साधना के पथ पर

अद्य की स्याही

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नंगों की बस्ती में नंगापन, एक गुनाह!-खंड२

Posted On: 15 Apr, 2012 Others में

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अजय भैया जरा तम्बू से बाहर देखना सारे मर्यादित लोग इक्कट्ठा हुए या नहीं…..हाँ भैया जी, सभी एकत्रित हो चुके है….तो ठीक है आप मेरा आसन लगा दो. जी बिल्कुल
मेरी प्यारी बहनों और उनके प्यारे भाइयों!
पिछले दिनों हम कहा थे….
बाबा नहीं है ढोंगी है, यह तो मनोरोगी है!…… बाबा नहीं है ढोंगी है, यह तो मनोरोगी है!…..बाबा नहीं है ढोंगी है, यह तो मनोरोगी है!
संतोष भैया यह कौन बदतमीज है जो भैया जी के खिलाफ नारा लगा रहा है. इसे तम्बू के पीछे ले जाकर पेट भर प्रसाद खिलाना जरा. . ….अरे भैया यह तो शराफत चाचा के घर का चिराग है. शराफत चाचा लड़के की चाह में कुल तीन शादियाँ किये थे. बड़की चाची तो बेटी को जन्म देते देते मर गयी. बीचवाली चाची से कोई संतान ही नहीं हुई. छोटकी चाची का भी यही कुछ हाल था. लड़के की चाह में जाने कितने चौखट चूमने और कितने नदी-नाले नहाने के बाद छोटकी चाची ने एक लड़के को जन्म दिया. लोगों के सलाह पर चाचा ने उसका नाम चिराग रखा. कारण स्पष्ट है कि समाज के सामूहिक प्रयास से उनके घर में एक चिराग जला था. अतः लोगो की बात चाचा को तो माननी ही थी. आखिर वह एक सामाजिक प्राणी जो ठहरे. हमको आज तक इ समझ में नहीं आया कि चाचा की बेटी का क्या गलती थी जो उन्होंने उसके प्रेमी के साथ उसे जिन्दा दफ़न करवा दिए. जबकि एक औलाद की खातिर यही चाचा, चाची को जाने कितने घाट का पानी पिलवायें
हैं. इस पर शर्म करने के बजाय कल-तक शान से कहते फिरते थे कि मेरा चिराग है जो मेरे वंश को आगे ले जायेगा. अरे जब वह उनका खून ही नहीं है तो उनकी औलाद कैसी. चलो चाचा और उनकी बेटी तो रहे नहीं…… गड़े मुर्दे उखाड़ने से क्या फायदा...अरे भाई कोई हमें भी बताएगा कि क्या हुआ?…..स्वामी जी वो कल रात को शराफत चाचा का इंतकाल हो गया. .....तो भैया आप सभी उसे समझा-बुझाकर बैठा दो. वरना स्वामी जी फूंक देंगे तो बुझ जायेगा हाँ…हाँ….हाँ. अरे रहने दो भाई बोलने दो उसे. अजय भैया यह सब कैसे हो गया. कल सुबह में सुनने में आया था कि चाचा जी ठीक हो चले हैं. भैया जी आप बिल्कुल सही सुने थे. वह क्या है कि कल रात को अस्पताल के चौथी मंजिल पर चाचा जी किसी नर्स को अपनी बाँहों में जकड़ना चाह रहे थे. उसने खुद को बचाने की खातिर चाचा जी को झटका दे दिया. परिणाम स्वरुप चाचा जी चौथी मंजिल से सीधे जमीं पर आ गिरे. गिरने के साथ ही उनका प्राण पखेरू ऐसे निकला मानों कोई तोता वर्षों की मेहनत के बाद पिंजड़ा तोड़कर भागा हो. हाँ…हाँ…..हाँ…..! …..का रे चिरागावा फिर अनुज को दोष काहें दे रहा है. ससुर के नाती यही पर उठाकर पटक देंगे. मछली के माफिक छट-पिटाकर मर जाओगे. अरे दिनेश भैया कितनी बार बोला हूँ कि क्रोध को पालना सीखिए और व्यक्ति के खिलाफ मत जाइये. पर आप हो कि कुछ सुनते ही नहीं हो, रह-रह कर उत्तेजित हो जाते हैं. अनुज कोई तुम्हारे बारे में एक शब्द भी बोले हम बर्दाश्त नहीं कर सकते. अरे भाई यदि भारत भूमि पर यही जज्बा व्यक्ति विशेष के विरुद्ध न होकर बुराई के विरुद्ध रहा होता तो यह स्वर्ग-सा सुन्दर धरती नरक क्यों बनती. शांतिः…शांतिः…लगता है आज भी आप लोग मेरा प्रवचन ख़त्म नहीं होने दोगे. चाचा जी को शमशान का रास्ता भी तो दिखाना है. दिनेश भैया एक काम करिए. आप महिलाओं में अफवाह फैला दीजिये कि स्वामी जी बहुत जगता है. फूंक देते हैं तो बाँझ महिलाएं गर्भवती हो जाती हैं. साथ ही शहर जाकर ५-६ हट्टे-कट्टे बेरोजगार नौजवानों को किराएँ पर ले लीजियेगा. अनुज महिलाओं की बात तो समझ में आ गयी. परन्तु हट्टे-कट्टे नौजवान की क्या आवश्यकता है? जबकि तुम तो अहिंसावादी हो. दिनेश भैया हम दोनों को एक ही पिता ( सामाजिक कुरीति ) ने जन्म दिया है. फिर भी स्वामी की कुर्सी पर आपका अनुज विराजमान है कुछ तो कारण होगा. आप भले ही इन नौजवानों की आवश्यकता न समझ पायें हो. परन्तु सामने वाले सब कुछ समझकर मंद-मंद मुस्कुराएँ जा रहे हैं और साथ ही मनोकामना कर रहे हैं कि काश! स्वामी जी के साथ माताओ और बहनों की सेवा करने का मौका हमें भी मिलता तो कुछ मेवा हम भी खा लेते. अनुज को ज्यादे मुँह नहीं लगाते भैया. अब आप जाइये जैसी विनती किया हूँ वैसा ही करिए. अजय भैया और संतोष भैया आप दोनों मेरे साथ चाचा जी के अंतिम यात्रा में शमशान घाट चलिए. भैया देखों हमारे जाने की बात सुनकर अबोधावा क्यों रोने लगा. जी भैया अभी देखता हूँ. क्या हुआ बेटा ? क्यों रो रहे हो ? वो कहानी…..अच्छा मेरा बाबु कहानी सुनेगा. भैया जी वो आज भी आप नंगो की कहानी शुरू नहीं कर पायें न….उसी को सुनने के लिए रो रहा है. उसे मेरे पास लाओ. बेटा रोना बुरी बात है. अच्छे बच्चे रोया नहीं करते तुम्हें नंगों की कहानी सुननी है न तो हम जरुर सुनायेंगे. शराफत चाचा को ठिकाने लगाकर आता हूँ तो आपको कहानी जरुर सुनायेंगे. तबतक यह लोलीपॉप आप खाते रहिये. ठीक है न ….हम अभी आते हैं और आँखों में आंसू बिल्कुल नहीं आना चाहिए क्योंकि आप इस देश के भविष्य हो. जो कहानी मैं अधूरी छोडूंगा कल उसे आपको पूरी करनी है. है न…अब चलिए अच्छे बच्चों की तरह मुस्कुराइयें. हाँ…हाँ…हाँ…ही..ही…ही...यह हुई न बात.
भाई आप सभी जल्दी चिता को मुखाग्नि दीजिये. भैया जी पंडी जी देर कर रहे है. बोल रहे है कि मुखाग्नि से पहिले २५ ब्राहमण को भोजन, एक गाय, एक तोला सोना, ५ हजार रूपये का संकल्प करना पड़ेगा. तभी चाचा जी के आत्मा को शांति मिलेगी. वरना इनकी आत्मा इस मृत्यु लोक में बिना-अन्न जल के भ्रमण करती रहेगी और युगों-युगों तक मुक्ति नहीं मिलेगी. ठीक हैं पंडी जी को बोल दीजिये कि जब चाचा को शारीर से मुक्त कर दिए तो इस संसार से भी मुक्त कर देंगे. उनकी कोई आवश्यकता नहीं है. भैया जी पंडी जी बोल रहे है कि आप गलत कर रहें है और इसके लिए आपको नरक मिलेगा. ठीक है पंडी जी को बोल दीजिये कि वही अच्छा करके स्वर्ग में जाएँ हमें तो नरक में ही जाना है…… अरे भैया पंडी जी तो सचमुच नाराज होकर चले गए. अब कैसे क्या होगा. अरे हम है न आप सभी चिंता मत करिए. चाचा जी को स्वर्ग तक हम पहुंचाएंगे. भाई चिराग अब मुझसे नाराजगी छोड़ों चाचा जी की मुक्ति का सवाल है. बाद में मेरे खिलाफ नारे लगा लेना.
अरे अजय भैया, चाचा जी की इज्जत दिखाई नहीं पड़ रही. हम कुछ समझे नहीं भैया जी. अरे भाई  हम धोती और पगड़ी की बात कर रहें. भैया शराफत चाचा की इज्जत को तो पंडी जी उतारकर ले गए. यह कैसे हो सकता. चाचा जी की जीवन भर की पूंजी को ऐसे कैसे ले लेंगे. पंडी जी को दौड़कर पकड़िये और चाचा जी की लुटी हुई इज्जत को वापस लेकर आइये. आखिर शराफत चाचा भगवान के पास किस मुंह से जायेंगे. अभी पंडी जी को दौड़ा कर पकड़ता हूँ.  दौडिए पंडी जी! देखते हैं कितना दौड़ते है आप. आज तो दौड़कर आपकी जान ले लेंगे. बहुत जिन्दों और मुर्दों को खा चुके हैं आप. ए…………..हा पकड़ा गए. हम कुछ भी वापस नहीं करेंगे, ब्राहमण को देने के बाद वापस नहीं लिया जाता. नहीं तो मरने के बाद कीड़े पड़ते हैं. पंडी जी हम कह रहे हैं कि चुप-चाप चाचाजी की इज्जतियाँ वापस कर दीजिये नहीं तो यही पर पटक कर चढ़ जायेंगे और आप जिंदगी भर इहाँ पड़े-पड़े कीड़े ही निकालते रह जायेंगे. देता हूँ भाई! मैं तो मजाक कर रहा था,  इ लो! लीजिये भैया जी ….अरे हमको नहीं चाचा जी को वापस दीजिये और चाचा जी से माफ़ी मांगिये. भैया जी हम उनकी इज्जत थोड़े न उतारे हैं कि हम माफ़ी मांगे! अरे भाई, यह हमारी परंपरा है कि यदि किसी की इज्जत उतर रही हो तो उसकी इज्जत की रक्षा के लिए खून की नदियाँ बहा देते हैं. इतना सबकुछ जानने के बाद भी आप चाचा जी की इज्जत उतरने दिए तो गुनाहगार हुए की नहीं. समझ गया भैया जी अभी चाचा जी से दंडवत प्रणाम कर माफ़ी मांगते है. चाचा जी हमको माफ़ी देई दो..ऊं अज्ञानता बस आपकी इज्जत उतरता देखते रहे…..ठीक है-ठीक है, कोई बात नहीं अब रोना बंद करों. रे चाचा जी आप जिन्दा है. अरे भाई चाचाजी नहीं बोल रहे हैं. वह तो हम हैं. जल्दी उठो और इनकी अंतिम क्रिया-कर्म की तैयारी करो. चिराग भाई चाचा जी को मुखाग्नि दो और उसके बाद चिते को आग दो. तो बंधुओं जीवन के इस आखिरी पड़ाव और सबसे बड़े सत्य पर आइये ईश्वर की प्रार्थना के साथ हम सभी एक संकल्प लेते हैं. चूँकि शुरू से लेकर आजतक हम हकीकत को अस्वीकार कर अज्ञान, डर और स्वार्थ से जन्मे तथ्य को ईश्वर मानकर पत्थरों और अंधविश्वासों को पूजते आयें है और साथ ही ईश्वर का तिरस्कार और अपमान करते आये हैं. तो आगे भी हम इसी परंपरा का निर्वाह करेंगे. कहा गया है कि मानो तो देव नहीं तो पत्थर. तो अपनी इस श्रधा और भक्ति को आगे बढ़ाते हैं और मान लेते हैं कि सामने दहकती हुई चिता ईश्वर हैं. आप सभी अब आँखें बंद करिए और मेरे साथ ईश्वर से प्रार्थना कीजिये…


