साधना के पथ पर

अद्य की स्याही

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तुम्हारे लिए

Posted On: 30 Mar, 2012 Others में

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प्रिय अजय और तुम्हारे उम्र के मेरे सभी अनुज!
आप सभी को शुभाशीष!
अजय, दैनिक जागरण आखबार में तुम्हारा आलेख नहीं छपने पर, तुम्हारे द्वारा प्रस्तुत की गयी विवशता और कमजोरी से बहुत दुखी और आहत हूँ क्योंकि मैं नहीं चाहता कि मेरे छोटे भाई-बहन किसी के सामने विवश हो. अतः आज का आलेख तुम्हे और तुम जैसे दुनिया के सभी बच्चों को समर्पित करने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ है. मैं जब कभी ब्लोगिंग के लिए बैठता हूँ, आप लोगों द्वारा की गयी पोस्टिंग पढ़ना नहीं भूलता. आप सभी के प्रोत्साहन के लिए कमेन्ट के साथ रेटिंग करना मेरी आदतों में शुमार हैं. परन्तु मैं देखता हूँ कि आप लोग पढाई-लिखाई छोड़कर हमेशा ब्लोगिंग करते रहते हो. कुछ महीने पहले जब मैं इस मंच पर ब्लोगिंग शुरू किया तो एक कक्षा ८ वीं या ९ वीं की बच्ची ब्लोगिंग किया करती थी. मैं अक्सर उसे प्रोत्साहित करने के साथ उसके कमियों को दर्शाता रहता था ताकि वह बेहतर लिख सके. आजकल वह ब्लोगिंग बंद कर दी है. कारण कुछ भी हो पर कही न कही खुद को दोषी पाता हूँ और साथ ही उसे मिस करता हूँ. हो सकता है कि इस समय वह मेरी यह पोस्टिंग पढ़ रही हो. अजय, चिंकी और मेरे सभी छोटे भाई-बहन; मैं कभी नहीं चाहता कि आप सभी ब्लागिंग बंद कर दो वरन आप सभी अपना अधिक से अधिक समय पढाई पर दो. अजय तुम्हारी सबसे बड़ी कमी यह है कि तुम अपनी बात बड़ों की तरह रखना चाहते हो. तुम अधिकतर उन विषयों का चयन करते हो जो तुम्हारी समझ के बाहर है और इस कोशिश में तुम न ही बड़े बन पाते हो और न ही बच्चे रह जाते हो. ऐसा कुछ नहीं है कि आप बुरा या ख़राब लिखते हो क्योंकि आपकी कई ऐसी पोस्टिंग हैं जो दर्शाती हैं कि आप अपनी उम्र के हिशाब से हम बड़ों से बहुत अच्छे हो. तुम्हारी इच्छा इतनी बड़ी भी नहीं है कि हम सभी इसे पूरा न कर सके. संभवतः आपकी उम्र १०-१५ वर्ष के बीच की होगी. कभी मैं भी आपकी उम्र का था. परन्तु लिखने से ज्यादा चिंतन और मनन को समय देता था और यह आज भी जारी है. ताकि मैं समझ सकू कि क्या गलत है और क्या सही है? मैं भी चाहता था कि मेरे विचार अख़बारों में प्रकाशित हो; नाम और पैसा के लिए नहीं बल्कि उस हकीकत को व्यक्त करने के लिए जिसमे हम जी रहे है. परन्तु उसके प्रभाव को महशुस नहीं कर रहे है. अपने विचारों को अधिक से अधिक लोगों तक पहुचाने की कोशिश में मैं कई क्षेत्रीय पत्रकारों और लेखकों से मिला. पर उसके लिए मेरे पास पैसे नहीं होते थे कि मैं उनकी मांग पूरी कर सकू. अतः मेरी मदत करने को कोई तैयार नहीं होता था. जो तैयार हुए भी तो वो मेरी कृति को अपना नाम से प्रकाशित कर दिए. इससे मेरा मन बहुत व्यथित हुआ और मेरी नाराजगी मेरे होठों से एक शेर के रूप में निकली. उस समय मैं लगभग १५ वर्ष का रहा हूँगा. वह शेर आप सभी लोगों के साथ शेयर करना चाहूँगा.


कुछ लोग अपना गलत पहचान देते हैं,
कि गैरों के शेरों को अपना नाम देते हैं;
कुछ लोग ऐसे भी है यारों,
जो किसी लायक नहीं,
पर लोग उन्हें इनाम देते हैं.


