साधना के पथ पर

अद्य की स्याही

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एक बुड्ढे की हकीकत

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मैं हूँ अलीन मैं हूँ अलीन, जो पिछले कई दिनों से इस मंच पर उथल-पुथल मचाया हुआ है. इस मंच की मान-मर्यादा और शांति को जहाँ-तहाँ ऐसे बिखेरे हुए है. मानो कोई बच्चा किसी दुकानदार की शीशे की गोलियों के थैले से सारी गोलिया निकालकर जमीन पर बिखेर दी हो. मैं वो योद्धा हूँ जो हारने की चाह लिए युद्ध के मैदान में उतरता है परन्तु सामने वाला मुझे हराने की चाह में स्वयम हारते चला जाता है. मुझे लोगों की हार बर्दाश्त नहीं होती और ऐसे लोगो की हार तो कभी नहीं जो खुद को मर्यादित बताते हैं. अतः उनकी एक जीत की इच्छा लिए हमेशा उनसे लड़ता रहता पर अफ़सोस वो ह़र बार ही अपने अभिमान और खोखले आदर्शों से वशीभूत होकर अपनी ही तलवार अपने गर्दन पर मारते रहते हैं. आज पहली बार मुझे हार का सामना करना पड़ा हैं. अतः मेरे लिए यह जश्न मनाने का मौका है.

एक बुड्ढा, जो सागर की तरह गंभीरता, पर्वत की तरह स्वाभिमान, हवा की तरह चंचलता, सूरज की तरह तेज, चन्द्रमा की तरह शीतलता, नदियों की तरह गतिशीलता धारण किये हुए, जे जे मंच के नौजवानों के साथ-साथ छोटे-बड़े सबको अपने साहित्य, सेवा और सदाचार से प्रभावित किये हुए है. उसकी आकाश की तरह विशाल बाहें इस मंच के सभी ब्लागर्स को प्यार और भाई चारे के बंधन में जकड़े हुए और सिने से लगाये हुए है. वो हमेशा ही इस मंच पर हार कर जीतता रहता है और मैं ह़र बार ही उससे जीत कर हारता रहता हूँ. अतः मुझे भीख में मिली अपनी यह हार बर्दाश्त नहीं हुई. कई दिनों से उससे मिलने का मौका ढूंढ़ रहा था ताकि मैं देख सकू कि आख़िरकार क्या है उसके अन्दर जो वह हरबार ही मुझसे जीतता रहता है. इसी चाह में कल सुबह उसके कार्यालय जा धमका.

वह अपने केबिन से १०० कदम से भी अधिक दुरी चलकर मेरे स्वागत में खड़ा था. सहसा मेरे दिमाग में एक विचार आया, “लगता है बुड्ढा डर गया है”. यह सोचकर ज्योहीं उसकी तरफ बढ़ा, उसने अपने हाथ मेरे तरफ बढाकर मुझे अपने ह्रदय से लगा लिया. वो पल मेरी जीत थी या मेरी हार इसे आपसे बेहतर कौन समझ सकता है? मैं खुद को उससे अलग करते हुए बोला, “यहाँ ह्रदय से लगने नहीं बल्कि ह्रदय चीरने आया हूँ.” यह सुनकर उसने हँसते हुए कहाँ, “ठीक है नाती जी, पहिले चाय-पानी कर लीजिये. फिर मेरा ह्रदय भी चीर लीजियेगा.” बात तो सही थी परन्तु सहज नहीं. अतः मैं बोला, ” मेरी उम्र चाय पीने की नहीं, बल्कि दारू पीने की है.” यह सुनकर बुड्ढा एकदम तिलमिलाते हुए बोला, ” नाती जी, यह जागरण जन्शन नहीं है जहाँ आप चिल्लाते रहते हैं. यह नाना का कार्यालय है. इतनी मार पड़ेगी की आपका सारा नशा उतर जायेगा. आप बच्चे हो बच्चे की तरह रहो, बाप बनने की कोशिश मत करो.” इतना सुनकर तो बड़ो-बड़ो का नशा उतरना लाजिम है. तबतक नाश्ता आ चूका था और हम दोनों एक साथ नाश्ता करने में लग गए. नाश्ते के दौरान बस एक ही बात सोचता रहा कि इस बुड्ढे की हिम्मत कैसे हुई मुझे बच्चा कहने की. जबकि पिता श्री कहते हैं, “अलीन, तुम अब बच्चे नहीं हो जो बच्चों की हरकते करते फिरते हो. अभी शादी कर दिया जाय तो एक-आध दर्ज़न बच्चों के बाप बन जाओगे.” कितना फर्क है एक बाप और एक नाना होने में. परन्तु इसे एक बाप को कैसे समझाया जाय कि जब एक बच्चा बाप बन जायेगा तो बाप भी बाप नहीं बल्कि दादा हो जायेगा.

