साधना के पथ पर

अद्य की स्याही

50 Posts

1446 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 8647 postid : 509

कोई मुझसे भी तो पूछे प्यार क्या होता है?

Posted On: 30 Apr, 2012 न्यूज़ बर्थ में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

कोई मुझसे भी तो पूछे प्यार क्या होता है?यदि मेरी प्रेम कहानी ‘मेरी सदा- एक अधूरी परन्तु सच्ची प्रेम कहानी’ की बात छोड़ दी जाय तो मैं अब तक प्यार शब्द को लेकर कुछ भी कहने से खुद को avoid करते आया हूँ. फिर भी लोगों द्वारा मेरे हरेक विचार को मेरे प्रेम कहानी से जोड़कर उसे सब्जेक्टिव और आब्जेक्टिव का नाम दिया जाता रहा है और इससे भी आगे बहुत कुछ………! जाने क्या-क्या मेरे बारे में अवधारणा और सोच पाली गयी और आगे भी पाली जाती रहेगी. सिर्फ मैं ही इस दुनिया में एकलौता नहीं जिसको इससे से गुजरना पड़ रहा है. आपको भी तो जाने कितने आलोचनाओं और मुश्किलों का सामना करना पड़ता हैं तथा आगे भी करना पड़ेगा…..अतः मेरी समझ से इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है. आश्चर्य तो तब होता है जब हम खुद को अच्छा साबित करने के लिए दूसरों की निंदा करना शुरू कर देते हैं और बस वही पर गलत हो जाते हैं. स्वाभाविक सी बात है कि एक अंगुली सामने वाले पर करते हैं तो बाकी अंगुलियाँ हमारे तरफ होंगी. आज जाने क्या सूझी है कि मुझे आज अपनी आदत के विपरीत प्यार पर व्यक्तिगत रूप से कुछ कहने और सुनने को दिल कर कर रहा हैं.
प्यार!…….एक ऐसा विषय जिस पर पढ़ना, सुनना, लिखना और निश्चय ही कहना; सदैव ही सुखद रहा है. यह चाहें आज की बात हो या बात हो कल की, इस वर्ष की बात हो या बात हो विगत वर्षों की, हमेशा ही यह रोचक, अध्यात्मिक रहा है और जाने क्या-क्या….परन्तु हकीकत के धरातल पर हमेशा ही दुखदायी रहा है और कष्टदायक भी; कहने वाले के लिए, सुनने वाले के लिए और साथ ही करने वाले के लिए भी. यहाँ इसको लेकर सबका एक अपना मत. कोई कहता है, “प्यार खुदा है” तो कोई कहता है, “सबसे जुदा है” ; कोई कहता है, “यह जीत है” तो कोई कहता है, “यह हार है” ; कोई कहता है, ” यह अँधा होता है” तो कोई कहता है, “यह चंगा होता है” ; कोई कहता है, “फाँसी का फंदा है” तो कोई कहता है, ” हमारा धंधा है”. यहाँ तक की कुछ लोग यहाँ तक बोलते है कि प्यार बच्चे पैदा करने के लिए होता है….हाँ….हाँ….हाँ…..और जाने क्या-क्या….. जिसे सुनने के बाद कभी रोने को जी चाहता है तो कभी हँसने को, कभी नाचने को तो कभी चुपचाप बैठने को. इसके अलावा प्यार को लेकर बहुत कुछ कहा और सुना गया है. जैसे कोई इसे अध्यात्मिक कहता है तो शारीरिक, कोई अपना कहता है तो कोई पराया पर ……कोई मुझसे भी तो पूछे प्यार क्या होता है…………………………………………………………?

शायद प्यार को किसी ने समझा ही नहीं,
कोई मुझसे भी तो पूछे प्यार क्या होता है?
इसमे न मिलने की ख़ुशी, न बिछड़ने का गम होता है,
न यह किसी से अधिक, न किसी से कम होता है,
न ही यह सुखा , न ही नम होता है.
सच पूछो तो प्यार से पहिले और प्यार के बाद,
सिर्फ प्यार होता है.
इसमे न कोई आम , न कोई खास होता है,
न कोई दूर, न कोई पास होता है,
न कोई तृप्ति, न कोई उपवास होता है.
सच पूछो तो प्यार से पहिले और प्यार के बाद,
सिर्फ प्यार होता है.
इसमे न कोई जीत, न कोई हार होती है,
न कोई बद्दुवा, न कोई दुआ होती है,
न किसी से ना, ना हाँ होती है.
सच तो यह है;आँखों से मिलने से पहिले
और होठों के मिलने के बाद सिर्फ प्यार होता है.
इसमे ना कोई हीर, ना राँझा होता है,
न कोई अलग, न जुड़ा होता है,
न कोई बंदा, न खुदा होता है.
सच तो यह है, तुमसे, उससे, मुझसे
हम सबसे प्यार जुदा होता है.
इसमे न कोई दूर, न कोई पास होता है,
न कोई इजहार, न कोई इंकार होता है,
न यह एक बार, न हजार बार होता है.
प्यार से पहिले और प्यार के बाद,
सिर्फ प्यार होता है.
इसमे न कोई जिस्म, न कोई जान होता है,
न किसी का नाम, न कोई बदनाम होता है,
प्यार से पहिले और प्यार के बाद,
खुदा से नहीं खुद से पूछो क्या होता?
मेरे ख्याल से प्यार ने एक बार होता है,
न हजार बार होता है, प्यार से पहिले…………


