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महिलाएँ ! और सुरक्षित ?- Jagran Junction Forum

Posted On: 20 Mar, 2012 में

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महिलाएँ ! और सुरक्षित ?

गुडगाँव के पब में कामकाजी महिला के साथ गैंग रेप की घटना, मानवता को शर्मसार करती है. यह कोई पहली बार नहीं है कि किसी महिला के साथ गैंगरेप, बलात्कार या छेड़खानी की वारदात हुई है. आये दिन जाने ऐसी कितनी घटनाएँ प्रकाश में आती रहती है और इससे भी कहीं ज्यादा महिलाओं के साथ घटित उन घटनाओं की संख्या है जो कि प्रकाश में नहीं आती हैं या फिर यह कहिये कि जिन्हें प्रकाश में आने नहीं दिया जाता है. चाहें समाज हो, प्रशासन हो, स्वयं सेवी संस्था हो या फिर साहित्य जगत, सब के सब ऐसी समस्याओं का समाधान खोजने की बजाय उसमें मिर्च-मसाला लगाकर एक दुसरे के सामने परोशने में लगे रहते हैं. ताकि पीड़िता लोक-लाज के मारे अपनी जुबान पे ताला लगा ले या फिर शर्म से खुदखुशी कर ले और इस प्रकार महिलाओं का शारीरक और मानसिक शोषण सतत चलता रहता है. चूँकि गुडगाँव की शर्मशार करने वाली घटना समाज के मान-मर्यादा, लोक-लाज की सीमाओं को चीरती हुई बाहर आ चूँकि है. अतः मौका देखकर सारे शरीफ (समाज, प्रशासन, स्वयं सेवी संस्था, मीडिया और साहित्य जगत इत्यादि) तन पर शराफत की चादर डालें खुद को शरीफ कहलाने की दौड़ में एक दुसरे पर छीटा-कशी में जुट गए हैं. मानों बरसाती मेढक मौसम के मिजाज को देखकर खेत और खलिहानों में टर-टर की आवाज लगा रहे हो. आखिर यही तो उपयुक्त समय है अपनी संख्या बढाने के लिए प्रजनन करने का. इन दूध के धुलें हुए शरीफों से यह पूछना चाहता हूँ कि मान-मर्यादा, इज्जत और मानवता की इतनी चिंता है तो फिर ऐसी घटनाओं को अंजाम क्यों देते हो? आख़िरकार वो घिनौना चेहरा हमी में से किसी एक का है. हमारे बीच होने वाली यह घटनाएँ यह सोचने पर मजबुर करती है कि क्या हम सच में मानव ही है जिनका सामाजिक और मानसिक स्तर जानवरों से भी निचे गिर चूका है? इन घटनाओ के पीछे एक गन्दी मानसिकता और सोच है जिसका कोई एक चेहरा नहीं हो सकता. चाहें समाज हो, प्रशासन हो, स्वयंसेवी संस्था हो या फिर हमारा जागरण जन्शन मंच, सब के सब एक सुर-ताल में अपन राग अलापे जा रहे हैं. यहाँ एक प्रश्न रखना चाहता हूँ कि इस घटना का शिकार हमारी बहन और बेटी हुई होती तो हम क्या करते? यदि इस वारदात को कोई अपना बेटा, भाई या बाप अंजाम दिया होता तो हम क्या करते……..? हम यह कर देते और हम वो कर देते…… अरे साहब डींगे हाकना छोडिये. मैं कोई आसमान से उतरा फ़रिश्ता नहीं हूँ. मैं भी इसी हकीकत के धरातल पर रहता हूँ. सारी हकीकत से वाकिफ हूँ. जो इन घटनाओं को अंजाम देते हैं, वो और उनके अपने भी कल तक यही कहते आये हैं, जो आपके दिमाग में चल रहा है. पर आज वो खुद को दागदाग होने से बचाने में लगे होंगे. इस अवसर पर एक शायर की कही हुई बात याद आ गयी…एक ही उल्लू काफी है,वीरां गुलिस्तां करने को; उस देश का यारों क्या होगा जहाँ हर शाख पर  उल्लू बैठे हैं.

ऐसी घटना क्रम को रोकने के लिए स्थानीय पुलिस ने यह फरमान जारी किया है कि अगर रात को आठ बजे के बाद महिलाओं से काम करवाना है तो पहले श्रम विभाग से अनुमति लेनी होगी। इस फरमान के विरोध में, जो मीडिया और महिला आयोग के फरमान आये हैं, उससे तो स्पष्ट होता है कि हरेक महिला के साथ, चाहें वो घर के भीतर हो या बाहर, एक सुरक्षाकर्मी लगा दिया जाय क्योंकि महिलाओं के साथ ऐसी घिनौनी वारदातें अन्दर-बाहर,हरेक जगह हो रही है. यदि सुरक्षाकर्मी कम पड़ जाते हैं तो कुछ मीडिया और महिला आयोग से ले लिया जाय ताकि महिलाओं का शारीरिक और मानसिक शोषण करने का एक और मौका मिल जाये और वो लाचार होकर इज्जत-आबरू की खातिर एक बार फिर कठपुतली बन जाये. कुछ लोग मानते है कि महिलाओं को देर रात तक बाहर रहना अपराध को दावत देने जैसा है. अतः पुलिस द्वारा उठाये गए इस कदम की सराहना कर रहे हैं. वो लोग इस बात को सिद्ध कर रहे है कि औरत सिर्फ एक उपभोग की वस्तु है जिसे हरेक समय और हरेक जगह व्यवस्थित नहीं किया जा सकता. अब मैं जागरण जन्शन फोरम द्वारा उठाये गए चारों सवालों पर अपना विचार रखना चाहूँगा………………………………..