नाश्ता करने के बाद उसने अपने हाथ-पैर मेरे तरफ करते हुए कहाँ, ” अब जो तोड़ना-जोड़ना है तोड़-जोड़ लो नाती जी.” मैं उस समय बुड्ढे की हकीकत देखकर हैरान था जो पहिले से ही टुटा हो उसे क्या तोड़ना? हाथ और पैरों में गर्म पट्टिया पड़ी हुई थी ताकि पुरे शारीर में रक्त का संचार सुचारू रूप से हो सके. नहीं तो एक-कदम भी चलने की शक्ति उस बुड्ढे के पास नहीं थी. मैं तो बस यही सोचता रहा, मेरे लिए वह कैसे १०० कदम चल गया. इसके अलावा भी जाने कितने शारीरिक और मानसिक, सामाजिक और घरेलु समस्याएं फिर भी माथे पर चिंता की एक लकीर भी नहीं. फुल-सा मुस्कुराता हुआ चेहरा जिसके हौशले के आगे सारी मुश्किलें और उलझने दम तोड़ती रहती हैं. ह़र पीड़ा और दर्द खुद को उसके आगे असहाय पाती है. आज मुझे एक बात समझ में आ चुकी थी कि क्यों मेरी हार और उसकी जीत असली थी. आज मैं बहुत खुश हूँ कि आख़िरकार जे जे रणक्षेत्र में कोई तो ऐसा योद्धा मिला जिसके आगे मैं अपनी हरेक बाजी हारा हूँ. वरना यहाँ तो हारने की चाह में हारते ही आया हूँ. यह पहली बार है जब मेरे हारने की चाह जीत में तब्दील हो पायी. आज ख़ुशी के मारे मेरी आखें नम है. मुझे तो अबतक यकीन नहीं होता कि दुनिया भर के सारे गम लिए कोई इंसान इतना प्यार और खुशियाँ बाट सकता है……..क्या आपको यकीन है……………………?

एक बुड्ढे की हकीकत

चंद सिक्कों की खन-खनाहट पर
सैकड़ों कदमो की आहट देखी.
सच से मुँह मोड़कर,
पूजना बेजान पत्थरों को,
लोगो की यह एक अजीब सी चाहत देखी.
सुकून मिला है आज मेरे दिल को बहुत कि
एक बुड्ढ़े के चेहरे पर सच्ची
मुस्कुराहट देखी.

सुबह, २५/ ०५/२०१२ ……………… …………………………………………………………………………………………..अनिल कुमार, ” अलीन”

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39 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
June 7, 2012

स्नेही अनिल नाती श्री जी, सस्नेह आपकी प्रतिक्रिया से मैं पूर्ण सहमत. आशीर्वाद तो मैं दूंगा ही यशस्वी होने का, मेरा अधिकार है

ajay kumar pandey के द्वारा
June 6, 2012

अलीन भैया नमन आपके ब्लॉग पर अपनी एक पोस्ट प्रदुषण का प्रचार करने आया हूँ समय निकालकर पढ़ें और मार्गदर्शन करें आपने कहा था की लिखने के बाद प्रचार भी करिए तो वही कर रहा हूँ मैंने जैसा की पहले ही कहा की रूचि मैडम का मार्गदर्शन मेरे लिए वैसे अहम् हैं वैसे ही आपका समय निकालकर जरुर देखें धन्यवाद

