साधना के पथ पर

अद्य की स्याही

50 Posts

1446 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 8647 postid : 370

मुझे पैदा किया, जिस ज़मीनी हकीक़त ने

Posted On: 25 Mar, 2012 न्यूज़ बर्थ में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

अनिल कुमार 'अलीन'कुछ कारणवश, मैं वही रचनाओं को यहाँ पोस्ट किया जिसकी रचना  मैंने आज से लगभग १०-१५ साल पहले की थी. आज जो रचना पोस्ट करने जा रहा हूँ, वह 4 रोज़ पहले की हैं. यह रचना उस विचारधारा के विरुद्ध हैं, जो आये दिन जाने कितने मासूम जिंदगियों को निगल रही हैं. यह सिर्फ एक रचना नहीं बल्कि मेरे तरफ से ऐसे विचारधारा, जो मानवता को ताड़-ताड़ करती हो, को समर्थन करने वालों को एक चेतावनी हैं कि वक्त रहते संभल जाएँ वरना…………………………………………………………………………….



मुझे पैदा किया, जिस ज़मीनी हकीक़त ने


मुझे पैदा किया, जिस ज़मीनी  हकीक़त ने,

अब  वह  कैसे,  आसमां पर  नजर आएगा.


जिसने बेघर किया, चंद सिक्कों की खातिर,

देखता हूँ, वह  अपना  घर  कहाँ  बनाएगा.


जिन फूलों को मसल बैठे, अपनी खुदगर्ज़ी में,

वो  क्योंकर  न अब, अंगारा  नज़र  आएगा.


लुटती हो मुहब्बत, जिस मर्यादा की नगरी में,

कहो  कैसे,  वहाँ  इबादत  नज़र  आएगा.


मुझे  मारा  हैं,  मेरी  बेगैरत  ने  वरना,

भला  मरे  को, तू  क्या  मार  पायेगा.


मैं सूरज नहीं, जो ढल जाऊ शाम होते-होते,

मैं वह सुबह हूँ, जो हर रोज नज़र आएगा.


मार लो पत्थर मुझे, जी  चाहे जितने,

ज़िस्म शीशा नहीं रहा, जो टूट जायेगा.


उतार  फेंको  तन से, शराफत  की  चादर,

नज़र घुमाया अगर, तू नंगा नज़र आएगा.


कब तलक मिटाओगे, दिलों से मुहब्बत को,

कोई कच्चा धागा नहीं, जो यह टूट जायेगा,


बंद करों  अब  भी, आग  लगाना ‘अलीन’,

राख से निकला तो सब खाक नज़र आएगा.

STOP HONOUR KILLING ( चित्र गूगल इमेज साभार )

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (30 votes, average: 4.93 out of 5)
Loading ... Loading ...

39 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ajaykumarji के द्वारा
April 1, 2012

मेरे प्यारे भाई अलीन क्या तुम कल दैनिक जागरण के कार्यालय गए थे यदि गए थे तो मुझे यह बताना की क्या कारवाई हुई क्या उन्होंने मेरा लेख छपने के लिए हाँ कर दी है भाई एक बात और कहनी है मेरा स्कूल जाने को मन ही नहीं करता एक दिन जाने को करता है तो एक दिन नहीं बताओ क्या करूँ मेरी इस प्रतिक्रिया का जवाब मेरे ब्लॉग पर भेज देना आशा है की मेरी इस प्रतिक्रिया का जवाब मेरे ब्लॉग पर देने की कृपा करोगे धन्यवाद

