साधना के पथ पर

अद्य की स्याही

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नंगों की बस्ती में नंगापन, एक गुनाह!

Posted On: 3 Apr, 2012 Others,मस्ती मालगाड़ी में

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नंगों की बस्ती में नंगापन, एक गुनाह! ( चित्र गूगल इमेज साभार )

कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिनके जवाब नहीं हुआ करते. उन्हें दुसरे सवालों के माध्यम से ही समझा जा सकता है. कुछ रोज पहले पिता श्री द्वारा एक सवाल मेरे पोस्ट (गन्दी, राजनीति या हम?) पर उनकी बहुमूल्य टिप्पड़ी द्वारा रखा गया था. जिसके प्रेरणा से मैं एक कटु सत्य को व्यक्त करती कहानी को जन्म देने में सक्षम हो पाया हूँ और इस बात के लिए हमेशा उनका आभारी रहूँगा. साथ ही यह भी चाहूँगा कि भविष्य में ऐसे ही सवालों के माध्यम से मुझे एक कटु सत्य को व्यक्त करती हुई कहानी लिखने को प्रेरित करते रहें. उनका सवाल उन्ही सवालों में से एक है जिसको सवालों के माध्यम से ही समझा जा सकता है. आइये अपनी बात रखने से पहले उनकी टिप्पड़ी और उस टिप्पड़ी पर मेरे तत्कालीन विचार पर एक नज़र डाला जाएँ….
मान्यवर अनिल जी,
सादर !
भूख से बिलबिलाते व्यक्ति के सामने भोजन भी है, पानी भी
है, पर उन के सामने खूंखार कुत्ते खड़े हैं !
वह व्यक्ति क्या करे ?