दहकते हुए प्रभु हमारे, भाग्य उज्जवल कीजिये,

शुरू कर दे छल-कपट को, बस इतना वर दीजिये.

धर्म के नाम पर सदा अधर्म हम करते रहें

राम-रहीम के खातिर जीवन पर्यंत लड़ते रहें.

धन-बल के लिए दुर्गा लक्ष्मी का सम्मान हो,

और उसी के दम पर, अत्याचार व बलात्कार हो.

भूखे-प्यासे लोग सभी बाजारों में मरते रहें,

हम खुदगर्ज़ महलों में अपना पेट भरते रहें.

समाज के हितैषी सब, समाज अहित करते रहे,

अगर कोई आये रास्ते में, उसको चित करते रहे.

नियम-कानून की आड़ में अपन धंधा चलता रहे,
हराम की कमाई से हमारा बाग़ फूलता फलता रहे

चंद सिक्कों की खातिर कलम अपनी बिकती रहे,

और दम तोड़ती मानवता सड़को पे सिसकती रहे.

दंडवत प्रणाम कर, हम प्रार्थना यह कर रहे,

मान-मर्यादा और धर्म से स्वार्थ पूर्ति होती रहे.

अब आप सभी आँखें खोलिए. चूँकि चिता अब शांत होने वाली है. अतः चाचा जी की आत्मा की शांति के लिए. हमारे साथ आप सभी एक मंत्र का उच्चारण कीजिये……
ओह्म दयौं शांतिरन्तरिक्षं शांतिः पृथिवी शांतिरापः
शांतिरोषधयः शांतिः! वनस्पतयः शांतिः र्विश्वेदेवाह
शांतिर्ब्रम्ह शांतिः सर्वं शांतिः शान्तिरेव
शांतिः सा मा शान्तिरेधि!

!!ओह्म शांतिः शांतिः शांतिः !!

इसी के साथ चाचा जी के आत्मा को शांति मिल चुकी है. आप सभी अपने घर को जाएँ. अगला प्रवचन फिर ४-५ दिनों के बाद शुरू होगा और यदि कोई व्यवधान उत्पन्न नहीं हुआ तो हम नंगो की कहानी आप को जरुर सुनायेंगे.
तब तक के लिए..
!!ओह्म शांतिः शांतिः शांतिः !!