उसके बाद से लेकर अबतक मैं प्रकाशन को लेकर किसी से विनती अथवा आग्रह नहीं किया. हाँ जबकभी किसी कॉलेज में कुछ कहने को मौका मिला तो अपने विचारों और कृतियों को प्रस्तुत किया और साथ ही छात्रों से लेकर अध्यापक वर्ग तक सभी को प्रभावित किया. आओ कुछ और अपने बारे में तुम्हे बताता हूँ ताकि तुम मुझे लेकर किसी भी प्रकार की गलतफहमी न पालों. मैं कोई कवि या लेखक नहीं हूँ जिसकी कभी कोई आलेख या कृति उसके नाम से प्रकाशित हुई हो. जबकि आज मैं अपने पैरों पर खड़ा हूँ और दो पैसे कमाता हूँ. इसलिए मेरे पास एक लैपटॉप और इन्टरनेट कनेक्शन है जिसके माध्यम से आप लोगों से अपने विचारों और अनुभवों को बाटते हुए, अच्छा लगता है. मुझे खुद के मानव होने का एहसास है और मैं चाहता हूँ कि यह एहसास आप सभी के अन्दर भी हो. मानव जो संसार की सबसे सुन्दर और सर्वश्रेष्ठ कृति हैं जिसे इश्वर ने महत्वकांक्षा, दयालुता, क्षमा और प्रेम जैसे गुणों से अलंकृत करके इस धरती पर भेजा ताकि हम इसे स्वर्ग बना सके. हम इंसानों के पास वह दृढ़इच्छा शक्ति है जिससे भगवान भी वंचित है.अतः हम चाहें तो भगवान बन सकते हैं. पर भगवान कभी इंसान नहीं बन सकता. यदि कुछ बड़ों को लगता है कि मैं कहीं से गलत बोल रहा हूँ तो मैं चाहूँगा कि वह किसी एक उदहारण के साथ मेरी बातों को काटना चाहें.
मेरे प्यारे छोटे भाइयों और बहनों ! यह सारी बातें मैं आप सबसे इसलिए कर रहा हूँ ताकि आप खुद की पहचान कर सको और इस बात का एहसास कर सको कि आप सभी दुनिया के सर्वश्रेष्ठ प्राणि की संताने है. आप अपनी शक्ति को सही दिशा में लगाओं ताकि इस संसार को खुबसूरत बनाया जाय बिल्कुल तुम्हारी तरह. आज हरेक चीज का व्यवसायीकरण होता जा रहा हैं और मैं चाहूँगा कि आप सभी इससे वंचित रहों. चलते-चलते मैं अपनी पहली कृति, जिसकी रचना १३ वर्ष की उम्र में किया था, आप लोगों के सामने इस आशा के साथ रखना चाहूँगा
कि उसमे छुपे हुए सन्देश आप तक भली भांति पहुँचे.

The WatchThe Watch

The watch is very important,

Because it has not any contact,

Its needle wanders always;

It  may  be nights  or  days.

You will do your work enough,

You  succeed  in  your  aim;

If you will ruin your time,

You  lose  your  good  life.

The watch is very important,

Because it has not any contact;

It   says us  something

‘Do you know anything?’

If you will develop your mind,

You bright like a good child;

If you will get up at break of day,

You live always  gay.



आप अनुजों को मेरी बातें जो समझ में नहीं आयी हो, कृपया उसे समझने की कोशिश न करें क्योंकि वह हम बड़ों के लिए हैं. आप सभी के लिए वहीँ है जो आपको आसानी से समझ में आ जाएँ और अंत में दैनिक जागरण से विनती करता हूँ कि यदि एक बच्चे की छोटी सी इच्छा पूर्ण करते हैं तो मैं समझता हूँ कि इससे आपका ज्यादा कुछ  नुकसान नहीं होगा.
आप सभी का शुभचिंतक
अनिल कुमार ‘अलीन’

( चित्र गूगल इमेज साभार )



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52 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
April 17, 2012

अलीन जी,,,,,,आपने सही कहा | उचित निर्देश को लोग अब ग़लत ले बैठते हैं | अब तो डर लगता है , निर्देश देने में ! सृजनशीलता में शॉट- कर्ट नहीं चलता ! यह तो तप है, जितना तपोगे – कुंदन बनोगे !

    April 18, 2012

    फिर सही से परहेज क्यों ? दर किस बात की. यदि हम सच का समर्थन करते है तो डरने का सवाल ही नहीं. पर यदि हमें यह लगता है कि किसी को सही रह दिखने पर अपमानित होना पड़ेगा इसलिए जुबान बंद रखना ही ठीक है. इसका मतलब कि हम अपने सम्मान के लिए बोलना चाहते है न कि सच के लिए. इसप्रकार हम स्वयं गलत हो जाते हैं….

Ritesh Chaudhary के द्वारा
April 13, 2012

कुछ लोग अपना गलत पहचान देते हैं, कि गैरों के शेरों को अपना नाम देते हैं; कुछ लोग ऐसे भी है यारों, जो किसी लायक नहीं, पर लोग उन्हें इनाम देते हैं.  बहुत खूब प्रस्तुति बधाई

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
April 9, 2012

प्रिय,अनिल जी,बहुत ही अच्छा आलेख.अफ़सोस भी हुआ,पहले क्यों नहीं पढ़ पाया.बहुत ही अच्छा सन्देश दिया है आपने,किशोरों को.इस उम्र में कई सपने होते हैं,जिनके टूटने पर बहुत दुःख होता है.आपकी घड़ी से सम्बंधित पोएम भी बहुत अच्छी है.इतने सुन्दर आलेख के लिए बधाई !

