साधना के पथ पर

अद्य की स्याही

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दो बुद्धिमान मूर्खों की मुर्खता

Posted On: 25 May, 2012 न्यूज़ बर्थ में

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कल कुछ सरकारी काम से लखनऊ में था. जाने से पहिले, अपने अजीज दुश्मन आनंद प्रवीन से दूरभाष पर वार्तालाप के दौरान पता चला कि एक बुड्ढा जिसका हाथ-पैर तोड़ने के लिए पिछले दो महीने से खोज रहा हूँ. वही का रहने वाला है. अतः सोचा चलो वहाँ एक पंथ दो काज हो जायेगा. एक तो कार्यालय का काम भी कर लूँगा और साथ ही बुड्ढे के कार्यालय पहुँच कर उसका हाथ-पैर भी तोड़ दूंगा. यह सोचकर गया परन्तु उससे मिलने के बाद मैं कुछ समय के लिए अवाक् रह गया. अतः आप सभी को भी अवाक् करने के लिए जे जे मंच पर उस बुड्ढे की छवि और उससे मिलने के बाद की हकीकत पर आज सुबह ही आलेख तैयार करके बैठा था कि अचानक जे जे मंच पर चल रहे मान-मर्यादा के व्यापर पर एक और आलेख ” जे जे व्यापर मंडल और हम दो लुटेरे’ भी तैयार हो गया. अभी इन दोनों को पोस्ट करनी की बात सोच ही रहा था कि चिखेरू और पखेरू के संवाद मेरे कानो तक पहुंचे जो मित्र संदीप के नए आलेख “श्रीमान लख्खा प्रसाद, सितीया एंड Pakiya की लफबाजी…!” पर हम दोनों मित्रों का उपहास था. मैं सोचा कि चलो बुड्ढों और जे जे व्यापर मंडल की तकलीफे बढ़ाने से पहिले उन दोनों द्वारा प्रस्तुत उपहास को आप सभी के बीच रखकर आप सबको भी थोड़े समय के लिए हँसा दूँ.

चिखेरू

चिखेरू- यार, संदीप भाई का तत्कालीन आलेख को पढ़ने के बाद एक बात याद आ गयी.

पखेरू- कौन सी बात यार?

चिखेरू- अरे यार, बहुत पुरानी है और वो भी मुग़ल कालीन या यूँ कहो मेरे पिछले जन्म की. जब मैं कबूतर हुआ करता था और ताजमहल की मीनारों पर बैठकर पोटी किया करता था…हाँ….हाँ..हाँ..

पखेरू- सच में, भाई ! बहुत माजा आता होगा न….मीनार पर बैठकर पोटी करने में ……! भाई जल्दी वह बात बताओ न ….अब रहा नहीं जा रहा हैं…………!

चिखेरू- इस बात को सुनने के लिए, पहिले पोटी करने की मुद्रा में बैठ जाओ…..और पूरा ध्यान पोटी करने में मतलब सुनने में लगा दो…….!

पखेरू- लो भाई बैठ गया और ……लगा दिया… !

चिखेरू- क्या लगा दिए ……?

पखेरू-अरे भाई ध्यान……आप ही ने तो कहा था……लगाने को….!

चिखेरू- अरे हा…..! तो ठीक है ..ध्यान से सुनना……!

यह बात उस समय की हैं जब ताजमहल बनकर नया-नया तैयार हुआ था और उसके उद्घाटन होने से पहिले मैं उसके मीनार पर बैठकर उद्घाटन कर दिया था. वो भी क्या हसीं दिन थे……..!

पखेरू- सच में भाई!….उसका उद्घाटन आपने किया था. मुझे तो यकीं नहीं होता………!भाई कैसे किया था…..आपने.

