसा किसी के साथ न हो. फिर भी इतनी अच्छी प्रस्तुति के लिए साधुवाद!

MAHIMA SHREE के द्वारा
February 19, 2012

अनिल जी नमस्कार ! आपकी प्रेम कहानी बहोत ही मार्मिक है मन उदास हो गया आपने परिवार और समाज से जो भी सवाल किया है प्रेम की आजादी , जीवन साथी का चुनाव और जात पात की छोटी सोच का दायरा वो सब से हम सभी सहमत है….मेट्रो सिटी में अब उदारता आ गयी है माता-पिता बच्चो की ख़ुशी के लिए सहजता या विवशता से लेकिन मान जाते है पैर छोटे शहरो में हमारा समाज अभी भी इन मामलो में संकुचित है पैर जिस घरो में माता पिता खुले विचारो के है पड़े लिखे है वे कुछ विरोध के बाद मान जाते है..अतः..समाज को शिक्चित होने की बहोत जरूरत है…. जहा तक आपकी बात करे तो अगर ये आपकी अपनी आप बीती है तो ….आपको लंबा जीवन में आपका साथ जीवन संगनी देगी न की आपका परिवार …अतः दुखी होने बजाये आपको अनजानी जी के साथ विवाह कर लेना चाहिए…हजारो लोग ऐसा कर रहे है… तभी जात पात की बेरिया टूटेगी और आने वाला कल या कहे समाज खुले विचारों का होगा……संकीर्ण समाज की दीवार तुतानी चाहिए…..लेखक और समाज सुधारक ही हमेशा से समाज की मानसिकता में बदलाव करते आये है अतः आप पीछे न हटे हिम्मत करे हम सब आपके साथ है…

mparveen के द्वारा
February 19, 2012

अनिल जी नमस्कार, आखिर ३ दिन में मैंने आपकी कहानी पढ़ ही ली . और इन तीनों दिन दिल इतना दुखी हुआ की क्या कहे . समाज के बनाये नियमों के सामने किसी की नहीं चली . फ़िल्मी दुनिया में तो हर कहानी का अंत सुखद हो जाता है लेकिन ये कहानी रियल है तो फिर अंत सुखद कैसे हो सकता है . इसके डारेक्टर यानि की आप लोगो के परेंट्स थे जो अपने अनुसार दिशा दी उन्होंने …. कहानी जिनती रोमांचित कर रही थी अंत में उतना ही दुखी कर दिया . दिल भर आया पढके ही फिर जिसपे गुजरी होगी वाकई में दर्दनाक सच …

ASHU YADAV के द्वारा
February 19, 2012

बहुत अच्छा अनिल जी .

    February 19, 2012

    सादर अभिवादन! आपको अच्छा लगा, इससे बढ़कर मेरे लिए क्या हो सकता है, आभार….

tosi के द्वारा
February 19, 2012

अनिलजी कहूँ या अलीन जी , नमस्कार सचमुच आपकी सच्ची प्रेम कहानी मैंने पूरी पढ़ी , जहां तक कहानियों वाली बात है तो इसमें कुछ कमियाँ खटकती हैं। लेकिन जब कोई अपनी रियल बात कह रहा हो तो फिर सब बातें गौण हो जाती हैं । मैं भी सबकी तरह आपसे यही कहना चहुंगी की अगर लड़की की शादी नहीं हुई है तो , आप फिर से कोशिश कीजिये । ईश्वर जब एक दरवाजा बंद करता है तो दूसरा खोल देता है । कोई न कोई जरूर होगा जो उस तक आपको पहुंचा सकता हो अपने परिवार के उस सदस्य को विश्वास में लीजिये ।जो आपकी व माँ-बाप दोनों की सुलह करा सके । और लड़की के परिजनो  को भी राजी कर सके ,आजकल तो इंटर काष्ट मेरीज आसानी से हो जाती हैं । बस उन्हे कोई ठीक से समझाने वाला इंसान नहीं मिला । रेलवे स्टेशन वाली बात वाकई काबिले तारीफ है । अनजानी को भी सोचना चाहिए था की प्रेम अगर करना है तो रुक्मणी की तरह कृषणा का साथ देना पड़ेगा …..