इस मंच के माध्यम से अपनी दिल की आवाज कुछ शेरों के माध्यम से अपने जीवनसाथी “अन्जानी” तक पहुँचाना चाहता हूँ. ‘अन्जानी और अनिल’ एक ऐसा रिश्ता जो भगवान, धर्म और कानून की नज़र में जायज़ है. परन्तु अपनो और समाज की नज़र में नाजायज़ है. एक ऐसा बंधन जो बिना मंत्रो और अपनो की सहमती से बंध गया है. एक ऐसा रिश्ता जो समाज के परम्पराओं और मर्यादाओं की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है. एक ऐसा रिश्ता जो कल तक हर किसी के आँखों में चुभता था और एक ऐसा रिश्ता जिससे अधिक जायज समाज को अपनी मर्यादाएं और परम्पराएँ लगती थी. अब जबकि मर्यादाओं और परम्पराओं की बेड़ियाँ टूटने को है तो सबको इसका ख्याल आ रहा है. एक ऐसा रिश्ता जो कल तक अपनो की ख़ुशी और उनके झूठे मान मर्यादा के लिए खुद की आहुति देता आ रहा है और जिंदगी से हारकर मौत को गले लगता आ रहा. उससे अपील करता हूँ कि भगवान, धर्म और कानून के लिए इन झूठी परम्पराओं और मर्यादाओं को तोड़कर जिंदगी को गले लगा लो…………ताकि मानवता के दुश्मन फिर हमारी कायरता और बुजदिली के नींव पर अपनी परम्पराओं और मर्यादाओं का मकान खड़ा न कर सके…….

कैसे डाल ले आदत तुम बिन मुस्कुराने की,
हर नाकाम कोशिश कर लिए तुम्हें भुलाने की,
जब मर्ज़ भी तुम हो और दवा भी तुम,
काम नहीं आती कोई दवा ज़माने की.
जान पे खेल जाऊंगा तुम्हें पाने को,
खा के निकला हूँ जो कसम तुम्हें पाने की,
कैसे भूल
जाऊ तुम्हें, यूँही ‘अन्जानी’
एक बीमारी सी हो गयी है तेरी याद आने की.

जिसका इलाज सिर्फ तुम्हारे पास हैं. मैंने तुम्हे बहुत बार कहाँ था कि जब हमारी मंजिल एक है तो उस तक पहुँचने के लिए हमें एक साथ ही बहुत से रास्तों से गुजरना होगा. मैंने तुमसे कहा था कि इन रास्तों पर चलते-चलते ऐसे कई मोड़ आयेंगे जो हमें अपनी मंजिल से दूर किसी ऐसे रास्ते पर ले जाने को प्रेरित करेंगे जिसका कोई अंत नहीं. तुम कभी भी किसी मोड़ पर मेरा हाथ मत छोड़ना. मुझे नहीं पता कि मुझसे बिछड़ने के बाद तुम्हें मंजिल मिलेगी या नहीं. पर तुमसे बिछड़ने के बाद मैं रास्तों में खुद को तलाशता ही रह जाऊंगा. पर तुम मेरी एक न सुनी. मुझे इस दुनिया की भीड़ में रास्तों के हवाले छोड़कर जाने किस मंजिल की तलाश में चली गयी. मेरी नम आखें और सिसकती हुई साँसे, मौत से भी बदतर जिंदगी जिस पर नाज था कभी और बहुत कुछ जिसे मैं शब्दों में वयां नहीं कर सकता, उन्ही रास्तों के किसी मोड़ पर तड़पती मेरी जिंदगी तुम्हारे इंतजार में अपनी आखिरी साँसे गिन रही हैं.

मैं उन बद्नशिबों में हूँ
जो रोते हैं तो आँसू और
हँसते हैं तो हँसी नशीब नहीं होती’
बस मरे जा रहा हूँ, मरने की चाह में
और क्या बताएं ‘अनजानी’ तुम्हे,
हमें नाज था जिस जीवन पर,
जिंदगी क्या ? आज उसे मौत नशीब नहीं होती.
तुम्हे याद है कभी मैंने तुमसे कहा था कि अन्जानी कभी किसी कारण बस तुम्हे मेरा हाथ छोड़ना पड़े तो तुम मुझे अपने हाथों से मौत की नींद सुला के जाना क्योंकि तुम से बिछड़कर मौत से भी बदतर जिंदगी मैं जीना नहीं चाहता और तुमने कहाँ था कि अनिल जैसा आप चाहते हो वैसा ही होगा. पर तुम मुझे ना ही जिंदगी दे सकी और ना ही मौत. मैं तुम्हारे सामने रोता रहा, चिल्लाता रहा पर तुम मेरा हाथ झटकर चल दी. यदि तुमने कभी मुझसे प्यार किया था तो उसकी सौगंध आकर मेरी जिंदगी लौटा दो या फिर इस मौत से भी बदतर जिंदगी से आजाद कर दो ताकि यह खुदगर्ज दुनिया मेरे मौत रूपी नींव पर अपना झूठी मर्यादा की दिवार खड़ा न कर पाए. यकीं नहीं अगर मेरी बातों पर यहाँ कभी आकर ……….

कैसे गुजरती है तुम बिन मेरी रातें और दिन, मुझसे पूछों ना,
बहुत हो चुकी बेरुखी मुझसे, देखों ‘अन्जानी’ अब और रूठों ना,
कौन-सी खता हुई मुझसे एक वफ़ा के सिवा, मुझे बताओ ना,
दूर रहकर अब और दूर न करो, देखों अब और सताओ ना,
भटक रहा हूँ इस दुनिया में बिछड़कर तुमसे, गुम होने से पहले
मुझे धुंध लाओ ना……………………………………………
तुम्हें कसम है हमारी लुटी हुई खुशियों की, फिर नए सपने दिखाओ ना,
अब तो चुभ रहे है अश्क भी नासूर बनके, फिर से मुझे हँसाओ ना,
कबतलक यूँही पत्थर बनी रहोगी तुम, दम निकलने से पहले
लौट आओ ना………………………………………..
कैसे गुजरती है तुम बिन………………………………..