सादर चरण स्पर्श!
कुछ सवालों का जवाब सवालों में ही दिया जाय तो बेहतर. जब कोई फोड़ा ला इलाज हो जाता है तो उसका ओपरेशन करना ही उचित होता है. परन्तु यदि यही फोड़ा बार-बार हो तो समझ लेना चाहिए कि गड़बड़ी पुरे खून में है. तो इस परिस्थिति में क्या करना चाहिए?…..आज जरुरत है Proactive Process की न कि Reactive Process की. अपनी अगले लेख में इस बात को और बेहतर तरीके से स्पष्ट करने की कोशिश करूँगा.
आपका अनुज, अलीन
बड़ों के सवालों का जवाब नहीं दिए जाते और न ही सवाल के बदले सवाल किये जाते हैं. परन्तु जो सवाल-जवाब व्यक्तिगत न होकर पुरे समुदाय के हित से जुड़े हो तो उनका सामने आना ही बेहतर होता हैं. मैं अपनी बातों को एक बस्ती की कहानी के माध्यम से स्पष्ट करना चाहूँगा. यह कहानी है मान-मर्यादा नामक बस्ती की. जो पिछले १५ सालों से मेरे मन-मस्तिष्क में सुबह की पहली किरण के साथ उभरती है. फिर शाम होते-होते सूरज की आखिरी किरणों की भाँति सिमटती चली जाती है. अब आप सोच रहें होंगे कि अनायास ही यह कहानी इसकी मस्तिष्क की उपज होगी. इस पर कहना चाहूँगा कि यह कोई अनायास ही नहीं बल्कि एक हकीकत हैं. जिसे हम स्वीकार नहीं करना चाहते क्योंकि यह हमारे स्वार्थों से जुड़ा है. हाँ तो मैं बात कर रहा था, मान-मर्यादा नामक नगरी की जोकि काल्पनिक तो है पर बिल्कुल हमारे हकीकत के दुनिया जैसी. जहाँ लोग एक-दुसरे के टांग खीचने में लगे हुए है. हरेक व्यक्ति किसी न किसी व्यक्ति और व्यवस्था से त्रस्त हैं. प्रत्येक व्यक्ति खुद को भूख से बिलबिलाता हुआ और सामने वाले को खूंखार बताता है. ऐसे में एक दुसरे का शिकार करना और उसकी आगे की थाली को अपनी तरफ खींचना ही वाजिब समझता हैं. दुसरे शब्दों में हरेक व्यक्ति राम हैं या फिर राम का भक्त. ऐसे में मुझे यह समझ में नहीं आता कि रावण कौन है और चारों तरफ हाहाकार कैसा ? जब कोई रावण ही नहीं है तो यह युद्ध कैसा. यदि रावण हैं तो इसका मतलब कि राम के खाल में रावण छुपे हैं जो खुद को राम बताकर पुरे भारतीय समाज को रावणरूपी प्रवृति का गुलाम बना रहे हैं. कहने का तात्पर्य यह हैं कि जब कोई समस्या ही नहीं है तो समाधान किस बात का. यदि समस्या हैं तो फिर हमें इस बात को स्वीकारना होगा कि समस्या की जनक हमारी विचारधारा है. मैं समझ सकता हूँ कि मेरे द्वारा हमारी भारतीय समाज के ऊपर की गयी इस टिप्पड़ी से बहुतों की तकलीफे बढ़ गयी होगी और बहुतों के हाथ-पाँव के साथ-साथ साँसे फूलने लगी होगी. तो भैया मेरी बातों से जिनकी समस्याएं बढ़ गयी होगी उनको फ्री में सलाह देना चाहूँगा कि वो किसी अच्छे मनोरोग चिकित्सक को दिखा कर अपना इलाज प्रारंभ कर दे क्योंकि आने वाले दिनों में उनकी समस्या और बढ़नेवाली है. जो हम शराफत की चादर तन पर डाले बैठे है. वह अब हटने ही वाली है और जिस हकीकत को हम पैदा किये हैं उसका सामना हमें करना ही होगा. अरे अजय भैया, जरा देखना की शराफत चाचा को क्या हुआ? मेरी बात सुनकर छट-पिटा क्यों रहें हैं. वो अन्दर ही अन्दर मुझे जरुर कोस रहे होंगे कि मुवां आज मेरी जान लेकर रहेगा. अरे
भैया हम जानते है कि आप अमीर हो गए हैं. पिछले दिनों आपकी पोस्टिंग ‘अब हम अमीर हो गए हैं….’ पढ़कर ज्ञात हुआ. लेकिन इसमें चाचा जी का क्या दोष है ?जो इनको छूने से घबड़ा रहे हैं. जल्दी से उन्हें किसी अच्छे डाक्टर को दिखाओं . इनकी तो तबियत एकदम से बिगडती ही जा रही है. अभी तो उनको बहुत चीजों का सामना करना है.. ………भैया जरा संभालकर, बुजुर्ग आदमी है, कही पसली-वसली इधर-उधर खसक गयी तो बुढ़ापे में लेने के देने पड़ जायेंगे. अरे भैया आप लोग क्यों खड़े हो गए. कोई तमाशा थोड़े नहीं हो रहा है. चाचा जी तकलीफ में है और आप लोग उनको ऐसे घेरे हैं जैसे कि वो प्रसव पीड़ा में हो और आप सभी उनको उस पीड़ा से निजात दिलाने आये हो. ताकि जल्दी से जल्दी उनको उस दर्द से मुक्ति दिलाया जाय. इतना ही आप सबको उनकी तकलीफ का ख्याल हैं तो एक-दो लोग अजय भैया के साथ हास्पिटल चले जाओ और बाकि लोग स्वामी अन्जनानंद ( अंजना + आनंद = अंजना को आनंदित करने वाले अर्थात अनिल ) के प्रवचन सुनकर प्रसाद ग्रहण करने के बाद ही जायेंगे और साथ ही कुछ दक्षिणा देकर जायेंगे. लो बातों ही बातों में आप लोग स्वामी जी के मुख से उनकी प्रेमिका का नाम भी जान गए, जो अबतक वो आप सभी से छुपायें फिर रहें थे.चलिए कोई बात नहीं. स्वामी जी गुनाह थोड़े नहीं किये हैं जो आप लोगों से डरेंगे. भलें ही आप लोगों के नज़र में प्यार एक गुनाह हो पर इनके नज़र में तो इबादत हैं और इबादत ही रहेंगा. आज इसी के चलते तो आप लोग इस महान पुरुष के प्रवचन सुन रहें हैं………. अरे अजय भैया चाचाजी की धोती और पगड़ी को जरा संभालना. भले ही आज अपनी तकलीफ के कारण अपनी इज्जत का ख्याल नहीं रहा हो . परन्तु यही उनकी जिंदगी भर की कमाई हुई इज्जत हैं. भला मैं कैसे भूल सकता हूँ. इसी इज्जत की खातिर अपनी बेटी और उसके प्रेमी को इसी जमीं के अन्दर जिन्दा दफ़न कर दिए. यह अलग बात है कि खुद जिंदगी और मौत के बीच लटके हुए हैं तो इस बात की सुध-बोध जाती रही हो, . भैया जरा देखना……..भले ही इनकी जान चली जाएँ पर धोती और पगड़ी नहीं खुलनी चाहिए. नहीं तो खुद को जिन्दा पाकर शर्म से मर जायेंगे. हाँ तो महान देश के महापुरुषों हमारा प्रवचन कहा तक हुआ था. याद आया तो हम बात कर रहें थे, मान-मर्यादा नामक बस्ती की जहाँ नंगों के बीच नंगापन एक गुनाह है. मैं यहाँ कसम खाकर आया था कि कम से कम आज तो भारतीय समाज पर कोई टिप्पड़ी नहीं करूँगा. तो चलिए सीधे आप सभी का रुख नंगों की बस्ती मान-मर्यादा की ओर करते हैं. भक्तों सूरज के डूबने के साथ ही मेरे मन से यह कहानी पूरी तरह से मिट चुकी हैं. अतः बाबा नंगों की कहानी सुनाने से पहले ही आज का सत्संग यही पर ख़त्म करने की घोषणा करते हैं. फिर किसी दिन सूरज की रोशनी के आगमन के साथ इस कहानी की शुरुवात होगी. साथ ही बाबा इस बात का यकीं दिलाते हैं कि अगले सत्संग में शाम होने से पहले आपके कानों को तृप्त कर देंगे. वैसे इसमें बाबा की कोई गलती नहीं है क्योंकि बाबा तो पहले ही कह चुके थे कि सूरज डूबने के बाद उनके मस्तिष्क से कहानी ओझल हो जाएगी. सारा दोष तो शराफत चाचा का है जो सुबह से शाम और फिर शाम से रात हो गयी. जिसके साथ ही बाबा के मन की बैटरी भी डिस्चार्ज हो गयी. अभी बाबा दो-चार दिन के लिए यात्रा पर जा रहें हैं. जब तक बाबा लौट कर नहीं आ जाते तब तक आप सभी मिलकर दुआ करिए कि शराफत चाचा जल्दी से ठीक हो जाएँ और पहले से ज्यादा मजबूत भी. वरना अगले सत्संग में नंगों की कहानी सुनने के बाद उनका जाने क्या हो? वो तो खुदा ही जानता है…….और अंत में बाबा अपनी एक पुरानी कृति के माध्यम से कुछ सवाल रख रहे हैं. उस पर चिंतन-मनन करते रहिये……….तो एक बार प्रेम से बोलिए भारतीय संस्कृति की….जय! भारत के महान मान-मर्यादा वालों की ……जय! शराफत चाचा की …….अरे भाई उनकी तकलीफ देखकर गलती से मुंख से निकल गया. चाचा की जय नहीं बोलना हैं…..अब बोलिए स्वामी अन्जनानंद की ………… ! अब आप सभी बाबा को दंडवत प्रणाम करिए ताकि आपके सारे पाप कट जाएँ और आप पुनः कल से पाप करना शुरू कर दे.
उनसे पूछता हूँ जो पूछते हैं, इन्सां क्या है?
अँधेरे को जो मिटायें वो रोशनी क्या है?
आदमी तो हम सभी, क्या बताएं इन्सां क्या है?
बस इतना समझ लो रोशनी क्या है?

उनसे पूछता हूँ जो पूछते हैं, आत्मा क्या है?
चेहरा को जो दिखाए वो आइना क्या है?
जीवन तो सभी में, क्या बताएं आत्मा क्या है?
बस इतना समझ लो, आइना क्या है?

शुभ रात्रि!



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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ajay kumar pandey के द्वारा
April 13, 2012

प्रिय बड़े भाई अलीन जी जब आप लेख की प्रति भेजेंगे तो उसे स्पीड पोस्ट मत करना कौरिएर करना क्योंकि यहाँ पर जो मेने आपको घर का पता दे रखा है यहाँ k ४/५६ कई है भेजे हुए स्पीड पोस्ट पहुच नहीं पाते है किसी और के घर चली जाती है आप मेरे घर के पते पर लेख की प्रति कौरिएर करना समर्थन के लिए धन्यवाद धन्यवाद

मनु (tosi) के द्वारा
April 11, 2012

अनिल जी नमस्कार ! बहुत आक्रोश है आपके अन्दर ये आपके लेख से ही मालूम पढता है . इश्वर आपको आपकी मंजिल तक जरुर पहुंचाए इसी शुभकामना के साथ बधाई

ajay kumar pandey के द्वारा
April 11, 2012

मेरे प्रिय बड़े भाई अलीन जी एक कविता आपको भेज रहा हूँ आशा है की आपको यह प्रयास पसंद आएगा में पल दो पल का शायर हूँ पल दो पल मेरी कहानी है यह दो पल कैसे बीतेंगे यह मुझे भी पता नहीं में पल दो पल का शायर हूँ पल दो पल मेरी कहानी है यह दिल की बात बताऊँ तो तड़प कही खो जाती है में पल दो पल का शायर हूँ पल दो पल मेरी कहानी है धन्यवाद