    April 9, 2012

    कोई बात नहीं सर, आप लोगों का बस आशीर्वाद चाहिए. हार को जीत में बदलना तो मुझे आता ही हैं………अनुजों के लिए किया गए प्रयास को आपने सराहा……हार्दिक आभार.

ajay kumar pandey के द्वारा
April 4, 2012

मेरे प्रिय बड़े भाई अलीन जी कल में लैपटॉप पर यह प्रतिक्रिया इसलिए देख नहीं पाया क्योंकि लाइट चली गयी थी आपने कहा था की एक जगह लिंक मिला है तो में आपको अपना एड्रेस अब भेज रहा हूँ मेरे घर का पता

    April 4, 2012

    जी आपके घर का पता मुझे मिल गया. यदि काम हो जायेगा तो एक प्रति आपको मिल जायेगा. वैसे मैं आपको इ-मेल करने को बोला था और आप पब्लिस कर दिए हैं. लगता हैं प्रकाशन से पहले ही ख्याति पाना चाहते हैं. सुधर जाइये प्रभु…….और पढाई पर ध्यान दीजिये….

ajay kumar pandey के द्वारा
April 3, 2012

मेरे प्रिय बड़े भाई अलीन जी मिलते है ब्रेक और आराम के बाद क्या है न स्कूल में पढ़ते पढ़ते बहुत थक गया हूँ यह समय है ही ऐसा रात में आपका कमेन्ट नहीं देख पाया समय ही नहीं मिला और आज सुबह स्कूल गया किताब का पता करने कापियों में कवर कौन से कलर का लगेगा यह स्कूल वालों के भी कैसे कैसे नखरे हैं किताब का पता करके अब आया हूँ काम भी किया है कापियों में मिलते हैं २ बजे के बाद खाना खाकर आराम करकर और फ्रेश होकर गुड afternoon बड़े भैया जी धन्यवाद

rekhafbd के द्वारा
April 3, 2012

अनिल जी ,बहुत ही बढ़िया आलेख लिखा है आपने ,घडी के माध्यम से आपने समय का महत्व अच्छे से समझाया |मै आपके विचारों से सहमत हूँ कि ईश्वर ने मानव को बहुत से गुण प्रदान कर के इस धरती पर भेजा है और वह इसे स्वर्ग बना सके ,लेकिन बहुत दुःख कि बात है ऐसा होता नहीं है |एक बहुत ही बढ़िया लेख |

ajay kumar pandey के द्वारा
April 3, 2012

मेरे प्रिय बड़े भाई अलीन जी में आपकी प्रतिक्रिया इसलिए नहीं देख पाया क्योंकि में आज अपने स्कूल गया था किताबें देखने और पढाई करने जब घर आया तो आपकी प्रतिक्रिया सामाजिक रूढ़ीवाद का चक्रवात आलेख में देखि यह मेरा ही विचार है शैली कुछ अलग है जैसा आप समझ रहे हैं मैंने यह लेख इसलिए लिखा है क्योंकि आप जब अजय के नाम से लेख अपनी किताब में छपवायेंगे तो येही लेख अपनी किताब में छपवायेंगे यदि आपको उचित लगे तो धन्यवाद आपका भाई अजय पाण्डेय

    April 4, 2012

    भैया! आप शायद भूल रहें हो कि हममे से बड़ा कौन हैं…….सफाई मत दो भाई. हम तो वो चीज हैं कि बंद लिफाफे के अन्दर बंद पत्र को पढ़ जाएँ…….हाँ अपना एड्रेस e mail कर दीजिये. एक जगह लिंक मिला है. हो सकता है. आपका काम बन जाएँ……

ajay kumar pandey के द्वारा
April 2, 2012

प्रिय पुत्र तुल्य अलीन आप जिस लड़की से विवाह करना चाहते है यदि आपके परिवार वाले इस रिश्ते को अपनाने में सहमत हैं तो यदि मेरी कोशिश इसमें काम आ सकती है तो में तुम्हारे साथ उस लड़की के घर जाकर उन्हें समझाने की कोशिश करुँगी शायद मेरी कोशिश से तुम्हारा कुछ काम बन जाये पक्का तो नहीं कह सकती हूँ सिर्फ कोशिश कर सकती हूँ लेकिन तुम्हारे साथ संपर्क कैसे हो इसका रास्ता साफ़ करो तुम्हारी मात्र तुल्य श्रीमती पुष्पा पाण्डेय