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84 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ajay kumar pandey के द्वारा
April 24, 2012

अलीन भैया अब आप मेरी लेखन शमता और ज्यादा पोस्ट लिखने से ही नाराज हो गए और अब आपने खुद ही लेखन बंद कर दिया अब भैया लेखन शमता का उपयोग किसी मुद्दे और कुरीतियाँ ख़त्म करने के लिए किया जाता है में आपको अपना गुरु मानता हूँ तो आपके सन्देश तो मेरे जीवन में स्थान रखते ही हैं और में अपने लेखन को छोड़ रहा हूँ वो भी आपकी बात का मान रखते हुए क्योंकि अभी मुझे और भी काम करने हैं में सामाजिक कुरीतियों के विरूद्ध एक आलेख तैयार करने जा रहा हूँ और उन आलेखों को आपको सौप दूंगा एक किताब का रूप देकर आप वह आलेख जो मेरा होगा उसे आपको एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित करना उसी पुस्तक से सामाजिक कुरीतियाँ ख़त्म होंगी और में अब इस मंच पर कुछ दिन नहीं लौटूंगा क्योंकि में अब अपनी पढाई में लग जाऊँगा और अपना आलेख भी तैयार करूँगा और मुझे अभी और भी काम करने हैं और मुझे कुछ साहित्यकारों के विचार पढ़कर विश्लेषण अपने दिमाग से करने के लिए समय चाहिए में इस मंच से कुछ दिन अवकाश ले रहा हूँ धन्यवाद आपका भाई अजय कुमार पाण्डेय

ajay kumar pandey के द्वारा
April 23, 2012

अलीन भैया आप मेरी एक पोस्ट पढो उत्तराखंड के जिला अल्मोरा का दर्शनीय मंदिर दूनागिरी और उस पोस्ट को पढ़कर दूनागिरी चले जाओ हो सकता है की आप जो चाहते हैं आपको वो मिल जाए इन गर्मियों में दूनागिरी घूम लेना धन्यवाद

    April 24, 2012

    भाई साहब मंदिर और मस्जिद में अपने स्वार्थ के लिए सर झुकाना ईश्वर के शान के खिलाफ समझता हूँ …..

jalaluddinkhan के द्वारा
April 21, 2012

इस एक कहानी में आपने कितनी सारी सच्चाई को एक साथ उजागर किया है.निश्चित रूप से यह कहानी जबरदस्त लेखन का नमूना है.सामाजिक बुराई,ढोंग का पर्दाफाश करती इस कहानी के लिए आपको बधाई.

    April 22, 2012

    अस्सलाम वल्लेकुम, जनाब! जी यह तो आप का बड़प्पन है जो इसे जबरजस्त लेखन का नाम दे रहे है, मैं तो बस वही लिखा हूँ जो हकीकत है…….

ajay kumar pandey के द्वारा
April 21, 2012

बेटे अलीन अब अजय की लेखन शमता थोडा बहुत अच्छी हो रही है यह बाबा रम्सा पीर फिल्म शमिक्षा उन्होंने अपने आप लिखी है तुम्हारी मात्र तुल्य श्रीमती पुष्पा पाण्डेय

sombir singh saroya के द्वारा
April 21, 2012

अरे भाई वह आपका नंगा नाच तो बहूत ही बढ़िया विषय को चुन कर लिखा गया जन्नाब

    April 22, 2012

    सादर अभिनन्दन ! हमारे समाज में विषयों की कमी नहीं कि उसे चुनना पड़े……..आपका आगमन सुखद रहा……….

ajay kumar pandey के द्वारा
April 20, 2012

अलीन भैया मेरा लेख छप गया आपने यह खबर दी तो सुनकर ख़ुशी का ठिकाना ही नहीं रहा मेने जब सुना की मेरा लेख छपा तो ख़ुशी हुई वैसे मेरा लेख छपा किस अख़बार में है बाल श्रम एक चिंतनीय समस्या उसकी प्रति मुझे शीघ्र दे दो धन्यवाद

    April 20, 2012

    भैया मैं कहा बोला की आपका लेख प्रकाशित हो गया है. वो तो आप ही बोले थे न कि नैनीताल के समाचार में छाप गया है. अतः मैं तो आप ही की बात सुनकर आपको बोला था कि जब आपका आलेख छाप गया है तो अब आप निश्चिन्त रहिये. जिस दिन आप खुशखबरी सुनाएँ थे, उस रत को मैं चैन से सोया था. और अगेले सुबह मिठाई भी बता था कि मेरे भाई का आलेख छाप गया है. पर अब लगता है कि मुझे नींद नहीं आने वाली…..कोशिश में लगा हूँ . देखिये क्या होता है….

jantakiawaz के द्वारा
April 20, 2012

अनील जी आदाब , आप का लेख ”नंगों की बस्ती नंगापन एक गुनाह” पढ़ कर तुरंत मुंशी प्रेमचन्द की कहानी गोदान की याद आ गयी ! आप ने समाज में फैली हुयी कुरूतियों की तरफ चोट करने का बहुत ही अच्छा प्रयास किया है ! शराफत चाचा , अजय इत्यादि का चरित्र चित्रण का अच्छा सामंजस्य काबिले तारीफ़ है! प्रिय अनील जी समाज में अनेकों अन्धविश्वास फैले हुए हैं उसे दूर करना अति आवश्यक है, इस हेतु ज़रूरत है समाज को जगाने की खास तौर से आज के नवयुवको को ! अनील जी मैं समझता हूँ आप ने उक्त लेख से समाज में फैली हुयी बुरायेओं क्र खिलाफ जंग का एलान तो कर दिया है बस इसे आगे बढ़ाते रहें ! आप का आलेख बहुत ही प्रशंसनीय है.जीतनी भी तारीफ़ की जाय कम है ! इस के लिया बधाई हो! अनील जी समाज में फैली हुयी एक सबसे बड़ी कुरीति की तरफ आप का ध्यान आक्रिस्ट कराना चाहूँगा ! वह है दहेज़ रुपी दानव ! मैं चाहता हूँ आप अपने इस मंच के माध्यम से इस के विरुद्ध देशोयापी अभियान चलायें ! मैं समझता हूँ पढ़े लिखे लोगों का एक बड़ा तबका आप के साथ खड़ा होगा! इसके लिया बस मैं यही कह सकता हूँ की – मैं अकेला चला था जानिबे मंजिल मगर लोग आते गये और कारवां बनता गया राजा राम मोहन राय ने जब सति प्रथा के विरुद्ध आवाज़ उठाई थी तब वो भी अकेले ही थे , परन्तु अंत आते आते समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग उनके साथ खड़ा होने में अपने आप को गौरान्वित महसूस कर रहा था ! बस आगे मिलने पर! आप का शाहाब अहमद खान

    April 20, 2012

    जी बिल्कुल, दहेज़ रूपी दानव के खिलाफ देशव्यापी अभियान चलाऊंगा और सिर्फ दहेज़ रूपी दानव के खिलाफ ही नहीं बल्कि समाज के हरेक बुराई के खिलाफ देशव्यापी अभियान चलाऊंगा. आपका इस मंच पर पुनः आना सुखद रहा. आशा करता हूँ कि आप चंद लोग बुराई के खिलाफ हमारा ऐसे ही समर्थन करते रहेंगे और इसके बदले में इस समाज के सारी जिल्लते और प्रताड़नायें अपने सिने पर हंसकर लेता रहूँगा ताकि आने वाला कल एक स्वच्छ और सुन्दर माहौल में सांस ले सके जिससे आदि गुरु शंकराचार्य, ईसा मसीह, मुहम्मद साहब, संत कबीर, स्वामी विवेकानंद और महात्मा गाँधी जैसे महा पुरुषों के कोशिशों को एक खुबसूरत अंजाम दिया जा सके….आज समय है इंसानियत को जगाने का. जिसको आज तक हम उपरोक्त महापुरुषों के नाम पर रौदतें आये हैं और जाने-अनजाने में इनका अपमान और तिरस्कार करते आयें है. साथ ही अपने क्रिया कलापों द्वारा सिद्ध करते आये हैं कि दुनिया के सबसे नीच और घाटियाँ जाति यदि कोई है तो वो कोई और नहीं बल्कि हम इंसानों की हैं जो सर्वश्रेष्ठ बनने के प्रयास में कब अपनी श्रेष्ठता खो दिए कुछ पता ही न चला……आज जरूरत है….खुद को एहसास करने की ….