जब अपने ही जान के पीछे पड़े हो तो कोई कहाँ जाये और किससे फरियाद करें. ऐसे में कोई मौत को गले लगता है तो क्या बुरा करता है? किसी की जिंदगी जब मौत से भी बदतर हो गयी हो तो ऐसे में कोई मौत को गले लगता है तो क्या बुरा करता है? कोई जीने की चाह में हर रोज मरता हो तो अगर वह मौत को गले लगता है तो क्या बुरा करता है? कल तक मैं भी यही कहता था कि आत्महत्या करना गुनाह और पाप है जो एक बुजदिल और कमजोर लोग करते हैं. ऐसे लोग एक बार भी नहीं सोचते कि उनके जाने के बाद उनके घरवालों पर क्या गुजरती हैं. पर आज जब अपने ही झूठी शान और मर्यादा की खातिर मुझे मौत के करीब लाकर खड़े कर दिए हैं तो आज मुझे यह पता चला कि जिस पर गुजरती है वही जानते हैं. यह कैसी परंपरा और मर्यादा हैं जो किसी के जीवन से भी ज्यादा कीमती है. वो भी अपने बेटे से तो फिर हम नालायक बेटों के लिए आँसू बहाना क्या? हम तो चलो नासमझ ठहरे पर यह समझदारों की कौन-सी समझदारी है जिसके कारण हम नासमझो को मौत को गले लगाना पड़ता है. और फिर यही समझदार लोग हम पर हँसते हुए कहते हैं कि एक बार भी अपने माता-पिता के बारे में नहीं सोचते. यदि हम किसी के साथ जीना चाहते हैं तो जीने नहीं दिया जाता और मरना चाहते हैं तो मरने नहीं दिया जाता. दिन रात तड़पते हैं, रोते हैं, चिल्लाते हैं….आखिर और कर भी क्या सकते हैं….

अपनी किस्मत पर अश्क क्यों न बहायें भाई,
कि  कोई   चीज  अपनी   यहाँ   हुई   है  पराई,
वो   अश्क
बहाते हैं   जो   कमजोर    होते    हैं,
जो   कहा  है, उसे मुझसे  मिला  दो  मेरे  भाई;
शीशे   बनकर   पड़े   हैं  मेरे  दिल     के  टुकड़े,
पत्थर  दिलवालों  जरा  सम्भलना  मेरे  भाई,
किसी  और   कि  न  हो,
हालात ‘अलीन’ की
हर    जख्म   मेरे   दिल   के   दे  रहे   हैं  दुहाई,
एक    शिकायत   हैं    खुदा    से   जहाँ   वालों,
आग  बुझानी   ही  थी  तो  क्यों  इसे   लगाई.

मुझे यह व्यक्तिगत आलेख मजबूर होकर लिखना पड़ा. कारण स्पष्ट है कि मेरे विचरों को यहाँ व्यक्तिगत विचार के अलावा सब्जेक्टिव और ओव्जेक्तिव का नाम दिया जाता रहा है और इसके अलावा भी जाने क्या-क्या ? ऐसे में यह बताना बहुत ही जरुरी हो गया था कि व्यक्तिगत आलेख क्या होता हैं. परन्तु इस मंच पर मैं किसी से व्यक्तिगत कोई भी उम्मीद नहीं रखता. यह मुझे कहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है कि बहुत से लोगो द्वारा मेरे मदद की बात कही गयी है. परन्तु मैं अपनी व्यक्तिगत समस्या स्वयं साल्व करना चाहता हूँ . अतः उन सबकी मदद को एक शिरे से इंकार करता आया हूँ. फिर भी कुछ लोग मेरी सामाजिक कुरीतियों की लड़ाई को मेरी व्यक्तिगत समस्या से जोड़ते आये हैं. उन सबसे बस एक ही विनती करना चाहता हूँ कि वक्त रहते खुद को सुधार ले वरना जो ज़हर मेरे नशों में लहूँ बनकर दौड़ रहा हैं जिससे मैं रोज ना जी पाता हूँ न मर पाता हूँ, बस रोता हूँ, चिल्लाता हूँ, कभी नाचता हूँ और कभी गाता हूँ, यदि बाहर आ गया तो जाने कितने मासूम लोग मारे जायेंगे और मेरे प्यार भरे घर को उजाड़ने वाले खुदगर्ज लोग अपने घरों में चैन से नहीं रह पाएंगे. पर मैं उनकी तरह खुदगर्ज नहीं हूँ क्योंकि मैं जानता हूँ कि एक जीवन कितना बहुमूल्य हैं. मैं जानता हूँ कि निर्माण करने में एक समय गुजर जाता है, विनाश के लिए तो एक पल ही काफी हैं. मैं हमेश ही व्यक्तिगत लिखने से खुद को बचाता आया हूँ. इसीलिए जो भी व्यक्तिगत गीत, ग़ज़ल और शायरी लिखा हूँ. आज तक किसी के सामने नहीं लाया. पर आज मुझे विवश किया गया व्यक्तिगत लिखने को, आज मुझे विवश किया गया है आंसुओं के शैलाब से गुजरने को, आज मुझे विवश किया गया वह करने को जो मैं कभी नहीं करना चाहता. धर्म, मर्यादा और परंपरा के नाम पर मानवता को रौदते हुए हम जैसों को यदि ऐसे ही जिंदगी और मौत के बीच में लटकाया जाता रहा तो वह दिन दूर नहीं, जब चारों तरफ मौत का ऐसा नंगा नाच शुरू होगा जिससे यह धरती और आसमान काप उठेगा, जिससे उस परम पिता परमेश्वर को भी अपनी इस कृति पर अफ़सोस होगा. बेटा, बाप को काटेगा, भाई, भाई को काटेगा, बेटी माँ की लहूँ पीयेगी……इस जमीं से लेकर आसमान तक हैवानियत और शैतानियत का अपनो के खून से एक ऐसी कहानी लिखी जाएगी. जिसे पढ़कर आने वाली पीढ़िया खुद को हमारा वंशज कहलाने पर शर्म करेगी. अपने इन विचारों से नैतिकता के रौदते हुए जितना अफ़सोस किया हूँ और जितना आँसू बहाया हूँ, मैं नहीं चाहता की फिर मुझे मजबूर किया जाय ऐसा करने को. नहीं तो सुना हूँ कि आदमी बहुत ही कमजोर होता है और ऐसे में हो सकता है कि कलम उठाने की बजाय बन्दुक उठा लूँ. वैसे भी मुझसे कम आशा है इस बात की क्योंकि मैं खुद को जानवर समझता हूँ जो दिन-रात आदमी बनने की कोशिश में लगा हुआ हैं. मुझे तो आश्चर्य उन लोगो पर होता है जो खुद को आदमी नहीं बल्कि इंसान कहते हैं. यदि इंसान इसी को कहते हैं तो मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि मुझे जानवर ही रहने दे……

तमन्ना   एक   आईने   की   हम  भी  रखते,
गर खुद को सूरत दिखाने की हिम्मत रखते,
हर   इलज़ाम   उनका   सर आँखों  पर  लिया
जो कहते हैं हमारी बात को दिल में नहीं रखते.