    April 2, 2012

    सादर चरण स्पर्श! आपके प्यार और आशीर्वाद के लिए….हार्दिक आभार. कोई फायदा नहीं सब कुछ करके देख लिया हूँ. अब खुद के अलावा किसी और पर विश्वास नहीं रहा. मैं अपनी लड़ाई खुद लड़ना चाहता हूँ. वैसे कहा भी जाता है, जिंदगी का बोझ तो अपने ही कन्धों पर ढोया जाता है. दूसरों के कंधो पर सिर्फ अर्थियां ही उठती हैं. मुझसे अबतक इ-मेल करके बहुत लोग नंबर मांग चुके हैं. परन्तु मैं अभी किसी भी व्यक्ति से किसी भी प्रकार का कम्युनिकेशन नहीं रखना चाहता. क्योंकि अगले पल मेरे साथ क्या होगा यह मुझे भी नहीं पता.मैं जिस वातावरण में रहता हूँ वह आप लोगों के लिए जितना सरल दिखता हैं वो उतना ही हकीकत में जटिल हैं. मैं नहीं चाहता की मेरे साथ-साथ कोई और भी इसका शिकार हो. हाँ यदि इस धर्म और कर्म युद्ध में मैं जिन्दा बच जाता हूँ तो आप सभी का साथ जरुर चाहिए ताकि फिर भविष्य में किसी दुसरे अनजानी-अनिल को अपनो के खिलाफ खड़ा न होना पड़े. जिससे बाप और बेटे के रिश्ते की गंभीरता बनी रहें. साथ ही हम और आने वाली पीढ़िया इस गंभीर विषय पर गंभीरता से विचार करें ताकि मान-मर्यादा, मानवता और अधिकार तीनों की रक्षा हो सके…… आपके प्यार और आशीर्वाद का अभिलाषी! आपका पुत्र तुल्य अनिल

    D33P के द्वारा
    April 29, 2012

    ” मैं अपनी लड़ाई खुद लड़ना चाहता हूँ. वैसे कहा भी जाता है, जिंदगी का बोझ तो अपने ही कन्धों पर ढोया जाता है. दूसरों के कंधो पर सिर्फ अर्थियां ही उठती हैं. ” बहुत अच्छे अनिल जी हमारी शुभकामनाये आपके साथ है पर शायद समय बीत रहा है ,ऐसा न हो कुछ ज्यादा देर हो जाये,इस बात का भी ध्यान रखियेगा !

    April 29, 2012

    aap to mere jaan ke pichhe haath धोकर पद गयी हैं. लगता है मेरी जान लेकर ही rahengi……kuchh na kuchh to kar hi raha hun….aap nishchint rahen…..

ajay kumar pandey के द्वारा
April 2, 2012

मेरे प्रिय बड़े भाई अलीन जी में भगवान से प्रार्थना करता हूँ की आपकी व्यक्तिगत जीवन की परेशानियाँ जल्द दूर हो जाएँ भगवान मेरी यह प्रार्थना भगवान जरुर सुनेंगे यदि आपकी पहली पुस्तक में अगर मेरा आलेख छपा तो मुझे यह बता दीजियेगा की आपकी पहली पुस्तक का क्या नाम है और कौन से प्रकाशक है ताकि में वोह पुस्तक खरीद कर रख लूँगा धन्यवाद

    April 2, 2012

    अजय, जब मेरी पुस्तक प्रकाशित हो जाएगी तो मैं खुद उसकी एक प्रति तुम्हारे हाथों में सौपूंगा. चिंता मत करों. बस तुम पढाई पर ध्यान दो……जहाँ तक रहा तुम तक पहुँचने की बात तो मैं कभी भी कहीं पहुँच सकता हूँ……जितना तुम्हारा मुझतक पहुचना मुश्किल है उतना ही मेरा तुम तक पहुचना आसान हैं….बस समय औए स्थिति की बात हैं. इसीलिए कहता हूँ कि माँ-बाप के धन-दौलत का मोह छोड़कर, खुद के पैरों पर खड़ा हो जाओ…एक अपनी पहचान बनाओ. लोग यह नहीं कहें कि तुम उनके बेटे हो बल्कि लोग यह कहें कि वो तुम्हरे माँ-बाप हैं. जिस दिन तुम यह साबित कर दोंगे तो वह पल तुम्हारे माता-पिता के लिए बहुमूल्य पल होंगे. साथ ही इसी में उनका सही सम्मान है…..