चन्दन राय के द्वारा
April 20, 2012

मित्रवर अनिल जी , कमाल का व्यंग किया है भाई , पुरे गिला गिला कर के धोया आपने , उम्दा लेखन शक्ति

    April 20, 2012

    जी मैं कोई लेखक नहीं हूँ और न ही उम्दा करने की चेष्टा में लिखता हूँ. बस अपनी आवाज को आप सबतक पहुँचाने के लिए लिखता हूँ. और शायद सबसे अधिक अपनी आवाज को खुद तक पहुँचाने की कोशिश करता हूँ……हार्दिक आभार.

Bhupesh Kumar Rai के द्वारा
April 20, 2012

अनिल जी नमस्कार, बहुत खूब! पाखंडियों के प्रपंच पर आपका व्यंगात्मक प्रहार.

    April 20, 2012

    जी माफ़ करियेगा, पाखंडियों पर यह प्रहार नहीं है बल्कि पाखंड पर हैं क्योंकि पाखंडी तो कही न कही आप भी है और मैं भी. आज जरूरत है पाखंड को ख़त्म करने की न कि पाखंडियों की…….,, जी आपकी प्रतिक्रिया का हार्दिक आभार….कृपया अपना बहुमूल्य विचारों को निःसंकोच आगे भी जरी रखे…..चाहें पक्ष में या विपक्ष में….

ajay kumar pandey के द्वारा
April 19, 2012

अलीन भैया मेरे लेख छपने का क्या हो रहा है कब तक भेजोगे धन्यवाद

    April 20, 2012

    मैंने तो बात कर रखी हैं….अब उनसे मैं बार-बार नहीं पूछ सकता न. अच्छा नहीं लगता……वैसे भी आपका लेख छाप गया न. अब तो आपको संतोष करना चाहिए…….न…!

yamunapathak के द्वारा
April 19, 2012

अलीन्जी,आप जब-जब दुनिया का सच सामने रखते हैं मैं चकित रह जाती हूँ पर मेरे भाई दुनिया में सुधार भी तो हम ही कर सकते हैं और वह भी सर्वप्रथम खुद से.देखो मैं बड़ी बात तो नहीं कर रही पर इतना ज़रूर जानती हूँ की अगर कोई मेरी सही बात सुनने को तैयार होता है तो उसे ज़रूर समझाती हूँ.

    April 19, 2012

    सादर अभिनन्दन! आपके विचार हमेशा सराहनीय हैं. पर जो बातें मैं रखता हूँ इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है. आश्चर्य तो यह है कि हम दूसरों को मरते हर देखकर भी जीने की आशा रखते हैं, आश्चर्य तो यह है कि हम राम-रहीम का नाम लेते है और काम रावन और शैतान का करते हैं. आजतक दुनिया में जो कुछ भी होता रहा है. वह सिर्फ अच्छाई के नाम पर तो होते रहा हैं. लोग अच्छाई का समर्थन तो करते है. पर अनुसरण नहीं करते. जो धर्म, व्यवस्थाएं और मर्यादाएं बनी हैं, वह शांति, प्रेम, अहिंसा के लिए ही बनी हैं . परन्तु आज पूरी दुनिया में अशांति, अव्यवस्था और अमर्यादाएं इन्ही के नाम पर तो है तो अच्छाई की बात करके मुझे नहीं लगता कि हम सुन्दर और सुसज्जित समाज का निर्माण कर पाएंगे क्योंकि हर बार ही हम अच्छाई के आड़ में अपना स्वार्थ सिद्ध करते आयें है…..अब तो हमें सिर्फ इस पर काम करना है कि हमारी बुराइयाँ क्या है? ताकि हम अपनी बुराइयों का बहिष्कार कर के अच्छाई को कायम रख सके. …नहीं तो हम अच्छाई का गुणगान गाते चले जाते है और बुराई का अनुसरण करते चले जाते हैं तो फिर फायदा क्या……मैं चाहूँगा कि अब आप अपनी बात यहाँ रखे ताकि हम दोनों में एक स्वच्छ और साफ वार्तालाप की शुरुवात हो जिससे हम लोगो के साथ-साथ दूसरों को भी फायदा हो….

    dineshaastik के द्वारा
    April 20, 2012

    आदरणीय यमुना जी मुझे लगता है कि हृदय  में वो क्राँति की चिंगारी है, जो परिवर्तन की चाह रखती है। आपसे निवेदन है कि ओरों के हृदय में इसे जला कर ज्वाल  बनाना है। अनुज  अनिल जी कितनी विडम्बना है कि हमरी कथनी और  करनी में बहुत  अंतर है, हम  बातें तो बहुत  बहुत  बड़ी करते हैं। लेकिन  करते वही हैं, जो अब  तक  करते आये। अब देखिये मैंने जातिप्रथा के  विरोध  स्वरूप दिनेश  अग्रवाल  के स्थान पर  दिनेशास्तिक  लिखना आरंभ  कर  दिया तो एक  सम्मानीय  ब्लॉगर  ने उस  पर सवाल  उठा दिये। खैर  हमें इन छोटी बातों पर ध्यान  नहीं देना हैं। 

    yamunapathak के द्वारा
    April 20, 2012

    दिनेशजी,मैं अनिलजी की बातों से सहमत हूँ और आपके कदम की भी सराहना करती हूँ .

sinsera के द्वारा
April 18, 2012

निशब्द……मूक…….बेजुबान…..no comments…

    April 19, 2012

    जी…..ऐसे ही निशब्द….मूक….बेजुबान…..बने….रहिये. दंडवत प्रणाम करकर एक विनती कर रहा हूँ. यदि बोल नहीं सकती है तो एक हारमोनियम ले लीजिये और बैठकर बजाइए. बहन हारमोनियम बजाएगी और भाई नंगा होकर नाचेगा………………तो यहाँ पर मेरी नंगा नाच का तमाशा देखने वाले शरीफ और मर्यादित महा पुरुषों बजाओं ताली………..नाचो रे भाई ….नाचो रे नंगा होकर नाचो रे …..कपडा फाड़ कर नाचोरे……हाँ….हां….हाँ..

alkargupta1 के द्वारा
April 18, 2012

अनिल जी , समाज की कुरीतियों को व्यंग्यात्मक रूप में बहुत ही अच्छी तरह से बताया है……

ajay kumar pandey के द्वारा
April 17, 2012

अलीन भैया मेरा लेख नैनीताल समाचार के हरेला अंक २०११ में छपा है आप इन्टरनेट जब चलोगे तो गूगल पर जाना उसमे लिखना आतंकवाद मानवता का भक्षक वोह खोलना फिर उसमे बच्चो का कालम चिनूक वाले में जाना अगर आपको यकीन न आये तो मेरा लेख नैनीताल समाचार के इन्टरनेट वाले अख़बार में हरेला अंक २०११ में रखा हुआ है अगर आपसे वोह न खुले तो आपको एक वेबसाइट दे रहा हूँ उस पर suggest us वाले आप्शन पर जाकर मेरा लेख आतंकवाद का भक्षक है जरुर पढना www. mera pahad.com dhanyawaad