    April 1, 2012

    अजय, एक चीज देख रहा हूँ. तुम अपने मार्ग से बिल्कुल भटक रहें हो. बातें तो अच्छा करते हो पर काम जस्ट उल्टा करते हो. जो मुझे बिलकुल पसंद नहीं है. यदि पढाई को बोझ समझकर पढोगे तो कभी भी पढ़ नहीं पाओगे. किताबों को दोस्त बनाओं और उनसे कुछ सीखों. नहीं तो तुम पत्रकार क्या एक भिखारीभी नहीं बन पाओगे. मैं नहीं कहता कि पढाई पैसा या नाम कमाने के लिए करों. तुम्हे खुद के निर्माण के लिए पढाई बहुत जरुरी हैं. कभी सोचे हो तुम्हारे पास क्या है, इस समय कुछ नहीं है. बिल्कुल कंगाल हो. यदि समझते हो कि मम्मी-पापा की संपत्ति मेरी संपत्ति हैं तो बहुत बड़े ग़लतफ़हमी में हो क्योंकि तुम्हारे पास सिर्फ उनका प्यार और आशीर्वाद ही हैं. इसके सिवा उनके किसी भी चीज पर तुम्हारा कोई हक़ नहीं है. यदि तुम सचमुच खुद्दार और ईमानदार हो तो अपने पैरों पर खड़े होकर दिखाओं. अच्छा चलो यह बताओं यदि मैं कहूँ कि आपके पिता जी की पूरी कमाई और सम्पति में आग लग जाएँ तो आपको कैसा लगेगा…….बुरा लगेगा न……क्यों ? क्योंकि उससे तुम्हारा स्वार्थ जुड़ा हूँ है. पर ध्यान से सोचोगे तो पाओगे कि उनकी कमाई और सम्पति में तुम खुद आग लगा रहे हो पर तुम्हे यह बुरा नहीं लगता …क्यों? क्योंकि उससे तुम्हारा स्वार्थ पूरा हो रहा हैं….

ajaydubeydeoria के द्वारा
March 30, 2012

रात्रि 12 .10 . क्षमा चाहते हैं. हम स्वं भी नहीं सोच पा रहे हैं कि यह रचना हमसे छूट कैसे गयी…. कितनी आग लगाये बैठे हो सीने में. कुछ हमको भी दे दो….. तुम तो ठहरे शाकाहारी, हमहीं जिगर से बीडी जला लिया करेंगे. कौन ससुरा तुम्हारी मुहब्बत को मिटाने चला है…..उसकी ऐसी कि तैसी…..हम हैं न तुम्हारे साथ. मजाक में मत लेना, सही कह रहे हैं. किसकी इतनी हिम्मत जो तुमको तोड़ सके, हम उसको पहले ही तोड़ डालेंगे. मेरे हरदिल अज़ीज़ लगे रहो……

    March 31, 2012

    भाई, हमें किसी को तोड़ना नहीं है. मैं आने वाले कल की तस्वीर दिखाना चाहा हूँ की समय रहते मान-मर्यादा के नाम पर अमानवीय कृत्यों को बंद नहीं किया गया तो कल उनके साथ भी वही होगा और शायद अब शुरू भी हो गया है….मैं हिंसावादी नहीं हूँ कि मैं किसी को तोड़ता फिरू सबको जीने का अधिकार है……परन्तु शराफत के कपडे नंगों पर अच्छे नहीं लगते इसलिए ……नंगों को नंगा कर रहा हूँ…..बस आपको मेरा साथ देना हैं तो बस बुरे का विरोध करिए चाहें बच्चे करे या बाप…..

smtpushpapandey के द्वारा
March 30, 2012

प्यारे बेटे अलीन इन नवरात्रियों में मेरी भविष्यवाणी है की आपकी इच्छा जरुर पूरी होगी आपकी शादी अपनी मनपसंद लड़की से जल्द होने वाली है में देवी माँ से येही प्रार्थना करती हूँ हे देवी माता सारी समस्याओं को दूर करके जल्द आपकी शादी कर दे कविता बहुत पसंद आई शुभकामनाओं सहित मात्र तुल्य smt पुष्पा पाण्डेय

