साधना के पथ पर

अद्य की स्याही

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यह हमारा समाज है, कोई गीता और कुरान नहीं

Posted On: 22 Feb, 2012 न्यूज़ बर्थ में

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जीने की चाह है तो मरने की परवाह न कर ,
यह हमारा समाज है, कोई गीता और कुरान नहीं.
याद रहें हर पग पे उंगली उठेगी,
हर पग पे बाधाएँ आएँगी,
पर विचलित मत होना ऐ पथिक;
यह हमारा समाज है, कोई गीता और कुरान नहीं.

कहता है कुछ, करता है कुछ,
खुली आँख, बंद दिमाग,
यही इसकी निशानी है ,
फिर तुझको क्या हैरानी है;
यह हमारा समाज है, कोई गीता और कुरान नहीं

स्मरण रहें यदि तुम हो सही ,
इसकी तू परवाह न कर ,
गर आत्मा साफ है तेरी,
चारों धाम की चाह न कर;
तू सही, तेरी मंजिल सही,
दर्द भरी आह! न कर;
यह हमारा समाज है, कोई गीता और कुरान नहीं.

याद रहे जिस सीता को,
माता कहकर बुलाता है,
उसपे कलंक लगाया,
यहाँ यह स्थान एक माता का,
फिर तेरा मन क्यों घबराया;
यह हमारा समाज है, कोई गीता और कुरान नहीं.

मंजिल उसी को मिली यहाँ,
जो उसूलों की खातिर,
जान की बाजी लगाया;
मरने से तू भयभीत न हो,
तू एक सच्चा पथिक,
जो अपना मार्ग स्वयं बनाया,
अब मंजिल करीब है तेरी,
फिर क्यों शीश झुकाया ;
यह हमारा समाज है, कोई गीता और कुरान नहीं.


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42 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jantakiawaz के द्वारा
March 5, 2012

प्रिय अलीन, आदाब , आज पूरी कविता पढ़ी,, ऐसा प्रतीत होता है कि कोई मुझे नये संसार क़ी सैर करा रहा हो! प्रिय इसी तरह आप आगे बढ़ते रहें, badhayi हो!

    March 5, 2012

    सादर नमस्कार! मंच पर स्वागत है, आपका.आप जैसे लोगों के प्यार और आशीर्वाद से मेरे अभियान को बल मिलता है…….हार्दिक आभार!

Singh Mahavir के द्वारा
February 27, 2012

अनिल जी नमस्कार, बहुत सुंदर कविता

ANAND PRAVIN के द्वारा
February 26, 2012

मित्र अपना मेल देख लेना तुम्हे कुछ मैसेज लिखा है वहाँ

mparveen के द्वारा
February 26, 2012

मंजिल उसी को मिली यहाँ, जो उसूलों की खातिर, जान की बाजी लगाया; मरने से तू भयभीत न हो, तू एक सच्चा पथिक, जो अपना मार्ग स्वयं बनाया, अब मंजिल करीब है तेरी, फिर क्यों शीश झुकाया ; यह हमारा समाज है, कोई गीता और कुरान नहीं. अनिल जी नमस्कार, बहुत सुंदर कविता समाज के नियमो और कानूनों को व्यक्त करती ……..

alkargupta1 के द्वारा
February 26, 2012

अनिल जी , चलिए आपकी कमेन्ट की समस्या का समाधान समाप्त हुआ तो मेरी प्रतिक्रिया भी पोस्ट हो ही जाएगी…….बिलकुल सही राहों के कंटक विदीर्ण करने में तनिक भी विचलित नहीं होना है तभी मंजिल मिल पाएगी बहुत अच्छी भावाभिव्यक्ति!

sadhana thakur के द्वारा
February 25, 2012

अलीन जी ,अच्छे भाव ,अच्छी रचना ,है सच को पाना भी पढ़े ..बधाई हो ………..