    April 18, 2012

    जी, बहुत अच्छी खबर है. मैं तो यह खबर सुनकर रात भर चैन से सोया हूँ………अब मेरी भी चिंता दूर हो गयी……

ajay kumar pandey के द्वारा
April 17, 2012

अलीन भैया आखिर आपने सही कहा था की दुनिया मेरे कदमो में होगी और देखिये अब मुझे म्योर उत्तराखंड नाम की संस्था ने मुझे करियर guidance कैंप में बुलाया है में अपने लैपटॉप पर बैठा था तो मुझे एक सन्देश आया की आपको म्योर उत्तराखंड ग्रुप ने carrier guidance कैंप में बुलाया है तो मेरा वोह निमंत्रण पत्र पढ़कर ख़ुशी का ठिकाना ही नहीं रहा और फिर म्योर उत्तराखंड की वेबसाइट पर गया उस शिविर की जानकारी भी ली और अब उस ग्रुप के अध्यक्ष मनोज सिंह नेगी जी ने मेरे पत्र का धन्यवाद भी दिया है में उस ग्रुप की वेबसाइट मेरा पहाड़ पर लेख लिखता रहा हूँ और उस ग्रुप का सदस्य भी हूँ मुझे दुःख है की में उस शिविर में जा नहीं पाउँगा मेने उन्हें लिख दिया है धन्यवाद

    April 18, 2012

    दुनिया तुम्हारे कदमो में नहीं है अनुज बल्कि तुम दुनिया के ऊपर-ऊपर चले जा रहे हो. जिस दिन दुनिया कदमो में होगी उस दिन तुम्हे यह बात नहीं कहनी पड़ेगी बल्कि दुनिया कहेगी……और एक चीज यद् रखना कि यदि तुम सच्चे पथ पर हो तो तुम्हे इस दुनिया से सिर्फ जिल्लते , अपमान और दर्द ही मिलेगा. और यदि तुम दुनिया से सम्मान और सलाम की आशा रखते हो तो इसका मतलब कि तुम्हारा मार्ग अनुचित हैं क्योंकि सम्मान मुर्दों को मिला करता है जिन्दो को नहीं. वैसे भी कोई व्यक्ति यह बोल रहा है कि मैं सही मार्ग पर चल रहा हूँ मुझे सम्मान और इज्जत मिलाना चाहिए तो वह गलत फहमी में हैं…….यदि सम्मान पाना है तो वही काम करों जो दुनिया चाहती है. परन्तु इसप्रकार तुम्हारे और तुम्हारे समकक्ष लोगों के इस दुनिया से जाने के बाद तुम्हारा सम्मान भी उसी प्रकार चला जायेगा जैसे सूरज के डूबने के साथ उजाले का लोप हो जाता है. बस विचार ही जिन्दा रह पते है और विचारों को जिन्दा रखने के लिए शारीर पर अनेको कष्ट झेलने पड़ते हैं . मैं जब बहुत छोताथा तो मैं सोचता था कि मैं भी राम, मुहम्मद, कबीर, गाँधी, विवेकानंद की तरह बनूँगा और इसप्रकार अच्छा काम करूँगा तो मुझे भी सम्मान मिलेगा. पर यह मेरी भूल थी क्योंकि मेरे पास यह समझाने और देखने की शक्ति नहीं थी कि यह सारे लोग जो जिल्लते, कष्ट, और चोट दिल पर झेले है. वह आम आदमी कभी झेल नहीं पायेगा और न ही उनकी तरह बन पायेगा. क्योंकि हम सम्मान और मर्यादा के लिए जीते है और वह लोग अपमानि और तिरस्कृत होकर इस दुनिया में सम्मान और मर्यादा पायें है……यह बहस का बहुत लम्बा विषय है अनुज जब मैं कभी तुमसे मिलूँगा तो तुम्हे बताऊंगा क्योंकि तुम्हे बहुत चीजे बतानी है….जिससे तुम अनभिग्य हो……..हमेशा तुम्हे मुश्किलें और चुनौतिया समाज और ईश्वर से मिलती रहे बस यही मनोकामना है…

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    April 19, 2012

    बाप रे बाप अलीन जी कहा से लाये है इतनी विद्वता ..आपसे तो बड़ो को भी पाठ सीखना है….सच कहा आपने “”यह सारे लोग जो जिल्लते, कष्ट, और चोट दिल पर झेले है. वह आम आदमी कभी झेल नहीं पायेगा और न ही उनकी तरह बन पायेगा. क्योंकि हम सम्मान और मर्यादा के लिए जीते है और वह लोग अपमानि और तिरस्कृत होकर इस दुनिया में सम्मान और मर्यादा पायें है…”" हमे अपनी तुच्छ इच्छाओ से उपर उठना होगा ….

    April 20, 2012

    मित्र! मैं समझता हूँ कि इसमें विद्ता की कोई बात नहीं है……मैंने तो आज तक गीता और कुरान को पढ़ने कि जरूरत ही नहीं समझी. क्योंकि उसमे निहित सभी ज्ञान हम सबके सामने समाज में ही हैं और जो अलौकिक ज्ञान है उसके लिए इश्वर ने हमें मस्तिष्क और मन दिया ही जिसके सहायता से उसे भी प्राप्त कर सकते हैं……बस यह हम पर निर्भर करता है कि हम खुद को कितना समय दे पाते सच को स्वीकार करने में. आपका दिन मंगलमय हो ……

Jayprakash Mishra के द्वारा
April 17, 2012

अलीन जी यह ज्ञान किताबी नहीं बल्कि भोगा हुआ है. बधाई

    April 18, 2012

    हरेक ज्ञान इसी समाज से उपजा हैं, जय प्रकाश जी बस समझाने का फेर है…..हार्दिक आभार!

yogi sarswat के द्वारा
April 17, 2012

अलीन जी , नमस्कार ! नंगो के देश में ही नंगा पण का नाच ? फिर देखेगा कौन ? लेकिन जिनको आँखें होते हुए भी देखने की आदत न हो , कान होते हुए भी सुनने की आदत न हो , मुंह होते हुए भी बोले नहीं , उनके लिए क्या किया जा सकता है ? बहुत बेहतर लेख ! आपकी प्रतिभा को सलाम करने को जी चाहता है !

    April 18, 2012

    सादर नमस्कार! योगी जी, यह मेरी प्रतिभा नहीं है. यह हमारी क्रांति की शुरुवात है. मैं सम्मान और सलाम के लिए नहीं लिखता और हम सबकी यह नैतिक तथा मौलिक जिम्मेदारी है कि जाति प्रथा, बलि प्रथा, दहेज़ प्रथा, होनौर किल्लिंग, अन्धविश्वास और आडम्बरों से अपने इस समाज को मुक्त करे. सबसे पहले दूसरों को नसीहत देने कि बजाय हम सभी अपने में बदलाव करके समाज में एक उदहारण प्रस्तुत करें. ध्यान रहे हम अन्दर से वही हो जो बाहर से है….आशा करता हूँ कि आप जैसे मित्रों द्वारा सच्चे अर्थों में समर्थन मिलाता रहेगा……..

ajay kumar pandey के द्वारा
April 17, 2012

बड़े भैया आपने मुझसे स्कूल का नाम कक्षा और पापा का नाम माँगा था वोह निम्न है स्कूल का नाम पंडित यादराम secondary पब्लिक स्कूल कक्षा दसवी पापा का नाम श्री भुवन चन्द्र पाण्डेय माता का नाम श्रीमती पुष्पा पाण्डेय अलीन भैया आपने कहा था की मेरी जो भाभी मिली उसे समाज ने अनुमति नहीं दी परन्तु मेरा यह कहना है की वही मेरी भाभी बनेंगी जो आपको मिली है धन्यवाद

ANAND PRAVIN के द्वारा
April 16, 2012

मित्र, नमस्कार यह कौन सा नया प्रवचन शुरू कर दिया है…………लगता है निर्मल बाबा का भांडा फोर होने के बाद आपही की बारी है………………..बच के ज़रा आरती पढ़ के आनंद आया………………….अगली कड़ी का इन्तजार रहेगा वैसे एक बात बता दूँ …………..जगह चाहे जो भी हो नंगो के देश में भी नंगापन गुनाह ही है………..