चिखेरू- अबे बुरबक के नाती, कोई भी बात करते समय बीच में मत टोका कर ……जहाँ तक उद्घाटन की बात है तो शाहजहाँ को भी यकीं नहीं हो रहा था कि उसका उद्घाटन मैंने किया है और वो भी तब जब शाहजहाँ ताजमहल बनने के बाद आखें बंद और मुँह खोलकर ऊपर की तरफ सर करके मुमताज को याद कर रहा था. तभी मीनार के ऊपर बैठा हुआ मैं पोटी कर दिया जो सीधे उसके मुख में जा गिरी और इसी के साथ ही हो गया ताजमहल का उद्घाटन..…….हाँहाँ..हाँ…! और मजा की मत पूछ ….. शाहजहाँ कुछ बोलने लायक नहीं था. बस इतना ही कह सका. .. मैं ख़ामो खा ही इसको बनाने में आधा खजाना ख़त्म कर दिया…!मजाक-मजाक में कुछ ज्यादा ही मजाक हो गया…

पखेरू- ही…ही…ही………! भाई मजा गया….दिल गार्डेन-गार्डेन हो गया…..!


चिखेरू- यदि ज्यादे मजा गया है तो कुछ फोली भाई को दे दो और कुछ इनके मित्र अलीन भाई को….ताकि यह दोनों बुद्धिमान मूर्खों का दिमाग ठिकाने पर जाये……और दूसरी ताजमहल जैसी कोई रचना या कल्पना करने की ख्वाब भी हम मूर्खों के बीच देखे…………! हाँ….हाँ….हाँ…!

पखेरू- ही…ही…ही…भाई बात तो मजेदार कह रहे हो परन्तु इन दोनों बुद्धिमान मूर्खों से मजा की बात , भला करेगा कौन……..? एक करैला है और दूसरा नीम….ही…ही…ही…!

पखेरू

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19 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ajay kumar pandey के द्वारा
May 27, 2012

अलीन भैया नमन दरअसल मेरा नेट कल चालू ही नहीं हुआ था आज चालू किया तो विलम्ब से आपके ब्लॉग पर आया हूँ कृपया शमा करें हम लेखक लोग प्रतिक्रिया से ही तो जुड़ते हैं और देर हो गयी नेट चालू नहीं था आज ही चालू किया तो विलम्ब से ब्लॉग पर पंहुचा शमा करें धन्यवाद

dineshaastik के द्वारा
May 27, 2012

भाई ताजमहल मैं भी जा चुका हूँ, लेकिन वहाँ चिखेरू और पखेरू के बारे में किसी ने नही ंबताया। आपसे अनमाल जानकारी मिली, इसके लिये आभार। इतिहास में भी इनका कहीं नाम नहीं है। यदि इन्होंने सचमुत ताजमहल का उद्घाटन किया है तो इन्हें भी वही सम्मन मिलना चाहिये जो हमारे उद्घाटन करने वाले नेताओं को मिलता है। भाई उन बुढ्ढ़े महोदय का कहीं पता नहीं चला। उनके पैर तोड़े या नहीं। या फिर पहिले से ही टूटे हुये थे। अरे भाई ये व्यक्तिगत बातें छोड़िये। एक तरफ तो कहते हो हमें सम्मान अपमान से कोई फरक नहीं पड़ता तथा दूसरी और वही बातें लिये बैठे रहते हो। सच है भाई हम सबकी करनी और कथनी में बहुत अंतर हैं। हम सब झूठे अहंम को लेकर जीते हैं। कुछ नहीं होने वाला, कुछ नहीं बदलेने वाला। हम अपने आपको तो बदल नहीं पा रहे। बात करते हैं दुनियाँ को बदलने की। अपने से बाहर निकलिये। दूसरे को शिक्षा न देकर, पहले खुद को शिक्षा दीजिये। इसी तरह के आलेखों की भरमार देखकर मन दुखी हो गया इसलिये कुछ कड़े एवं व्यंगात्मक शब्दों का इस्तेमाल कर दिया है। दिल दुखा होगा उसके लिये क्षमा चाहता हूँ।