Santosh Kumar के द्वारा
February 25, 2012

अनिल जी ,.सादर नमस्कार आपकी इस बेहद प्रेरक रचना से बहुत प्रभावित हुआ हूँ ,.पहले भी कमेन्ट का प्रयास किया था लेकिन तब बंद था ,..हार्दिक साधुवाद आपका

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
February 25, 2012

अनिल जी,आपकी कविता बहुत अच्छी लगी.पर इससे सम्बंधित चित्र मेल नहीं खाते. स्मरण रहें यदि तुम हो सही , इसकी तू परवाह न कर , गर आत्मा साफ है तेरी, चारों धाम की चाह न कर; तू सही, तेरी मंजिल सही, दर्द भरी आह! न कर; बहुत सुन्दर पंक्तियाँ.

    February 25, 2012

    सादर प्रणाम! आपकी बात गौर करने योग्य है….अभी कुछ करता हूँ. आपके कीमती सुझाव का हमेशा स्वागत. यूँही अपना स्नेह बनायें रहिये….सादर आभार !

    shashibhushan1959 के द्वारा
    February 25, 2012

    आदरणीय झा जी ने आपको बहुत उचित निर्देशन दिया ! झा जी, आपको बहुत बहुत धन्यवाद ! इस तरह के सुझाव आने चाहियें ! मान्यवर अनिल जी, आपने आदरणीय झा जी के सुझावों पर ध्यान दिया, सुखद लगा ! वरिष्ठ जनों के सुझावों पर सदैव ध्यान देना चाहिए ! निखार आयेगा ! अब वही रचना गंभीर हो गई !

    February 26, 2012

    पिता श्री, सादर चरण स्पर्श! आप जहाँ मेरे दोस्त प्रवीन के साहित्यिक गुरु है, वही दूसरी तरफ आप मेरे साहित्यिक पिता है, अतः आप मेरे लिए हर दृष्टि से आदरणीय, अनुकरणीय और पूज्यनीय है. आपका कमेन्ट हमेशा ही मेरे लिए महत्वपूर्ण होता है. वो चाहें किसी भी रूप में हो. आपका मुझे डाटने और फटकारने का अधिकार है. मैं बुरा नहीं मानता. चूँकि आप मेरे पिता श्री है तो मुझे भी आप से रूठना और नाराज होने का अधिकार है. मुझे इस बात का एहसास है कि आप मेरे लिए सदैव अच्छा ही सोचेंगे. परन्तु इसके साथ ही मुझे इस बात का अभिमान है कि आप मेरे साहित्यिक पिता है,…बस सारे झगड़े की जड़ यही इगो प्रॉब्लम है जिसे मैं चाहकर भी ख़त्म नहीं कर सकता और न ही करना चाहूँगा……..आपका, अलीन

ANAND PRAVIN के द्वारा
February 24, 2012

मित्र, नमस्कार बहुत कोशिश करने के बाद आज मैं कुछ कमेन्ट कर पा रहा हूँ तुम्हारी कविता पर अन्यथा इससे पहले की साड़ी कोशिश सफल नही हो सकी थी टेक्निकल समस्याओं की वजह से तुम एक मूल भावनाओं वाले कवी हो जो अपनी शर्तों पर लिखता है ये निर्भीक शैली मुझे बहुत अच्छी लगी जो तुम्हे बहुत आगे ले जायेगी इस क्षेत्र में कविता के बारे में क्या कहूँ जो लिख दिया तुमने वो ही अपने आप में खुद को कह रहा है की व्यर्थ समाज की सीमाओं में हमें अपने आप को नहीं भूलना चाहिए ये हमारा समाज है, बिलकुल सही कोई गीता या कुरान नहीं किन्तु एक बात कहना चाहूँगा दोस्त की शायद तुम्हारे इस कविता के मूल भाओं को कम ही लोग समझ सकें इस पर अफसोश ना करना “हम इन्शान है, पर इंशानियत नहीं दिखतीं” इस पांति को पूरा करो …………………तुम्हारा मित्र