    April 11, 2012

    भाई, अपना फ़्लैट बदलने के कारण पिछले एक महीने से मैं दैनिक जागरण नहीं पढ़ रहा हूँ क्योंकि यहाँ पेपरवाला बोलता है कि दैनिक जागरण मैं नहीं बेचता. मैं आपके लिए कई लोगो से बात कर राखी है पर कोई रिस्पांस नहीं मिला. इस दुनिया में कोई किसी की मदद नहीं करना चाहता. मैंने आज तक अपने लिए किसी के सामने कभी सर नहीं झुकाया और गलत के सामने तो कभी नहीं. पर आपके लिए तो सबकुछ कर रहा हूँ. पर आप जो झुककर बाते करते हो तो मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगता. यदि तुम मेरे भाई हो तो स्वाभिमानी बनना सीखो. और अपने अन्दर वो चीज पैदा करों की लोगों की आपसे जरूरत हो. आपको किसी से नहीं. फिर देखना यह पूरी दुनिया तुम्हारी कदमो में होगी. आज तुम मुझसे अपना आलेख छपवाने को बोले हो. कसम खाओं कि फिर कभी किसी दुसरे से नहीं बोलोगे. क्योंकि यदि कोई चीज माँगने और सोर्स लगाने से मिले तो मैं उसे हराम मनाता हूँ. मैं नहीं चाहता कि मेरा भाई किसी के सामने गिड़गिड़ाए. मेरा सर इतने लोगो के सामने झुक जाता हैं. रहा मेरी जुबान कि बात तो भाई तुम्हारा लेख जरुर प्रकाशित करवाऊंगा. उसके लिए मुझे खुद को बेचना ही क्यों न पड़े. पर तुम ऐसी बात मत किया करों. मैं खुद बहुत परेशान हूँ. मुझे और परेशान न करों. कुछ वक्त दो तुम्हारे लिए भी प्रयास कर रहा हूँ……… मैं कुछ विशेष ब्लागरो का ब्लाग पढ़ने को क्यों बोलता हूँ क्योंकि मैं समझता हूँ कि सिर्फ वही तुम्हारा अच्छा मार्गदर्शन कर सकते हैं. फिर भी तुममे बदलाव नहीं आ रहा, यह तो बहुत शर्म की बात है. यदि दिमाग काम करना बंद कर दे दूसरों से कुछ सीखना चाहिए……तुम मुझे भाई बोले हो न तो मैं समझता हूँ कि तुम्हारे लिए क्या बुरा है और क्या भला है……..

ajay kumar pandey के द्वारा
April 11, 2012

अलीन भैया में पढाई में ध्यान नहीं दूंगा अगर मेरा लेख नहीं छपा तो मुझे मेरे लेख को शनिवार को दे दो मुझसे अब और इन्तजार नहीं होता ठीक है नहीं लिखूंगा ब्लॉग में दो दिन स्कूल नहीं जाऊँगा ऐसे ही छुट्टी करूँगा जब लेख छपे तब ही मुझे सूचित करना मेरे ब्लॉग पर मुझे अपना लेख चौदह अप्रैल को ही चाहिए में स्कूल जाऊंगा नहीं धन्यवाद

ajay kumar pandey के द्वारा
April 11, 2012

भैया please जल्दी करो वक्त बहुत कम है मेरे को अपना लेख जल्द ही अपने दोस्त को दिखाना चाहता हूँ मुझे अपना लेख जल्द चाहिए ठीक है तुम्हे में चौदह अप्रैल का वक्त दे सकता हूँ मुझे उस पत्रिका वाले से मिलवा दो में पढाई में ध्यान नहीं दे सकता क्या करूँ स्कूल में भी अपना लेख छपने की चिंता है धन्यवाद

ajay kumar pandey के द्वारा
April 11, 2012

भैया जल्दी लेख छपा दो धन्यवाद

ajay kumar pandey के द्वारा
April 11, 2012

बड़े भैया मुझे शक है की मेरा ब्लॉग सामाजिक रूढ़ीवाद का चक्रवात दो अप्रैल को ही feautured ब्लॉग था कही मेरा आलेख दैनिक जागरण तीन अप्रैल के अंक में छप तो नहीं गया कृपया बताइए मुझे तीन अप्रैल का दैनिक जागरण दे दीजिये धन्यवाद

ajay kumar pandey के द्वारा
April 11, 2012

मेरे प्रिय बड़े भाई अलीन जी क्या आपने तीन अप्रैल का दैनिक जागरण देखा क्या उसमे मेरी पोस्ट सामाजिक रूढ़ीवाद का चक्रवात छपी थी यदि छपी हो तो बताये धन्यवाद

alkargupta1 के द्वारा
April 10, 2012

अनिल जी , आपका यह लेख पढ़ा पर कहीं कहीं कुछ समझ नहीं सकी….. पर यह समझ आया कि क्रोधावेश में शायद लिखा गया हो……. अंतिम पंक्तियाँ बहुत ही अच्छी लिखी हैं……

    April 11, 2012

    सादर प्रणाम! दरअसल विषय वस्तु के अनुसार इसे अंजाम तक पहुंचा नहीं पाया. अतः बहुत लोगों को समझाने में दिक्कतें आई है. वैसे जब मैं इसका अगला भाग लिखूंगा तब पूरी बात स्पस्ट हो जायेगा. आपने अभी माना कि अंतिम पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगी फिर आप यह कैसे मान ली की बाकि आलेख क्रोध वश लिखा हूँ. आपको जानकार आश्चर्य होगा कि मैं बहुत ही शांत मिजाज का व्यक्ति हूँ. मेरी शैली कुछ ज्यादा ही व्यंग्यात्मक होती हैं. अतः गलतफहमी हो जाती है लोगो को. आपका बहुत दिनों बाद मेरे ब्लाग पर आगमन हुआ, बहुत अच्छा लगा. ….आपके प्यार और आशीर्वाद का सदैव आभार.