    March 30, 2012

    सादर चरण स्पर्श! एक माँ का प्यार और आशीर्वाद मिला…..इससे बढ़कर मेरे लिए क्या हो सकता है…….. आपका पुत्र तुल्य अनिल

sinsera के द्वारा
March 30, 2012

अनिल जी, शांत भव….. बंद करों अब भी, आग लगाना ‘अलीन’, जली रस्सियों की ऐंठन न तू मिटा पायेगा…. मेरे ख्याल से अब आप की शादी जल्द से जल्द हो जानी चाहिए..जहाँ तक मुझे लगता है , आप बिहार से हैं. आप मुझे लीना के घर का एड्रेस बताइए. मैं अपने स्तर पर उसको उसके घर से निकाल कर आप से शादी करवाऊं गी.उस की माँ की ..ऐसी की तैसी…देखते हैं कैसे हाथ उठाती है. ऊँगली भी न छू सके गी. अब तो हद हो गयी है. इस बात को मजाक मत समझिये गा..i am very much serious about it. send me her address as soon as possible… नहीं तो मैं समझूँ गी कि आप ही इस शादी के लिए सीरियस नहीं हैं …इस मंच पर उस बेचारी का काफी मजाक बन चुका है…

ajaykumarji के द्वारा
March 29, 2012

प्रिय बड़े भाई अलीन अगर आप लेख छपवाने की कृपा कर देंगे तो यह बता दीजियेगा की लेख कौन से प्रस्थ पर कौन से कौने में और कब छप रहा है में उस अख़बार को संभाल कर रखूँगा मेरी पहली उपलब्धि के रूप में और आपको अपना गुरु सलाहकार और मार्गदर्शक मानते हुए इससे आपकी याद भी मेरे जीवन में बनी रहेगी यह जरुर बताइयेगा की लेख कौन सी तारीख को छप रहा है धन्यवाद

ajaykumarji के द्वारा
March 29, 2012

प्रिय बड़े भाई अलीन मेरा वादा है तुमसे की में ज्यादा ब्लॉग नहीं लिखूंगा बस तुम मेरा लेख दैनिक जागरण के अख़बार में छपा दो मेरे ब्लॉग का कोई भी लेख अगर तुम्हे अच्छा लगे तो वो छपा दो तुम ही लेखन कला के बारे में जानते हो पता है भाई मेरे जीवन की येही ख्वाइश है की मेरा कोई लेख चाहे वो मेरे ब्लॉग का ही हो पर छपे जरुर भाई अगर तुम्हे कोई लेख अच्छा लगे तो मुझे बता देना की तुम्हारा यह लेख अच्छा लगा बस तुम मेरा लेख दैनिक जागरण के अख़बार में छपा दो बस फिर में ब्लॉग्गिंग से अवकाश लेकर अपने करियर बनाऊंगा और ज्यादा समय नहीं बिताऊंगा बस यह ख्वाइश पूरी कर दो आशा है की तुम मेरा कोई लेख छपा दोगे धन्यवाद

ajaykumarji के द्वारा
March 29, 2012

मेरे प्रिय बड़े भाई अलीन आपने कहा था की में इसका समाधान करूँ तो भाई आप मेरे से बड़े हैं क्योंकि आप मेरे सलाहकार हैं आपको लेखन कला का अनुभव हैं आप यह भी समझते हैं की किस लेख में अपरिपक्वता स्पष्ट रूप से झलकती है आप कृपया मेरी एक ख्वाइश पूरी कर दीजिये कृपया आप मेरा लेख अख़बार में छपवा दीजिये धन्यवाद

ajaykumarji के द्वारा
March 29, 2012

मेरे प्रिय अनुज अलीन पहले तो में तुम्हारा आभार प्रकट करता हूँ जो तुमने मुझे इतनी अच्छी सलाह दी भाई में तुम्हे एक बात बता दूं की में अपने लेख एक कॉपी में रखकर इसलिए रखता था क्योंकि मेने अपने लेख जागरण को कई बार भेजे मेरे लेख की कोई सुनवाई नहीं हुई और अभी भी ब्लॉग लिखता हूँ तो मेरे ब्लॉग जागरण के अख़बार में छपते ही नहीं और मेरा चयन इलेक्शन २०१२ ब्लॉग कांटेस्ट में भी नहीं हुआ एक बार मेने संता क्लौज को पत्र लिखा था वोह भी नहीं छपा कई जगह लेख दिए पर कोई सुनवाई नहीं होती थी इसलिए में अपने लेख कॉपी में रख देता था तुम्हारा हार्दिक आभार जो तुमने मुझे प्रतिक्रिया दी और मार्गदर्शन किया हार्दिक आभार धन्यवाद