यहाँ कुछ लोग मुझे बोलते हैं कि मैं बेकाबू होकर लिखता हूँ और साथ में आक्रोश के साथ भी. परन्तु मैं तो वही लिखता हूँ जो हकीकत है. वो भी नैतिकता और मर्यादा के दायरे में क्योंकि मैं बेहतर समझता हूँ मर्यादा और नैतिकता की जरूरत को. वरना यदि दो-चार पोस्टिंग इस दायरे से बाहर कर दिया और हम बड़ों की हकीकत हमारे छोटे जान गए तो यकीं के साथ कहता हूँ कि आने वाली हमारी सात पीढ़िया आवारा और बदचलन पैदा होगी. जो माँ-बहन में भी फर्क नहीं समझेगी. अरे शराफत चाचा के समधी जी मेरी बात सुनकर मुँह छुपाकर भाग कहा रहे हैं. घबराइए नहीं आपकी हकीकत मैं नहीं खोलने वाला, अभी मुझमे इतनी शर्म बाकी है. परन्तु ज्यादा शराफत का ढोंग करेंगे तो आपके शराफत की पोल यही खोल के रख दूंगा और आप सीधे जाकर अपने समधी जी से ही मिलेंगे…..अजय भैया इनको ससम्मान बैठा दीजिये…..! आज कल देख रहा हूँ कि सच लिखने पर लोगों की तकलीफे बढ़ जा रही हैं. प्रवीन की बात छोडिये अभी तो वो बच्चा है, उसकी उम्र अभी लालीपाप खाने की है. परन्तु बाप …..बाप रे बाप…………………….!

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (30 votes, average: 4.83 out of 5)
Loading ... Loading ...

54 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

MAHIMA SHREE के द्वारा
May 25, 2012

आदरणीय jj , नमस्कार आज सुबह से आलेख “अन्ध्रेरे के आधार पर विकास करता झारखण्ड ” जिसने आपने featured ” में डाला हुआ है जिसे सुश्री खुसबू जी ने अपने विचार कह के पोस्ट किया हुआ है … वो पूरा का पूरा आलेख टाइप (चोरी ) किया हुआ है प्रथम पैर को छोड़ के … सीर्फ आकड़ा होता तो मैं आपके संज्ञान में नहीं लाती क्योंकि इस तरह के आलेख के लिए आकडे कहीं न कहीं से उठाने होते है . पर चुकी महोदया ने पूरा आलेख ही चोरी का टाइप कर दिया है और संदर्भ भी नहीं दिया है … तो सवाल उठाना स्वाभविक है / आपके जानकारी के लिए बता दू इस आलेख की लेखिका अनुपमा जी है .. जो मर्ज कुछ , दवा कुछ ” के नाम से “तहलका ” के अंक 31may2012 में प्रकाशित है .. चूँकि आप ने सुबह से इसे फीचर किया हुआ है और कल को आप इसे बेस्ट ब्लॉग अफ डी विक भी कर देंगे … तो जानना चाहती हूँ आपकी नजर में ये कहाँ तक उचित है .. क्या जो अपनी स्वरचित और लिखित लेख लिखते हैं क्या उनके साथ नाइंसाफी नहीं होगी .. तो फिर हम भी क्यों मेहनत करे … http://kg16.jagranjunction.com/2012/05/23/%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%86%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a4%b0

ajay kumar pandey के द्वारा
May 25, 2012

अनिल भैया नमन सबसे पहले में आपका आभार प्रकट करता हूँ की आपने मुझे समर्थन दिया यह चोपाई रामचरितमानस के उत्तर कांड से ली गयी है न की सुन्दरकाण्ड से आभार धन्यवाद

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
May 25, 2012

मान्य अलीन जी, सादर ! एक बार मैंने आप को कहा था …..सच बोलना या लिखना अगर ग़लत है तो तो ऐसी गलती हज़ार बार करनी चाहिए पर आज कहता हूँ …….बानी ऐसी बोलिए मन की आपा खोय औरन को सीतल करे आपहूं सीतल होय | संस्कृत में भी कहा गया है ….. सत्यं प्रियं च वदेत, अप्रियं सत्यं न वदेत | शेष शुभ ! पुनश्च !!

ajay kumar pandey के द्वारा
May 25, 2012

अलीन भैया नमन सबसे पहले आपसे एक बात कहना चाहता हूँ की आप मुझे पाण्डेय जी न कहकर अजय भैया कहिये क्योंकि मुझे पाण्डेय जी शब्द बिलकुल अच्छा नहीं लगता स्कूल की अलग बात है क्योंकि वहां सब मेरे दोस्त हैं तो वो मुझे पाण्डेय जी कह भी दें तो चलेगा उ का है न भैया हम कहत रहे थे की हमका पाण्डेय जी कहकर संबोधन नाही देवत का है की उ हमका अच्छो न लागत तो कृपा कर पाण्डेय जी संबोधन नाही देवत हम आपक इस ब्लॉग पर आपन एक पोस्टक प्रचार करन आवत हैं उ का है की हमर एक पोस्ट लिखत अनमोल जल का महत्व और उसको बचाने के कुछ रास्ते अवश्य पढ़त और आपण मार्गदर्शन देवत हमुक कृतार्थ करत यह बोली अवधि भाषा है भैया जी वैसे में उत्तराखंड का हूँ मैंने यह भाषा विशेष आपके लिए लिखी है आशा है आप इसे पढ़कर नाराज नही होंगे मेरा यह लेखन रूचि मैडम को याद करके शुरू होता है रूचि मैडम को प्रणाम करके ही मेरे आलेख ख़तम होते हैं आप नाराज न हों बस येही प्रचार आपके ब्लॉग में करन आवत धन्यवाद आपका बबुवा अजय पाण्डेय