प्रथम सवाल : क्या हमारा सुरक्षा तंत्र महिलाओं की सुरक्षा करने में पूरी तरह असफल हो चुका है?

मेरे विचार : हाँ. परन्तु इसके जिम्मेदार सुरक्षा तंत्र नहीं बल्कि उस तंत्र के लोग है जो हमारे सामाजिक तंत्र के अभिन्न हिस्सा है. जब हमारा सामाजिक और मानसिक स्तर का हास हुआ है तो उसका प्रभाव हरेक तंत्र पड़ना एक स्वाभाविक घटनाक्रम होगा क्योंकि किसी भी तंत्र का निर्माण सामाजिक तंत्र के अवयवों से होता है. ऐसी परिस्थिति में समस्याओं को समाधान खोजने की बजाय एक दुसरे को दोषी ठहराना कहाँ तक उचित होगा?

द्वितीय सवाल: अगर किसी महिला के साथ बलात्कार होता है तो क्या वह स्वयं इसके लिए जिम्मेदार है, इस घटना का दोष पुरुष को नहीं दिया जाना चाहिए?

मेरे विचार : यदि किसी महिला के साथ ऐसी वारदात होती है तो इसके लिए जिम्मेदार, ना ही उक्त महिला है और ना ही पुरुष बल्कि जिम्मेदार है हमारे गंदे सामाजिक और मानसिक स्तर जिसके आवरण से हम सभी खुद को मुक्त नहीं करना चाहते.

तृतीय सवाल : क्या पंजाब शॉप्स एंड कमर्शियल एस्टैब्लिशमेंट एक्ट 1958 लागू करने के बाद रात आठ बजे से पहले महिलाएं खुद को सुरक्षित मान सकती हैं?

मेरे विचार : जबकि किसी एक्ट को लागु करने वाले और तोड़ने वाले भी हम ही हैं तो दुनिया का कोई भी एक्ट लागु कर दिया जाय ऐसी घिनौनी घटनाओं को घटित होने से नहीं रोका जा सकता.
चतुर्थ सवाल : क्या पुलिस और सुरक्षा प्रबंधन इस बात की गारंटी लेते हैं कि अब दिन के समय कोई महिला किसी दरिंदे की घृणित मानसिकता का शिकार नहीं होगी?

मेरे विचार : पुलिस और सुरक्षा प्रबंधन की बात छोडिये. मैं सारे प्रबंधन की बात करता हूँ. क्या कोई इस बात की गारंटी लेगा कि उसके तंत्र में अब दिन के समय कोई महिला किसी दरिंदे की घृणित मानसिकता का शिकार नहीं होगी? क्या आप इस बात की गारंटी लेते है, क्या हम इस बात की गारंटी लेते है कि मौका मिलने पर हमारे द्वारा कोई महिला हमारी गन्दी मानसिकता का शिकार नहीं होगी? यह सवाल मैं व्यक्ति विशेष पर नहीं बल्कि समाज की विचारधारा पर उठा रहा हूँ.

उपरोक्त विचार पढ़ने के बाद, आप यह जरुर सोच रहे होंगे कि अलीन अजीब बेवकूफ इंसान है, ना इधर की बात करता है ना उधर की बात करता है. समस्याओं को सुलझाने की बजाय उलझाता ही चला जा रहा है. मैं इस पर कहना चाहूँगा की समस्याओं को उलझाने और संकीर्ण बनाने का काम हमारा निम्न सामाजिक और मानसिक स्तर कर रहा है जो समय के साथ-साथ दिन-प्रतिदिन गिरता चला जा रहा है. आख़िरकार मैं इधर-उधर की बात क्यों करूँ? जबकि हकीकत यह हैं कि महिलाएं किसी भी तंत्र में सुरक्षित नहीं हैं. आज किसी के बेटी और बहन के साथ हुआ है. कल आपकी बहन और बेटी के साथ होगा और परसों मेरी बहन बेटी के साथ होगा. हो भी क्यों नहीं, हम भी तो दुसरे के साथ ऐसा ही चाहते हैं ? एक-दुसरे पर दोषारोपण की बजाय आज अपने गिरेहबान में झाकने की जरुरत है. साथ ही सामाजिक और मानसिक स्तर पर ऐसी घटनाओं के विरुद्ध बड़े पैमाने पर अभियान चलाने की जरुरत है. मैं कबका सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध लड़ने के लिए घर से निकल चूका हूँ. क्या आप एक सामाजिक और मानसिक क्रांति के लिए तैयार है……..? नहीं न !…….इसीलिए मैं कहता हूँ कि सारी चिंताओं और समस्याओं को छोड़िए और एक बार जोर बोलिए…….भारत माता की….जय! भारतीय संस्कृति की ….जय! नारी शक्ति की…जय! मान-मर्यादा की ….जय!
अब हम सभी अधिकारिक रूप से मानवता को ताड़-ताड़ करने के लिए स्वतंत्र हैं. पर ध्यान रहे किसी भी घटना को अंजाम देने के बाद उपरोक्त नारे को बुलंद आवाज में संबोंधित जरुर कर लीजियेगा…..जय हो!……जय हो!…….जय हो! जय हो महान देश के महान सपूतों!