yogeshkumar के द्वारा
February 19, 2012

नमस्कार अलीन जी, मैंने आपकी पूरी कहानी पढ़ी.. आपने बहुत अच्छे तरीके से अपनी कहानी लिखी.. मगर इससे पता चलता है कि आप एक निस्संदेह उम्दा लेखक हैं…. मगर अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है कि आप एक अच्छे प्रेमी नहीं हैं… आप डर गए एक समाज से ..अपने घर से… लड़की के घर से… आपने जिस तरीके से अपनी कहानी रखी, मैंने वैसे ही आपकी कहानी मान ली.. मगर जरूरी नहीं कि हकीकत भी ऐसी ही हो… आपकी कहानी बहुत अच्छे तरीके से लिखी गयी है… मगर इसमें नया कुछ नया नहीं है… मैं बचपन से ऐसे किस्से फिल्मों में, अखबारों में , कहानियों में देखता या पढता आ रहा हूँ…. “दो प्रेमी और दुश्मन जमाना” ये ना जाने कब से होता आ रहा है… आपने कहानी के बहुत अधिक भाग में अपने परिवार और ” अनजानी” के परिवार कि इज्ज़त का वास्ता दिया है… एक ऐसे परिवार जिनके लिए आपकी कोई इज्ज़त नहीं, आपकी भावनाओं कि कोई इज्ज़त नहीं… यदि आप सच्चे प्रेमी होंगे तो आप अपनी अनजानी का इंतज़ार करेंगे और विवाह नहीं करेंगे …यही बात अनजानी पर भी लागू होती है…. जीवन एक बार मिलता है…. जीवन से पहले क्या था ..इसके बाद क्या होगा,…. कोई नहीं जानता…. धर्मं क्या ..जात क्या ..समाज क्या … परेशानी में कोई साथ नहीं देता …सब या तो ताने देते हैं या दूर की सहानुभूति दिखाते हैं….. आप इस जीवन को अपने मन मुताबिक जी लीजिये या फिर अपने आपको जिंदगी भर कोसते रहिये….. या इसी प्रकार अपना दुखड़ा रोते रहिये …… इन झूठी शान, मर्यादाओं और रुढ़िवादी परम्पराओं को बदलने के लिए आसमान से या स्वर्ग से कोई देवदूत या ईश्वर नहीं अवतरित नहीं होगा .. इन्हें अपने या मुझे ही बदलना है…… अगर आपकों परिवार, परम्पराओं , समाज और संस्कृति की इतनी ही फिक्र थी तो दिल क्यों लगाया???? यहाँ मुस्लिम लड़के एक हिन्दू लड़की को भगाने में कोई संकोच नहीं करते और आप एक वैश्य हिन्दू होकर एक क्षत्रिय हिन्दू परिवार को नहीं संभाल पाए ….

div81 के द्वारा
February 18, 2012

अनिल जी सभी साथी ब्लोगर्स कि तरह मेरा भी यही मत है कि आपने जब प्यार किया है और बिना किसी खोट के किया है तो उस को उसके अंजाम तक पहुंचाइए | दिल छोटा न कीजिये लड़की के बारे मे सोचिये वो कितने घुटन मे जी रही होगी आप के घर वाले राजी है उसको अपने घर का मान बना के ले आइये | ऊपर वाला आप के जीवन मे खुशियाँ ले कर आये हमारी शुभकामनाये आप के साथ है |

akraktale के द्वारा
February 16, 2012

अनिल जी नमस्कार, आलेख काफी लंबा है इसलिए प्रतिक्रया के वाक्य बीच में ही लिख ले रहा हूँ हो सकता है अंत में तालमेल ना मिले.आपने लड़की को बोझ बताया वह एकदम निराशाजनक शब्द है कोई बच्चे माँ बाप पर बोझ नहीं होते यदि संस्कारी हैं तो.सन्यासी बन जाना शर्म की बात कदापि नहीं है यदि शिक्षित होकर सही रीती से संन्यास ले तो.दुःख अवश्य होता है क्योंकि यह प्रकृति का उल्लंघन होता है. पूरी कहानी का प्रस्तुतीकरण बहुत ही गजब का है और रेलवे स्टेशन वाला वाकिया हलचल मचा देता है.फिर सत्य कथा है और यदि लड़की की शादी नहीं हुई है तो फिर कायरता छोडिये और शादी कर डालिए जैसा की मेरे अन्य साथियों ने सलाह दी है. और जब शादी हो जाए फिर बताना की पति पत्नी एक दिन बात ना हो तो दुखी होते हैं की खुश होते हैं. आलेख के सुन्दर प्रस्तुतीकरण पर बधाई. आगे आप और इश्वर मार्ग प्रशस्त करे.