    May 27, 2012

    सादर प्रणाम! आपकी बाते सुनकर …..दुष्यंत कुमार जी की कुछ पंक्तियाँ याद आ गयी…….. ! कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं, गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं. अब तो इस तलब का पानी बदल दो, ये कँवल के फुल कुम्हलाने लगे है! कल भी एक बात कहा था और आज भी वही बात कहूँगा……………..कल भी व्यक्तिहत नहीं था और आज भी व्यक्तिगत नहीं………….! व्यक्तिगत तो वो होते हैं जो मान-मर्यादा को लेकर चिल्लाते रहते हैं. परन्तु यह कोई भीख मांगने की चीज नहीं की एक मांगे और दूसरा उसे झोली में दाल दे….या फिर एक के देने पर दूसरा देते रहे…कृपया मान-मर्यादा का व्यापर बंद करिए और स्पष्ट रूप से अपने दिल की अभिव्यक्ति करिए…! मुझे किसी की भी बातों से दिल नहीं दुखता. पहिले भी बोला था और आज भी कहता हूँ क्षमा मांगकर आप लोग मुझे शर्मिंदा न किया करें……………..! वैसे भी मेरा दिल तो अनजानी के पास है तो दुखने का सवाल ही नहीं उठता……..!

vikramjitsingh के द्वारा
May 26, 2012

प्रिय भैया अनिल जी….. अच्छे लगते हो…ऐसे ही प्यार और हंसी बांटते रहो…. दुनिया में जीने के लिए दिन कितने कम हैं कितनी हैं खुशियाँ और कितने गम हैं….. सभी को गले से लगा के जियो…अच्छा लगता है….

    May 27, 2012

    सादर प्रणाम! बिल्कुल भैया जी, हम तो सबको गले लगा के ही चलते हैं….वो तो सामने वाले लोग ही अन्दर नफ़रत लिए गले मिलते हैं……आशा करता हूँ …..आगे भी आपका साथ बना रहेगा ताकि हम इस ब्लॉग की दुनिया से जमीनी हकीकत पर उतरकर सामाजिक बुराइयों का सामना सिने पर हर जुर्म और चोट को हँसते हुए लेकर शांति और अहिंसा से करें………………….!……आमीन…………………….! वाहे गुरु जी की खालसा…वाहे गुरु जी की फतह…………..!

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
May 26, 2012

ताजमहल पर एक रचना काफी अरसे से डब्बे में बंद पड़ी है सोचता हूँ की उसे बंद ही रहने दूं.

    May 26, 2012

    सादर चरण स्पर्श! अभी उपयुक्त समय नहीं हैं…………….डिब्बे की चीज डिब्बे में रहने दीजिये वरना यदि बाहर आ गयी तो हंगामा हो जायेगा………..!

चन्दन राय के द्वारा
May 26, 2012

अनिल भाई , सबसे मजेदार बात यह की इस तीखी नोख झोंक ने अब हास्य का रूप ले लिया , इक सच बता दूँ आप लोगो के पिछले सभी तीखे लेखों को पढ़ते समय में भी में अपनी हंसी नहीं रोक पाता था , कमाल करते हो अनिल भाई और खुद भी कमाल

    May 26, 2012

    माफ़ करियेगा…चन्दन जी मेरी किसी से भी तीखी नोख-झोक नहीं हैं…..सिर्फ विचारों से ही और वो भी कभी गंभीरता, तो कभी व्यंग्य; तो कभी हास्य रूप में. परन्तु सामने वाले के लिए यही मुश्किल होता है कि आखिर मैं कब गंभीर हूँ, कब व्यंगात्मक रूप में हूँ और कब हास्य रूप में. मैं इस मंच पर एक बात देखा हूँ कि मेरी हर बात को गंभीरता से लेकर मुझ पर व्यक्तिगत टिप्पड़ी कि गयी और आगे भी कि जाएगी. परन्तु मैं व्यक्तिगत टिप्पड़ी कल भी नहीं किया था और कल भी नहीं करूँगा……! यदि कोई मेरी बैटन को तोड़ मोड़कर रखता है तो वह उसकी समस्या हैं……..हाँ एक बात और जहाँ कुछ ज्यादा चीनी हो जायेगा तो वहां नमकीन चलाना जरुरी हो जाता है…..बाकि सब ठीक-थक है….प्रेम से रहिये और इसी तरह प्रेम बाटते रहिये…..परन्तु जहाँ कहीं कुछ दिखने की कोशिश करंगे तो वह मेरे नज़रों से नहीं बच सकता……..हाँ…..हाँ….हाँ…! यह मजाक में नहीं..गंभीर होकर कह रहा हूँ….!

