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अख़बार की सुर्ख़ियों से

Posted On: 27 Feb, 2012 Others,न्यूज़ बर्थ में

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एक खास खबर (चित्र दैनिक जागरण साभार)

एक खास खबरअख़बार की सुर्ख़ियों से आज एक खास खबर लाया हूँ. खबर है बलिया जिले के गाँव-भीटा, ब्लाक-सीयर की. जहाँ एक कुत्ता और एक बिल्ली की दोस्ती चर्चा का केंद्र बनी हुई हैं. दोनों को एक साथ जीवन यापन करते हुए पाया गया है. एक साथ खाने, पीने, सोने और रहने से लेकर एक-दुसरे का ख्याल रखने तक उनके रोज के दिनचार्याँ में शुमार हैं. उनकी हरेक गतिविधि से आपसी समझदारी, भाईचारा और निश्वार्थ प्रेम झलकता है. जो की विशेष मानवीय गुण है. जिससे हम इन्सान सारे जीवों में श्रेष्ठ माने जाते हैं. पर कहीं न कही हम इंसानों में इन गुणों का लोप होता जा रहा है. यदि हम अपनी आँखें खोलना चाहे तो हम पाएंगे कि जो धर्म, नियम और कानून मानव की भलाई और शान्ति के लिए बने हैं. आज उसी का सहारा लेकर समाज में नफ़रत और द्वेष का बीज बोया जा रहा हैं. कहीं दूर बैठें इनके ठेकेदार जन-मानस में अशांति और हिंसा रूपी फसल तैयार कर रहे हैं. जो हम इंसानों के साथ-साथ पूरी दुनिया को निगलने के लिए बस पक कर तैयार होने ही वाली है. आज हम भले ही घरों में बैठकर पूरी दुनिया की खबर रखते हो परन्तु बगल में क्या हो रहा है, इसकी कोई खबर नहीं. भले ही पूरी दुनिया सिमट कर एक मुट्ठी में आ गयी हो पर जो मुट्ठी में होना चाहिए वो धीरे-धीरे गुजरते हुए वक़्त के साथ फिसलता जा रहा है. भले ही हम भौगोलिक रूप से एक दुसरे के समीप होते जा रहे हो परन्तु मानसिक रूप से एक दुसरे से दूर होते जा रहे हैं. ऐसे माहौल में यदि कुत्ते और बिल्ली का प्रेम प्रकट होकर सामने आये तो निश्चय ही आश्चर्य का विषय है. हम इंसानों के पास वेद, कुरान और बाइबिल जैसे धार्मिक ग्रन्थ होने के बाद भी हम कुछ नहीं सीख पाये. ईश्वर, अल्लाह और गाड की समझ होने के बावजूद भी कुछ नहीं समझ पाये. हम मंदिर, मस्जिद और गिरजाघर जाकर भी कुछ नहीं पाये. इसका मतलब ये नहीं कि ये सारी चीजें  व्यर्थ है. पर इसका मतलब ये जरुर है कि हम उपासना, भक्ति और चिंतन में भी अपना स्वार्थ देख रहे हैं. यदि सत्कर्म मार्ग के अनुसरण की बात होती है तो हम बहुत ही आसानी से कह देते है कि ये किताबी बातें है. यदि ऐसा है तो निश्चय ही ये ग्रन्थ व्यर्थ है. यदि ये किताबी बातें हैं तो हमे किसी मंदिर-मस्जिद की  चौखट नहीं चूमना चाहिए. यदि ये किताबी बाते है तो ईश्वर-अल्लाह के सम्मुख शीश नहीं झुकाना चाहिए. यदि हमें जानवर ही बनना है तो फिर इंसान बने रहने का ढोंग क्यों? कम से कम वो परमपिता परमेश्वर हमारे कर्मों से शर्मिंदा तो नहीं होगा. कम से कम ये नासमझ  जानवर हमपे हँसेंगे तो नहीं.

और सबसे बड़ी बात यदि उपरोक्त गुण किताबी बातें हैं तो इसकी समझ इन बेजुबान औए अनपढ़ जानवरों को कैसे?….

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32 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

shashibhushan1959 के द्वारा
March 4, 2012

मान्यवर अनिल जी, सादर ! “A Real Love Story !” बहुत सुन्दर !

March 2, 2012

आलीन जी नमस्कार ! अच्छी खबर है आखिर हम इन्सानों के साथ रहते रहते कुछ तो सीखा इन जानवरों ने…लेकिन एक हम है सीखने को कौन कहे…जो कुछ इंसानियत बची है उसे भी भूल जा रहे हैं…..अच्छा लेख!!