    February 24, 2012

    सादर नमस्कार, मित्र ! हम इन्शान है, पर इंशानियत नहीं दिखतीं, चाह है, पर कोई राह नहीं दिखती, तडपते हैं, सिसकते हैं, न जीते है न मरते हैं: यह दर्द है कुछ ऐसा ‘अलीन’ कोई आह नहीं दिखती. दिन-रात किये हम एक, अपना घर बनाने में, पर किसी को उसमे पनाह नहीं दिखती. “हम इन्शान है, पर इंशानियत नहीं दिखतीं

    February 24, 2012

    मित्र, मैं किसी पंक्तियों को पढ़कर बस दो-चार पंक्तियाँ ही तुरंत जोड़ सकता हूँ……इससे बेहतर नहीं, पर मैं चाहूँगा कि अभी जो भाव मैं इस पंक्ति को दिया हूँ, उस भाव को अपने शब्दों में लिखकर एक खुबसूरत कविता का निर्माण करों और हाँ एक बात और उसे असफल कोशिश नाम मत देना सुनने में अच्छा नहीं लगता……..तुम्हारा मित्र.

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    February 24, 2012

    दिल से निकली आवाज़ ही सच्ची होती है, मैं कोई कवी नहीं हूँ बस सोचता हूँ और लिखता हूँ सच्चाई कहूंगा की मुझे पन्तिया बढाना नहीं आता बस मन में क्या सुझा की तुम्हे एक लाइन दूँ बाकी तो तुमने उसका पूरा इंशाफ कर दिया वो शब्द अमर हो गए मैंने शशी सर को कहा है की जब तक कुछ अच्छा ना लिख लूँ कोई पांति नहीं बधौंगा उनके द्वारा दी हुई पांति पर काम कर रहां हूँ किन्तु “शब्द नहीं मिल रहें” कोशिश जरुर करूंगा इस पर भी किन्तु कोशिश कब दिखा सकूंगा ये तो मैं भी नहीं जानता एक और बात कहना चाहूँगा की आप अपनी एक अलग की शैली रखतें है कोई जरुरी नहीं की सभी समझें निचे आपका चातक जी से कुछ उदगार प्रतीत हुआ जो अच्छा नहीं है जो समझ सका वो भी ठीक जो ना समझे वो भी सही एक मित्र होने के नाते कह रहा हूँ

    February 24, 2012

    एक बात कहूँगा दोस्त, वो ये कि कवि बनने के लिए रचना करना और रचना करने के लिए कवि बनना. दोनों में बहुत फर्क है. मैं कभी नहीं चाहूँगा कि मेरा मित्र, कवि बनने के लिए रचना करे. तुम अपनी रचनाओं में वो लों जो तुम चाहते न कि कोई और. हाँ यदि किसी से तुम एक सर्वोत्तम रचना लिखने कि कला सिख रहें हो, यह बुरा नहीं है. पर उस रचना में शब्द, भाव और अभिव्यक्ति. तुम खुद को पहचानों, तुम प्रवीन हो और तुम्हे इसी रूप में रहना. रहा पिता श्री का सवाल तो मैं भी उनसे सीखता हूँ और साथ ही कृतज्ञ भी हूँ……..पर इस बात को उनको एहसास नहीं होने देता हूँ. साथ ही वो भी जानते है कि अलीन को क्या सिखा रहें हैं पर वो भी इस बात का मुझ पर एहसास नहीं होने देते है…… यार मुझे चातक जी से कोई शिकायत नहीं, तुम भी मेरी बात को व्यक्तिगत ले रहें हो. सब कुछ सामान्य है. मैं बस उनके सामने अपनी बात रखा हूँ और कुछ नहीं… हाँ एक बात यार जो पंक्ति तू दिया है, उसपे तुम्हे रचना करनी है तो बस करनी हैं क्योंकि वो तुम्हारे मन की उपज है. मैं बस यही कहना चाह रहा हूँ किसी के अच्छा लगने और कम्मेंट पाने के लिए मत लिख, जो तू सोचता है वो लिख………बाकि यह तुम्हारा दोस्त हमेशा तेरे साथ है.