ajay kumar pandey के द्वारा
April 10, 2012

प्रिय बड़े भाई अलीन जी कृपया ३ अप्रैल का दैनिक जागरण देखकर बताइयेगा की क्या मेरी पोस्ट सामाजिक रूढ़ीवाद का चक्रवात प्रकाशित हुई थी यदि हुई हो तो मुझे तीन अप्रैल का दैनिक जागरण दे दीजियेगा धन्यवाद

smtpushpapandey के द्वारा
April 10, 2012

बेटे अनिल तुमने जो kaha की में समाज के लिए कुरीतियों पर लड़ाई लड़ रहा हूँ और उसमे बलिदान होने पर हम माओं को गर्व होना चाहिए लेकिन तुम्हे यह नहीं पता है की बलिदान क्या होता है और वीरता क्या होती है एक सैनिक जब देश के लिए सीमा पर आर पार की लड़ाई लड़ता है और दुश्मन के द्वारा मारा जाता है उसको वीरगति कहो या बलिदान वह वीरता होती है और देशहित में होता है लेकिन जब सामाजिक कुरीतियों से खिन्न होकर और अपनी इच्छा या भावनाओं का अपमान होता देखकर जो मौत को गले लगा लेता है वह कायरता होतीiहै तुम जो सोचते हो की तुम्हारे बलिदान से समाज की कुरीतियाँ समाप्त हो जायेंगी तो तुम्हारा यह सोचना व्यर्थ है तुम्हारे ऐसा करने से समाज तुम्हे दीवानगी या पागलपन में मौत को गले लगाया है ऐसा कहकर सब भूल जायेंगे और अपने अपने कामो में लग जायेंगे कुरीतियाँ वही की वही रह जायेंगी तुमने देखा होगा की राजा राम मोहन राय विनोबा भावे सरोजनी नायडू महात्मा गाँधी ईश्वरचंद्र विद्यासागर इन महान लोगो ने अलग अलग शेत्रो में देशहित में समाजहित में नारिहित में अनेक आवाजें उठाई और आज वह इस दुनिया में हैं भी नहीं लोग उन्हें उनकी पुण्यतिथि पर याद कर लेते हैं और फिर भूल जाते है उनके इतने बलिदान से भी सामाजिक बुराइयों की जड़े अभी भी विद्यमान हैं अच्छा तो यह होगा तुम अपनी ज़िन्दगी जियो और जीवित रहते हुए स्वयं सामाजिक बुराइयों से हताश हुए लोगो की मदद करो तभी तुम्हारा जीवन सार्थक होगा इसे एक माँ का प्यार समझो या उसका आदेश यह तुम्हारी समझ है इसके आगे में कुछ नहीं कहना चाहूंगी क्योंकि तुम्हारे जैसे कई लड़के लड़कियां अपना बलिदान दे चुके हैं फिर भी समाज जैसे का तैसा ही है बलिदान देने से कुछ हासिल नहीं होगा जीवित रहकर ही इस लड़ाई को लड़ो तभी सही है तुम्हारी शुभचिंतक माँ श्रीमती पुष्पा पाण्डेय

    April 10, 2012

    सादर चरण स्पर्श! मैं कहाँ खुद को ख़त्म करने की बात करता हूँ. जो लोग मानसिक रूप से झूठी मान-मर्यादा और परम्पराओं से जुड़े हैं और आये दिन बेगुनाह लड़के और लड़कियों की इसके नाम अपर बलि चढ़ा रहें हैं. तो यह स्वाभाविक सी बात है कि यदि उन्हें कगेगा कि मैं उनकी झूठी शानो-शौकत की दीवारों को गिराने वाला हूँ तो मैं उनके हाथों मारा जाऊ. देश भक्ति और मानव कल्याण क्या होता. यदि इतना लोग समझते तो देश में जात-पति, उंच-नीच, अमीर-गरीब, भ्रष्टाचार, सम्प्रय्दिकता जैसी समस्याएं नहीं होती ……….वैसे भी कोई मुझे यद् करें इसके लिए नहीं लड़ रहा हूँ. बल्कि इसलिए कि मेरे प्रयास से कोई एक जीवन भी बचता है तो मैं खुद को धन्य समझूंगा. रहा इन सामाजिक बुराइयों की जड़ों की बात तो इतना मिटटी खोद दूंगा कि इनको धरातल ही नशीब नहीं होगा फिर से पनपने के लिए……. मैं अलीन हूँ …….और अलीन ….वो आग है जो जल्दी लगता नहीं…….और एक बार जो लग गया तो फिर बुझाता नहीं……बिलकुल जंगल की आग की तरह जो तब तक ख़त्म नहीं होती जब तक कि पूरा जंगल जलकर रख न हो जाएँ…….आपके प्यार और आशीर्वाद का हार्दिक आभार. आपका पुत्र तुल्य, अलीन

    dineshaastik के द्वारा
    April 15, 2012

    भाई अनिल जी आपकी भावनाओं को समझने में मैने बहुत देर की, बड़ा भाई हूँ, माफी मागूँगा तो डर है कि कहीं नाराज  न हो जाओ। जो आग  आपके अंदर है वही मेरे अंदर भी है। हमें यह आग  और लोंगो के में भी सुलगाना है। इस  आग  को दावानल, वड़बानल  और क्रोधानल  बनाना है। हे अनिल (हवा) तुम  दिनेश(सूर्य  के गोले) को और भी दहका दो। सामाजिक  और धार्मिक  कुरीतियों में मेरे साथ  मिलकर आग  लगा दो। आपके सहयोग  का आकांक्षी बड़ा भाई दिनेशास्तिक

    April 15, 2012

    दिनेश भैया नाराज तो मुझे आप से होना चाहिए क्योंकि मैं अनुज हूँ न. लेकिन मैं व्यक्ति से कभी नाराज या खफा नहीं होता क्योंकि यदि ऐसा करने लगा तो फिर बड़े पैमाने पर हम अपने विचारों को पहुंचा नहीं पाएंगे फिर हम लोगो की सामाजिक, वैचारिक और मानसिक क्रांति अधूरी रह जाएगी…..मुझे तो पता ही था कि आप एक न एक दिन खुद को भी पहचानेंगे और मुझे भी. जन्मो में विश्वास मैं भी नहीं करता पर मैं यह जानता हूँ कि आप और मेरा रिश्ता बहुत पुराना है………भैया हम चाह रहें है कि december तक हम अपनी क्रांति सेना बनाकर. नए साल पर हम सभी सामाजिक क्रांति कि घोषणा कर दे ….इस तरह चुप चाप बैठने से कुछ नहीं होनेवाला…….