    March 4, 2012

    सादर प्रणाम! किसी शायर ने क्या खूब कहा है….. इस बात का रोना है, इस बात पर रोतें है, कश्ती के मुहाफिज कश्ती को डुबोते है…….हार्दिक आभार.

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
March 1, 2012

भले ही हम भौगोलिक रूप से एक दुसरे के समीप होते जा रहे हो परन्तु मानसिक रूप से एक दुसरे से दूर होते जा रहे हैं. ऐसे माहौल में यदि कुत्ते और बिल्ली का प्रेम प्रकट होकर सामने आये तो निश्चय ही आश्चर्य का विषय है. हम इंसानों के पास वेद, कुरान और बाइबिल जैसे धार्मिक ग्रन्थ होने के बाद भी हम कुछ नहीं सीख पाये. .. अनिल जी इसी बात का तो रोना है …न जाने कब हम सुधरेंगे ..जब हम खुद को नहीं समझ पाते जीवन क्या है दुनिया में आये हैं तो क्यों ..क्या कर जाएँ ….क्या नहीं तो फिर सब बेकार ही है … सुन्दर लेख …सुन्दर छवि प्रेम और साथ निभाते दिखाते …. भ्रमर ५

    March 4, 2012

    सादर नमस्कार! आप मेरी बातों को समझ पायें …….हार्दिक धन्यवाद.

smtpushpapandey के द्वारा
March 1, 2012

सम्माननीय अनिल कुमार जी प्रतिक्रिया दिलवाने वाली बात मेरे बेटे के द्वारा कही गयी है इसको मेने समझाया की किसी के ब्लॉग का दुरूपयोग नहीं करते यह तो स्वेच्छा वाला कार्य है जबरदस्ती किसी से नहीं कहा जा सकता आपका कहना उचित है शर्मिंदगी की कोई बात नहीं व्यवधान के लिए शमा चाहती हूँ धन्यवाद

    March 1, 2012

    सादर प्रणाम! आप मेरी बातों को अन्यथा न ले, मैं भी आपके बेटे की तरह ही हूँ…..

tosi के द्वारा
March 1, 2012

बिलकुल सही कहा अनिल जी …. इंसान से ज्यादा कोई जंगली नहीं …अच्छा लेख बधाई लें

MAHIMA SHREE के द्वारा
March 1, 2012

भले ही पूरी दुनिया सिमट कर एक मुट्ठी में आ गयी हो पर जो मुट्ठी में होना चाहिए वो धीरे-धीरे गुजरते हुए वक़्त के साथ फिसलता जा रहा है. भले ही हम भौगोलिक रूप से एक दुसरे के समीप होते जा रहे हो परन्तु मानसिक रूप सेएक दुसरे से दूर होते जा रहे हैं……नमस्कार अलीन …..समसामयिक लेख के लिए बधाई……बहुत सही प्रश्नचिन्ह ……..

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    March 1, 2012

    अलीन जी ….पूर्व पोस्ट में आपके नाम के साथ “जी” छुट गया है …..क्षमा चाहूंगी…

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    March 1, 2012

    अलीन जी मुझे इक जानकारी चाहिए….क्या हम जब किसी को उसके ब्लॉग कमेन्ट पोस्ट करते है तो उसकी भी मेल INFORMATION आप सब को आती हा क्या ???

    March 1, 2012

    सादर अभिवादन! हाँ उसके लिए. जब आप सम्बंधित व्यक्ति के किसी पोस्ट को ओपन करेंगी तो पोस्टेड शीर्षक के निचे Follow My blog का ऑप्शन आता है जहाँ क्लिक करके आप अपना इ-मेल आइड सबमिट कर सकती हैं, उसके बाद वो व्यक्ति जब कभी भी नया पोस्ट करेगा तो उसकी जानकारी आपके इ-मेल आइड पर मिलता रहेगा.

minujha के द्वारा
February 29, 2012

अनिल जी प्रेरणादायी पोस्ट जाने इंसान कब इनसे कुछ सीखेगा

    February 29, 2012

    सादर नमस्कार! जिस दिन खुद के इंसान होने का एहसास होगा….शायद तब.