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
April 1, 2012

अलीन जी,,,,,,आपने सही कहा | उचित निर्देश को लोग अब ग़लत ले बैठते हैं | अब तो डर लगता है , निर्देश देने में ! सृजनशीलता में शॉट- कर्ट नहीं चलता ! यह तो तप है, जितना तपोगे – कुंदन बनोगे ! अजय को मैं भी कुछ कहना chahta tha पर तकनीकी कारणों से ऐसा न हो सका | (मेरे ब्लौग पर -( चतुर मदारी) पढ़ें ) ! उपयोगी आलेख के लिए -बधाई !!

ajaykumarji के द्वारा
March 31, 2012

मेरे प्रिय बड़े भाई अलीन आपकी पोएम अच्छी है मेने इसे अपनी एक कॉपी में नोट कर लिया है इसमें आपने जो सन्देश दिया है वह भी अच्छा है उसमे छुपी बात मुझे समझ आई है में देख रहा हूँ की आप इस पत्र की प्रतिक्रिया का जवाब ही नहीं दे रहे हैं आप मेरे लेख अख़बार में छपाने के अभियान को पूरा करके और सफल होकर लौटे आप दुखी मत होना की मेरे भाई अजय का लेख नहीं छपा मुझे लेख छपवाने का लालच नहीं है आप इस अभियान में सफल होकर लौटे इसी कामना के साथ आपका भाई अजय कुमार पाण्डेय

    April 1, 2012

    अजय, मुझे जितनी कोशिश करनी थी मैं किया. आप अभी पढाई पर ध्यान दो…

vikramjitsingh के द्वारा
March 31, 2012

प्रिय अनिल जी, अति उत्तम विचार हैं आपके, हम आपसे पूर्णतया सहमत हैं……

    April 1, 2012

    सादर नमस्कार! आपकी सहमिति मिली और मेरी सहमिति बनी…..हार्दिक आभार.

चन्दन राय के द्वारा
March 31, 2012

अलीन आदरणीय साहब, आपने हर महत्वपूर्ण बिंदु को छुआ है और उसका आंकलन किया है ! बहुत सटीक विश्लेषण और बिलकुल ठीक विचार ! बहुत बेहतर

minujha के द्वारा
March 31, 2012

अलीन जी  आपने बहुत अच्छा संदेश दिया है,साथ ही आपकी घङी के ऊपर लिखी कविता तो हर बच्चे के लिए है,मैने उसे अपनी बच्ची के लिए सेव कर लिया है,बहुत बढिया

    April 1, 2012

    सादर नमस्कार! शुक्रिया…….यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है….वैसे बच्चों के लिए बहुत कुछ लिखा हूँ…..फिर कभी आपकी सेवा में हाजिर करूँगा….

ajaydubeydeoria के द्वारा
March 30, 2012

अनिल भैया नमस्कार, बहुत देर से प्रयास कर रहा था कि मैं भी कुछ कहूँ. इस नेट कि स्पीड ने सब बेडा-गर्क कर दिया. अब चूँकि थक गया हूँ. और 11 .11 pm हो चुके हैं. तो भईया गुड-नाईट. फिर मुलाकात होगी ब्रेक के बाद. वैसे आप पत्र लिखो,कविता लिखो या कोई लेख लिखो. सबका अपना एक अलग महत्व है.

    April 1, 2012

    प्रशंसा के लिए शुक्रिया अजय भाई…..वैसे आप मिर्च मसाला बहुत लगाते हो…..

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    April 7, 2012

    अनिल भाई, हम मसालची थोड़े ही हैं कि मिर्च-मसाला लगायेंगे.. और न हम कौनो कुक हैं.

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
March 30, 2012

अजय, चिंकी और मेरे सभी छोटे भाई-बहन; मैं कभी नहीं चाहता कि आप सभी ब्लागिंग बंद कर दो वरन आप सभी अपना अधिक से अधिक समय पढाई पर दो. अजय तुम्हारी सबसे बड़ी कमी यह है कि तुम अपनी बात बड़ों की तरह रखना चाहते हो. तुम अधिकतर उन विषयों का चयन करते हो जो तुम्हारी समझ के बाहर है .. एक अच्छा सन्देश अनिल जी …सुन्दर भाव हर चीज का एक वक्त है उस वक्त उसे करना चाहिए अति कहीं न हो अपना भविष्य और हालत देखते हुए और अपनी आयु के अनुसार चलाना श्रेयस्कर होता है … जय श्री राधे भ्रमर ५

    April 1, 2012

    सादर नमस्कार! शुक्रिया…….आपने सही कहा. नहीं तो अति करने पर अति ही मिलता है…..एक बार फिर आपका हार्दिक आभार!

akraktale के द्वारा
March 30, 2012

अनिल जी नमस्कार, बहुत सुन्दर आज एक शिक्षक की तरह आपने अपने विचार रखे. पढ़कर मन को संतोष मिला.कविता भी आपने छोटी उम्र में शायद अपने लिए ही लिखी हो किन्तु आज उस उम्र के सभी बच्चों के लिए सार्थक सन्देश दे रही है.बस मै तो यही कहूँगा यही भावना बनाए रखें. कीप इट अप.