ajay kumar pandey के द्वारा
June 6, 2012

alin bhaiya naman abhi padhai kahan se karoon aajkal garmi ki chhutiyan hain to mauj maarne ka din hai philhaal mein dehradoon jaane ki taiyaari mein hoon dehradoon se jab aaunga tab aaram karunga phir uske baad aap logo se mulakat hogi dhanyawaad

ajay kumar pandey के द्वारा
June 6, 2012

alin bhaiya naman abhi chuttiyan hai to padhai kahan se karoon mein to dehradoon shaadi mein jaane ki taiyaari mein hoon jab vapas lotunga tabhi aapse mil paaunga 22 june ki raat ko jaa raha hoon 21 june tak dilli mein hoon shadi se aane ke baad hi milunga dhanyawaad

ajay kumar pandey के द्वारा
June 4, 2012

अलीन भैया नमन आपके ब्लॉग पर कुछ सवालों के जवाब लेने आया हूँ मेरा पहला सवाल यह है की आपने संतोष भैया की रचना का समर्थन क्यों किया है जिसमें उन्होंने मनमोहन सिंह जी की बुराई करी है और अपशब्द लिखे हैं आपने समर्थन क्यों किया है और क्या कारन है उन्हें समर्थन देने का हाँ में मानता हूँ की वोह मुरख्मंच का संपादक बताते हैं पर वह मनमोहन सिंह जी से क्यों चिड़ते हैं क्यों उनके लिए गाली गलोज करते हैं धन्यवाद

    June 5, 2012

    मैं उनकी रचना का समर्थन नहीं बल्कि एक भ्रष्ट निकाय के खिभ विरोध प्रकट किया हूँ……वह किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ लिखते हैं वह उनकी समस्या हा. इसमे मैं क्या कहूँ…………यहाँ हरेक व्यवस्था दुसरे व्यवस्था को दोषी ठहराकर खुद को महान साबित करने में लगी रहती है. आपको इन्ही सब चीजों पर ध्यान देना है क्योंकि यह हम इंसानों की यह फितरत है कि कभी भी हमारा दोष नहीं दिखता….अतः मैं किसी दुसरे व्यवस्था को दोषी देने के बजाय उस व्यवस्था ( समाज ) को दोषी ठहराता हूँ जिसका कि अभिन्न हिस्सा हूँ तभी तो यह महफ़िल में बदनाम हूँ…………और दुसरे सभी नाम वाले हैं…By the way I like it what I do and love with what I am.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
June 4, 2012

फिल्म की सफलता , असफलता में प्रोडूसर का भी बड़ा हाथ होता है. कई बड़े बड़े पुरूस्कार मिल जाएँ वो अलग बात है पर बॉक्स आफिस पे भी सफलता जरूरी है, आज के परिवेश में. आपकी सद भावना हेतु क्रतग्य हूँ. आप यशस्वी हों. शुभ कामना है.

    June 5, 2012

    सादर चरण स्पर्श! यह तो प्रोडूसर विशेष पर निर्भर करता है कि उसकी सफलता के मायने क्या है. कुछ प्रोडूसर का प्रोडूस करने का मकसद ना ही पुरस्कार होता है और ना ही बॉक्स आफिस पर सफलता. और जहाँ तक रहा परिवेश की बात तो जरुरी नहीं है कि सब आँख वाले अँधा हो जाये तो एक अँधा अँधा बना रहे. आशीर्वाद भी आप ऐसा दिए जिसकी मुझे चाहत नहीं…..इसलिए थोडा दुःख हुआ…….. !

ajay kumar pandey के द्वारा
June 4, 2012

alin bhaiya naman yeh batao ki yeh anjaani kaisi hai meri ruchi madam ki jaisi shakal hai ya nahi iska patla lamba muh hai ki nahi anjaani meri ruchi madam ki tarah hi ho dhanyawaad