May 24, 2012

मैं किसी भी शब्दों में बदलाव करने का अधिकारी नहीं हूँ पाण्डेय जी, वह तो सब कुछ समाज की दें हैं मैं तो बस उसे उठाकर सामने रख देता हूँ. वैसे उसमे जो कुछ संसोधन किया गया है वो नवभारत टाइम्सद्वारा किया गया. एक बार आपको पहिले ही बोल चूका हूँ किमुझे अपनी प्रशंसा बिलकुल पसंद नहीं है और यह भी बोला हूँ कि मेरी कोई भी पोस्टिंग बच्चों के लिए नहीं होती…इसलिए आप इसे न पढ़े…आप यमुना मैम, मीनू दी, डिंडा जी इत्यादि के आलेख पढ़िए….आपके लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होंगे. उनकी शैली, शब्दों और विचारों का अनुकरण करिए क्योंकि वही आपको मानसिक रूप से मजबूत बना सकते हैं. यदि मेरी शैली अभी से अनुकरण करने की कोशिश करंगे तो समाज का हित करने की जगह अहित करने लंगेंगे……!

ajay kumar pandey के द्वारा
May 23, 2012

बड़े भैया कल सुबह आपके लिंक पर पक्का जाऊँगा अभी रात को खाना खाने के बाद किसी के घर पूजा में जा रहा हूँ पूजा रात के दस बजे शुरू होकर रात बारह एक बजे तक ख़त्म होगी कल ही जा पाउँगा आपके इस लिंक पर और कल ही फीडबैक दे पाउँगा तब तक के लिए अलविदा और ब्रेक कल मिलेंगे धन्यवाद

ajay kumar pandey के द्वारा
May 23, 2012

अलीन भैया नमन जानकर अच्छा लगा की आपने स्त्रियों के अपमान वाली पोस्ट डिलीट करके बदल दी और फिर से सही शब्दों में लिखा आप अपने विचार जिन्दा रखिये और मेरी पोस्ट पर मार्गदर्शन भी दीजिये और में आपको प्रतिक्रिया भी देता रहूँगा आप नाराज न हो में अभी कही जा रहा हूँ कल मिलूँगा और कल सुबह ही आपके लिंक पर जाऊँगा धन्यवाद

May 23, 2012

आदरणीय पाठकगण, मेरे आलेख के डीलेट कर दिए जाने के बाद भी, आप लोगों को बिरश होने की कोई जरुरत नहीं क्योंकि वही आलेख नवभारत टाइम्स द्वारा अपने ब्लॉग पर उसका नाम बदलकर और दो-चार शब्दों को संसोधित कर स्वीकार कर लिया गया है. जिसका लिंक निम्नवत है….आप वहां जाकर हम इंसानों की हकीकत से एक बार फिर रुबरून हो सकते हैं. मेरे सभी अहित चाहने वाले ब्लॉगरगण बहुत दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि आपके लाख कोशिश के बाद भी मैं और मेरे विचार आज भी जिन्दा है. अतः आप सभी से पुनः निवेदन है कि एक बार फिर मेरे पिछले आलेख में समाहित समाज के हकीकत को ख़त्म करने के लिए नवभारत टाइम्स पर अपना अनमोल फीड बेक डालने कि कृपा करें….हाँ…..हाँ..हाँ…!

मनु (tosi) के द्वारा
May 21, 2012

क्या खूब लिखा है !! अनिल जी  प्रेम तो सच में बस प्रेम है … आपने तो अपना सब प्यार को सोंप दिया …. निशब्द !!

    May 21, 2012

    जी, अभी तो इस पर बहुत कुछ सौपना बाकि है…….ये सांसे और जीवन……………!

D33P के द्वारा
May 5, 2012

प्यार से पहिले और प्यार के बाद, सिर्फ प्यार होता है……….सही कहा अनिल जी प्यार का और कोई रूप हो ही नहीं सकता ,,,,,, प्यार, सिर्फ प्यार होता है..

ajay kumar pandey के द्वारा
May 4, 2012

अलीन भैया नमन मेरे आलेख छपने की कोशिश कहाँ तक पहुची में तो यह जानना चाहता हूँ की कोई मदद करना चाहता है या नहीं धन्यवाद

    May 4, 2012

    जी उनके द्वारा कहे जाने पर इ-मेल कर दिया हूँ….देखिये क्या होता है….यदि छपेगा तो उस दिन आपको बताकर कोरियर कर दूंगा…आप पढाई पर ध्यान दे….

May 3, 2012

मेरे इस कमेन्ट को लेकर १९ अप्रैल को अशोक सर, इ-मेल करके मेरा ध्यान इस तरफ करने को कहा था. परन्तु उनका मेसेज मैं नहीं पढ़ पाया था. अचानक आज सारे मेसेज डिलीट कर रहा था तो उनका unread मेसेज पढ़ा जिसके द्वरा इस मेरे कमेन्ट में गलती को दर्शाया गया था. जिसके लिए मैं उनका आभारी हूँ. इसलिए मैं तुरंत इस पोस्ट को वीजित किया तो मुझे मेरी गलती पता चली. मुझे सफाई देने की आदत नहीं है क्योंकि गलती मुझसे हुई है. इसलिए इसे स्वीकार करता हूँ. अतः खुले मंच पर सामूहिक रूपसे माफ़ी मांगता हूँ और यदि कोई सजा आप देना चाहते हैं तो वह भी मंजूर है. बस इतना कहना चाहूँगा कि मैं लिखना चाह रहा था….’ इस विषय वस्तु को छोड़कर मेरा नंगा नाच देखने की कृपा करें.” पर कैसे क्या हुआ है कुछ समझ में नहीं आ रहा… http://timsymehta.jagranjunction.com/2012/04/18/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%9D%E0%A5%87-%E0%A4%AE%E0%A4%A4-%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8B-jagran-junction-forum/

vinitashukla के द्वारा
May 3, 2012

अपनी भावनाओं को सुन्दर ढंग से अभिव्यक्त किया है आपने यहाँ. हर शब्द तराशा सा लगता है. शुभकामनाएं -आपका लेखन यूँ ही बरकरार रहे.