    April 1, 2012

    सादर प्रणाम! आपका आशीर्वाद पाकर खुद को गौरान्वित महशुस करता हूँ…

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
March 30, 2012

स्नेही अनिल जी, सादर अभिवादन. मेने पूरा लेख पढ़ा, बात समझी, समर्थन है, बधाई.

jlsingh के द्वारा
March 30, 2012

प्रिय अनिल जी, आपके विचार श्रेष्ठ हैं! घड़ी यानी समय के ऊपर लिखा गया पोएम भी उत्तम सन्देश देती है. अपनी बात को इसी तरह संयत शब्दों में रखते रहें. आप अपने उद्देश्य में सफल हों इस कामना के साथ – जवाहर!

    April 1, 2012

    सादर प्रणाम! समय-समय पर आपका प्यार और आशीर्वाद मिलता रहता हैं…..यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है.

ajaykumarji के द्वारा
March 30, 2012

प्रिय बड़े भाई अलीन अगर मेरा लेख नहीं छपे तो आप दुखी न हो आपने जो swantwana मुझे दी है अपने पत्र के द्वारा उससे मेरा मनोबल बढ़ा है में समझ गया की अख़बार में लेख छपना कोई बड़ी बात नहीं होती में खुद ही जब पत्रकार बनूँगा तो खुद ही मेरे लेख छप जायेंगे बड़े होकर में मुंशी प्रेमचंद मैथिलीशरण गुप्त महादेवी वर्मा जैसा बन सकता हूँ बस आपका आशीर्वाद चाहिए अगर आप लेख छपवा सके तो मेरे लेख की प्रति गूगल image द्वारा मेरे ब्लॉग पर भेज देना

    April 1, 2012

    भाई साहब, पढाई पर ध्यान दीजिये और जितना कहता हूँ उतना ही करिए यदि मुझे बड़ा भाई समझते है तो ……जागरण जन्शन से एक बार अपील तो कर दिया हूँ देखिये क्या करते है. अभी उनके पास महान-महान लेखक पड़े हुए हैं यदि उनसे फुर्सत मिलेगी तो आपका लेख वह जरुर छापेंगे. यह मेरा विश्वास है…आप कृपया पढाई पर ध्यान दे.

MAHIMA SHREE के द्वारा
March 30, 2012

मित्रवर अलीन जी…. आपकी साफगोई और आपके मन की सच्चाई आपके लेखन में झलकती है…निसंदेह आप एक कर्तव्यशील नागरिक है जो अपने सामजिक कर्तव्यो का इमानदारी से निर्वहन करना जानता है…..थोड़ी अलग हट के विषय आपने चुना और अपने अनुभव हमार साथ बाटा… आच्छा लगा….आशा है बच्चो ने भी कुछ हद तक जरुर आपकी बात समझी होगी…poem आपकी बहुत अच्छी लगी… मैं दावे के साथ कहती हूँ भविष्य आपका है…समाज आपको समझेगा….आप बहुत दूर तक जाने वाले है….शुभकामना के साथ..

    April 1, 2012

    महिमा जी, वह तो मैं भी जानता हूँ की बहुत दूर तक जाने वाला हूँ…..इतनी दूर की फिर वापस नहीं आने वाला. कोई नयी चीज बताइए न …….

dineshaastik के द्वारा
March 30, 2012

अनिल जी निश्चित ही आपके विचार असाधारण हैं। ऐसे  विचार ही कालान्तर में व्यक्ति को महान बनाते हैं। मैंने कई आदर्शवादी विचारकों के थोड़ा बहुत पढ़ा है। और उनसे प्रभावित भी हुआ हूँ। किन्तु अपनी सीमाओं को समझते हुये, उनका अनुसरण नहीं कर सका। जिसका मुझे खेद भी नहीं है। इसके दो कारण है- एक तो वह हमारी सामर्थ में नहीं था, तथा जो बीत चुका, वह वश में नहीं है। अतः उसका अफसोस करना मूर्खता के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।        मैं आपकी इस बात से कुछ तार्किक कारणों से सहमत नहीं हो सकता कि ईश्वर ने मनुष्य का निर्माण किया है। मैं इसका भी वास्तिक विवेचन नहीं कर पा रहा हूँ कि मनुष्य सुन्दर, दयालु एवं क्षमाशील है। हाँ इनता जरूर निर्णय कर सकता हूँ कि हमें सुन्दर(विचारों से), दयालु एवं क्षमाशील अवश्य बनना है।      मित्र मेरी बात पर यकीन करो ईश्वर मनुष्य के अज्ञान एवं डर के स्वार्थ रूपी संसर्ग से उत्पन्न हुआ है। यह मेरी कल्पना नहीं अपितु अकाट्य सत्य है।     इस संबंध में लिखना तो बहुत चाहता हूँ, किन्तु समय की बेड़ियों में जकड़ा हूँ, बाकी फिेर कभी…….