    अलीन के द्वारा
    February 17, 2012

    सादर प्रणाम! कोई बात नहीं सर जी, आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया समय-समय पर मिलती रहती हैं, यही बहुत है मेरे लिए…आपका आभार.

Santosh Kumar के द्वारा
February 16, 2012

अलीन जी ,.आपकी संवेदनशील प्रेम कहानी पढ़कर अद्भुत रोमांच के साथ बहुत दुःख भी हुआ ,..आज के दौर में ऐसे सच्चे प्रेमी जोड़े कम ही मिलते हैं ,.जो पवित्र प्रेम के साथ भविष्य के सपने देखें !..श्रेयांश और अलीना की बातें पढ़कर हंसी भी आई ,….उनके मातापिता को समझना चाहिए की वो अपनी उस औलाद को घुट घुट कर मार रहे हैं जो उनको भी उतना ही प्रेम करती है जितना आपको !..लेकिन अपने पाखण्ड भरे अहंकार में चूर हैं ,.. और क्या लिखूं ?,..ईश्वर उनको सद्बुद्धि दे !…. मैं तो आपको सलाह दूंगा की कानूनी मदद से आप अपनी प्रेम कहानी को अंजाम तक पहुंचाएं ,..हमारा नैतिक समर्थन आपके साथ है ,..ईश्वर आपको शक्ति और सफलता दें …बहुत शुभकामनाये

    अलीन के द्वारा
    February 17, 2012

    सादर नमस्कार! आपकी महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया का आभार!

merehisaabse के द्वारा
February 16, 2012

अनिल/अलिनजी आपकी कथा बहुत ही wide spectrum वाली है. पढ़ने और समझने के लिए वक़्त चाहिए. डर है कहीं confuse न हो जाऊं

    अलीन के द्वारा
    February 16, 2012

    सादर प्रणाम! THANKS TO VISIT MY BLOG.

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
February 16, 2012

अनिल जी, आपकी दर्द भरी दास्तान को पढ़कर सोच नहीं पा रहा हूँ कि क्या प्रतिक्रिया दूं. जो कुछ भी हुआ,वह अच्छा तो नहीं लेकिन सबकुछ समाज की कुरीतियों और जाति प्रथा में विश्वास के कारण ही होता हो यह जरूरी नहीं.आज जाति प्रथा का वह संकीर्ण रूप नहीं जो पहले था.अब तो गांवों में भी अंतर्जातीय विवाह हो रहे हैं.इस तरह के प्रसंग में सबसे ज्यादा हालात की शिकार तो लड़कियां ही होती हैं न. आप दोनों बालिग थे और आर्थिक रूप से स्वतन्त्र भी,तो क्यों न समझदारी वाला फैसला लेते हुए आर्यसमाज मंदिर में या फिर कोर्ट मैरिज ही किया. ईश्वर से प्रार्थना है कि आगे जो भी हो,अच्छा ही हो. आभार सहित, …..राजीव

    अलीन के द्वारा
    February 16, 2012

    सादर प्रणाम ! आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया का आभार.

sadhana thakur के द्वारा
February 16, 2012

अलीन जी ,लगता है आपका दुःख बहुत बड़ा है इसलिए आपकी रचना भी बहुत लम्बी हो गई है ,हमें आपसे सहानुभूति है अगर ये आपकी अपनी कहानी है तो ………..

    अलीन के द्वारा
    February 16, 2012

    सादर आभार! अब क्या कहें,,,,,बस इतना ही कहूँगा कि वो रोये तो बहुत मेरी कब्र , पर जाते-जाते बोल गए क्या तुम सचमुच नहीं रहें. सितम करना है कर लो ‘अलीन’ यह तो कुछ भी नहीं उसके आगे, जो हँसतें हुए,हमने दिल पर सहें.