    June 5, 2012

    भैया जी, वह मेरी अन्जानी है न की आपकी. आपकी तो भाभी है. अतः……………………………… बाहर से तो कभी गौर नहीं किया कि वह कैसी है पर अन्दर से बहुत ही खुबसूरत है. बस यूँ समझ लो जो बचपन से अपने जीवनसाथी के बारे में ख्वाब संजोया था बिलकुल वैसी है…………..वह दुनिया में बस एक है. उसकी जैसी कोई दूसरी, खुदा ने बनाया ही नहीं है……………….फिलहाल उससे आपको क्या लेना-देना……..चलिए पढाई पर लग जाइये….!

ajay kumar pandey के द्वारा
June 1, 2012

बड़े भैया सादर नमन आपके ब्लॉग पर अपनी दो पोस्ट का प्रचार करने आया हूँ पहली पोस्ट है त्वीले धारो बौला म्योर मोतिया बलदा रे यह पोस्ट आपके मतलब की भी है और दूसरी पोस्ट है भारत बंद देश की अर्थव्यवस्था का नुक्सान और हानियाँ आप मेरी पहली पोस्ट पढ़ें और सभी ब्लोग्गेर्स को पढने को जरुर कहें मेरे लिए जैसे रूचि मैडम का आशीर्वाद अहम् है वैसे ही आपका मार्गदर्शन भी अहम् है और आपका प्रतिक्रिया रुपी आशीर्वाद मेरा संबल है धन्यवाद

smtpushpapandey के द्वारा
May 30, 2012

पुत्रतुल्य अलीन यह जानकर ख़ुशी हुई की तुम शादी कर रहे हो और पुत्रवधू ला रहे हो अगर शादी कर लोगे तो मेरी पुत्रवधू को लेकर मुझसे मिलने जरुर आना तुम्हारी मात्र तुल्य श्रीमती पुष्पा पाण्डेय

    May 30, 2012

    सादर चरण स्पर्श! लीजिये अब आपसे कौन कह दिया कि मैं शादी करने जा रहा हूँ…….शादी तो मेरी अनजानी से उसी दिन हो गयी थी. जिस दिन उसने मेरा प्रस्ताव स्वीकार किया था….उसे बस अपने पास बुलाना है और जिस दिन आपकी बहु आपके इस बेटे के पास आ जाएगी. उस दिन हम दोनों आपका आशीर्वाद लेने जरुर आयेंगे…..!

MAHIMA SHREE के द्वारा
May 30, 2012

इसमें कोई शक नहीं है . आदरणीय प्रदीप सर की विनम्रता और ह्रदय की विशालता से कोई भी अनभिज्ञ हो … उनके मन में सब के लिए मान , प्यार और आशीर्वाद है / मैं तो जब से जागरण से जुडी हुई उसी दिन से उनका आशीर्वाद बरसा रहा है .. और आकस्मिक वर्षा की तरह नहीं की कभी बरसा कभी नहीं बरसा .. बस अनवरत बरस रहा है और जानती हूँ कभी नहीं थमेगा / उनका व्यक्तित्व तो जागरण के आँगन में उस विशाल बरगद की तरह है जिसकी छावं में हमसब छोटे पछी की तरह निर्भीक होकर चचाहते रहते है … चलो आपके बहाने आदरणीय प्रदीप सर के प्रति हमसब अपनी कृतज्ञता और और उनके के लिए जो मन में श्रधा हहै उसे वयक्त करने का मौका मिला / आपका बहुत -२ धन्यवाद / अपने स्टाइल में ही सही पर बहुत दिनों बाद .. आपने कुछ अच्छा लिखा / बधाई

Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
May 29, 2012

anil जी, सार्थक लेख देने के लिए बधाई. तारीफ के लिए शब्द कम पद रहे है………………………………… अति उत्तम आलेख..