महिलाएँ ! और सुरक्षित ?( चित्र गूगल इमेज साभार )

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48 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

March 29, 2012

सादर प्रणाम! आपकी प्रथम प्रतिक्रिया का स्वागत है. बहुत अच्छा लगता है जब आप जैसे बड़ों का मार्गदर्शन मिलता है. चलिए मेरी बात को छोडिये. आइये आपके बातों पर कुछ गौर फ़रमाया जाय….. ” ऐसी सामजिक बुरायिया हत्या बलात्कार क्यूँ कर नहीं बढती नजर आएगी आखिर अपने देश का कानून दोषियों को सजा भी तो नहीं दिला पाता यही मूल कारन है ऐसी बुरायिओं का दिनोदिन बढ़ना हाँ लेखन भी एक विरोध का तरीका है जो हम और आप कर रहें हैं. ” आखिर देश का कानून दोषियों को सजा दिला पाने में क्यों नाकाम है? कमी इसमें है ? या फिर इसके इम्प्लीमेंटेशन में? आप इस पर अपना अब जो भी व्यक्तव्य देना चाहें परन्तु मैं आपकी ही बातों से अपनी बात सिद्ध करता हूँ…… “क्या यह लिख भर देने से इस देश की सामाजिक और मानसिक मान्यताएं बदल जाएँगी आज यह सब जो कुछ हो रहा है उसका एक मात्र कारन हमलोगों का स्वार्थी होना है अब सभी ब्याक्तिवादी सोंच के बनते जा रहें हैं इस स्वार्थी समाज में कोई किसी की परवाह कहाँ करता है? और हर उस खबर पर एक नजर देखकर अपनी दुनियां में मस्त हो जाता है और आजकल हर कोई समस्यायों से घिरा है वह उनसे हीं नहीं उबर पाता फिर क्या वह इन सामाजिक समस्यायों के लिए समय निकाल पायेगा अगर विरोध करने का मौका भी आएगा तो वह अपने काम पर निकल पड़ेगा .” आपने यह माना हैं की इसके पीछे सबसे बड़ा कारण हम लोगों का स्वार्थी होना हैं जो कि गिरी मानसिकता में से एक है तो आदरणीय आप बता सकते हैं कि आप कानून में जो भी बदलाव या उसका इम्लिमेंटेशन करवाना चाहते हैं क्या वो देवताओं से करवाएँगे, नहीं न. क्योंकि उस व्यवस्था को चलानेवाला भी तो हमी में से कोई एक हैं या फिर कोई खास जीवजन्तु द्वारा इस काम को अंजाम देने की सोच है. आपने सच कहाँ कि हर कोई समस्या से घिरा है और उसका भी प्रमुख कारण स्वार्थ हैं तो हम दूसरों पर टिप्पा-टिप्पड़ी क्यों कर रहें है जबकि हमभी उसी में शामिल हैं. यदि हम सामाजिक रूप से कुछ नहीं कर सकते तो मानसिक रूप से अपना ही सुधार करके इस दुनिया को खुबसूरत कर सकते हैं………एक से दो…दो से चार…..और चार से ….आठ……….आप क्या सोचते हैं?………आपके प्यार और आशीर्वाद का इच्छुक, आपका अनुज, अलीन.

ashokkumardubey के द्वारा
March 29, 2012

महोदय, आपने समस्यायों के बारे में बड़े विस्तार से लिखा है और समाधान भी बताया है लेकिन क्या यह लिख भर देने से इस देश की सामाजिक और मानसिक मान्यताएं बदल जाएँगी आज यह सब जो कुछ हो रहा है उसका एक मात्र कारन हमलोगों का स्वार्थी होना है अब सभी ब्याक्तिवादी सोंच के बनते जा रहें हैं इस स्वार्थी समाज में कोई किसी की परवाह कहाँ करता है? और हर उस खबर पर एक नजर देखकर अपनी दुनियां में मस्त हो जाता है और आजकल हर कोई समस्यायों से घिरा है वह उनसे हीं नहीं उबर पाता फिर क्या वह इन सामाजिक समस्यायों के लिए समय निकाल पायेगा अगर विरोध करने का मौका भी आएगा तो वह अपने काम पर निकल पड़ेगा अतः ऐसी सामजिक बुरायिया हत्या बलात्कार क्यूँ कर नहीं बढती नजर आएगी आखिर अपने देश का कानून दोषियों को सजा भी तो नहीं दिला पाता यही मूल कारन है ऐसी बुरायिओं का दिनोदिन बढ़ना हाँ लेखन भी एक विरोध का तरीका है जो हम और आप कर रहें हैं .

MAHIMA SHREE के द्वारा
March 24, 2012

मित्रवर अलीन जी…सबसे पहले तो आपको साधुवाद इस गहन चिंतन से युक्त आपके आलेख केलिए ..मुझे अफ़सोस हो रह है की मै देर से क्यों पड रही हूँ…आपके हर सवाल के साथ दिए गए जवाब से मैं अक्षरश सहमत हूँ … आप एक संवेदनशील नागरिक है..जो अक हरेक समस्या की जड़ो तक जाना चाहता है…और निदान करने के लिए कटिबद्ध है… समाज कितना भी आधुनिक क्यों ना हो जाये और तकनिकी सुरक्षा से लैस हो जाए …पर जब तक समाज की मानसिकता में बदलाव नहीं लाया जाता है तबतक ऐसी घटनाये होती रहेंगी…… अब आपने चर्चा शुरू ही कर दिया है ….तो जल्द ही अपने आलेख के द्वारा आगे ये परिचर्चा जारी रखूंगी………जिसका शीर्षक होगा भेड़िया आया ………आभार .

    March 25, 2012

    अफ़सोस करने की जरुरत नहीं वरना तबियत ख़राब हो जाएगी…………..आपके कदम स्वर्ग से नर्क तक आये इसके लिए…………..हार्दिक आभार.

मनु (tosi) के द्वारा
March 24, 2012

नमस्कार अनिल जी ,  आपने जो सवाल उठाए हैं वो वाकई एक सोच पैदा करते हैं ॥और उसका निराकरन भी मन कहीं ढूंढने निकल पड़ता है। ये सही है की हम बदलेंगे तभी जग बदलेगा … आपके विचारों में एक जलती हुई चिंगारी है और इसे ज्वाला बनने से कोई नहीं रोक सकता ….. शुभकामनाएँ सहित नव सम्वत्सर, एवं पावन नवरात्र की बधाई स्वीकारें,

March 23, 2012

आपके आन्दोलनकारी विचार पढ़कर बहुत अच्छा लगा. ये विचार समाज की आवाज़ बन सकें, शुभकामना. नव सम्वत्सर, एवं पावन नवरात्र की बधाई स्वीकारें, सादर.