aksaditya के द्वारा
February 16, 2012

गुरु , अपने को तो लगता है कि न अनिल अनजानी से प्रेम करता था और न ही अनजानी अनिल से | यदि दोनों में प्रेम होता तो बहाने के बजाय जाकर आर्यसमाज में या कोर्ट में शादी कर लेते | अपुन ने ऐसा ही किया था , वो भी अडतीस वर्ष पहले | कहानी के हिसाब से भी यह कमजोर है | अनिल और अनजानी शादी कर लेते और फिर ऑनर किलिंग जैसा एंड होता तो शायद कुछ मेसेज होता | मुझे तो दोनों केरेक्टर कोवार्ड (भीरु) और सेडिस्ट (स्वयम को दुखी रखकर आनंद लेने वाले ) लगे हैं | मैं यह नहीं लिखता , यदि आपने इसे सच्ची कहानी कहने की जहमत न उठाई होती | सच्चे प्रेमी तडपते नहीं , बगावत करते हैं और उसके लिए सब कुछ छोड़ना पड़ता है | समाज में ऐसे जोड़े भरे पड़े हैं | वैसे कहानी के हिसाब से आपका प्रयास अच्छा है |

    अलीन के द्वारा
    February 16, 2012

    सादर प्रणाम! आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया का आभार!

yogi sarswat के द्वारा
February 16, 2012

अलीन जी , सादर ! आपकी कहानी हकीक़त से रूबरू कराती हुई , रुलाती हुई बहुत कुछ सोचने पर विवश करती है ! आज मुझे पता चला की आपने अपने ब्लॉग में फोटो के स्थान पर खून के आंसू क्यों लगाए हैं…….! यदि ये कहानी आपकी अपनी है तो मुझे आपसे ज्यादा उस लड़की के लिए अफ़सोस रहेगा……! आपकी कहानी को पढ़कर ऐसा लगा की आपको इस बात अंदाजा शुरू से था की आपके या अनजानी के माता पिता इस रिश्ते को लेकर नहीं मानेंगे ….. ! और ये बात आप तब से जानते थे जब आप उस से पहली या दूसरी बार मिले ……..! तो फिर उसे अपना नंबर क्यों दिया…..? पहले अपने माता पिता से बात करनी चाहिए थीं, यदि वो सहमत होते तो सीधा अनजानी के माता पिता से बात करते ….. पहले उस से शादी की बात करने का क्या मतलब……! में मानता हूँ की हमारे समाज में कुरीतियाँ हैं और प्यार करने वालों को तो समाज के दुश्मन के तौर पर देखा जाता है और आप भी ये बात जानते ही होंगे इतिहास से कुछ तो सबक लिया होता और प्रेम की पींगें बढाने से पहले अपने प्यार को पाने का तरीका ढूंढना चाहिए था ………..! माफ़ कीजियेगा यदि में कुछ कडवा लिख रहा हूँ आप तो अनजानी से बिछड़ कर दुःख प् ही रहे हैं लेकिन आपने उसको और ज्यादा दुःख दिया है क्योंकि प्यार में हमेशा लडकियां लड़कों पर बहुत भरोसा कर बैठती हैं और आपने माता पिता की इज्ज़त और मान मर्यादा के नाम पर एक लड़की के साथ खिलवाड़ किया ………! ज़रा बहादुरी से काम लीजिये ……..! http://yogensaraswat.jagranjunction.com

    अलीन के द्वारा
    February 16, 2012

    yogi sarswat जी, सादर नमस्कार! लगता है, आपने पूरी कहानी नहीं पढ़ी. वैसे आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया का आभार.

    yogeshkumar के द्वारा
    February 19, 2012

    योगी सारस्वत जी ….आश्चर्य है कि… नीचे मुनीश महोदय और आपकी प्रतिक्रिया एकदम एक जैसी है …… आखिर चक्कर क्या है.????????????? COPY-PASTE है क्या?????????

minujha के द्वारा
February 16, 2012

अलीन जी  यकीनन आपके साथ नियति और परिवार ने जो किया बहुत बुरा किया और हमारे कुछ भी कह देने से वो दर्द कम नही होगा नाहि आप अपने पहले प्यार को भुला पाएंगे,पर शुभचिन्तक के नाते यही कहुंगी कभी जिंदगी की रफ्तार को रोकने की कोशिश मत करिएगा,हो सकता है ईश्वर ने आपके लिए कुछ सोच रखा हो ,आगे जिंदगी जहाँ ले जाए बढते जाइए,गम के बाद खुशियों का दौर जरूर आएगा हम सबकी शुभकामनाएं आपके साथ है