pawansrivastava के द्वारा
May 26, 2012

कंप्यूटर की जुबां में कहें तो आपने १० किलो बाईट(KB ) ,अध्यात्म की जुबान में कहें तो आपने १० सृजनात्मक सोंच और आपके मौजूदा लेख की जुबान में कहें तो आपने १० ग्राम कबूतर का पोट्टी नाहक हीं बर्बाद कर दिया ….लगता है कि आपको हनुमान के तरह विस्मृत हो चुके आपके लेखन शक्ति की याद दिलानी पड़ेगी तब हीं आप अपने लेखन का वो पुराना दमदार अंदाज दिखायेंगे जिसका मैं मुरीद हूँ …जिसमे आपके मुहब्बत कि गुदगुदाती,कभी रुलाती दास्तान है ,जिसमे अद्भुत वैचारिक उत्कर्ष है ,जिसमे निर्मल भावनाओं का अपार समंदर है .

    sadhna srivastava के द्वारा
    May 26, 2012

    अनिल जी, मैं दादा की बात से सहमत हूँ……

    May 26, 2012

    हाँ……हाँ….हाँ…….! और मैं आप दोनों की बातों से सहमत हूँ……….

akraktale के द्वारा
May 26, 2012

प्रिय अनिल जी नमस्कार, रुका हुआ पानी मत बनिए, आगे चलिए प्रसन्नता होगी.शुभकामनाएं.

    May 26, 2012

    आपके विअचारों का सुस्वागतम, सर………! मैं रुका हूँ पानी नहीं हूँ, सर,…….बस समझने का फर्क है………..! वैसे भी जिस व्यक्ति को मोटिवेट करने के लिए आप जैसे अग्रज हो उसे रुकने का सवाल ही नहीं उठता…..!

follyofawiseman के द्वारा
May 26, 2012

1.”Lakhna, did your father leave much money when he died?” ”NO,” said Lakhkha Prasad, ”NOT A CENT. IT WAS THIS WAY. HE LOST HIS HEALTH GETTING WEALTHY, THEN HE LOST HIS WEALTH TRYING TO GET HEALTHY.” one more…. 2)They had been married three months, and she said, “Are you satisfied with our married life, Lakhkhu?” “Yes,” replied Lakhkha Prasad. “I HAVE HAD ENOUGH OF IT.” (now that you are getting married, have few more…..) 3)”Now that you are married, Lakhkha Prasad, I suppose you will take out an insurance policy?” Lakhana’s friend told him at work. “Oh, no,” answered Lakhkha Prasad. “I don’t think she’s going to be so dangerous.” 5)”It must be hard to lose a wife,” said a friend at Lakhkha Prsad’s wife’s funeral. “Almost impossible,” said bereaved Lakhkha Prasad.

May 26, 2012

मैं शादी कर रहा हूँ…………….

    follyofawiseman के द्वारा
    May 26, 2012

    प्रेमसुख ने अपनी प्रेमिका का पार्क के अकेले कोने में चुम्बन लिया। तो प्रेमिका ने कहा- अभी नहीं जी, ये सब शादी के बाद। प्रेमसुख- कोई बात नहीं जी…, मेरी शादी तो ऑलरेडी हो चुकी है। (मित्र, आपने दुबारा शादी करने की क्यों ठानी है…..)

    May 26, 2012

    अरे मैं दुबारा शादी नहीं कर रहा…..मैं तो यह बोल रहा हूँ कि यदि कोई बोले कि मैं शादी करने जा रहा हूँ…..तो मुझे भी बताना साथ में पार्टी अटेंड करने चला जाएगा….हाँ…..हाँ…..हाँ…..!


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