    May 4, 2012

    सादर प्रणाम! यह तो आप लोगो का प्यार और आशर्वाद हैं….वरना इस यह नाचीज की कोई कीमत नहीं…

MAHIMA SHREE के द्वारा
May 2, 2012

अनिल जी बस इतना कहूँगी … समाज ने आपका सब छीन लिया पर ईश्वर ने उसी समाज को आपके रूप में एक विचारक , अपना एक सूत्रधार दे दिया है .. तो समाज में जातिगत फैले दुर्गन्ध को दूर करने का जरिया बन गया है …. बदलाव आ गया है … परिवर्तन अवश्य होगा .. आपके सपने पुरे होगे …आमीन .. इसी कामना के साथ

    May 4, 2012

    मेरा सपना तो पूरा होगा की नहीं मैं यह नहीं जनता पर जो लोग धर्म, मर्यादा और परंपरा पर अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहे हैं..उनका सपना पूरा नहीं होने दूंगा……..इन्कलाब!

ANAND PRAVIN के द्वारा
May 2, 2012

क्या कहूँ…………………..समझ नहीं पा रहा अजय भाई की बात पर ध्यान देना ……….बिलकुल सही है उनकी बात बाकी ज्यादा कुछ नहीं लेखनी पर कोई शक नहीं …………………धारदार + जोरदार

    May 4, 2012

    तुम्हे कुछ कहने की जरूरत है भी नहीं…देखने और यथार्थ को आत्मसात करने की जरुरत है बाकी जो आस्था है तुम्हारी उसे बनाये रखों….धारदार +जोरदार सुनते-सुनते बोर हो गया हूँ..कोई नया शब्द यूज कर न….विअसे वक्त मिलेगा तो जरुरु बताऊंगा कि धारदार =जोरदार क्या होता है…?

kalia के द्वारा
May 2, 2012

किसीने सच ही कहा है, ‘इश्क नचाए जिसको यार, वो फिर नाचे बीच बज़ार’. प्यार में पड़े व्यक्ति और एनेस्थीसिया के नशे में बडबडाते आदमी में कोई फर्क नहीं होता है. ‘या खाए बौराय नर, वा पाए बौराय’ ! लाहौलविलाकुव्वत !!

    May 4, 2012

    जी आप हमेश मेरी प्रशंसा में चार चाँद लगते रहते हैं….आगे भी आप से यही आशा रहेगी….इस नाचीज पर ऐसे ही कृपा बनाये रखे….हार्दिक आभार!

yogi sarswat के द्वारा
May 2, 2012

अनिल जी आपकी प्रेम कहानी पढ़ी ,परन्तु मेरा विचार ये है कि इस सबके बाद भी अपनी भावनाएं सार्वजनिक करने की आवश्यकता क्यों पड़ती है,दुनिया कुछ भी पूछे ,कहे,अपनी व्यक्तिगत भावनाओं को जिनसे समाज प्रभावित नहीं होता शेयर क्यों कियाजाय ! ये आदरणीय निशा जी मित्तल के शब्द हैं जिनसे पूर्ण इत्तेफाक रखता हूँ ! मेरा मानना ये है की प्रेम नितांत ही निजी मामला होता है , उसको किसी किताब में नहीं ढूँढा जा सकता , किसी को कहा नहीं जा सकता , बस महसूस किया जा सकता है ! ये मेरे निजी विचार हैं ! इसलिए अन्यथा मत लीजियेगा !

    May 4, 2012

    माफ़ करियेगा योगी जी, प्रेम किसी के मानने पर आधारित नहीं है….अन्यथा तो मैं लेता ही नहीं …कहे को शर्मिंदा कर रहे हैं…….वो तो इसे मैं व्यथा के रूप में लेता हूँ…..हाँ……हाँ….हाँ….

    D33P के द्वारा
    May 5, 2012

    योगी जी आपने सही कहा प्रेम नितांत निजी मामला होता है इसे सार्वजानिक क्यों किया जाये ….पर जब दर्द का समुन्दर हद पार करने लग जाता है किनारे टूट जाते है फिर किस किस को डूबना है इसकी चिंता किसको है ! अनिल जी मैंने आपका और अनजानी का शुरू से अब तक सफ़र आपके भावो के साथ तय किया है मैंने आपको शुरू में भी यही राय दी थी कि हिम्मत से काम लीजिये ..जिन्हें आपकी चिंता नहीं उनके दवारा दिए गए बन्धनों से बहार आ जाइये !

akraktale के द्वारा
May 2, 2012

प्रिय अनिल जी नमस्कार, बहुत अच्छा किया कहते हैं प्यार बांटने से बढ़ता है और गम बांटने से हल्का होता है.चलो कुछ व्यक्तिगत शेअर किया क्योंकि आपके पास इतनी लम्बी प्रेम कहानी है . हमारे प्रेम की कहानी तो इतनी छोटी होती है की क्या शेअर करें क्योंकि हर महीने को ३० तारीख की शाम को शुरू होकर अगले महीने की एक तारीख की शाम को जेब से तनख्वाह निकल जाने तक चलती है शायद फिर महीने भर जो खिंच तान होती है वही सच्ची प्रेम कहानी हो.गुलजार की लिखी पंक्तियाँ याद आती है. जमीं भी उसकी जमी की नेमतें भी उसकी, ये सब उसीका है, घर भी, घर के बन्दे भी, खुदा से कहिये, कभी वो भी अपने घर आये!

    jlsingh के द्वारा
    May 3, 2012

    अशोक भाई जी, सादर प्रणाम! बस और मैं क्या कहूं? ऊपर से नीचे तक पढ़ते पढ़ते……… यही पर अल्प विराम ले रहा हूँ! आपके विचारों और उद्गारों से सहमत-सा हो रहा हूँ!……

    akraktale के द्वारा
    May 3, 2012

    भाई जी सादर, हम सब तन्खैयों का हाल लगभग एक सा ही होता है. अनिल जी व्यर्थ ही लम्बी प्रेम कहानी में ग़मगीन हुए जा रहे हैं.प्रेम तो पल में उपजता है जब आप किसी अनजान महिला से बातें करें तो पत्नी के मन में इतना प्रेम जाग जाता है की वह आपसे नैना चार करने को बेताब हो जाती है.और उसके जाने के बाद के प्रेम पर क्या कहूँ. सहमति पर आभार आपका.