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
March 23, 2012

सुन्दर आलेख अनिल जी.बधाई!

mataprasad के द्वारा
March 22, 2012

अनिल जी नमस्कार, यह बहुत ही चिंता का विषय है । ऐसा करने वाले बिगड़ी हुई माँ-बाप की बिगड़ी हुई औलाद होती है। जिनको संस्कार रूप में यही मिला होता है। जिनकी अपनी खुद की तो इज्जत होती नही है और वो क्या जाने इज्जत क्या होती है। . ऐसे लोगो के विचारो को बदलने का कोई उपाय हो जाता तो ,शायद ऐसे घृणित कार्यो को रोका जा सके। जहा तक प्रशासन की बात है । मै इक निहायत ही कठोर कानून का समर्थन करता हूँ ।

    March 23, 2012

    सादर अभिवादन! सिर्फ बिगड़े हुई माँ-बाप के बिगड़े हुए औलाद ही नहीं होते बल्कि शरीफ माँ-बाप शरीफ औलाद भी है इसमें और इसके अलावा भी…………क्या उसमे आप नहीं है? क्या मैं नहीं हूँ? हो सकता है कि आप नहीं है परन्तु मैं तो हूँ. मौका मिलेगा तो मैं भी एक औरत के इज्जत को ताड़-ताड़ करने से पीछे नहीं हटूंगा. कहने का मतलब हैं कि लगभग ९९.९९ % लोग इस गन्दी मानसिकता के शिकार हैं. जो नहीं हैं कहा जाता हैं कि वह पुरुष नहीं हैं. कड़ा कानून किसके लिए बनेगा ९९.९९% लोगों के लिए या फिर ०.०१ % लोगों के लिए….यह बिंदु विचारणीय हैं….. जनाब ताला शरीफों के लिए होता हैं चोरों के लिए नहीं…..जनाब जरुरत हैं मानसिक और बौद्धिक विकास कि न कि किसी तंत्र में बदलाव की क्योंकि हरेक हाल में नियंत्रण तो मन ही करेगा न की कोई तंत्र…..जाने kitane कानून और नियम बनाते आये और लोग usaka इस्तमाल करके अपना स्वार्थ सिद्ध करते आये…क्या अब भी आप को लगता है कि कोई नियम और कानून बाकि है. क्या धर्म के कानून और नियम से भी कोई बड़ा कानून और नियम है क्या….जहाँ कर्मो के आधार पर लोग स्वर्ग और नरक को परिभाषित करते हैं….और इसमें अथाह विश्वास करने वाले लगभग ९९.९९% या उससे भी कम लोग कुकर्म करते रहते है……यह सोचकर कि चालों आज गुनाह कर लेता हूँ, कल इश्वर और अल्लाह के सामने इससे तौबा कर लूँगा…वो बड़ा ही दयावान हैं…हमारे गुनाहों को माफ़ कर देगा…..और परसों से फिर हम वही करते हैं जो हमारा मन करता हैं….भाई साहब, मैं यह कहना चाहता हूँ कि यह सब mind game हैं जिसके आगे सारे नियम और कानून धरे के धरे रह जाते हैं…….आखिर संचालन तो इसी से होना है……मैं अपनी बाते विस्तार में नहीं बतान चाहता हूँ क्योंकि यदि विस्तार कर दिया तो एक और धर्म ग्रन्थ तैयार हो जायेगा फिर लोगों को एक और आधार मिल जायेगा अपना स्वार्थ सिद्ध करने का…….थोडा समय निकलकर चिंतन-मनन करिए ….मैं भी कभी आप ही कि तरह सोचता था. …….मेरी और अनजानी का बसा-बसाया घर इसी मानसिकता के कारण टूट गया यदि मैं भावनावश वशीभूत होकर उनके खिलाफ हथियार उठा लूँ जो मेरी बर्बादी के कारक हैं तो क्या मैं उनको बचा पाउँगा जो आयेदिन इस गन्दी मानसिकता के शिकार हो रहें हैं…….

minujha के द्वारा
March 22, 2012

अलीन जी अंग्रेजी में एक बहुत चर्चित कहावत है जिसका सार है कि लेखक और कवि पागल होते है,पर अगर सचमुच ऐसा है तो मेरी अकांक्षा यही है कि काश हर कोई पागल हो जाता तो आज तस्वीर का रूख शायद कुछ और होता आपने बहुत अच्छा लिखा है ,और इसी तरह लिखते रहे तब तक जबतक परिवर्तन खुद आने को बाध्य ना हो जाए,बहुत बढिया

    March 22, 2012

    सादर नमस्कार! पागल=पा + गल = पाना + बात ( रहस्य ) मतलब जब कोई किसी रहस्य को पा जाता है तो उसे लोग पागल कहते हैं. मुझे जानने वाले भी, मुझे पागल कहते हैं और मैं यह भी जानता हूँ कि इस मंच पर भी ऐसे बहुत से लोग है जो मुझे पागल समझते हैं…….पर काश मैं भी पागल होता………..!

    minujha के द्वारा
    March 22, 2012

    कृप्या दूसरे अर्थों में ना ले,मेरी मंशा आपको पागल कहने की नही थी मेरा अभिप्राय पुरे लेखक वर्ग से था क्षमा सहित