yogi sarswat के द्वारा
February 24, 2012

जीवन को जीने की लालसा और उत्साह जगाती रचना ! आपको काव्य में महारथ हासिल होती जा रही है अलीन जी ! बहुत बढ़िया !

shashibhushan1959 के द्वारा
February 24, 2012

आदरणीय अनिल जी, सादर ! मेरी अल्प बुद्धि में आपकी यह रचना समा नहीं पा रही है, न इसके साथ सजाये गए चित्र ! आप सम्पूर्ण समाज के प्रति आक्रोशित हैं, पर यह आक्रोश निरर्थक है.

nishamittal के द्वारा
February 24, 2012

आपकी काव्य प्रतिभा सराहनीय है ,अलीन जी

sinsera के द्वारा
February 23, 2012

अनिल जी नमस्कार, आपमें उत्कृष्ट काव्य प्रतिभा है ये मानती हूँ, काफी आग भी है,लेकिन हर वक़्त आक्रोशित होना अच्छी बात नहीं. गीता और कुरान अपने आप में सम्पूर्ण हैं,इन में एक नुक्ते की भी कमी नहीं है. कमी इन्सान में है जो इन के सन्देश को ठीक से ग्रहण नहीं कर पाता है.

    February 24, 2012

    सादर नमस्कार! उत्कृष्ट काव्य प्रतिभा की बात छोडिये, आप पहले यह बताइयें आपकी तबियत कैसी है और आपने दवा सही समय पर लिया….अच्छी बात. अब चलिए कुछ काम की बात हो जाये. गीता और कुरान अपने आप में सम्पूर्ण हैं,इन में एक नुक्ते की भी कमी नहीं है. कमी इन्सान में है जो इन के सन्देश को ठीक से ग्रहण नहीं कर पाता है….मैं आपकी इस बात से कब इंकार किया हूँ. शुरू से लेकर आज तक मैं भी तो यहीं चिला-चिलाकर कह रहा हूँ. परन्तु इस कविता में जो कुछ भी है, बिना चिंतन-मनन किये नहीं समझ में आने वाली . यह सत्य है कि इस कविता को लिखने में मुझे १० मिनट से भी कम लगे थे क्योंकि, जो समाज में देखा उसे आपके सामने रख दिया. परन्तु इस कविता को शीर्षक देने में मुझे पुरे दो साल लगे. जो कि चिंतन और मनन पर आधारित है. यह हमारा समाज है, कोई गीता और कुरान नहीं. यह केवल एक वाक्य नहीं है अपितु एक दर्शन है…..जिसके जितने चाहें उतने अर्थ निकले जा सकते है. इस पर मैं एक पूरा ग्रन्थ लिख दू पर एक ग्रन्थ लिखने से कहीं बेहतर मैं इस वाक्य को समझा. यह नहीं कह रहा हूँ कि मैं बहुत ज्ञानी हूँ. मैं बस इतना कहना चाह रहा हूँ कि मैं जो कुछ लिखूंगा, वह समाज का दिया है. यहाँ मेरा कुछ नहीं. परन्तु जो मैं वापस करूँगा वह अमानत इन पवित्र और अनुकरणीय गीता और कुरान के उपदेशों से होकर गुजरेंगी, जिसका इस्तमाल हम लोग अपना स्वार्थ सिद्ध करने में करते हैं. जैसा कि आपने भी कहा कमी इन्सान में है जो इनके सन्देश को ठीक से ग्रहण नहीं कर पाता है. अब एक बार फिर उपरोक्त कविता को पढ़िए और प्रतिक्रिया दीजिये………..आपकी स्वतंत्र प्रतिक्रिया के इंतजार में…