    अलीन के द्वारा
    February 16, 2012

    minujha जी, सादर नमस्कार! आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया का आभार.

klpruthi के द्वारा
February 16, 2012

श्री मान जी,  कहते हैं जिस तन लागे सो तन जाने। फिर हर एक कष्ट को सहने की प्रत्येक की अपनी-अपनी शक्ति होती है। मेरा इस मामले  में कोई तज़रबा भी नहीं है। वैसे प्यार अगर सच्चा है तो कहते हैं कि वह जीना सिखाता है - त्याग सिखाता है। 

    अलीन के द्वारा
    February 16, 2012

    सादर चरण स्पर्श! आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया का आभार.

jagobhaijago के द्वारा
February 16, 2012

जनाब अलीनजी,नमस्कार अफसोस कि बंदिशों के कारण आपका मिलन नहीं हो पाया, ईश्वर से प्रार्थना है कि आपका मिलन अगले जन्म में जरूरु हो; किन्तु जरूरी नहीं कि प्रेम में पाया ही जाए मेरे विचार से प्रेम शर्तरहित होना चाहिए। सच्ची प्रेम-कथा की सरल शब्दों व चित्रात्मक ढंग से भावपूर्ण प्रस्तुति का प्रयास सराहनीय है; वैसे भी कहा गया है कि ‘वियोगी होगा पहला कवि ,और आह से….शायद इसी कारण इतने सुन्दर व रोचक ढंग से आपने अपनी प्रेम-कथा को शब्दों व चित्रों से गूँथा है।

    अलीन के द्वारा
    February 16, 2012

    सादर अभिनन्दन! आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया का आभार.

वाहिद काशीवासी के द्वारा
February 16, 2012

मार्मिक कथा है आपकी। एक जिज्ञासा है मन में कि आपका नाम अलीन है अथवा अनिल कृपया समाधान करें।

    अलीन के द्वारा
    February 16, 2012

    आस्ल्लाम वाल्लेकुम, वाहिद साहब! आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया का आभार. अनिल कुमार ‘अलीन’

munish के द्वारा
February 16, 2012

अनिल जी, आज मुझे पता चला की आपने अपने ब्लॉग में फोटो के स्थान पर खून के आंसू क्यों लगाए हैं…….! यदि ये कहानी आपकी अपनी है तो मुझे आपसे ज्यादा उस लड़की के लिए अफ़सोस रहेगा……! आपकी कहानी को पढ़कर ऐसा लगा की आपको इस बात अंदाजा शुरू से था की आपके या अनजानी के माता पिता इस रिश्ते को लेकर नहीं मानेंगे ….. ! और ये बात आप तब से जानते थे जब आप उस से पहली या दूसरी बार मिले ……..! तो फिर उसे अपना नंबर क्यों दिया…..? पहले अपने माता पिता से बात करनी चाहिए थीं, यदि वो सहमत होते तो सीधा अनजानी के माता पिता से बात करते ….. पहले उस से शादी की बात करने का क्या मतलब……! में मानता हूँ की हमारे समाज में कुरीतियाँ हैं और प्यार करने वालों को तो समाज के दुश्मन के तौर पर देखा जाता है और आप भी ये बात जानते ही होंगे इतिहास से कुछ तो सबक लिया होता और प्रेम की पींगें बढाने से पहले अपने प्यार को पाने का तरीका ढूंढना चाहिए था ………..! माफ़ कीजियेगा यदि में कुछ कडवा लिख रहा हूँ आप तो अनजानी से बिछड़ कर दुःख प् ही रहे हैं लेकिन आपने उसको और ज्यादा दुःख दिया है क्योंकि प्यार में हमेशा लडकियां लड़कों पर बहुत भरोसा कर बैठती हैं और आपने माता पिता की इज्ज़त और मान मर्यादा के नाम पर एक लड़की के साथ खिलवाड़ किया ………! ज़रा बहादुरी से काम लीजिये ……..! और उस लड़की को भंवर में मत छोडिये . (आपके दुःख को मैं कम तो नहीं कर सकता बस ये दुआ कर सकता हूँ की सब कुछ सही हो जाए और किसी को कोई दुःख न हो, आपके लिए हास्य रस की एक रचना का लिंक दे रहा हूँ ) http://munish.jagranjunction.com/2011/02/14/%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%82-%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AE%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%9C%E0%A5%80-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BE-%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A5%87/