    May 4, 2012

    सादर प्रणाम! हम भी तो तन्खैयें ही हैं….एक चीज हैं सर, मैं देख रहा हूँ जो service कर रहा है वह भी दुखी है और जो नहीं कर रहा है वो भी…..तो चलिए न किसी सुख की तलाश किया जाय काहे को हम लोग हाय- हाय कर रहे हैं…. किसी सुख की तलाश किया जाय ……………………….!

ajaydubeydeoria के द्वारा
May 1, 2012

क्या अनिल भाई ? इससे आपको क्या लगता है ? आप अपने उद्देश्यों में सफल हो जायेंगे . क्या आपको सुहानुभूति मिलेगी . नहीं …. सिर्फ और सिर्फ अपने साथ-साथ अन्जानी को भी मजाक का पात्र बना रहे हैं. शायद आप अभी दुनिया को पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं और जोश में होश खोने जैसा कार्य कर रहे हैं. आप को लगता है कि आप इससे अपने उद्देश्य में सफल हो जायेंगे तो ठीक है जैसी आप की मर्ज़ी. लेकिन कभी ज़रूरत महसूस हुयी तो मुझे ज़रूर याद करियेगा. मैं सदैव आप के लिए हाज़िर हूँ…..

    May 4, 2012

    सहानुभूति……हाँ …हाँ…हाँ ….कहे मजाक कर रहे हैं भैया जी……………………………………….! जहाँ तक मेरी और अनजानी के बदनाम और मजाक का सवाल है ….वो तो कबका हो चूका हैं ….अब कोई फर्क नहीं पड़ता..उससे ऊपर उठ चुके हैं हम दोनों…….. इसमें न किसी का नाम होता हैं और न ही बदनाम होता है……हाँ…….हाँ……हाँ…..! हमसे बचकर ही रहिये……. नहीं तो हम तो जायेंगे सनम तुम्हें भी ले जायेंगे…….हाँ…..हाँ….हाँ….

vikramjitsingh के द्वारा
May 1, 2012

अनिल जी….सादर…. प्रेम की दर्दनाक परिभाषा….लेकिन आक्रोश में भरी हुई….. किसी ने सच ही कहा है…… ”जीना भी आ गया, मुझे मरना भी आ गया…. पहचानने लगा हूँ, तुम्हारी नज़र को मैं…….” सादर…

    May 4, 2012

    सुस्वागतम ! मुझे तो नहीं लगता कि परिभाषा कहीं से दर्दनाक और आक्रोश भरी है…..हाँ पर परिभाषा लिखते-लिखते कलम रुकी ही नहीं और कुछ और भी लिख बैठा…….

mparveen के द्वारा
May 1, 2012

anil ji namaskaar, mujhe hamesha achha lagta hai love story padhna par dukhbhari love story padh ke dil bhi bada dukhi hota hai ….. main un logo me se hu jo film dekh ke bhi ro padte hain fir sachi ghatna to bap re bap…. dekhiye aapka dukh na koi bant sakta hai na kam kar sakta hai … apne bahut acha aalekh likha hai hope ki anjani ise padh paye …

    May 2, 2012

    सादर ! देखिये यहाँ मत रोयिएगा…..मैं यह आलेख लोगो को हंसाने के लिए लिखा हूँ…….रुलाने क्र लिए नहीं…..अपना आंसू पोछ लीजिये….आपने कह दिया कि मैं बहत अच्छा लिखा हूँ. अब मेरा पूरा दुःख ख़त्म हो गया….

Mohinder Kumar के द्वारा
May 1, 2012

अनिल जी, जीवन की सबसे बडी सच्चाई जिसे किसी शायर ने बहुत सुन्दर शब्दों में कहा है “हम गम जदा हैं लायें कहां से खुशी के गीत देंगे वही जो पायेंगे इस जिन्दगी से हम” जबसे दुनिया बनी है लोग प्यार करते हैं, कुछ भाग्य शाली होते हैं जिन्हें अपना प्यार मिल जाता है परन्तु जरूरी नही कि वह उम्र भर भाग्यशाली ही रहते हैं उनमें से कुछ अपनी ही कमी या साथी की कमी के वजह से उम्र भर उस पल को कोसते हैं जब प्यार की नेहमत उन्हें मिली. कुछ को अपना प्यार नहीं मिलता और जीवन भर उस टीस को दिल में बसा कर जो पा सकते हैं उसे पाने की तमन्ना ही छोड देते हैं. कुछ जीवन को एक सफ़र मानते हैं, जो मिल गया उसे सहेज लेते हैं और जो खो गया उसे भुला कर आगे निकल लेते हैं. मेरे विचार से आखिरी श्रेणी में आने वाले व्यक्ति ही असली प्रशन्सा के अधिकारी हैं.. प्रेम पाना या खोना उपलब्धि नहीं है. जीवन को पूर्ण रूप से जीना ही उपलब्धि है.