    March 22, 2012

    आप मेरी बातों को अन्यथा न ले. मैं जो हकीकत है उसका जिक्र किया हूँ……आपने सच कहाँ परन्तु सभी लेखक वर्ग नहीं……बल्कि उन लेखकों को पागल कहा जाता हैं…..जो समाज के सच को कह जाते हैं……पर अब आपकी मंशा जरुर हो गयी मुझे पागल कहने की……….आखिर आप भी तो…..हाँ….हाँ…..हाँ….

yogi sarswat के द्वारा
March 22, 2012

अलीन जी नमस्कार ! मैं खुद कुछ नहीं सोच प् रहा हूँ की इस लेख को पढने के बाद क्या कहूं ? क्योंकि जो भी मेरे मन में विचार आता है वो सब आपने लिखा है ! कहीं कोई रिक्त स्थान नहीं छोड़ा ! अगर आप बुरा न मानें तो एक बात कहता हूँ – अगर आपने इसे दो हिस्सों में रखा होता और बढ़िया होता ! इस हिस्से में आप सिर्फ सवाल रखते और तुरंत दूसरे हिस्से में अपने जवाब ! इससे ये बात निकल कर आती की आपके उठाये सवालों के विषय में इस मंच की बिरादरी क्या सोचती है ? आपने बहुत बेहतरीन लेख लिखा है इसमें कोई दोराय नहीं !

    March 22, 2012

    सादर नमस्कर! आपका सुझाव सही और सार्थक हैं………अपने लेख में इस कमी को मैं स्वयं महशुस किया………पर क्या करू?..जब समस्याएं सामने आती है तो समाधान भी साथ निकलता जाता है……..वैसे आपका सलाह विचारणीय है, आगे से कोशिश करूँगा कि समस्या एक साथ हो और समाधान एक साथ….और यह काफी बेहतर भी होगा….हार्दिक आभार.

yamunapathak के द्वारा
March 22, 2012

aleen jee aapne har prashna ke sateek uttar diye hain ,aapkee pratikriyaa maine apne lekh mein bhee padhee thee sach main kahtee hun iskaa zabaab ek hee hai har vyakti ko naitiktaa kaa mahtava samajhanaa hogaa

    March 22, 2012

    सादर अभिवादन, मैं किसी भी प्रश्न का जवाब नहीं दिया हूँ, जो समाज में यथार्थ है, बस उसको सामने रखा हूँ. यथार्थ यह है कि समस्या भी स्पष्ट है और समाधान भी पर कोई विचार नहीं करना चाहता …….या यूँ कहिये कि जो हमने अपने चारों तरफ रुढिवादिता, स्वार्थ, झूठी-मान मर्यादा, संकीर्ण मानसिकता जैसे लकीरों को खिंच रखे हैं….उससे से बाहर नहीं निकलना चाहते…

Sumit के द्वारा
March 22, 2012

आपके ४ सवालो ने सोचने पे मजबूर कर दिया है…….सुंदर लेख के लिए बधाई ………..

    March 22, 2012

    सादर अभिवादन! सवाल मैंने पैदा नहीं किया है बल्कि…………….. हमने किये हैं…..

mparveen के द्वारा
March 22, 2012

अनिल ji नमस्कार, बहुत ही चिंतनीय विषय है रक्षक ही भक्षक बन गए हैं फिर भरोसा किस पर किया जाये ?

vikramjitsingh के द्वारा
March 22, 2012

प्रिय अनिल जी, सादर, आपका कहना सच है, जब बाड़ ही खेत को खाने लगे तो किसी तंत्र में सुधार की उम्मीद कैसे की जा सकती हैं! एक बहुत ही गंभीर विषय……..आवश्यकता है ठोस कदम उठाने की……

    March 22, 2012

    सादर अभिवादन! आप समस्या को समझ पायें हार्दिक आभार…….आशा करता हूँ ….समाधान भी समझ रहें होगे……आपके प्यार और स्नेह का सदैव अभिलाषी…

jalaluddinkhan के द्वारा
March 22, 2012

गंभीर विचारोत्तेजक रचना,जो बहुत कुछ सोचने पर विवश करती है.इस समस्या के अंत के लिए लड़ाई हर स्तर पर होनी चाहिए.न किसी एक कंधे के सहारे न किसी एक योजना के तहत.सबको अपने-अपने हिस्से का दायित्व निभाना ही होगा.खास कर महिलाओं को अपने हिस्से की लड़ाई खुद लड़नी होगी.

    March 22, 2012

    अस्सलाम वाल्लेकुम जनाब! सही फ़रमाया आपने……और सबसे बड़ी बात कि यह लड़ाई केवल सामाजिक न होकर, मानसिक और नैतिक हो…..जबान से नहीं बल्कि यह हमारे क्रिया कलापों से झलकना चाहिए…..ताकि समाधान….. सकारात्मक, सही और स्थिर हो एक लम्बे समय के लिए….

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
March 21, 2012

स्नेही अनिल जी, सादर . बहुत गंभीर विषय है, चिंतन, मनन, निष्कर्ष तो निकालना ही होगा. बधाई/

    March 21, 2012

    सादर प्रणाम! सही फ़रमाया आपने.. मेरे आलेख बिंदु आप समझ पायें …….हार्दिक आभार.