    अलीन के द्वारा
    February 16, 2012

    मुनीश जी, सादर नमस्कार! आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया का आभार.

roshni के द्वारा
February 16, 2012

अनिल जी आपकी कहानी पढ़ी… अच्छा हुआ या बुरा हुआ नहीं कहुगी क्युकी ये प्रेम है और हाँ इसपे कोई राय भी नहीं दुगी क्युकी जिसे चोट लगती है उसे ही दर्द का पता होता है … आभार

    अलीन के द्वारा
    February 16, 2012

    रोशनी जी, सादर नमस्कार! आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया का आभार.

manojjohny के द्वारा
February 16, 2012

प्रिय अनिल जी, प्रस्तुतीकरण बहुत अच्छा है, मेरी कुछ पंक्तियाँ आपके लिए है: किस काम जवानी है, जो ज़ुल्फों में ना उलझे, और हुस्न के फंदे में जो, जकड़ा ना गया हो। पानी से भी कमतर है, वो खून जिस्म का सेवा में देश की अगर, कतरा ना गया हो। जज़्बात, वफा, प्यार में, रोयेंगे कहाँ तक रोने के लिए अब कोई, दुखड़ा तो नया हो। सोने को खरा कहने का, मतलब नहीं तब तक जब तक कि वो पत्थर पे, रगड़ा ना गया हो हम किसको कहें ‘जानी’, बेईमान या शरीफ वो है ईमानदार जो, पकड़ा ना गया हो

    अलीन के द्वारा
    February 16, 2012

    मनोज जी, सादर नमस्कार! आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया का आभार.

dineshaastik के द्वारा
February 16, 2012

अनिल जी नमस्कार। काश यह सिर्फ कहानी हो. यदि सच्ची है तो निश्चित ही दुखद है। कहानी का दुखद अंत अत्यंत ही कष्टप्रद है। मित्र मेरा तो मानना है प्यार ही सबकुछ नहीं जिन्दगी के लिये। इससे भी जरूरी बहुत से काम हैं। सोच को सकारात्मक रखते हुये आगे बढ़िये। जो  बीत  गया  सो  बीत  गया, जो  बात  गई  सो  बात  गई। फिर हम क्यों उस पर सोच करें, जिससे हमको कोई लाभ नहीं।। जो  न हीं हा थ में अपने है, उस पर हम क्यों अफसोस करें। मेरा   तो तजुर्बा  कहता  है, यह  बुद्धमा नी की  बात  नहीं।। http://dineshaastik.jagranjunction.com/author/dineshaastik/ नेता- कुत्ता और वेश्या (भाग-2)

    अलीन के द्वारा
    February 16, 2012

    दिनेश जी, सादर नमस्कार! आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया का आभार.

sinsera के द्वारा
February 16, 2012

अनिल जी नमस्कार, बहुत ही शॉर्ट में आप से एक बात कहना चाहती हूँ.. यदि यह कहानी सच्ची है और उस लड़की की शादी नहीं हुई है तो आप तुरंत आर्य समाज मंदिर में शादी कर लीजिये,कुछ नहीं होगा, आप के परेंट्स तैयार हैं तो डरने की कोई बात नहीं है..प्यार को इस हद तक ले जा कर छोड़ना पाप होता है..आज नहीं तो कल आप दोनों को अगर कही और शादी करनी पड़ गयी तो फिर इस पाप से बचने का कोई रास्ता न होगा…

    अलीन के द्वारा
    February 16, 2012

    सिंसेरा जी, सादर नमस्कार! आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया का आभार.