    May 30, 2012

    सुस्वागतम! हनीफ जी, यहाँ तारीफ़ की जरुरत क्या?……बस अभिव्यक्ति किया करिए…………..! अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ! वृक्ष हो भले खड़े, हों घने, हों बड़े, एक-पत्र-छाँह भी माँग मत, माँग मत, माँग मत! अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ! तू न थकेगा कभी! तू न थमेगा कभी! तू न मुड़ेगा कभी!- कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ! यह महँ दृश्य है- चल रहा मनुष्य है अश्रु-स्वेद-रक्त से लथपथ, लथपथ, लथपथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!…………….ह. बच्चन

ajay kumar pandey के द्वारा
May 29, 2012

अलीन भैया नमन हाँ आपने कहा की पढ़ाने के और भी रास्ते हैं में आपका अनुज हूँ और आप मेरे बड़े भाई और आप मेरे से उम्र में बड़े भी हैं और अनुभवी भी पर यह सब dialog उनकी डिंग ही सही पर मेरे लिए यह उपदेश का काम करते हैं और रूचि मैडम सभी को यह dialog बोलकर शिक्षित करके एक अच्छा विद्यार्थी बनाती हैं मुझे रूचि मैडम अच्छी लगती हैं और मेरी उनके प्रति श्रद्धा है और उनके यह कथन मेरे लिए उपदेश का काम करते हैं भले ही वो मुझसे कुछ कहती नहीं पर यह dialog मेरे लिए उपदेश के समान हैं क्योंकि रूचि मैडम जैसी शिक्षिका के इन्ही उपदेशों पर चलकर में कुछ बना हूँ वो मुझसे बातें भी करती हैं और अच्छी राह दिखाती हैं उनके यह dialog मेरे लिए उपदेश का काम करेंगे और आगे भी यह मेरे मूलमंत्र बने रहेंगे धन्यवाद

    May 30, 2012

    पहिले तो आप अपने दिमाग से यह भ्रम निकल दीजिये कि आप कुछ बन पाए हैं…….और आआगे कुछ बनने कि तैयारी करिए……………!

Santosh Kumar के द्वारा
May 29, 2012

अनिल जी ,.सादर नमस्कार श्रद्धेय सर के विराट व्यक्तित्व को हमारे सामने रखने के लिए हार्दिक आभार आपका ,..इसे लोग विरले ही होते हैं जो अपनी तकलीफों को पीछे छोड़ हँसते मुस्कराते हुए जीवन सार्थक करते हैं ,..उनको शत शत प्रणाम और आपको नमन ….सादर आभार

    May 30, 2012

    हार्दिक आभार! ज़ख्म यूँ मुस्कुरा के खिलते हैं जैसे वो दिल को छू के गुजरे हैं राख के ढेर जैसे सर्द मकाँ चाँद इन बदलियों में रहते हैं…………..बशीर भद्र

ANAND PRAVIN के द्वारा
May 28, 2012

मित्र, सार्थकता ही जीवन है ………….एक योग्य चरित्र को हमारे सामने रखने के लिए खुले दिल से धन्यवाद स्तंभ की कोई परिभाषा नहीं होगी…….न उन्हें कोई झुका सकता है ना डिगा सकता है प्रदीप सर भी वही स्तंभ हैं………….मुझे उनसे बात कराने का धन्यवाद अलग से

    May 29, 2012

    मैं दुश्मनों और दोस्तों के लिए शुक्रिया, धन्यबाद और माफ़ी जैसे शब्द जल्दी इस्तेमाल नहीं करता……………. कोई दरिया से प्यासा आ रहा, कोई शहरा में पानी पा रहा है; जवां बेटा मजे से खा रहा है, कमा कर बाप बुड्ढा ला रहा है, उसे धुप का अंदाज़ा नहीं है, शज़र जो आँगन का कटवा रहा है; हुआ है नफरतों का बोलबाला, दिलों से प्यार घटता जा रहा है; किताब बेचकर नादर बच्चा, दावा बीमार माँ की ला रहा है; मुहब्बत प्यार, एक धोखा है, रिफअत सड़क पर कोई गता जा रहा है………………. “रिफअत परवास”

Mohinder Kumar के द्वारा
May 28, 2012

अनिल जी, बुजुर्गों का आदर करना हम सब का कर्तव्य है… कोई सीधा बुजुर्ग तो हो नहीं जाता… अथार्त उन्होंने अपने जीवन में वो ऊंच नीच देखी होती है जिसकी एक बालक या एक नौजवान कल्पना भी नहीं कर सकता. दुर्भाग्य वश आज के दौर में न्यूकलियर फ़ैमली का चलन फ़ैल रहा है और बुढापा ठोकरें खाने पर मजबूर है. लिखते रहिये.