    April 15, 2012

    तबतक मेरा व्यक्तिगत समस्या भी साल्व हो जाएगी….

ajay kumar pandey के द्वारा
April 10, 2012

मेरे प्रिय बड़े भाई अलीन जी सादर नमन सबसे पहले जब मेरा यह लेख छपेगा तो उसमे पहले aap एक समर्पण वाला पेज बनाकर उसमे यह लिखवा देना की यह लेख में अपने तीन मित्र योगी सारस्वत जी आचार्य विजय गुंजन जी दिनेश आस्तिक जी को समर्पित करता हूँ जिन्होंने मुझे समर्थन दिया और मेरे लेखो को निरंतर पढ़ते रहे और उसके बाद यह लिखवाना की में अपने प्रिय बड़े भाई अलीन जी को यह लेख समर्पित करता हूँ जिन्होंने मुझे यह कहा की तुम एक दिन अच्छे लेखक बनोगे जिन्होंने मुझे इस काबिल समझा और अपने स्कूल के दो पसंदीदा अध्यापक्गन रूचि मैडम और अजय सर को समर्पित करता हूँ इसको लिखवाने के बाद तब लेख छपाना धन्यवाद

ajay kumar pandey के द्वारा
April 10, 2012

प्रिय बड़े भाई अलीन जी आपने सही सोचा बाल श्रम वाला लेख छापने के लिए यह एक समस्या भी है और मुद्दा भी है मेरी इसे सहर्ष छपने की अनुमति है भाई कृपया अपनी पुस्तक का नाम बताइए जो आप लिख रहे हैं धन्यवाद

    April 10, 2012

    अभी पुस्तक नहीं छपवा रहा हूँ.उसमें तो अभी वक्त है…….तुम्हारा यह आलेख किसी पेपर या पत्रिका में छपवा रहा हूँ…..१५-२० दिन का वक्त दो क्योंकि बहुत व्यस्त हूँ. तुम चिंता मत करों. पढाई पर ध्यान दो…….मैं तुम्हे स्वयं सूचित कर दूंगा……

ANAND PRAVIN के द्वारा
April 10, 2012

मित्र तुमसे बस एक ही बात कहूंगा …………….हमसे भूल हो गई हमका माफ़ी देइदो…………… ऐसे तेज़ को ना दिखाओ बच्चे दर जायेंगे तुमसे……………..कुछ दिनों में नियमित हो जाउंगा

    April 10, 2012

    मेरे विचार से दोस्तों को माफ़ी नहीं सजा दी जाती हैं मित्र…..तुमको क्या सजा दी जाय यह वक्त decide करेगा…!

smtpushpapandey के द्वारा
April 9, 2012

प्रिय पुत्र तुल्य अनिल तुमने अगर जिन्दा रहा यह शब्द कहकर एक नहीं दो दो माओं के दिल को ठेस पहुचाई है एक वो माँ जिसने तुम्हे जन्म दिया है और एक वो जो तुम्हे अपने पुत्र से भी ज्यादा चाहती है यानी में श्रीमती पुष्पा पाण्डेय में तुम्हे येही सलाह दूंगी ऐसा सोचने से पहले अपनी दोनों माओं के बारे में सोच लेना की उनपर क्या बीतेगी सबसे ज्यादा तुम्हारी माँ जिसने तुम्हे नौ महीने गर्भ में रखकर पाल पोस कर बड़ा किया है और तुमसे कितनी आशाएं बंधी है वैसे भी वही मनुष्य महान होता है जो जिंदगी के संघर्षो से डटकर मुकाबला करता है और समाज के हित में कुछ कार्य करता है इस तरह के गलत कदम उठाने वाला व्यक्ति कायर कहलाया जाता है हौसला जारी रखो कभी कभी न कभी सफलता मिलेगी यदि नहीं भी मिली तब भी जीवन का मूल्य समझो मानव जीवन बहुत संघर्ष के बाद मिलता है बाकी तुम खुद समझदार हो तुम्हारी मात्र तुल्य श्रीमती पुष्पा पाण्डेय

    April 10, 2012

    सादर चरण स्पर्श ! हरेक आदमी जीने की इच्छा रखता हैं. चाहें कितनी भी मुश्किलों की ही घडी क्यों न हो. मैं भी सबसे अलग नहीं हूँ. पर झूठी परम्पराओं और झूठी मान-मर्यादा के आगे सर झुकाकर नहीं जी सकता. अतः उसके खिलाफ बगावत करना है मुझे. आप अच्छी तरह जानती हैं कि बागियों की सज अ क्या होती हैं? अतः यह आशंका व्यक्त करना तो लाज़मी है. वैसे जब आप जैसे माताओं का मेरे सर पर हाथ हैं तो निश्चय ही मरकर भी जिन्दा रहूँगा और मेरा बलिदान विफल नहीं जायेगा…….मैं जानता हूँ कि मेरी इस लड़ाई को लोग आवारापन, पागलपन का नाम देते हैं. पर यह भी देशभक्ति हैं और क्रांति भी ……इस देश को सामाजिक कुरीतियों (आडम्बरों, झूठी परम्पराओं और झूठी मान-मर्यादा) से मुक्त करने की. आप सचमुच बेटे की तरह मानती हैं तो मुझे आशीर्वाद और हौशला दीजिये की इन बुराइयों के खिलाफ हंसते-हंसते मरुँ……क्योंकि मेरे एक के मरने से यक़ीनन लोग नए शिरे से विचार करेंगे और बहुत सी माओं के कोख उजड़ने से बच जायेंगे. आपको तो फक्र होना चाहिए कि आपके एक बेटे के जाने से हजारों माताओं की गोद भरी रहेगी…….

ajay kumar pandey के द्वारा
April 9, 2012

मेरे प्रिय बड़े भैया आपको मेरा कौन सा लेख अच्छा लगा यह तो बताइए ताकि में भी अपनी राय दे सकू और भैया आपको एक प्रसंग समझाना चाहता हूँ मार्टिन लुथेर किंग का नाम तो सुना होगा उन्होंने धर्म के विरोध में एक आन्दोलन चलाया उसका नाम protestant आन्दोलन था उन्होंने धर्म के विरोध में लेख लिखे उनके लेख की प्रतियाँ भी लगी उनके लेख बचपन में ही प्रस्सिध हुए में लेखन और पढाई के बिच समय बनाकर चलता हूँ में समय पर क्लास में जाता हूँ काम पूरा रखता हूँ कापियां चेक रहती हैं अगर आपको यकीन न आये तो मुकेश सर और देवेश सर से मेरे स्कूल आकर पूछ लीजिये जब आप मुझे मेरे लेख की प्रति देने आओगे तब में आपको अपने स्कूल ले चलूँगा वहां पर आप मेरे बारे में सब जानकारी ले लेना धन्यवाद

    April 10, 2012

    बाल श्रम एक चिंतनीय समस्या …….को सोच रहा हूँ प्रकाशित करवाने के लिए….. अभी सफाई मत तो……जिस दिन रिजल्ट आएगा उस दिन मार्क्स शीट देखूंगा. फिर तुम्हे बताऊंगा की कितनी पढाई किये थे…..

sinsera के द्वारा
April 9, 2012

anil जी नमस्कार, कितना आक्रोश है आप के मन में, बिलकुल स्पष्ट दिख रहा है.लग रहा है जैसे आप का हाथ रुका hi nahi , bs ek rau में likhte chale gye … kavita to आप ki khubi ban chuki है..kya kahu..bas lajawab… (uff ye network….)

minujha के द्वारा
April 6, 2012

अलीन जी क्या कहुं क्या ना कहुं क्योकि मेरे भी दिमाग में कुछ बातें ही अंटी,कुछ ऊपर से निकल गईं,लेकिन जितनी समझ में आई उस आधार पर लाजवाब कहना तो बनता है..