    March 29, 2012

    अजय भैया, मैं आपकी बातों से समझ नहीं पाया कि आखिर हम दोनों में से बड़ा कौन है……क्योंकि अभीतक मैं यही समझ रहा था कि आप मेरे अनुज हो और मैं आप से बड़ा हूँ. कृपया समाधान करें……यदि आप हमसे बड़े हैं तो मैं जो तुम संबोधन किया हूँ उसके लिए मांफी चाहूँगा और यदि मैं आप से बड़ा हूँ तो स्पष्ट हैं कि अभी आपको बहुत कुछ सीखना हैं क्योंकि अभीतक आपको यह नहीं पता कि अनुज किसको कहते है और अग्रज किसे कहते हैं. जो शब्द आप सुनते हो वही इस्तमाल कर देते हो ………आपके लेख और विचार में अपरिपक्वता साफ़ झलकता हैं. वैसे भी आप अपना मूल्याकन स्वयं नहीं कर सकते. इस मंच पर एक से बढ़कर एक लेखक और प्रतिभा पड़े हैं, उनकी तो क़द्र हो ही नहीं पा रही हैं…अभी तो आप को बहुत कुछ सीखना है. हाँ मैं अपनी बात नहीं कर रहा हूँ क्योंकि ….मैं न ही लेखक बनना चाहता हूँ, न ही कवि न और न ही पत्रकार. परन्तु मुझे जो बनना है, मैं खुद बन जाऊंगा. किसी का मोहताज नहीं हूँ…………..बस खुद पर विश्वास करना सिख लो …उसके मुताबिक काम करों… सब अच्छा होगा …………………पर हाँ इस बात का अभिमान न हो तो ही अच्छा….

Santosh Kumar के द्वारा
March 27, 2012

अलीन जी ,नमस्कार बहुत आग भरी है आपके सीने में ,.इसकी सार्थकता सिद्ध हो यही कामना है…धारदार प्रस्तुति आपकी ,.बहुत बधाई

    March 29, 2012

    सादर नमस्कार! जब आप जैसे लोग साथ है तो इस आग की सार्थकता जरुर सिद्ध होगी….आप निश्चिन्त रहें……हार्दिक आभार.

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
March 27, 2012

जिसने बेघर किया, चंद सिक्कों की खातिर, देखता हूँ, वह अपना घर कहाँ बनाएगा. जिन फूलों को मसल बैठे, अपनी खुदगर्ज़ी में, वो क्योंकर न अब, अंगारा नज़र आएगा.. प्रिय अलीन जी गहन अभिव्यक्ति और सुन्दर छवि के साथ मन का गुबार बाहर निकालती हुयी रचना ..खबरदार करती हुयी लोगों को और आगाह करती हुयी ..प्रेम सर्वोपरि है …प्रेम प्रेम रहे to बधाई हो भ्रमर ५

    March 27, 2012

    यक़ीनन प्रेम सर्वोपरी है यदि प्रेम, प्रेम रहे तो. परन्तु जब समाज इसका तमाशा बनाएगा…..तो भला वो खुद को तमाशा बनने से कैसे रोक पायेगा…….एक बार फिर आपका हार्दिक आभार.

Rajesh Dubey के द्वारा
March 27, 2012

नफरत से भरी दुनिया में काव्य के माध्यम से सुन्दर सन्देश के लिए बधाई.

    March 27, 2012

    सुन्दर नहीं, कड़वा सन्देश दिया हूँ, जिसका समर्थन मैं खुद नहीं करता…..परन्तु जब लोग हिंसा को ही क्रांति मानते हैं तो जिन पर यह अत्याचार हो रहा है. वो भी तो इसका जवाब हिंसात्मक ही देंगे…….मैं अपनी बात नहीं कर रहा हूँ. आने वाले कल की तस्वीर दिखा रहा हूँ……

MAHIMA SHREE के द्वारा
March 26, 2012

बधाई….आपको मुझे मारा हैं, मेरी बेगैरत ने वरना, भला मरे को, तू क्या मार पायेगा……बहुत खूब (पर इस पंक्ति में शायद गैरत होना चाहिए..)