    May 29, 2012

    जी, मोहिंदर जी …………….! किसी शायर ने क्या खूब लिखा है………………….. जलते रेगिस्तान पूछते सावन कैसा होता है, फुटपाथी बच्चे क्या जाने आँगन कैसा होता है. आधी उम्र किताबे ढ़ोकर रोजगार में खोकर कुछ कल कुछ बुड्ढ़े पूछ रहे थे यौवन कैसा होता है…………………………..!

akraktale के द्वारा
May 28, 2012

प्रिय अनिल जी नमस्कार, बुढापा भी जीवन का एक पड़ाव है. यादों वादों का पूरा एक गाँव है, आप कह रहे हैं जिसे सच्ची हंसी यही तो उस बरगद की फैली छाँव है. आप नाना – नाती दोनों के जीवन में अपार खुशियाँ और मुस्कराहट रहे यही शुभकामनाए,.

    May 29, 2012

    सादर प्रणाम! शुक्रिया सर, आप से बेहतर मुझे यहाँ कौन समझ सकता है………. मन तो मौसम सा चंचल है सबका होकर भी न किसी का अभी सुबह का, अभी शाम का, अभी रुदन का, अभी हंसी का और इसी भावना की गलती क्षमा न यदि ममता कर देती इश्वर तक अपराधी होता पूरा खेल दुबारा होता…………….गोपाल दास “नीरज”

ajay kumar pandey के द्वारा
May 28, 2012

अलीन भैया नमन रूचि मैडम यह सब dialog इसलिए बोलती हैं क्योंकि बच्चे पढाई कर सकें वरना अगर वो यह सब न कहें तो बच्चे पढाई नहीं करते फिलहाल मेरे से तो कुछ नहीं कहती मेरे से तो खूब बातें करती हैं और मेरे से कुछ नहीं कहती वो इसी कारन मुझे अच्छी लगती हैं धन्यवाद

    May 29, 2012

    भाई जी, यह अब आप मुझे मत सिखाइए कौन किसलिए बोलता है…और भी रास्ते हैं बच्चों का पढ़ाने के ……मैं भी लगभग ८ साल पढाया हूँ ….हाँ यह जरुर है की छोटे बच्चों का नहीं पढाया हूँ……..हाँ यह सही भी है कि छोटे बच्चों को पढाना थोडा मुश्किल होता है……

ajay kumar pandey के द्वारा
May 28, 2012

अलीन भैया नमन आपने यह बुड्ढे की हकीकत बढ़िया लिखी है अच्छा लगा यह जानकर की आपने अपने पिताजी के प्रेरक व्यक्तित्व के बारे में बता दिया अब में यहाँ रूचि मैडम की हकीकत का पर्दा खोलना चाहता हूँ उनके dialog निम्न हैं और वह इन्ही dialog के कारन पुरे स्कूल में प्रस्सिद्ध हैं १. बातें बातें बातें २. शुक्र है एक इंग्लिश के शब्द की वर्तनी तो आती है वो भी किश्तों में बोली गयी है ३. नीद आ रही है वोह भी पढाई में ४ मैंने कितने बच्चो को सुधार दिया है पूछ लेना ५. थप्पड़ मारकर सिद्धा फिल्मों में पंहुचा दूंगी धन्यवाद

    May 28, 2012

    जी यह तो हमारे पिता श्री नहीं है परन्तु उनके पिता श्री जरुर है…..अर्थात नाना श्री …………! आपकी रूचि मैडम के dialog से यह स्पष्ट होता है कि वह एक अच्छी टीचर हो ही नहीं सकती…एक डिंग हांकने वाली औरत के सिवा वो कुछ नहीं क्योंकि एक टीचर में ऐसे गुण नहीं होने चाहिए जैसा कि आपने उनके बारे में अभी-अभी बताया है…………….!