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    March 30, 2012

    दिनेश सर इस बात से मैं भी सहमत हूँ की हमें सुन्दर(विचारों से), दयालु एवं क्षमाशील अवश्य बनना है। बाकी तो समय के साथ हम अपने जीवन में आये संघर्षो से सीखते जाते है…….और जैसे बुद्धि वैसी समझ विकसित कर लेते है…

    April 1, 2012

    दिनेश भाई, आप एक बार फिर भटक रहे हो. मुझे समझ में अभी तक यह नहीं आया कि आपके और मेरे विचारों में अंतर कहाँ है. लगता है आज मुझे स्पष्ट करना ही पड़ेगा कि ईश्वर क्या है? तो वार्तालाप शुरू किया जाय….आइये ५ मिनट एक साथ बैठते हैं औए इस बिंदु पर एकग्रता से बात करते हैं. मुझे भी पता हैं कि चाँद उपग्रह हैं, मामा नहीं; मुझे भी पता हैं कि पृथ्वी गृह है कोई माता नहीं, मुझे भी पता हैं कि सूर्य एक तारा है, कोई देवता नहीं. मुझे भी पता है कि चाँद, पृथ्वी का चक्कर; पृथ्वी सूर्य का चक्कर और सूर्य आकाशगंगा का चक्कर लगता हैं. और इससे से भी आगे बहुत कुछ जो एक आम मानव मस्तिष्क नहीं जानता है और न ही समझ सकता है. पर मैं अपनी बात सामने वाले के ग्रहण शक्ति को देखते हुए रखता हूँ. यदि उसे पहला स्टेप समझ में आ जाता है तब मैं उसके सामने दूसरा स्टेप रखता हूँ. आप इस पर विश्वास करते हो न की मानव और अन्य प्राणियों का तत्कालीन स्वरुप कई वर्षों और चरणों की भौतिक और रासायनिक प्रक्रियाओं ( प्रकृति) का परिणाम है और आपने इस तथ्य को माना है की प्रकृति ही ईश्वर है. जिसने सबको जन्म दिया हैं. मैं न ही डर और अज्ञान से जन्मे को ईश्वर मानता हूँ और नहीं प्रकृति को बल्कि इनदोनो विचारों से कहीं हटकर उस तथ्य पर जो ज्ञान, चिंतन और मनन पर आधारित है. ज्ञान और डर से जन्मे पर मैं बात नहीं करूँगा क्योंकि मैं जनता हूँ कि उसके हकीकत से आप भलीभांति वाकिफ हो. पर कुछ्ह बातें प्रकृति पर कहना चाहूँगा. प्रकृति तो सिर्फ धरती पर हैं धरती के बाहर नहीं तो इसे भी सर्वशक्तिमान मानना हमारी भूल है. क्योंकि इस पृथ्वी से भी कई बड़े और रहस्यमयी तथ्य है जैसे कि करोड़ो सूर्य ( यानि की तारे), करोड़ों ब्लैक होल, करोड़ो आकाशगंगाएं, और ब्रहमांड जो किसी एक शक्ति से संचालित होते हैं और वह शक्ति इन सब से संचालित होती है . सब के सब एक दुसरे में समाहित हैं जिसकी परिकल्पना मात्र से एक आम मानव मस्तिष्क घबड़ा जायेगा क्योंकि यह उसके समझ के बाहर का क्षेत्र है. बस यही ईश्वर हैं. एक छोटे से कड़ में में पूरा ब्रह्माण्ड समाहित हैं जबकि हरेक कड़ इस ब्रह्माण्ड का एक अवयव है. मैं यहाँ अन्धविश्वास की बात नहीं कर रहा हूँ मैं यहाँ ज्ञान, विज्ञान और अध्यात्म की बात कर रहा हूँ जो कि एक धर्म उपासक के समझ के बाहर का क्षेत्र है. यदि अब भी ईश्वर को लेकर कोई गलत फहमी हो तो कृपया स्पष्ट करें. हम दोनों ही सामाजिक कुरीति और अन्धविश्वास के खिलाफ लड़ते हैं पर हमदोनो के विचारधारा में फर्क बस इतना है कि मैं सामने वाले के सम्मुख उसी की सोच के अनुसार विचार रखता हूँ. परन्तु उसकी बातों को काटते हुए सत्य पर आधारित. यदि मैं किसी भोजपुरी भाषी से अंग्रेजी में बात करूँ तो क्या उसे मेरी बातें समझ में आएगी……. नहीं न. दिनेश भाई मैं कोई पागल नहीं हूँ और न ही अन्धविश्वासी हूँ जो इस मंच के लोग समझते हैं. एक समय के लिए मान लीजिये कि आपके सामने एक पागल है और आप उसके डॉ हो तो क्या उसे अपने डाक्टरी भाषा में समझायेंगे नहीं न तो फिर……..बिलकुल सही आपने सोचा पागल को समझाने के लिए पागल बनना पड़ेगा. अब आइये बात करते हैं: मनुष्य के सुन्दर, दयालु और क्षमाशील होने की. तो क्या आप बता सकते हैं हम इंसानों के अलावा कोई दूसरा जीव हैं जो इन गुणों का विवेचन कर सकता हैं नहीं न. क्या किसी और जीव के पास इतनी समझ विकसित हो पायी है…..नहीं न. यदि हम इन सारे गुणों को जानते हुए इसे आत्मसात नहीं कर रहे तो कमी तो हमारे अन्दर है न. उपरोक्त आलेख में इसी तथ्य को दर्शाया हूँ. सामने वाला इसे किस रूप में लेता हैं.यह तो उस पर निर्भर करता हैं. मैं यह स्पष्ट रूप से इसलिए नहीं कहता हूँ कि आधे लोग मुझे भगवान मान लेंगे और आधे लोग शैतान. फिर लोगों को लड़ने और अपना स्वार्थ पूर्ण करने के लिए एक और आधार मिल जायेगा. जो कि भगवान के नाम का अपमान होगा और फिर शुरू होगी एक नयी बहश……….आज का प्रवचन यही ख़त्म. बस छोटा भाई होने के नाते आपसे विनती करता हूँ कि मुझे इस अन्धविश्वासरूपी सामाजिक कीचड़ से मत निकालिए.वरना मैं छटपिटा कर मर जाऊंगा. क्योंकि यदि मैं भी आपकी तरह बाहर से निकालने की कोशिश करूँगा तो इसे खरोंच-खरोंच कर साफ़ कौन करेगा. वैसे बहुत मजा आता हैं इस कीचड़ में हाथ-पाँव चलाने पर. आप भी अन्दर आओ न. हम दोनों ही मजा करेंगे. घबराओं मत भाई …….डूबोगे नहीं……..मुझे तुम पर पूरा विश्वास है…..वैसे तुम्हारा और मेरा साथ बहुत पुराना है. मैं तो तुम्हे पहचान लिया पर इतने सारे इशारे करने पर भी तुम मुझे नहीं पहचान पा रहे हो……….कहाँ खो गए …..मजाक कर रहा था…..हाँ …हाँ….हाँ ……..फिर नंगे से पंगा न लेना नहीं तो तुम्हे भी नंगा कर दूंगा…..हाँ……हाँ…….हाँ…… जिन लोगों को मेरी बातें समझ में नहीं आई होगी….तो उनसे बस इतना ही कहना चाहूँगा कि उपरोक्त तथ्य एक काल्पनिक हैं जिसका सम्बन्ध किसी भी जीवित या मृत प्राणी से कहीं भी किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं हैं. यदि भविष्य में ऐसा कुछ होता हैं तो इसे मात्र एक संयोग माना जायेगा………इस लिए आप सभी इसकी चिंता छोड़कर राम-राम जपिए और पराया माल……..भुत अच्छे तो एक बार प्रेम से बोलिए भारत माता की ……जय!, महान भारतीय संस्कृति-सभ्यता की …जय, महान-मान मर्यादा की……. जय!……अब प्रवचन ख़त्म हुआ….आप सभी स्वतंत्र है ……..देश और समाज का ………हाँ…..हाँ……हाँ…