smtpushpapandey के द्वारा
February 29, 2012

आदरणीय अनिल कुमार जी , प्रतिक्रिया देने के लिए सादर आभार आप ऐसे ही कमेन्ट रुपी कृपा मुझ पर बनाये रखे आप को जितने लोग समर्थन देते है उनसे कहिये की श्रीमती पुष्पा पाण्डेय के ब्लॉग जनतंत्र की आवाज में उनकी रचनाओं पर आप लोग भी प्रतिक्रिया दे और मेरे बेटे अजय कुमार जी के ब्लॉग जन लोकपाल बिल में मेरे बेटे की रचनाये चुनाव में प्रासंगिक और ज्वलंत मुद्दे और संभावित मुख्यमंत्री अलग अलग राज्यों के सन्दर्भ में और चुनाव में धनबल और बाहुबल का औचित्य इन रचनाओं पर प्रतिक्रिया खुद भी दे और औरो से भी कहें धन्यवाद सहित

    February 29, 2012

    सादर प्रणाम! कृपा की बात करके शर्मिंदा न करें…….हरेक व्यक्ति की एक अपनी सोच होती है जिसके माध्यम से वो दुनिया को देखता है और अपना विचार रखता है. अतः हम किसी को मजबूर नहीं कर सकते. बस आप यूँही एक अच्छे विषय-वस्तु का चुनाव करते रहिये. आपको कमेन्ट जरुर मिलेगा….

akraktale के द्वारा
February 28, 2012

अनिल जी नमस्कार, वाकई प्रेरणादायक लव स्टोरी. इंसान भी कुछ सबक तो ले ही सकता है.

    February 29, 2012

    सादर प्रणाम ! सर जी, जब मैं कक्षा ७ वीं का छात्र था तो उस समय एक मेरे गुरु जी ने बात बताई थी. जो मुझे आज भी याद है ‘इंसान चाहें तो क्या नहीं कर सकता’. आज मैं अपने चारों तरफ नज़र उठाकर देखता हूँ तो पता हूँ कि सचमुच हम बहुत कुछ कर लिए हैं. पर काश कुछ भी करने से पहले हमें खुद के इंसान होने का एहसास रहा होता तो आज हम कुछ भी नहीं करते…….

chaatak के द्वारा
February 28, 2012

आपकी इस पोस्ट को पढ़कर सहसा चार पंक्रियाँ स्मरण हो आईं- तेरी सूरत, तेरी सीरत मैं दिल में जज़्ब कर लाया, मैं मंदिर में नहीं ठहरा, मैं मस्जिद से चला आया; वफ़ा का था यकीं भगवान इक बुत को बना दूंगा, मैं इस कोशिश में एक मासूम बच्चे को गँवा आया| अच्छी पोस्ट पर बधाई!

    February 29, 2012

    सादर अभिवादन! आपकी इन चार पंक्तियों से एक शायर की चार पंक्तियाँ याद आती है….. कहीं मंदिर, कहीं मस्जिद यह हम क्या बना बैठे? हमें क्या बनाना था और हम क्या बना बैठे? इन परिंदों में बुत परस्ती क्यों नहीं होती, कभी इस मंदिर पे, कभी उस मस्जिद पर जा बैठे.

mparveen के द्वारा
February 28, 2012

अनिल जी नमस्कार, सुंदर सन्देश देती रचना … जी और कुछ नहीं तो एक नियम को जरुर अपनाना चाहिए इंसान को और वो है ” भला किसी का कर ना सको तो बुरा किसी का मत करना ” ….

jlsingh के द्वारा
February 28, 2012

अनिल जी, सादर अभिवादन! बहुत ही सुन्दर दृष्टान्त के साथ विचारणीय आलेख! हम सबको सीखने और दृष्टान्त बनने की जरूरत है.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
February 27, 2012

प्रिय महोदय. सस्नेह निश्चित तौर पर , मेरे विचार आप जानते हैं. प्रेम के बारे में भी लिख चूका हूँ. बूले शा कहते है सब तोड़ दो पर किसी का प्यार भरा दिल न तोड़ो उसमे ईश्वर रहता है ..? बधाई.

    February 29, 2012

    सादर प्रणाम! आपका आशीर्वाद यूँही मिलता रहें….और हमें क्या चाहिए.

sinsera के द्वारा
February 27, 2012

अनिल जी नमस्कार, बहुत ही उपयुक्त दृष्टान्त के साथ चिंतनीय विषय. सुन्दर प्रस्तुतीकरण

Aakash Tiwaari के द्वारा
February 27, 2012

अनिल जी, बहुत अच्छी प्रस्तुति आकाश तिवारी


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