Aakash Tiwaari के द्वारा
February 23, 2012

अनिल जी, आज मैंने आपके सच्ची कहानी पे आधारित आपकी सच्चे जीवन पर एक व्यक्तिगत प्रश्न और बिन माँगा सलाह दिया था..मैंने वही पूंछा और लिखा था जो मै अपने प्यार में चाहता था..मैंने जिससे प्यार किया और उसे ही नहीं पाया तो व्यर्थ है जीवन..झूठा है प्यार दिखावा और आडम्बर है सब..अगर आपके जीवित रहते हुए आपका प्यार किसी और का हो जाए तो कैसा प्यार है आपका..आपके हिसाब से मुझे अपनी राखी के इस दुनिया में न रहने के बाद शादी कर लेना चाहिए..अनिल जी आप अगर मेरे उस कमेन्ट को डिलीट न करते और जवाब देते तो मै मानता की आपमें सच्चा प्यार करने का दम है..आपने तो अपनी पहचान छुपाकर अपनी कहानी को ब्लॉग पर डाला…जो इंसान खुलकर सामने नहीं आ सकता क्या जरूरी है की वो सच्चा है..मैंने प्यार किया था सीना थोक क्र कहता हूँ दुनिया के सामने कहता हूँ हां मै आकाश तिवारी राखी से सच्चा प्यार करता था..और उब जब वो इस दुनिया में नहीं है तो किसी और को नहीं अपनाऊंगा,..रही समाज से लड़ने की बात तो वो काम मेरा है क्योंकि मेरा प्यार तो इस दुनिया से चला गया..अगर आपने सच्चा प्यार किया है तो आपकी प्राथमिकता समाज से लड़ने से ज्यादा अपने प्यार को वापस लाना होना चाहिए था..बाद में समाज सुधार….मेरा तो स्पस्ट मानना है की जो सच्चा प्यार करते है वो अपने प्यार को आखिरी सांस तक अपना बनाने का प्रयास करते है… मुझे किसी के कमेन्ट का लालच कदापि नहीं मै सत्य हु सत्य के साथ रहूँगा..आपने आज जो किया उससे मुझे बहुत ठेस पहुंची..एक सच्चे प्यार करने वाले को आपका काम कभी शोभा नहीं देगा..आप अगर थोडा भी सच होंगे तो इस कमेन्ट को देलेट नहीं करेंगे बल्कि स्पस्ट जवाब देंगे.. आकाश तिवारी