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
March 21, 2012

प्रिय अनिल जी बहुत सुन्दर प्रस्तुति सवाल ही सवाल नहीं है कोई जबाब ….लोग सुनुने समझें आँखें खोलें तो बात बने … भ्रमर ५

    March 21, 2012

    सादर अभिवादन! जब आप जैसे लोगों का साथ है तोलोग सुनेंगे भी और समझेंगे भी…….हार्दिक आभार.

sinsera के द्वारा
March 21, 2012

अनिल जी नमस्कार, एक बात तो है कि आप ने कहा कि आप क्रांति के लिए घर से निकल पड़े हैं , ये सत्य आप की लेखनी से झलकता है. आप के लेख बेहद अंगार उगलते हुए, सिस्टम के खिलाफ चिढ़ से भरे हुए होते हैं . पढ़ कर अच्छा लगता है.बस इन बुराइयों को दूर करने का रास्ता भी खोजना होगा वरना हमारी आप कि बात भी टी वी पर दिखाई जाने वाली खोखली चर्चा परिचर्चा कि तरह टाइम पास बन कर रह जाएगी…

    March 21, 2012

    आपके विचारों का सुस्वागतम! बहुत जल्द ही सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध एक सेना बनाने जा रहा हूँ. जिसका हरेक सिपाही अपने आप में एक सेनापति होगा………….और यह तभी संभव हो पायेगा जब आप जैसे लोगो का साथ हो…………तो तैयार रहिये दुनिया की सबसे बड़ी रक्तहीन क्रांति का हिस्सा बनने के लिए………बहुत जल्द ही सेना के संगठन के लिए आवाज दूंगा. पर उससे पहले मैं अपनी प्यार की लड़ाई की तैयार कर रहा हूँ जिसे मैं स्वयं लड़ना चाहता हूँ. बस आप सभी मेरी जीत की दुआ करिए ताकि अगली लड़ाई सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध हम सबकी एक साथ हो………… क्योंकि मेरी हार का मतलब है मेरी मृत्यु?

    dineshaastik के द्वारा
    March 23, 2012

    क्षमा चाहता हूं अनिल जी हार का मतलब मृत्यु कभी नहीं हो सकता, अपितु अगली लड़ाई के लिये तैयारी करना होता है। अपनी लड़ाई मैं मेरे कुछ मुद्दे भी शामिल करिये- जाति व्यवस्था का तोड़ना, मृत्यु भोज के कलंक से हिन्दु समाज से मुक्त कराना। बेटियों को बेटों की तरह परिवार में समान अधिकार  तथा केवल मानवीय धर्म की स्थापना।

    March 23, 2012

    दिनेश भाई, आपने बिलकुल सही फ़रमाया. परन्तु शरीर से आत्मा का निकल जाना भी मृत्यु नहीं होता. मेरी लड़ाई में सिर्फ एक ही मुद्दा हैं और वो है अनजानी को पाना. परन्तु आप सब से जिस लड़ाई की बात कर रहा हूँ, वो हमारी अर्थात हम सबकी की लड़ाई है और मैं, हमारी लड़ाई के लिए सेना तैयार करने की बात कर रहा हूँ न कि खुद की. आप जिन मुद्दों की बात कर रह हैं वो आपके नहीं है बल्कि हमारे हैं और हम अपनी लड़ाई जरुर लड़ेंगे. बस आप मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार रहिये…..आ[पके प्यार और साथ का सदैव आभार!

dineshaastik के द्वारा
March 21, 2012

अलीन जी, नमस्कार, महत्वपूरण प्रश्न यह है कि इस तरह के अपराधों की अंतिम जिम्मेदारी किसकी। मेरी दृष्टि में शायद व्यवस्था की। शायद हमारे देश में चुनावाधारित लोकतान्त्रिक व्यवस्था पूर्णतः सफल  नहीं है। अब प्रश्न उठता है कि फिर कौन सी व्यवस्था अपनाई जाये। ऐसा समाजवाद (मुलायम सिंह वाला नहीं)  जिसमें आखिरी पंक्ति में खड़ा व्यक्ति की भी सत्ता में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भागेदारी हो। और प्रत्येक  घटना के लिये स्पष्ट जिम्मेदारी निर्धारित हो।     नैतिक, सैनिक एवं देश भक्ति की शिक्षा अनिवार्य हो।    मेरे अनुसार बलात्कार हत्या से भी जघन्य अपराध है। जिस अबोध वालिका ने इस पीड़ा  भुगता हो वही समझ  सकती है इसे। हम सब तो केवल शब्दों में बयां कर सकते हैं। बलात्कार अक्षम्य अपराध है। ऐसे व्यक्ति को उसके सारे अधिकारों से वंचित कर देना चाहिये। हो सकता है मेरे कुछ सुझाव व्यवहारिक न हो। किन्तु इस संबंध में मेरी  यही सोच है। 

    nishamittal के द्वारा
    March 21, 2012

    अनिल जी,जब कमी हमारे अंदर है तो उसका निदान भी अपने ही पास है,और अपनी कमी दूर करने वाले बिरले होते हैं.

    March 21, 2012

    सादर नमस्कार! सादर अभिवादन! और मेरा प्रश्न यह है कि इस तरह के अपराधी कौन है….शायद आप ….शायद मैं……कोई भी हो यक़ीनन हम्मे से ही कोई एक हैं…और यदि है तो आखिर क्यों है? मेरा सवाल यह है कि क्या मुझे और आपको ऐसा मौका मिला तो क्या एक औरत के साथ खेलने की कोशिश नहीं करेंगे? मेरा प्रश्न यह है कि क्या प्रत्येक घटना के लिए हमारे कानून में जिम्मेदारी नहीं है? मेरा प्रशन यह है कि क्या व्यवस्था बदलने से हमारी मानसिकता बदल जाएगी. मेरा प्रशन यह है कि है कि क्या शेर को पिजड़े में बंद कर देने से घास खाने लगेगा……….और अंत में जो आपने बात कही उसका समर्थन करता हूँ………… नैतिक, सैनिक एवं देश भक्ति की शिक्षा अनिवार्य हो और साथ ही हमारी गन्दी मानसिकता में बदलाव हो। आप भी यह अच्छी तरह से जानते हैं कि इसमे बदलाव तभी होगा जब हम चिंतन और मनन करें और वहीँ हम नहीं करना चाहते……..बस राम, क्रिशन का नाम लेकर रावन और कंश का करना चाहते हैं………एक बार फिर आपका हार्दिक आभार.