    March 27, 2012

    शायद नहीं, यक़ीनन होना चाहिए. मैं खुद सही ठहराता, यदि इसे आप लिखी होती तो. . लगता है आप भूल गयी की मैं ‘अलीन ‘ हूँ, महिमा नहीं . अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए अपने द्वारा लिखा हूँ शेर, आपके सामने रख रहा हूँ. जिसमे आपके द्वारा कुछ और होना चाहिए पर मेरे द्वारा कुछ और ही हैं मित्र……गौर फरमैयेगा ……. सवारने में लगा हूँ खुद को, क्योंकि नफरत सी हैं जिंदगी से मुझे, जिस दिन मुहब्बत हो गयी, सबकुछ तबाह कर दूंगा…..अब रात भर, इसका अर्थ निकालते रहिएगा और सोचते रहिये कि यह नहीं वह होना चाहिए…..शुभ रात्रि.

yogi sarswat के द्वारा
March 26, 2012

बंद करों अब भी, आग लगाना ‘अलीन’, राख से निकला तो सब खाक नज़र आएगा. अलीन जी नमस्कार ! हम जिस परिवेश में रहते हैं उस परिवेश में हर तरह के लोग होते हैं ! आपके गुस्से को आपकी रचना में देख कर महसूस करता हूँ की आप की रचनायें बहुत कुछ कह जाती हैं , आपकी रचनायें दिमाग की नसों को झकझोर देती हैं !

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
March 26, 2012

बहुत सुन्दर कविता,अनिल जी. कब तलक मिटाओगे, दिलों से मुहब्बत को, कोई कच्चा धागा नहीं, जो यह टूट जायेगा, क्या सुन्दर पंक्तियाँ हैं.

    March 27, 2012

    सादर प्रणाम! हार्दिक आभार………हकीकत की पुनरावृति के लिए.

akraktale के द्वारा
March 25, 2012

अनिल जी नमस्कार, सुन्दर भावनात्मक रचना. बस कुछ जगह स्त्रीलिंग पुल्लिंग का ध्यान नहीं दिया है, इस पर ध्यान दें.

minujha के द्वारा
March 25, 2012

मजबुत ईरादों को दर्शाती एक भावपूर्ण रचना अलीन जी

आशुतोष पाण्डेय के द्वारा
March 25, 2012

वास्विकता के आयने में शब्दों को ढाल कर, काव्य की परिणति… एक सार्थक प्रयास… अनिल जी साधुवाद…

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
March 25, 2012

मैं सूरज नहीं, जो ढल जाऊ शाम होते-होते, मैं वह सुबह हूँ, जो हर रोज नज़र आएगा. स्नेही अलीन जी, सादर बहुत भावनात्मक , आपका होंसला इन पंक्तियों में काबिले तारीफ़. सफलता हेतु शुभ कामना.

vikramjitsingh के द्वारा
March 25, 2012

अलीन जी, सादर, हर पंक्ति में कुछ बात है…….. भावपूर्ण रचना…….

    March 26, 2012

    सादर नमस्कार! यहाँ बातें ही तो …..और क्या? ….हार्दिक आभार!

dineshaastik के द्वारा
March 25, 2012

मार्मिक गजल, हर पंक्ति सराहनीय…..

jlsingh के द्वारा
March 25, 2012

कब तलक मिटाओगे, दिलों से मुहब्बत को, कोई कच्चा धागा नहीं, जो यह टूट जायेगा, कच्चा धागा से बंधे, मजबूत वो हो जायेगा! कच्चा शीशा है नहीं जो टूट जायेगा! अलीन जी, परतें अनेक हैं, भावनाएं उनमे कैद है ………………


topic of the week



latest from jagran