    April 9, 2012

    सादर नमस्कार! मेरे लिए इतना ही बहुत है…..बस एक विनती करूँगा कि कभी भी मेरे किसी ब्लाग को अन्यथा मत लीजियेगा. क्योंकि मैं जो कुछ भी लिखता हूँ वो बहुत सोचसमझकर लिखता हूँ. और वही लिखता हूँ सामने होता हैं….परन्तु उसके समर्थन में नहीं बल्कि समाधान में…..

ajay kumar pandey के द्वारा
April 6, 2012

मेरे प्रिय बड़े भाई आप गए कहाँ है जागरण मंच पर लोटे ही नहीं आपका प्रवचन ही पढ़ रहे हैं इसी प्रतीक्षा में है की आप हम सब की प्रतिक्रिया का जवाब कब देंगे अगर आप मेरा लेख छपाने गए है तो आशा करता हूँ की कुछ अच्छी खबर ही देंगे और यह बताएँगे की आप मेरे घर कब आ रहे हैं आप से मिलने की प्रतीक्षा में हूँ वैसे में कम ही ब्लॉग लिख रहा हूँ आपने अपने अनुभव तो व्यक्त ही नहीं करे आपसे मिलने की प्रतीक्षा है धन्यवाद

    April 9, 2012

    आपके लेख छपवाने में लगा हुआ हूँ यदि कामयाब होता हूँ तो एक प्रति आपको आपके पते पर भेज दूंगा. जहाँ तक मुझसे मिलाने का सवाल है. कम से कम आपको ५-६ महीने और इंतजार करने होंगे. यदि इसके बाद जिन्दा रहा तो आप से जरुर मिलूँगा वरना अगले जन्म में…..

चन्दन राय के द्वारा
April 6, 2012

अनिल जी ,.सादर नमस्कार, विचारो की गहनता और गूढता लिए आपका आलेख भिन्न भिन्न प्रसंगों को जोड़कर इक ऐसे सन्देश और प्रश्नों को जनम देता है , जिसका कोई उत्तर कोई दार्शनिक ही दे सकता , मेने आपके आलेखों से अनुमान लगाया की आपके घाव बड़े गहरे है , आपका मित्र चन्दन

    April 9, 2012

    हार्दिक आभार मित्र, जब प्रश्न और समस्या को जन्म हमने दिया है तो समाधान भी हमारे ही पास हैं. लोग कहते हैं की शारीर के घाव एक दिन भर जाते हैं. मैं तो मानता हूँ कि दिल के घाव भी भर जाते है बशर्ते कोई भरने वाला हो. पर जो घाव और चोट आत्मा पर लगी हो उसे मिटाया नहीं जा सकता………छोडिये हमारी और आपकी बातें फिर कभी होगी. एक विनती करना चाहूँगा जख्मो को हवा मत दिया करे……

Santosh Kumar के द्वारा
April 5, 2012

अनिल जी ,.सादर नमस्कार आपका आलेख जितना खुला हुआ है उससे कहीं ज्यादा रहस्यमयी है ,.भाई बाबा और शराफत चाचा कौन हैं ?..आजकल मैं भी ज्यादा समय नही दे पा रहा हूँ ,.कोई बात नहीं उम्मीद करता हूँ कि जल्दी फुलटाइम उपस्थिति दर्ज करूंगा ,..दो बातें है एक तो फोड़ा बार बार हो रहा है दूसरा अब यह नासूर बन चूका है अतः मैं समझता हूँ कि आक्रमण(आपरेशन) और बचाव (परहेज) दोनों करने पड़ेंगे ,..खून में गड़बड़ी है तो साफी भारतीय संस्कृति में ही उपलब्ध है ,.संस्कृति का मजाक उड़ाने से नहीं बल्कि उसका अनुसरण करने से बात बनेगी ,.समयनुसार स्वस्थ परिवर्तन स्वीकारना भी जरूरी है ,..गड़बड़ संस्कृति में नहीं बल्कि व्यक्तिओं में होती है ,.. राम और रावण तत्व सबमें है ,.कम या ज्यादा हो सकता है ,.जिसने रावण तत्व को जीत लिया वो संत और जिसने राम तत्व को मार दिया वो राक्षस !…शेष हम और आप सब बीच के दरिया में तैरते, डूबते हुए जीवन पार करते हैं ,..आपकी पंक्तिओं के सम्मान में एक लाइन लिखना चाहता हूँ . कोई अंजाना रोता है तो सब उदास होते है | यही इंसानियत है जो सबमें पूरी बाकी है ….जय हो स्वामी अंजानानन्द की ,..वन्देमातरम !

    April 9, 2012

    सादर नमस्कार, भैया! आपकी इन बातों से १००% इत्तेफाक रखता हूँ…….क्या भैया अब आप भी मजाक करने लगे जो पूछ रहें हैं कि बाबा और शराफत चाचा कौन हैं? जबकि पूरा देश इन्ही से भरा हुआ है. मेरे और आपके अलावा कौन हो सकता हैं….कोई देवदूत और पिसाच थोड़े नहीं……

ajay kumar pandey के द्वारा
April 5, 2012

प्रिय बड़े भाई अलीन जी कृपया इसी लिंक पर जाए http..//hindivichaar641.blogspot.com dhanyawaad

ajay kumar pandey के द्वारा
April 5, 2012

प्रिय बड़े भाई अलीन जी कृपया इस लिंक पर भी जाए http..//hindivichaar.641.blogspot.com dhanyawaad

    ajay kumar pandey के द्वारा
    April 5, 2012

    प्रिय बड़े भाई अलीन जी कभी कभी इस लिंक पर भी जाए http..//hindivichaar.641.blogspot.in

    April 8, 2012

    भाई जी आपका लिंक तो खुल ही नहीं रहा हैं और हाँ एक बात और अब भी आप उपयुक्त विषय नहीं चुन पा रहे है जिस पर आप अपनी भावनाओं को अच्छी तरह से व्यक्त कर सके. आपको मैं कितना सिखाता हूँ कि आप बड़े होकर बड़ी बात कभी नहीं कर पाएंगे. पर आप छोटे होकर सबकुछ कह लोगे. आप एक दिन बहुत अच्छे पत्रकार बनोगे पर उसके लिए आपको बहुत कुछ सीखना हैं. मैं चाहूँगा कि आप आशीष गोंडा जी का ब्लाग पढ़े जो लगभग आप ही के उम्र के होंगे. उनके द्वारा चुने गए विषयों पर गौर फरमाएंगे तो आप पाएंगे कि आपके अन्दर कहा कमी है. और साथ ही यमुना जी के ब्लाग ध्यान से पढ़ा करिए बहुत कुछ सिखाने को मिलेगा आपको. जो कि आपको अति आवश्यक है. दोनों व्यक्तियों का लिंक दे रहा हूँ ….. http://ashishgonda.jagranjunction.com/ http://yamunapathak.jagranjunction.com/

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
April 5, 2012

बहुत ही रहस्यमय आलेख है, अनिल जी.अच्छा लगा.शायरी भी उत्तम है.