    March 21, 2012

    सादर प्रणाम! जब हम जानते है कि कमी हमारे अन्दर है तो हमारा कोई हक़ नहीं बनता कि हम दूसरों पर उंगली उठायें.यह हक़ उन्ही बिरले लोगों का होना चाहिए जो पहले अपनी कमी दूर करते हैं. वैसे हमारे यहाँ प्रचलित एक कहावत है कि सूप हँसे तो हँसे चालन को नहीं हँसना चाहिए………

akraktale के द्वारा
March 20, 2012

चिंतनीय विषय है. आप लाख कहें की फ़ोकट चिंता से क्या होगा. मै भी यही कहता हूँ. किन्तु फिरभी चिंतित हूँ. आज शाम ही समाचार था पुलिस थाने में गैंगरेप. अब कौन सुरक्षा करेगा? महिलाओं को ही सतर्क रहना होगा और समाज को महिलाओं का साथ देने होगा.

    March 20, 2012

    सादर प्रणाम! बस मैं यही कहना चाह रहा हूँ कि जब हम ही रक्षक हैं और हम ही भक्षक है तो किसी तंत्र में सुधर कि गुंजाईश कैसे कि जा सकती हैं जबतक औरत जाति के प्रति हमारी गन्दी मानसिकता में बदलाव नहीं होता…..एक बार फिर आपके आशीर्वाद स्वरुप वचन पाकर……….खुद को गौरान्वित पाया हूँ…हार्दिक आभार.

ajaydubeydeoria के द्वारा
March 20, 2012

अनिल भाई नमस्कार, हमारा सामाजिक ताना-बना ही ऐसा हो गया है. हैवानियत और दरिंदगी बढ़ गयी है. समाज विकृत होता चला जा रहा है. कहने को तो शिक्षा का स्तर बढ़ रहा है, ज्ञान का स्तर बढ़ रहा है. मनुष्य प्रगति कर रहा है. यह प्रगति नहीं हो रही है. यह विध्वंश का संकेत दे रहा है. इसीलिए मैं कहता हूँ की हमारे पुरखे निरक्षर जरुर थे,अज्ञानी नहीं थे. आज शिक्षा है परन्तु ज्ञान नहीं है. इसीलिए मैं आदर्श,ज्ञान,चरित्र पर बात करना नहीं चाहता. वर्तमान परिद्रश्य को देख यही लगता है कि सब व्यर्थ है, ढकोशला है. हमारा समाज पाश्चात्य से प्रभावित है. आप उनके आवरण को ओढ़ कर चलते हैं तो आधुनिक हैं,प्रगतिशील हैं, अन्यथा आपको मूर्ख की उपाधि दे दी जाती है. इस आधुनिकता ने ही समाज में विकृति पैदा कर दी है.

    March 20, 2012

    आप फिर भूल कर रहें हैं, हमारा समाज पाश्चात्य से प्रभावित नहीं है बल्कि अपनी गन्दी मानसिकता, सोच और स्वार्थ से प्रभावित हैं. मैं शुरू से lekar अब तक भारतीय इतिहास का अवलोकन करता हूँ तो पाता हूँ कि हम अपने दोषों को छुपाने के लिए दूसरों पर आरोप लगते रहते हैं. अजय भाई, आप मेरी बात को समझने कि कोशिश क्यों नहीं करते कि यदि हम नंगे है तो दूसरों को नंगा करके शरीफ नहीं बन सकते. आज हममे से कुछ लोग शिक्षा का सही उपयोग करके इस दुनिया को खुबसूरत बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं. जहाँ तक दरिंदों की बात है वो कल भी बहुतायत में थे और आज भी बहुत हैं. यह बिना दाँत के दिखने वाले बुजुर्ग जो संस्कृति, सभ्यता, परंपरा और मान-मर्यादा की बात करते हैं क्या आप उनपर भी पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव हैं, ये परदे की आड़ में ऐसे-ऐसे कारनामों को अंजाम दे जाते हैं जिसे सुनने के बाद, आप दातों तले अंगुलिय दबा लेंगे. मैं बस यही बाते खुलकर नहीं करना चाहता क्योंकि मुझे कहने में भी शर्म आती हैं. इसीलिए कोशिश करता हूँ कि कम शब्दों में, अपनी बात व्यंग्यात्मक लहजे में कह जाऊ. एक बार फिर कहना चाहूँगा कि आधुनिकता ने नहीं बल्कि हमारी गन्दी मानसिकता ने विकृति पैदा की. सच को स्वीकार कीजिये क्योंकि आप जैसे विचारक और भाई सामान मित्र से मुझे बहुत उम्मीदे हैं…………..हार्दिक आभार.

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    March 21, 2012

    अनिल भाई यही तो नहीं सोच पाता कि हमारी मानसिकता गन्दी क्यों हो गयी है. ज्यादे पीछे नहीं जाऊंगा, कुछ वर्षों पहले तक, शहरों की बात नहीं करता, हमारे गावों में हर बहू-बेटी पूरे गाँव की बहू-बेटी होती थी. सबसे बहन ,बेटी, माँ, चाची,काकी,दादी का रिश्ता होता था. यह अचानक से क्या हो गया? वह प्रेम,वह रिश्ता कहाँ चला गया. शहरों में तो अपराध बढ़ ही रहे हैं हमारे गाँव भी अछूते नहीं रह गए हैं. रिश्ते तार-तार हो रहे हैं. हमारे समाज का चारित्रिक पतन हो रहा है. सत्य ही आज के बुजुर्ग क्या-क्या गुल खिला रहे है,यह कहने योग्य नहीं है. हमारे बुजुर्गों में यह विकृति पैदा कैसे हो गयी, यही नहीं सोच पाता. किसको दोष दिया जाये? हमारा समाज,हमारी संस्कृति कभी नंगी नहीं थी तो फिर आज हम कैसे नंगे हो गए हैं.