    April 17, 2012

    बाबाओं को बढ़ावा नासमझ और अंश्विश्वासी के साथ-साथ जब पढ़े-लिखे और जागरूक लोग देते हैं तो घोर आश्चर्य होता है. पढ़े-लिखे और समझदार लोगो को इतना तो विवेक होना ही चाहिए कि सामने वाले के क्रिया-कलापों से समझ सके कि बाबा है या ढोंगी है. परन्तु यहाँ तो लोग अपना स्वार्थ पूर्ण के लिए बाबा के पीछे-पीछे बाबा-बाबा चिलाते हुए भागे जा रहे हैं. सोचने-समझने की शक्ति ही ख़त्म हो गयी है. “ऐ नासमझ बालक! क्या तुम्हें इस बाबा की शक्तियों का तनिक भी अंदाजा नहीं है जो पल में राजा को रंक और रंक को राजा बना देते हैं. क्या तुम बाबा की कृपा नहीं चाहते हो. लगता हैं तुम्हे परीक्षा में पास नहीं होना है जो बाबा से पंगा ले रहे हो. यदि बाबा से ज्यादा पंगा लोगे तो बाबा इसी मंच पर तुम्हे नंगा कर देंगे…..अजय भैया और संतोष भैया……इस बदतमीज को अभी इस मंच से अहिंसा के साथ उठाकर निचे फेक दिया जाय …..ओह्म शांति!” श्री श्री १७१४ स्वामी अन्जनानंद महाराज, A symbol of Ravan that is committed to destroy whole bad customs of society.

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    April 17, 2012

    संत जी इतना क्रोध ना करें………….और शाप तो बिलकुल ना दें…………त्राहिमाम – त्राहिमाम

    April 18, 2012

    अबे तू फिर आ गया…….लगता है तुम्हे श्राप देना ही पड़ेगा……

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    April 19, 2012

    लगे रहो …. :) अलख निरंजन ..श्री श्री १७१४ स्वामी अन्जनानंद महाराज की जय हो…..

Santosh Kumar के द्वारा
April 16, 2012

अनिल जी ,.सादर नमस्कार बहुत ही अच्छा और सार्थक व्यंग्य ,.प्रार्थना बहुत ही अच्छी लगी ,.आर्यसमाज का प्रार्थना गीत कभी सुना नहीं है ,..फिर भी निश्चिन्त हूँ की लाभ ही होगा ,…संतोष भैय्या को भी छोटा सा चरित्र देने के लिए बहुत आभार ,..प्रवचन की सार्थकता के लिए एक बहुत छोटे से अल्पविराम के बाद दुबारा मंच पर आऊँगा ,…. प्रवचन चलता ही रहना चाहिए ..हार्दिक अभिनन्दन और बधाई .

    April 17, 2012

    सादर नमस्कार, भैया! यह तो हमारी खुश किस्मती है की आप जैसे लोगो का साथ है. आर्य समाज की प्रार्थना मुझे बहुत ही ज्यादे प्रभावित की है. बहुत अच्छा लगता सुनाने के बाद. परन्तु मैं उसी लय में जास्त उसकी विपरीत विचारधारा लिए हुए प्रार्थना लिखने की कोशिश किया हूँ. यह जानकर ख़ुशी हो रही है कि आप सभी को यह पसंद आ रही है. इससे भी बढ़कर ख़ुशी तब होगी जब हम सभी इसका उपयोग अपना स्वार्थ पूर्ति के लिए करेंगे और इस प्रार्थना में कही हुई बातों का अनुसरण ऐसे ही करते रहेंगे जैसे कि अब तक करते आये हैं…. श्री श्री १७१४ स्वामी अन्जनानंद महाराज, A symbol of Ravan that is committed to destroy whole bad customs of society.

ajay kumar pandey के द्वारा
April 16, 2012

अलीन भैया मेरा लेख कौन से अख़बार में छप रहा है यह तो बताओ में तुम्हे परेशान नहीं कर रहा बल्कि जानना चाहता हूँ की कौन से अख़बार में मेरा लेख आ रहा है धन्यवाद

    April 17, 2012

    भाई कई लोगों से बात किया था पर कोई स्पष्ट रूप से जवाब नहीं दिया. परन्तु एक दिन मेरे आफिस में एक सज्जन मिले वह बोले कि मैं प्रकाशित करावा दूंगा. उनसे यह नहीं पूछा कि वह कौन सी magazine या paper में प्रकाशित करावा रहे हैं. वैसे भी आपको आम से मतलब होना चाहिए, पेड़ से नहीं. आपका आलेख कि भाषा संसोधित कर रखा हुआ हूँ. जिस दिन वह मिलेंगे उन्हें सौप दूंगा प्रकाशन के लिए. आप कौनसी क्लास में पढ़ते हो. वह मुझे बता दो साथ ही पापा और स्कूल का नाम ताकि मैं आपके नाम के साथ स्कुल का नाम प्रकाशन के लिए दे दूँ. यदि आपका आलेख छाप जायेगा तो मैं उसे आपको कोरियर कर दूंगा…..यदि नहीं छपा तो मैं उसे अपनी किताब में जगह जरुर दूंगा. परन्तु उसके लिए ८-९ महीने इंतज़ार करने पड़ेंगे क्योंकि अभी मैं कुछ भी सोचने के स्थिति में नहीं हूँ. जब मेरी किताब प्रकाशित हो जाएगी तो एक प्रति मैं आपको अपने हाथों से दूंगा…पर तबतक आप शांति के साथ रहों और प्रगति के साथ आगे बढों क्योंकि मेरे बड़े भी मुझ से यही कहा करते थे. यह अलग बात है कि आज तक मुझे न ही शांति मिली और न ही प्रगति मिली. एक आपकी भाभी मिली पर हमारे समाज के परम्पराओं और मर्यादाओं को मेरी ख़ुशी रास नहीं आई. ठीक हैं आप पढाई पर ध्यान दो…..अभी चलता हूँ…..

ajay kumar pandey के द्वारा
April 16, 2012

अलीन भैया मेरी एक समस्या है पढाई से जुडी हुई कृपया मुझे तुम यह बताओ की में हिंदी और संस्कृत में से कौन सा विषय लूं मेरे स्कूल के अध्यापक कहते हैं की हिंदी का जॉब में ज्यादा scope है और संस्कृत का नहीं जिसको आचार्य बनना है वोह इस विषय को लेता है अब तुम मुझे यह बताओ की में मुख्य विषय में किसे रखु और अतिरिक्त विषय में किसे रखु यह बताओ यह मेरे बोर्ड pariksha का sawal है asha है की तुम मेरी समस्या hal kar doge dhanyawaad

    April 16, 2012

    भाई एक चीज याद रखों कि आदमी स्कोप को जन्म देता है, स्कोप आदमी को नहीं. पहले तो आप यह decide करो कि आप बनना क्या चाहते हो पत्रकार या आचार्य या कुछ और. स्कोप के पीछे वह भागते है जिनको खुद पर विश्वास नहीं होता. मैं नहीं चाहता कि मेरे अनुज स्कोप के पीछे भागे बल्कि अपनी काबिलियत और मेहनत से उस क्षेत्र में स्कोप पैदा करें जिसमें उन्हें रूचि है….

vikramjitsingh के द्वारा
April 16, 2012

बहुत सुन्दर प्रवचन हैं…..बाबा, क्रांति अवश्य आएगी……. (और भक्तों की स्वार्थसिद्धि अवश्य होगी…)