    April 9, 2012

    सादर प्रणाम! प्यार और आशीर्वाद के लिए……हार्दिक आभार, सर.

dineshaastik के द्वारा
April 5, 2012

स्वामी अन्जनानन्द महाराज  की जय, आदरणीय आपकी बातें बहुत  ही उच्चस्तरीय  दार्शनिक  एवं अध्यात्मिक  होती हैं, जो इस  अबोध  बालक  की समझ  से परे  है। यदि इसे सरल  भाषा में लिखें। तो महाराज  की कृपा होगी (मजाक  में)

    April 9, 2012

    बाबा से ज्यादा मजाक मत करिए दिनेश भैया , नहीं तो बाबा श्राप दे देंगे तो आप अपाहिज हो जायेंगे……हाँ….हाँ……..हाँ…

    dineshaastik के द्वारा
    April 12, 2012

    प्रिय  अनुज  संभवतः मुझे आपके वैचारिक  सहयोग  की आवश्कता पढ़ेगी। मुझे लगता है कि आपकी मंजिल  और मेरी मजिल  लगभग  समान हैं। रास्तों में थोड़ी भिन्नता हो सकती है। मेरी लड़ाई बहुत ही ताकतवर लोंगो  से है। बिना सबके सहयोग  के उसे जीत  पाना मेरे लिये असंभव है। फिर यह लड़ाई  केवल  मेरी ही नहीं है आपकी भी है। समान  विचारधारा वाले हम सब लोगों की है।

    April 12, 2012

    सादर प्रणाम! आप मुझे अनुज कहकर मेरा सम्मान बढ़ा दिए भैया. मैं बहुत दिनों से इसी घडी का इंतजार कर रहा था क्योंकि मुझे यह सम्मान सर उठाकर चाहिए था और मुझे वह मिल गया. आपका अनुज होना मेरे लिए फक्र की बात है. मैं हमेशा आपके साथ था, साथ हूँ और साथ रहूँगा क्योंकि मैं जानता हूँ कि आप सही हो. रहा ताकतवर की बात तो कोई भी व्यक्ति धन, बल और जन से तबतक ताकतवर नहीं हो सकता जबतक की उसके विचार अच्छे न हो. और वो चीज आपके पास है जो उनके पास नहीं. आप बस आदेश करिए …….आपके लिए हमेशा तैयार हूँ पर मैं किसी को मार नहीं सकता. हाँ आपके लिए मर जरुर सकता हूँ…….और यह मेरे लिए फक्र की बात होगी क्योंकि मेरा मजहब किसी के लिए मरना सिखाता है, मारना नहीं………आपने सही कहा कि यह लड़ाई हम सबकी हैं और इस युद्ध में मैं आपके साथ हूँ…….मैं सर कटाने वालों में से हूँ, सर झुकाने वालों में से नहीं………मैं तो शुरू से कहता हूँ कि मैं आपको पहचान लिया हूँ परन्तु आप ही खुद को और मुझे नहीं पहचान पा रहे थे तो इसमे मेरी क्या गलती…..बड़े भाई तो आप है तो गुनाहगार हम थोड़े नहीं होंगे……हाँ यह बात जरुर है कि आपकी सजा मेरी सजा होगी………प्यार और सम्मान देने के लिए कोटि-कोटि हार्दिक आभार.

MAHIMA SHREE के द्वारा
April 4, 2012

अज्नानंद बाबा की जय… मान मर्यादा बस्ती की जय, देश के सभी शराफत चाचाओ की जय !!! बाबा आप ने क्या प्रवचन दिया है ……लोगो की bolti बंद करवाओगे क्या… बेचारे जिन्दा कैसे रहेंगे बिना नंगेपन के…..

    vikramjitsingh के द्वारा
    April 4, 2012

    ”अज्नानंद बाबा” नहीं महिमा जी, ”श्री श्री 1008 स्वामी श्री अलीनानन्द जी महाराज” कहिये…. ऐसे कहिये… ”जय हो प्रभु, बच्ची दर पे आई हैं, कल्याण करें प्रभु……….. आपका आशीर्वाद चाहिए, कृपा करें प्रभु….” तभी समाधि टूटेगी ”श्रीमान बाबा’ की…….हा…….हा…..हा……

    April 9, 2012

    इब्त दायें इश्क है रोता है क्या? आगे-आगे देखिये होता है क्या? बच्छा मैं तो साधन मात्र हूँ, मैं तो कुछ कर ही नहीं रहा, वो तो सब कुछ ऊपर वाला करता है…..हाँ….हाँ…हाँ….

    April 9, 2012

    कल्याण होगा और जरुर होगा. बस आप बाबा में आस्था बनायें रखे. यदि बाबा आप लोगो का कल्याण नहीं करेंगे तो अपना करेंगे ही…………हाँ….हाँ….हाँ……तो एक बार प्रेम से बोलिए ……देश के बाबाओं की……!

ajay kumar pandey के द्वारा
April 4, 2012

बड़े भाई अनिल जी बिलकुल ठीक कहा की नंगे की बस्ती में नंगापन एक गुनाह है इस ब्लॉग को पढ़कर मुझे भी एक व्यंगात्मक कविता याद आई वह कुछ इस प्रकार है सिख वाको दीजिये जाको सिख सुहाय सिख न दीजे वानरा की घर बयेका जाय धन्यवाद

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    April 4, 2012

    बहुत अच्छे अजय जी ..;))