    March 21, 2012

    अजय भाई! हमारी संस्कृति कल भी नंगी नहीं थी, आज भी नहीं है और कल भी नहीं होगी. परन्तु हम कल भी नंगे थे और आज भी नंगे है और आने वाले समय में अपनी महानता का बखान छोड़कर उसका अनुकरण नहीं करते है तो कल भी नंगा रहेंगे. आपने सही कहा, ” हमारे गावों में हर बहू-बेटी पूरे गाँव की बहू-बेटी होती थी. सबसे बहन ,बेटी, माँ, चाची,काकी,दादी का रिश्ता होता था.” परन्तु आज जो कुछ भी हो रहा है, अचानक नहीं हुआ हैं. यह पहले भी होता था और इन्ही रिश्तों की आड़ में. शायद आप इससे वाकिफ नहीं होंगे. हाँ यह जरुर मैं मानता हूँ कि पहले परदे की आड़ में होता था. अब पर्दा हट चूका है. यदि आपको यकीं नहीं होता तो लोगों की सुनी सुनियी गाथाओं को छोड़कर किसी भी समय और काल का विश्लेषण अपने विचार शक्ति से कीजिये सारा सच बाहर आ जायेगा. मैं यह बात हर किसी नहीं कहता पर मैं जनता हूँ कि आप एक अच्छे विचारक हैं. जिसके पास अपनी सोचने और समझने की क्षमता है. अतः आप इस कटु सत्य का विश्लेषण करने के पश्चात् आपका चिंतन और मनन जरुर चाहूँगा…….रात को १२ बजकर ३० मिनट हो चुके हैं सो मैं सोने चला………शुभ रात्रि.

D33P के द्वारा
March 20, 2012

पुलिस के डिप्टी कमिश्नर ने पंजाब शॉप्स एंड कमर्शियल एस्टैब्लिशमेंट एक्ट 1958 लागू कर सभी वाणिज्यिक संस्थानों को यह निर्देश जारी कर दिया कि अगर वह अपनी महिला कर्मचारियों से रात को आठ बजे के बाद काम करवाते हैं तो उन्हें पहले श्रम विभाग से इसके लिए अनुमति लेनी होगी। ठीक है अगर श्रम विभाग विभाग अनुमति दे देता है फिर …….? क्या अनुमति के साथ संस्थानों से महिला सुरक्षा की गारंटी बांड भी भरवाया जायेगा ? क्या महिला सुरक्षा का यही इलाज है ,क्या एक निर्देश जारी कर या कोई एक्ट बनाकर कर्तव्य की इतिश्री हो गई ..दिल्ली में सरकार की नाक नीचे रोज़ इस तरह के हादसे होते है,क्या वो सब महिलाये रात को नौकरी से वापिस आ रही थी.?वहा तो रोज़ दिन दहाड़े ये सब होता है इसके लिए कौन जिम्मेदार है ये एक दिल्ली नहीं हर शहर का किस्सा है?क्या महिलाये पुलिस में नहीं है क्या उनके लिए भी रात को ड्यूटी नहीं करने जैसे प्रावधान लागु किये जायेंगे !क्या महिला सुरक्षा का यही इलाज है ,क्या एक निर्देश जारी कर या कोई एक्ट बनाकर कर्तव्य की इतिश्री हो गई .? सुरक्षा तंत्र नाकाम है ,…इसके लिए महिलाओं को सीमाएं निर्धारित करने जैसे फरमान जारी किये जाते है ! महिलाये तो हमेशा ही सीमाओं में रहती है पर ,दमित और कुंठित राक्षसी प्रवर्ती के लोग रात के अंधेरो का इंतज़ार करते है .क्यों नहीं एक महिला जरुरत पड़ने पर रात को घर से बाहर निकलने की हिम्मत जुटा सकती !पुरुष क्यों नहीं डरता रात को सड़क पर आने में ?

    March 20, 2012

    आपके सारे सवाल जायज है और आपने बहुत ही सरल और सीधे शब्दों द्वारा समाज के हकीकत को सामने रखा है. आप को शायद लग रहा है कि मैं प्रशासन या किसी तंत्र के समर्थन में यह लिखा हूँ, ऐसी कोई बात नहीं हैं. मैं सिर्फ समाज के पुरुष वर्ग के गन्दी मानसिकता पर लिखा हूँ और वो हरेक तंत्र में हैं. आप ध्यान से पढेगी तो पाएगी कि मेरे हरेक बात के शुरुवात और अंत व्यंग्य से होती हैं. एक ऐसे व्यंग्य यदि जिसका अर्थ बिना सोचे-समझे निकाला जाय तो हमेशा अर्थ का अनर्थ ही निकलेगा…..वैसे अभी और भी कई ऐसे सवाल है जो आप से छुट गए है और शायद इस तरह एक-एक सवाल मैं भी उठाता तो मुझसे भी छुट जाते. अतः मैं कोशिश किया हूँ कि सारे सवालों कम शब्दों में समेटने की. परन्तु जिस समाधान का जिक्र आपने किया हैं वो स्थायी और लॉन्ग टर्म नहीं हैं…….विचार करियेगा. वैसे मैं आपके समाधान का समर्थन करता हूँ. पर इसका समाधान स्थायी चाहता हूँ. यदि हम औरत को देवी और माता कहकर पुकारते है तो हमारे कहनी और कथनी में अंतर नहीं होना चाहिए. मैं क्या कहना चाहता हूँ , आप मेरी बातों को समझने की कोशिश करिए. मैं बस इसी बात को अपने आलेख में उतरने की कोशिश किया हूँ…..आपका आगमन, मेरे ब्लॉग पर हुआ….हार्दिक आभार.


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