    May 2, 2012

    सुस्वागतम! माफ़ करियेगा, मैं उपलब्धि और प्रशंसा के लिए नहीं जीता…….उपरोक्त बातों में समाज का सच रखा है आपने…उसके लिए आभार.

smtpushpapandey के द्वारा
May 1, 2012

बेटे अलीन तुम्हारी प्रेम भरी कविता पढके मुझे हाल में ही एक संगीतकार जिनका निधन हो गया है उनका नाम याद नहीं आ रहा है उनकी याद आ गयी उनका भी तुम्हारा ही जैसा हाल था लेकिन वो तुमसे कही ज्यादा समझदार थे तभी इतने महान संगीतकार बने मैंने अखबार में उनके बारे में पढ़ा वो मुसलमान थे उन्हें राधा नाम की एक हिन्दू लड़की से दिली दिल प्रेम हो गया था लड़की भी शायद उनसे प्रेम करती थी यह शायद जयपुर की घटना है dono समझदार थे वह यह जानते थे की समाज हमें एक साथ नहीं देख सकता तो संगीतकार जी ने अपने परिवार की ख़ुशी के लिए अपनी ही जाती की मुस्लिम लड़की से विवाह कर लिया और बॉम्बे चले गए वह जितने भी गानों की रचनायें करते थे उसमे उनका इशारा अपनी प्रेमिका की और होता था जैसे बोल राधा बोल संगम होगा की नहीं और भी कई गाने थे जो उनके दर्दभरे प्रेम को जाहिर करते थे मेरे कहने का मतलब यह है तुम भी अपने माता पिता की ख़ुशी के लिए arrange marriage कर लो और अपने प्रेम का इजहार कविता के रूप में करते रहो धन्यवाद

    dineshaastik के द्वारा
    May 2, 2012

    मुझे लगता है, आदरणीय पुष्पा जी सही कह रहीं हैं। मेरा मानना है विवाह ते प्रेम  का अंत है। विश्वास न हो  तो देख  लो उस  प्रेमी जोड़े को जिसने प्रेम के बाद  शादी की हो।

    May 2, 2012

    सादर प्रणाम! माफ़ करियेगा मैं समझदार नहीं हूँ और न ही अपने भावनाओं को बेचकर महल खड़ा करने का शौख रखता हूँ…..मेरे लिए मान-सम्मान और दौलत कोई मायने नहीं रखती ! जी २८ साल से देख रहा हूँ …arrange marriage और love marriage भी…वो प्रेम ही क्या जिसका अंत हो जाये………….. प्यार ना ही शुरू होता है, ना ही ख़त्म होता है, ना कोई आगाज और ना ही इसका अंजाम होता है, प्यार से पहिले और प्यार के बाद सिर्फ प्यार होता है…….

चन्दन राय के द्वारा
May 1, 2012

अनिल मित्र , आपकी इक खूबी है की आप दिल से और डूब कर लिखते है , इक सच अभी समय की तंगी है ,इसलिए आपकी सारी काव्यात्मक ,और शायराना अंदाज , दोनों आपके मन की शुद्धता लिए हुए है , आपका सुन्दर मन आपकी रचना में भी दिखता है

    May 2, 2012

    जी डूब कर नहीं लिखता हूँ, बस मन में जो आता है या फिर जो सामने दिखता है उससे ज्यादा नहीं लिखता. फिर भी कभी मौका मिलेगा तो जरुर दिखाऊंगा….मुझे आज तक मेरी मन की शुद्धता दिखी ही नहीं, आश्चर्य होता है आप कैसे देख लिए…..

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
May 1, 2012

काव्यात्मक आलेख की सुन्दर प्रस्तुति,अनिल जी.लेकिन व्यक्तिगत भावनाओं को इस मंच पर रखना उचित है या नहीं,इस पर पुनर्विचार करें.

    May 2, 2012

    सादर प्रणाम! ब्लागिंग तो व्यक्तिगत भावनाओं के उजागर के लिए ही होती है. परन्तु फिर भी आपके बातों पर विचार करूँगा….!

nishamittal के द्वारा
May 1, 2012

अनिल जी आपकी प्रेम कहानी पढ़ी ,परन्तु मेरा विचार ये है कि इस सबके बाद भी अपनी भावनाएं सार्वजनिक करने की आवश्यकता क्यों पड़ती है,दुनिया कुछ भी पूछे ,कहे,अपनी व्यक्तिगत भावनाओं को जिनसे समाज प्रभावित नहीं होता शेयर क्यों कियाजाय ,

    shashibhushan1959 के द्वारा
    May 1, 2012

    आदरणीय निशा जी के विचारों का समर्थन ! इस रचना को पोस्ट करने के पहले इसे एक बार पुनः पढ़ना चाहिए था, विचार करना चाहिए था !

    May 2, 2012

    सादर प्रणाम! माफ़ करियेगा मैं लोगो को प्रभावित करने के लिए नहीं लिखता ….!

    shashibhushan1959 के द्वारा
    May 6, 2012

    आपसे ऐसे ही जवाब की उम्मीद थी !

Santosh Kumar के द्वारा
May 1, 2012

अनिल भाई ,.सादर नमस्कार इंसान को इंसान होने पर शर्म और गर्व दोनों हो सकते हैं ,..शेष आपके आलेख पर क्या लिखूं ..आप अपनी व्यक्तिगत समस्या खुद साल्व करना चाहते हैं यह बहुत अच्छी बात है ,.लेकिन ऐसी बहुत से लोग हैं जो खुद नहीं साल्व कर पाते .. बाप  रे  बाप ……….इतना खतरनाक अंदाज !!…फिर से वही कहूँगा ,..बहुत आग भरी है ,..ईश्वर सार्थकता प्रदान करें ..सादर

    May 2, 2012

    सादर नमस्कार! वन्देमातरम…………………………………………………….! इन्कलाब…………………………………………………………..जिंदाबाद……………………………………..!

dineshaastik के द्वारा
May 1, 2012

इसके उत्तर तो बहुत  मिल  जायेगें कि प्यार क्या होता है। उत्तर बहुत  मुश्किल  है मिलना कि, प्यार क्यों होता है। सच  पर पर्दा डाल  रक्खा है, जमाने ने मिलकर, कोई पर्दा उठाये तो, हाहाकार क्यों होता है। मैंने पहिले ही कहा था कि वह अलग  दिखता है सभी से, कोई हमारी कमी बताये तो, हमें इंकार क्यों होता है। सच्चे प्यार से तो कुछ  नहीं हासिल  होता है मैने देखा, सच्चा प्यार  जिन्दगी के लिये, बेकार क्यों होता है। प्यार एक  रास्ता है केवल, मंजिल  अलग  ही है हमारी, कोई मंजिल  बताये तो दुश्मन, संसार  क्यों होता है।

    May 2, 2012

    सादर प्रणाम ! खुबसूरत सन्देश देती हुई रचना …….हार्दिक आभार!


topic of the week



latest from jagran