    April 9, 2012

    भाई जी, आप से एक विनती करना चाहूँगा कि आप मेरा ब्लाग मत पढ़ा करें. बड़ों को तो समझ में आता नहीं हैं. दर लगता है कि यदि आप समझेंगे तो कहीं अनहोनी न हो जाएँ क्योंकि आप अच्छी चीजों को अनुसरण करने की बजाय बुरी चीजों का अनुसरण जल्दी करते हो. मैं लिखता कुछ और हूँ; कहना कुछ और चाहता हूँ और लोग समझते कुछ और हैं. भैया कुछ बातों को समझने के लिए वक़्त और उम्र दोनों की आवश्यकता होती हैं. यहाँ लोगो के पास उम्र तो है लेकिन वक़्त नहीं की मेरी बातों को समझ पायें. आपके पास वक़्त तो हैं पर उम्र नहीं कि आप अपनी प्रतिक्रिया उन विषयों पर दो जो मैं उठाता हूँ. हाँ एक बात कहूँगा आप मेरे विषयों पर चिंतन-मनन कर सकते हो परन्तु कमेन्ट नहीं करना…..कमेन्ट वही करना जहाँ लगे कि आपके काम की चीज हो. व्यंग्यात्मक कविता अच्छी लगी. अब जियें पढाई करिए. नहीं तो मार पड़ेगी…. और मित्रवर महिमा जी….बड़े भाई को तो बिगाड़ दी हैं आप. छोटे को तो मत बिगड़ीयें…..हाँ…..हाँ…हाँ…

nishamittal के द्वारा
April 4, 2012

अनिल जी,आपका आक्रोश किस के प्रति है,समझ पाने में असमर्थ हूँ.आपकी ये पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगींपूछता हूँ जो पूछते हैं, इन्सां क्या है? अँधेरे को जो मिटायें वो रोशनी क्या है? आदमी तो हम सभी, क्या बताएं इन्सां क्या है?

    April 8, 2012

    सादर प्रणाम! मैं पहले भी कह चुंका हूँ कि मेरा आक्रोश किसी व्यक्ति और समूह विशेष के प्रति नहीं हैं. यदि मेरी बात मेरे आलेख और कृतियों के माध्यम से आपतक नहीं पहुँच पाती हो तो मैं चाहूँगा कि आप सरिता दीदी की नयी पोस्टिंग जरुर पढ़ना चाहें. आपके मन के अन्दर उठने वाले सवालों का जवाब उनकी इस रचना से आपको जरुर मिल जायेगा. लिंक दे रहा हूँ…..आपके प्यार और आशीर्वाद का सदैव अभिलाषी http://sinsera.jagranjunction.com/2012/04/06/अब-यहाँ-कोई-नहीं-कोई-नहीं-आ

akraktale के द्वारा
April 4, 2012

अनिल जी नमस्कार, बाबा जी की गूढ़ बातें समझ सका ना कोय. जो समझे इनकी बातन को वो भी बाबा होय. वो भी बाबा होय घिरे हैं शराफत चाचा बेचारे, मान मरदन के मारे इहाँ सिसक सिसक के रोय. आपने विस्तृत आलेख लिखा है किन्तु केंद्र बिंदु ही गायब कर दिया है इसलिए समझने में कठिनाई का अनुभव हो रहा है. साथ की प्रश्नवाचक काव्य पंक्तियाँ अच्छी हैं.

    April 8, 2012

    सादर प्रणाम! बिल्कुल सही फ़रमाया आपने…..दरअसल पर्याप्त समय नहीं मिल पाया था की मैं अपनी बात पूरी करता. इसके लिए माफ़ी चाहूँगा…..!

ajaydubeydeoria के द्वारा
April 4, 2012

अनिल भईया तुम लगे रहो, शराफत चाचा के साथ-साथ बाकी की जिम्मेदारी मेरी. सत्संग के आयोजन से लेकर प्रसाद वितरण तक. मौका कभी मत चूकना……. वो क्या है…… हाँ याद आया…. ये दो लाइनें अपने यहाँ चर्चा में हैं…… वो क़त्ल भी करते हैं तो रहते हैं गुमनाम, हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम. .

    April 8, 2012

    बहुत खूब अजय भैया ……क्या खूब कहा है आपने…..हमें लगता हैं कि आप भी भी मौका धुनधते रहते हैं पत्थर मारने का…….बहुत अच्छा लगता हैं ….आप जैसे विचारक का साथ पाकर…..हार्दिक आभार.

vikramjitsingh के द्वारा
April 4, 2012

अनिल जी प्रणाम. ज़रा विस्तार से बताने का कष्ट करेंगे आप…..कि आप कहना क्या चाहते हैं? आपका आलेख पढने के बाद श्रीमान महमूद जी के उस रोल की बहुत याद आई, जो उन्होंने ‘पड़ोसन’ फिल्म में निभाया था…….

    April 8, 2012

    अभी बहुत कुछ याद आएगा ….बस आप देखते जाइये…..हाँ….हाँ….हाँ…..

jlsingh के द्वारा
April 4, 2012

प्रिय अनिल जी, वैसे तो आपका यह प्रवचन किसी तिलिस्म की माफिक लगी …. कुछ समझा कुछ नहीं…ये शराफत चाचा कौन हैं उत्सुकुता बनी रहेगी! वैसे आपकी कलम कभी नुकीली कभी पैनी, कभी तिरछी, तो कभी सर के ऊपर से होकर निकल गयी. वैसे जब कथा आरम्भ हुई है तो प्रथम अध्याय में पूरी बात कैसे आ जायेगी? धीरे धीरे परतें खुलेंगी, इसी उम्मीद के साथ. आपका – शुभ चिन्तक!

    April 8, 2012

    सादर प्रणाम! बिल्कुल सही सोचा आपने……..आपके प्यार और आशीर्वाद का हार्दिक आभार.

follyofawiseman के द्वारा
April 4, 2012

वैसे तो मैं मूलतः कवि नहीं हूँ, किन्तु जागरण जंक्शन के कुछ कवियों से प्रेरित हो कर कविता लिखने का प्रथम प्रयास कर रहा हूँ, कविता अगर पसंद आए तो खुले दिल से मेरी सराहना कीजिएगा ताकि मैं और भी ऐसी खूबसूरत कविताएँ लिखने के लिए प्रेरित हो सकूँ……….आपका Wise Man ! ऊपर आम का छतनार, नीचे हरे घास हज़ार, और वन-तुलसी की लताएँ करने गलबहियाँ तैयार, लेके चाकू और कटार, जब हो ओलो का प्रहार, बिमला मौसी का परिवार, चुने टोकरी मे अमियाँ फिर डाले उनका आचार… यह खेल चले दो तीन महीने लगातार…. फिर आए जाड़े का मौसम, पड़े शीत की मार, छोटू को हो जाए बुखार….. डॉक्टर की दवाई फिर करे छोटू का उद्धार….. फिर आए गर्मी की ललकार, सर्वत्र मचे हाहाकार, और जब लाइट न हो और हो पंखे की दरकार, मचाए सब चीख-पुकार, चले प्रक्रिया यह बारंबार, फिर आए बसंती बहार, इस मौसम के बारे में मैं कहूँगा अगली बार…… तब तक के लिए मेरा सादर नमस्कार…..

Sumit के द्वारा
April 3, 2012

सुंदर कहानी बाबा के द्वारा ,,,,,,,और आखिरी के सवालो से भरी पंक्त्यिया अति-सुंदर ,,,,,,,,,,,,,, http://sumitnaithani23.jagranjunction.com/2012/04/02/उफ़-ये-हाई-सोसाइटी/


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