April 16, 2012

आप सभी से विनम्र निवेदन! मुझे यहाँ दो बाते कहनी है पहली यह कि यह काव्य आर्य समाज की प्रार्थना गीत की लय में लिखा हूँ. अतः आप इसे उसी लय में पढेंगे तभी आपके स्वार्थ पूर्ण हो पाएंगे. दूसरी बात अंत के गद्यांश की कुछ पंक्तियाँ भूल गया था. जिसे अभी-अभी जोड़ा हूँ. अतः आप आलेख दुबारा पढ़कर मजा ले और हमको सजा दे ……… आप सभी महान मान-मर्यादा वालों का गुनाहगार स्वामी अन्जानंद .

minujha के द्वारा
April 16, 2012

अलीन जी इस आलेख से आपकी मंशा स्पष्ट होती है,पर सच कहुं तो इसमें मुझे व्यंग्य से ज्यादा पीङा नजर आ रही है……,आपके अगले प्रवचन का इंतजार रहेगा.

    dineshaastik के द्वारा
    April 16, 2012

    आदरणीय मीनू जी इस  पीड़ा को अपनी पीड़ा बनायें, सभी हमारे समाज  को इस  पीड़ा से मुक्ति मिलेगी।

akraktale के द्वारा
April 16, 2012

प्रिय अनिल जी नमस्कार, तकनिकी खामियों से भरा धारदार व्यंग.तिस पर ज्ञान बढाता काव्य.वाह! वाह!! वाह!!!

    dineshaastik के द्वारा
    April 16, 2012

    आदरणीय अशोक  जी मुझे लगता है कि यह आलेख , काव्य की दृष्टि से नहीं लिखा गया, बल्कि हम  जैसे सोये हुये लोंगो को जगाने के लिये लिखा गया है। विचारों से क्राँति आती है और  क्राँति से खुशहाली…

    April 16, 2012

    सादर प्रणाम, सर! आपका प्यार और आशीवाद मुझे सुझाव के रूप में मिलाता रहता है यह मेरे लिए गर्व की बात है…

ajaydubeydeoria के द्वारा
April 15, 2012

!!ओह्म शांतिः शांतिः शांतिः !! आज-कल बड़े अध्यात्मिक हो गए हो भाई . आपका यह प्रवचन चलता रहे……..इसकी आड़ में हमारी दाल गलती रहे……..हम बनायें करोड़ों…और आप अरबों बनाते रहें….. आखिर हम भी तो इन नंगों के यार जो ठहरे…

    dineshaastik के द्वारा
    April 16, 2012

    आदरणीय अजय जी इस  प्रवजन का असर हम  आप पर भी होना चाहिये, तभी प्रवचन की सार्थकता है। मुझे लगता है कि यह केवल  प्रवचन नहीं है, अपितु दर्द  है एक  सच्चे मानव का। जो सोच  रहा है कि उसके व्यंग  बाणों से हम  जाग  जायेंगे। लेकिन भाई हमारी नींद अंधकार से भी अधिक  गहरी है। इसे जगाने के लिये कई अनिलों का आवश्यकता पड़ेगी।      युगों युगों की नींद अभी भी नहीं टूटी, अब न जागे तो कब जागोगे।

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    April 16, 2012

    दिनेश जी हम ही इस कार्यक्रम के कर्ता-धर्ता हैं. अनिल भाई प्रवचन-कर्ता हैं. ज़ाहिर सी बात है हम साथ-साथ हैं. कुछ असर है तभी तो हम साथ हैं. बाकि दुनिया कब जागेगी यह भविष्य के गर्त में है. चिंगारी तो लगा ही रहे हैं. कभी न कभी आग भी लगेगी. सूरज सी चमक फैलेगी. अन्धकार दूर होगा.

    April 16, 2012

    ……आमीन!

ajay kumar pandey के द्वारा
April 15, 2012

अलीन भैया क्या आप मुझे इस काबिल नहीं समझते की में आपकी मदद नहीं कर सकता में आपकी मदद सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध लड़ाई लड़ने में करना चाहता हूँ इसके लिए में अपने स्कूल के कुछ दोस्त और i नेक्स्ट के रिपोर्टर आफताब अजमत जी को कहकर यह अपील करूँगा की अलीन जी की लड़ाई में सभी ब्लोग्गेर्स उनका साथ दे मुझे उम्मीद है की सब ब्लोग्गेर्स मेरी बात जरुर मानेंगे में कुछ दोस्त ऐसे लूँगा जिनको इस क्रिया में रूचि हो में आपकी मदद अब खुद से करूँगा स्कूल के दोस्त न सही लेकिन ब्लोग्गेर्स को सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध लड़ने को एकजुट करूँगा में अब खुद पर आश्रित होकर आपकी मदद करूँगा हमारे स्कूल में जो बात सिखाई जाती है वोह इसलिए नहीं सिखाई जाती की हम किसी के काम न आये में आपकी मदद करूँगा वो भी खुद पर आश्रित होकर और अपनी padhai करूँगा और आपकी मदद karta chalunga jab कंधे से कन्धा मिलायेंगे तभी यह कुरीतियाँ ख़त्म होंगी धन्यवाद

    April 16, 2012

    बेटा पहले तुम अपना ध्यान केन्द्रित करों और नैतिक शिक्षा की किताबें पढों और दोस्तों को पढाओं और साथ ही उस पर चिंतन-मनन करों……कोई चीज नहीं समझ में आती तो अक्रक्ताले जी, कुशवाहा जी, दिनेश भैया और यमुना जी जैसे लोगों का मार्गदर्शन लो. खुद को तैयार करों. जिस दिन तुम्हारे साहित्य से मुझे लगेगा की लायक हो गए हो तो मैं खुद तुम्हें शामिल कर लूँगा. तुम्हे खुद को बताना नहीं पड़ेगा की तुम लायक हो गए हो या नहीं. किसी व्यक्ति का व्यक्तित्व उसके दो-चार बातों से ही भाप लिया जाता है बशर्ते भापने वाला वैसा शख्श होना चाहिए…….इसीलिए कहता हूँ कि अभी बचपना है आप में……

ajay kumar pandey के द्वारा
April 15, 2012

बड़े भाई अलीन जी में आपकी सामाजिक कुरीतियों वाली सेना में शामिल होना चाहता हूँ और मुझे आपका आलेख पढ़कर यह लग रहा है की सामाजिक कुरीतियों को ख़त्म करने के लिए मुझ जैसे व्यक्तियों की जरुरत है हमारे स्कूल में यह कहा गया है की जो भी सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध हो उसका साथ जरुर देना में आपका भाई हूँ और इस सेना का सैनिक बनना चाहता हूँ भाई अगर में अपना समय इस सेना के लिए दूं तो मुझे ख़ुशी होगी में भी आपका साथ देना चाहता हूँ क्या आप मुझे इस सेना का सैनिक बनायेंगे यह एक कृतज्ञता भी होगी आपके लिए मेरी की आप मेरा लेख छपाने के लिए लगे हुए हो मेरे ब्लॉग पर आना उसमे तुम्हारे लिए कुछ लिखा है धन्यवाद

    dineshaastik के द्वारा
    April 16, 2012

    मेरे नौजवान साथी बड़ी खुशी हो रही है कि मेरा एक  नौजवान साथी तो जाग  गया है। ये लड़ाई बहुत लम्बी और  ताकतवर शक्ति से है। हमें उस शक्ति से कहीं अधिक  ताकतवर बनना है।

    April 16, 2012

    सादर प्रणाम, भैया! यह जगा नहीं है, बचपना है इसका. भाई जी को बोलता हूँ की जाकर आप पढाई कीजिये और पहिले एक अच्छा बेटा बनकर दिखलाइये तो इनको कुछ समझ में आता नहीं तो यह क्या समझेंगे क्रांति क्या होती है…..बस सुन रखे है की क्रांति एक आजादी चाहने वाली चिड़िया का नाम हैं. बस उसको पकड़ने की खातिर यहाँ वहां कूदे जा रहे है. इनको आप सिखाइए की पहले यह पंख लगा ले फिर उड़ना सीखे नहीं तो हाथ-पैर तोड़ लेंगे…