    February 24, 2012

    आकाश जी, सादर नमसकार! आपकी भावनाओं की क़द्र करता हूँ और और आपके जज्बातों की क़द्र भी. परन्तु सबसे बड़ी बात की मैं राखी जी के प्यार और बलिदान की इज्जत करता हूँ. मैंने तो कभी नहीं कहा कि किसी और से शादी कर लेना चाहिए. याद है जब आप आखिरी बार राखी जी से मिलाने गए थे और लोग आपको मिलने नहीं दिए फिर आप बेहोश हो गए फिर आपको अस्पताल में होश आया. भाई यह तुम्हारी खुशनशिबी है कि तुम होश में आ गए और यह मेरी बद्नाशिबी है कि आज भी मैं बेहोश हूँ. मैं आपका कोई भी कमेन्ट डिलेट नहीं किया हूँ, वो वैसे ही हैं. आप किसी से शादी नहीं करेंगे, यह आपके राखी जी के प्रति प्यार को दर्शाता है. परन्तु आपका प्यार सच्चा तब कहलायेगा जब आपके प्रयास से कोई दूसरी राखी फिर किसी आकाश के लिए आत्म हत्या नहीं करें और यह हमारी परम्पराएँ फिर किसी आकाश से उसकी राखी को छीन न पायें. मैं जनता हूँ कि वो आज भी आपके साथ है. परन्तु उस घडी की, कल्पना करिए जब आपको आखिरी ख़त लिखते समय उसके आँखों से आसुओं का सैलाब उमड़ रहा था. वो इस बात का गवाह था कि उसे अपने जीवन से कितना प्यार था और कितनी उम्मीदे परन्तु हमारें झूठे शान-प्रतिष्ठा ने उसे मृत्यु का ज़हर पिने को मजबूर कर दिया. आखिर उस पर क्या गुज़री होगी जो जीवन की चाह में अपना जीवन गवां रहा हो. इस हकीकत को सिर्फ उसने ही महसूस किया होगा. प्यार करने वाले कभी किसी दुसरे प्यार करने वाले पर उंगली नहीं उठाते भाई. आपको लगता है कि मैं जिंदगी को हस कर जिया रहा हूँ. वो तो आप लोगों का साथ पाकर खुद को भुलाया हुआ हूँ परन्तु अन्जानी को नहीं. हकीकत तो यह है कि अपनी मौत के इंतजार में एक-एक दिन मर रहा हूँ. मुझे इस जीवन से मुक्ति चाहिए. जी भर गया है….बस अब बहुत जी लिया. आपको सचमुच मेरी चिंता है तो PLEASE मेरे लिए न सही अपनी राखी के लिए मुझे इस जीवन से आजाद कर दो. यह मत सोचना कि मेरे मरने के बाद मेरा प्रयास विफल जायेगा क्योंकि मैं एक विचार हूँ जो कभी मर नहीं सकता…..मैं हमेशा जिन्दा रहूँगा आकाश और प्रवीन के रूप में और फिर आऊंगा एक नए रूप में……… एक बार फिर कहूँगा कि मैं आपका कोई भी कमेन्ट डिलेट नहीं किया हूँ…………क्या सच हैं और क्या झूठ है….मैं इस स्थिति में नहीं हूँ कि इसका फर्क कर सकू और अंत में बस यही कहूँगा कि आकाश तुम्हारा प्यार सच्चा है और हमेशा रहेगा.

    Aakash Tiwaari के द्वारा
    February 24, 2012

    तो आप उन्हें अपना क्यों नहीं लेते एक कदम बढाइये तो सही देखिएगा प्यार में सारे रास्ते आसान हो जायेंगे/….

    February 24, 2012

    आकाश आप एक कदम की बात कर रहे हो , मेरा तो जो भी कदम है उसकी राह में है. मुझे जीतनी रुढ़िवादी परम्पराओं और झूठी मान-मर्यादा से नफ़रत है उतना ही इसको बढ़ावा देने वालों से मुहब्बत है क्योंकि मुझे इस बात का एहसास है कि एक जीवन कितना बहुमूल्य है. मैं कभी भी व्यक्ति विशेष या समूह विशेष को दोषी नहीं हूँ. मेरी लड़ाई सिर्फ सामाजिक कुरीतियों से है. लेकिन फिर यहाँ लोग मेरे इस आवाज को सब्जेक्टिव और मुझे दोषी ठहराया जा रहा है. इसका एक मात्र कारण है. जिस चीज को मैं ख़त्म करना चाह रहा हूँ. वो उस चीज को जिन्दा रखना चाहते हैं……..कहने को अभी बहुत है पर फिर कभी.

vinitashukla के द्वारा
February 23, 2012

अलीन जी पहली बार आपके ब्लॉग पर आ रही हूँ. आपकी काव्य प्रतिभा देखकर सुखद आश्चर्य हुआ. बहुत ही शुभ और प्रेरक विचारों को समाहित किये हुए है आपकी यह रचना. बधाई और साधुवाद.