    April 1, 2012

    और महिमा जी, अब आप भी कुछ-कुछ समझाने लगी होंगी कि अलीन किस चिड़िया का नाम है…..बस अनजानी साथ पा लूँ फिर आप सबको सबक सिखाता हूँ…..तबतक आप सभी मेरा मजाक बना लीजिये……..हाँ…..हाँ…..हाँ..

    April 1, 2012

    हाँ एक बात और अभी तक मेरे उस विचार कोई काटा नहीं. जो प्मैने पत्र में लिखा है……आश्चर्य हैं……कोई तो आगे बढों भाई…..गीता, कुरान और बाइबिल का ज्ञान कोई तो इस्तमाल करों ….

nishamittal के द्वारा
March 30, 2012

अनिल जी,आपकी प्रतिभा और विचारों के विषय में ज्ञात हुआ.भगवान् के अस्तित्व और महत्ता के लिए सबके विचार भिन्न है.ये आस्था से जुड़ा प्रश्न है,मेरे विचार से विवाद का नहीं.परन्तु इतना अवश्य कहना चाहूंगी कि अपनी राह चुनना और कर्म करना तो आवश्यक है,मैं ज्ञानी तो नहीं परन्तु गीता के और अन्य सभी धर्मों के कर्म सिद्धांत में विश्वास रखती हूँ.लेखन और प्रकाशन के विषय में जो तथ्य आपने प्रस्तुत किये हैं,वो निस्संदेह सटीक हैं.यदि मेरी कोई बात अनुचित लगे तो कृपया भूल जाएँ.

    April 1, 2012

    सादर प्रणाम! भगवन के अस्तित्व और महत्ता पर कोई संदेह नहीं. मैं बस यहाँ इंसान की शक्ति का एहसास करना चाहा हूँ….


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