dineshaastik के द्वारा
May 28, 2012

पत्थर को पूजते पूजते बन गये हम  भी पत्थर, इस  शहर भी रहता है एक  इंसान। जैसा दिखता है वैसा ही निकलेगा, ऐसा होता है कोई कोई  विरला महान।। अनिल  भाई  आदरणीय कुशवाहा जी के व्यक्तित्व को शब्द देने के लिये आपका हृदय से आभार….

    jlsingh के द्वारा
    May 28, 2012

    बस यहाँ सहमत ही लिख रहा हूँ ! बाकी… मैंने आपको मेल किया है .. आप समझ ही रहे होंगे .. मैं क्या कहना चाहता हूँ!

    May 28, 2012

    सादर प्रणाम! मैं बहुत कुछ सोचता रहता हूँ पर कहता नहीं, बोलना भी है मन, सच बोलना तो दरकिनार. इस शिरे से उस शिरे तक सब शरीके जुर्म हैं, आदमी या तो जमानत पर रिहा है या फरार……दुष्यंत कुमार…!

    May 28, 2012

    सादर प्रणाम, सर! अब मैं यहाँ क्या लिखूं..जब आपको न मुझपर विश्वास है और न खुद पर कि आप सामने से बात कर सके….बाकि मेरी भी बात आपतक मेल से पहुँच ही चुकी होगी….फ़िलहाल एक ग़ज़ल आप भी पढ़े… तुम्हारे पाँवों के नीचे कोई ज़मीं नहीं, कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यकीं नहीं. मैं बेपनाह अँधेरा को सुबह कैसे कहूँ, मैं इन नज़ारों का अँधा तमाशबीन नहीं. तुम्हीं से प्यार जताएं तुम्हीं को खा जायें, अदीब यों तो सियासी हैं पर कमीन नहीं. तुझे कसम है खुदी को बहुत हलाक न कर, तू इस मशीन का पुर्जा है, मशीन नहीं. बहुत मशहूर है आयें ज़रूर आप यहाँ, ये मुल्क देखने के लायक है, हसीं नहीं. जरा से तौर तरीकों में हेर-फेर करो, तुन्हारे हाथ में कालर हो, आस्तीन नहीं…………..दुष्यंत कुमार…!

चन्दन राय के द्वारा
May 28, 2012

अनिल मित्रवर , शहर भर लगे है तमाम ठूंठ से शजर ,जो कभी जवान थे, वो आज भी सर झुकाए अदब से है नए पत्थर के इंतजार में !!! आपको ज्ञान मिला , और आपके आलेख से दूर हुई हमारी अज्ञानता !

    May 28, 2012

    जी आपकी बातों में पहली बार सच्चाई दिखी है वरना आप हरेक बात अच्छा लगाने की लिए कहते हैं..जो मुझे बिलकुल पसंद नहीं ….पर छोडिये देर आये दुरुस्त आये …आपके इस शेर पर एक शायर की कुछ पंक्तियाँ याद आ गयी…..गौर फरमाएं….. हमने सूरज को भी दिन में सोते देखा है, औ’ पूनम के चाँद को नयन भिगोते देखा है, सिसक रही है हंसी, रोककर आंसू अपने, आँख बचाकर मुस्कानों को रोते देखा है…………….हार्दिक आभार……….!

follyofawiseman के द्वारा
May 27, 2012

कुछ कहा नहीं जा रहा है मुझ से……..लिख-लिख कर मिटा रहा हूँ………भीतर शब्द ही नहीं बन पा रहें हैं॥….. “मुझ को शिकस्त-ए-दिल का मजा याद आ गया हैरत है तुमको देख के मस्जिद में ऐ ‘खुमार’ क्या बात हो गयी जो खुदा याद आ गया”

    May 28, 2012

    रात आँखों में ढली पलकों में जुगनू आये हम हवाओं की तरह जा के उसे छू आये उन फकीरों को अपनी आवाज सुनाते रहियो जिनकी आवाज में दरगाहों की खुशबू आये………..बशीर भद्र………….!


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