ANAND PRAVIN के द्वारा
February 16, 2012

प्रिय मित्र,अनिल मैंने तुम्हारी साड़ी बातें पढ़ी पढ़ कर दुख हुआ किन्तु एक दोस्त होने के नाते एक कडवी बात कहना चाहूँगा हो सकता है की मैं गलत होऊं अपनी जगह पर तो सिर्फ यही अनुरोध रहेंगा की मुझे क्षमा कर देना………. हम इन्शान है, और हमारे अन्दर वेदना संवेदना सभी कूट – कूट कर भरी हुई है, कितु जीवन वो नहीं जो हमें दिखता है आपकी प्रेम कहानी अच्छी है आप एक जबरदस्त लेखक होने की पूरी काबिलियत रखते है और इसी का परिचय देते हुए आपने अपनी बातों को पुरे आत्मविश्वास के साथ रखा है क्यूंकि अपने बाड़े में कहना कोई छोटी बात नहीं होती आप परम्पराओं की बात कर रहें है और इसी के आधार पर आप अपने माता – पीता तथा “अनजानी”जी के माता – पीता को कोस रहें है पर ये कितना उचित है ये समझदारी आपके लेख में मुझे नहीं दिखी आप बहुत प्यार कर सकतें है किसी से कितु ये मेरा दावा है की माता – पीता से ज्यादा नहीं कर सकतें एक छोटी सी बात रखना चाहूँगा जब अपनों की बात हो रही है तो मेरी उम्र २५ वर्ष है और जब में १८ का था तब से लेकर २१ तक मुझे लगता था की मेरे पीता मुझको अनायाश ही डांटते है बहुत सी बातों पर ज्यादा जिक्र नहीं करूंगा और मैं सोचता था की सायद मेरी किस्मत ही खराब है जो मुझे ऐसे पिता मिले जो मुझे बिना कारण डांटते रहते है, फिर धीरे – धीरे मेरी अपने पिता से अनबन होनी शुरू हो गयी ये सिलसिला 20 वर्ष तक चलता रहा फिर एक दिन मुझे मालुम हुआ की पापा को कैंसर है १० महीने मैं पापा के साथ मुंबई में भायखला अस्पताल में रहा था और दिन प्रतिदिन उनको मौत के करीब जाते देखा था इतने दिन करीब से साथ रहने के बाद मुझे समझ में आया की माँ – बाप का प्यार क्या होता है आखिर मेरे पापा गुजर गएँ उस वक़्त मेरी उम्र २१ थी अब कोई नहीं डांटता है किन्तु अन्दर से एक आह रहती है की कोई डांटे अधिकार समझ कर ये बाते कहने का ये अर्थ नहीं की मैं सेंटी हूँ कहने का अर्थ सिर्फ इतना है की जीवन का असली प्यार यही है जब तक है वो ही सत्य है वो ही ज्यां है आप उस बात से इनकार कर सकतें है किन्तु इसे झुटला नहीं सकते अब आता हूँ आप पर दो बातें है पहली ऐसा मेरा सोच है की जब आपको प्यार हुआ और आपने शादी तक की बात कर ली तो ये अधिकार किसने दिया आपको यदि आप बिना माँ बाप से पूछे प्यार कर सकतें है तो शादी भी कर सकतें थे दुसरी इस दुनिया में कौन सच्चा है और कौन झूठा ये भगवान् छोड़ कर कोई नहीं जानता एक लड़की के लिए आसान नहीं होता बहार निकल के प्यार करना और उसने ऐसा किया परिवार वालों ने उसका विरोध किया आप इतने यकीं से कैसे कह सकतें है की सिर्फ जाती ही वजह थी लड़की वालों के ना कहने की सच्चाई यह है की एक लड़के का बाप आगे बढ़ कर तोडा हिम्मत कर सकता है किन्तु एक लड़की का बाप डरा हुआ होता है वो आपपर शायद यकीं ना कर पाया हो, हर घर के कुछ उसूल होतें है और कुछ मरियादायें भी होती है जिसे नहीं लान्ग्नी चाहिए एक लड़की को प्यार करने का अधिकार नहीं है जब तक उसके परिवार वाले ना चाहें और यदि फिर भी वो प्यार करती है तो अंजाम से ना डरे क्यूंकि सब का दिल बड़ा नहीं होता की वो लड़के को स्वीकार कर ले …………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………… कहने के लिए बहुत कुछ था किन्तु अब नहीं बोलूंगा कहीं ये भी एक लेख ना बन जाए ………………………..बस इतना कहूंगा की “ये माना की, जिन्दगी में प्यार की कशिश जरुरी है, पर क्या प्यार ही हुम्हारा अंजाम बनेगा” “आये हो जग में तो कोई बात तो लाओ, इस देश को ही प्यार मान हक़ से मिटे जाओ” दोनों दो लाइन है साथ में ना लें और मेरी बातों को अन्यथा ना लें मैं बस यूँही बहता चला जाता हूँ, और एक बात कहना चाहूँगा अपने बाड़े में की सब बात तो ठीक है पर “I HATE LOVE STORY” ——————————लिखते रहिये

    अलीन के द्वारा
    February 16, 2012

    प्रिय मित्र, सादर नमस्कार! यह सुनकर मेरा दुःख और बढ़ गया कि मेरा दोस्त छोटी सी उम्र में पिता के प्यार से महरूम हो गया. तुम्हारी प्रतिक्रिया का आभार.