    February 24, 2012

    सादर सुस्वागतम! आपकी पहली प्रतिक्रिया पाकर खुद को गौरान्वित महशुस कर रहा हूँ…

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
February 23, 2012

आदरणीय अनिल जी, सादर अभिवादन. कल से कई बार प्रयास कर चुका हूँ. नेट साथ नहीं दे रहा है. याद रहे जिस सीता को, माता कहकर बुलाता है, उसपे कलंक लगाया, यहाँ यह स्थान एक माता का, फिर तेरा मन क्यों घबराया; समाज में परिवर्तन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है .

    February 24, 2012

    सादर प्रणाम! जी सर, मुझे इस सम्बन्ध में कई लोगों का E-MAIL प्राप्त हुआ. उसके बाद इसका समाधान निकलतें हुए मैं अपना कमेन्ट पोस्ट किया ताकि सबको खबर हो जाएँ कि समस्या का समाधान हो गया…..आप मेरी बात को काफी हद तक समझ पायें ….हार्दिक आभार!

chaatak के द्वारा
February 23, 2012

स्नेही अलीन जी, आपकी इस पोस्ट में जोड़े गए चित्र और लिखी गई पंक्तियाँ आपके मन के दर्द को और आपकी उलझन को बखूबी दर्शा रही हैं लेकिन मूल पंक्ति ‘यह हमारा समाज है, कोई गीता और कुरान नहीं.’ के साथ आप न्याय नहीं कर पाए गीता और कुरआन से अन्य पंक्तियों का विरोधाभास नहीं बल्कि साम्य है जबकि मूल पंक्ति विरोध दर्शा रही है| आपकी अपनी कहानी भी मैंने कई बार पढ़ी लेकिन उस पर कोई प्रतिक्रिया इसलिए नहीं दी क्योंकि हर जिंदगी अपने आप में अद्भुत होती है और उसका अपना दर्शन होता है व्यक्तिगत जीवन पर मैं वैसे भी कोई टीका-टिप्पड़ी और राय देना पसंद नहीं करता | मेरा अपना मानना है – ‘दर्द अपने हैं इन्हें दिल में छुपा कर रखिये, इन्हें गैरों की नज़र से भी बचा कर रखिये.’ आपके प्रयास बहुत ही अच्छे हैं थोडा सा objective होकर लिखें तो शायद इससे भी बेहतर कर सकते हैं\ आपका चातक

    February 24, 2012

    सादर नमदकर! आज से 7 साल पहले जोधपुर के एक हिंदी प्रोफ़ेसर ने मेरी जिस रचना को पढ़ने के बाद अपनी सारी कृतिया मेरे सम्मुख बिखेर दी उस पर आपका यह कमेन्ट मुझे स्तब्ध करता है… और जो आपने सब्जेक्टिव और आब्जेक्टिव का सवाल उठाया है, वो तो सचमुच ही सोचनीय और विचारणीय है…..मुझे यह नहीं समझ में आ रहा है कि आप मेरी इस रचना को मेरे प्रेम प्रसंग से क्यों जोड़ रहें और भी इस जहाँ में समस्याएं हैं इसके सिवा. मेरी बातों को अन्यथा मत लीजियेगा. कृपया अपने दिमाग से मेरे प्रेम प्रसंग को निकालकर, इस रचना पर गौर करियेगा बल्कि गौर नहीं चिंतन और मनन करियेगा फिर आपको शिकायत नहीं रहेंगी…….आपकी स्वतंत्र प्रतिक्रियाओं का हमेशा स्वागत.

February 23, 2012

“ Meri Sada is not only a blog but truth of my life and fight against social systems like honour killing, caste, dowry and sacrificing animal etc. Today I have my existence it means whenever you are but don’t have any type of misunderstandings to destroy me because only I can be produced not destroy. You will have to face me every age, every time and every moment with a new face and new sound. You will have to live with me. It may be together or against. So have your priceless comments in favour of me or against me…” – Anil Kumar ‘Aline’


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