MAHIMA SHREE के द्वारा
April 15, 2012

अलीन जी नमस्कार , क्या बात है ..आपके व्यंग की धार दिनों दिन पैनी होती जा रही है ….बहुत बढ़िया प्रस्तुति इस बार सबको स्पस्ट हो जायेगा .. सामाजिक गन्दगी की सफाई इसी सकरात्मक पहल से होगी…. बहुत खूब…बधाई स्वीकार करे एक तरफ संतोष भाई है जो राजनितिक गन्दगी साफ करने के लिए प्रतिबद्ध है दूसरी तरफ आप सामाजिक जागरूकता के लिए प्रतिबद्ध , उम्मीद जगी है बहुत कुछ बदलने वाला है…आमीन

    dineshaastik के द्वारा
    April 16, 2012

    आदरणीय  महिमा जी परिवर्तन की उम्मीद ऐसे ही बनाये रखिये। इस  उम्मीद  को आप जैसे विचारकों की भी आवश्यकता पड़ेगी। उम्मीद है आपका सहयोग  भी अनिल जी को मिलेगा।

    April 16, 2012

    इनके द्वारा बिल्कुल सहयोग मिलेगा भैया जी, आखिर यह हमारी दोस्त जो ठहरी….वैसे आपके आशीर्वाद से मुझे दोस्तों को पहचानना आ गया है….

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
April 15, 2012

कबीर दास की उलटी बानी | बरसे कम्बल भींगे पानी !! पाखंड के विरोध में हम आप के साथ हैं | अलीन जी, बधाई !!

    dineshaastik के द्वारा
    April 16, 2012

    आदरणीय  आचार्य  जी आप भी कुछ  लिखिये ऐसा ही, समाज  को झझकोरने वाला, कविता में। क्योंकि परिवर्तन या क्राँति की शुरुआत  कवि और लेखक  ही करते हैं। ये अलग  बात  है कि उसका श्रेय  राजनेता ले जाते हैं। समाज  को उद्देलित  कर देने वाली आपकी रतना के इंतिजार में….

    April 16, 2012

    सादर प्रणाम, सर! भैया सही कह रहे हैं ….आप जैसे व्यक्तित्व को कुरीतियों के खिलाफ फ्रंट पर आना चाहिए….

jlsingh के द्वारा
April 15, 2012

और नहीं बस और नहीं! शराफत चाचा और नहीं! यह मंत्र भी साथ में बोल देना चाहिए था! पर बोल देते तो फिर दुसरे शराफत पैदा कैसे होते? यहाँ तो एक मरते हैं और सौ पैदा होते हैं! आज ही समाचार सुन रहा था – नाबालिग लड़की के साथ गैंग रेप वह भी नाबालिगों के द्वारा! कही महिला को नंगा कर घुमाया गया, तो कही किसी लड़की ने आत्महत्या कर ली वगैरह … वगैरह ! इस बुराई का अंत हो तो कैसे हो! भाई अनिल जी, आपका प्रवचन चलता रहे अन्याय के खिलाफ! कुरीतियों के खिलाफ!

    dineshaastik के द्वारा
    April 16, 2012

    आदरणीय जवाहर जी अब केवल  प्रवचन से कुछ  नहीं होगा। हम आपको भी कुछ  करना होगा। अति हो चुकी है…और नहीं देखा जाता…

    April 16, 2012

    सादर प्रणाम ! आपने सही तस्वीर प्रस्तुत की. बुराई किसी भी रूप में हो उसका विरोध और तिरस्कार होगा. बस आप और दिनेश भैया जैसे लोगों का साथ और आशीर्वाद चाहिए….

nishamittal के द्वारा
April 15, 2012

अपने समाज की कुरीतियों पर बहुत सही लिखा है आपने ,दादागिरी कथनी करनी + जिसकी लाठी उसकी भैंस,स्वार्थ सभी कुछ का समावेश कर आपने बहुत अच्छा लिखा है,अनिल जी.

    April 16, 2012

    सादर प्रणाम! आपका प्यार और आशीर्वाद मिला….उम्मीद करता हूँ हम सभी अपनी कमियों पर एक साथ कम करेंगे. हार्दिक आभार.

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
April 15, 2012

सुन्दर एवं आंख खोलने वाला आलेख अनिल जी.समाज की कुरीतियों का सही वर्णन किया है आपने.

    dineshaastik के द्वारा
    April 16, 2012

    आदरणीय राजीव जी मुझे लगता है कि यह केवल  एक  आलेख  नहीं है, अपितु एक  आग  है जो अनिल (हवा) को अनल(अग्नि) बना रही है। अब  देखना है, इस  आग  में कितना तेज  है। इस  आग  को देख  कर कितनों के दिल  दहक  उठते हैं।

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
April 15, 2012

स्नेही अनिल जी, सादर अगर शराफत का इंतकाल हो गया तो कोई भी पूजा पाठ चल सकती है. अगर शराफत चाचा का इंतकाल हुआ है तो पंडित की क्या जरूरत. समाज के घिनौने रूप को प्रदर्शित किया है.

    dineshaastik के द्वारा
    April 16, 2012

    आदरणीय  प्रदीप जी, क्या अब इस  घिनौने रूप को बदलने की आवश्कता नहीं है। क्या हमें अपने हृदय  में जल  रही चिंगारी को आग  नहीं बनाना चाहिये। यदि हम  खामोश  होकर सब कुछ  देखते रहते हैं और इसके विरुद्ध  मात्र  कुछ विचार व्यक्त करके आगे बढ़ जाते हैं, तो क्या हम  इस  अपराध  के भागीदार नहीं बनेंगे। आप जैसे बुजुर्ग  यदि इस  लड़ाई में  अनिल जी को आशीर्वाद  रूपी रूपी सहयोग  देंगे तो मुझे खुशी होगी….

    April 16, 2012

    सादर प्रणाम! आप लोगों की बातों से सहमत.

    jlsingh के द्वारा
    April 18, 2012

    प्रिय दिनेश जी, और अनिल जी, आप दोनों के विचार क्रांतिकारी और ग्राह्य हैं. मेरा भी सभी बुद्धिजीवियों से अनुरोध होगा कि जितना जल्दी हो सके अधिक से अधिक लोगों को जगाएं और क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए सबको प्रेरित करें फिर यह विचार अगर मूर्त रूप बनकर सामने आ जाये तो फिर क्या कहने! हाँ प्रारम्भिक विरोध के लिए भी तैयार रहना होगा क्योंकि किसी भी परिवर्तन में जड़ता का सिद्धांत लागू होता है और अवरोध तो अवश्यम्भावी है.आभार!

    April 18, 2012

    जी, सर आपने बिलकुल सही फ़रमाया विरोध तो होना अवस्यम्भावी है और हम यह भी जानते है कि हमें बहुत से जिल्लते उठाने पड़ेंगे और हम सभी अपमानित भी होंगे. पर हरेक परिस्थिति के लिए हम खुद को तैयार कर रहे हैं. बस आप लोगो का आशीर्वाद साथ है तो हम अपनी इस धरती को स्वर्ग जरुर बनायेंगे यह कोई कोरी कलपना नहीं बल्कि हम दृढ प्रतिज्ञ हैं. बहुत अच्छा लगता है जब आप जैसे बड़ों का आशीर्वाद और साथ मिलता रहता है…नहीं तो यहाँ तो लोग अपने स्वार्थ के लिए धर्म, मर्यादा और इज्जत के नाम पर मानवता को कुचलने में लगे हुए


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