Rajkamal Sharma के द्वारा
February 15, 2012

अनिल जी अब क्या कहूँ इसके सिवाय की आप अपनी यह कारुणिक कहानी को दैनिक भास्कर की मधुरिमा में प्रकाशित करवा दीजिए …… इसके बाद जो भी होगा सब अच्छा ही होना चाहिए खुदा के करम से …. भगवन आप की प्रेम से सम्बन्धित समस्याओं का प्राथमिकता से युद्ध स्तर पर निदान करे …. रब्ब राखा

    अलीन के द्वारा
    February 16, 2012

    आदरणीय राजकमल जी,सादर नमस्कार! आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया का आभार.

shashibhushan1959 के द्वारा
February 15, 2012

मान्यवर अलीन जी, सादर ! आपने अपने जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना का वर्णन किया है, जिसपर दुःख प्रकट करना ही शिष्ट आचार कहा जाएगा ! सो मैं भी इस शिष्टाचार का पालन कर रहा हूँ. परन्तु जीवन में अनेक ऐसी परिस्थितियाँ आती हैं, जब आपको अपना पक्ष सर्वाधिक प्रिय लगेगा, बाकी सम्पूर्ण जगत आपको दुश्मन की भांति नज़र आयेगा. और ऐसी भी परिस्थितियाँ आयेंगी जब आपको लगेगा कि उस समय ऐसा नहीं हुआ तो ठीक ही हुआ. जीवन में बहुत से प्रश्नों का जवाब तत्काल नहीं मिल पाता है, उसके लिए इन्तेजार करना पड़ता है. लेकिन जब आपको अपने जीवन साथी के लिए अपने माता-पिता पर विश्वास नहीं था, तो फिर व्यर्थ के पारिवारिक लगाव या उनकी झूठी इज्जत के बारे में आप क्यों सोचते रहे. आप अपने पैरों पर खड़े हो चुके थे, वह बच्ची आप पर पूर्ण विश्वास करती थी, तो आपने कोई कडा रुख क्यों नहीं अपनाया ! अपने अभिभावक को, इस समाज को, समाज कि परम्पराओं को आप क्यों कोसते रहे, और उन्ही परम्पराओं के पीछे अपना चेहरा भी छुपाये रहे. आप एक बार पुनः विचार करें. हमारे समाज में बहुत सी अनर्गल परम्पराएं और मान्यताएं हैं जिन्हें छोड़ना उचित कहा जाएगा ! धीरे-धीरे वे समाप्त भी हो रही हैं. आपकी दुर्बलता ने आपके सपनों को तोड़ा और आप देखते रहे ! इश्वर से मेरी सच्चे दिल से प्रार्थना है कि कोई चमत्कार हो, और आपका प्यार आपको मिल जाए !

    अलीन के द्वारा
    February 16, 2012

    आदरणीय पिता श्री, सादर चरणस्पर्श! आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया का आभार

nishamittal के द्वारा
February 15, 2012

आपकी दुखद प्रेम गाथा को पढ़कर बहुत दुःख हुआ,साथ ही समाज की बेरहमी देख कर बहुत पीड़ा हुई.ईश्वर से आपके शुभ मिलन की कामना करती हूँ.

    अलीन के द्वारा
    February 16, 2012

    सादर प्रणाम! आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया का आभार

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
February 15, 2012

आदरणीय अलीन जी, सादर अभिवादन. ऐसे कई ताजे प्रकरण हैं मेरे सामने , मैं उनकी मदद नहीं कर पाया , लड़की ने मजबूर हो कर मना कर दिया. जाती पांति पूंछे न कोई हरी का भजे सो हरि का होई . भाव , प्रस्तुतीकरण सराहनीय.

    अलीन के द्वारा
    February 16, 2012

    सादर प्रणाम! आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया का आभार.


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