साधना के पथ पर

अद्य की स्याही

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एक मुलाकात की जरुरत

Posted On: 7 Jun, 2012 में

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मैं इस दुनिया में उन खुशनशीब इंसानों में से हूँ जिनके पास कुछ ही दोस्त होते है परन्तु वो कुछ दोस्त बहुतों से कहीं बेहतर. दोस्त जो हजारों-लाखों के भीड़ में एक अपनी पहचान रखते हैं और उनका व्यक्तित्व यह बताता है कि वह कितना विशेष हैं. विशेष हैं अपने दोस्त के लिए और विशेष हैं इस दुनिया के लिए. और मेरे लिए विशेष खासतौर से क्योंकि मेरा किसी भी व्यक्ति विशेष से दुश्मनी नहीं रहती. परन्तु हाँ मैं जिनसे दोस्ती निभाता हूँ. उन्हीं से बाखुदा दुश्मनी भी निभाता हूँ. मेरे इन्ही दोस्तों में से एक है निखिल अग्रवाल जो तत्काल में एक इंजिनियर है. आज भी मुझे याद है …मैं और वह B. Sc फर्स्ट इयर के स्टुडेंट थे. उन्हीं दिनों हमारे उम्र के कुछ लड़को ने सामाजिक सेवा के उद्देश्य से एक संगठन बनाया. जिसके सदस्य सामाजिक सेवा से कोशों दूर थे. अतः जब उससे जुड़ने के लिए मेरे पास प्रस्ताव रखा गया  तो मैं इंकार कर गया. चूँकि मेरा दोस्त मृदुभाषी और बहुत ही उदारवादी था जो किसी के दिल को ठेस नहीं पहुँचाना चाहता था. अतः मेरे लाख मना करने के बावजूद वह उस संस्था को ज्वाइन किया जिसके क्रिया-कलाप निश्चय ही  समाज सेवा और देश के विरुद्ध थे क्योंकि आज भी हममे से लगभग ९९ % भारतीय अपने देश के लिए दुसरे देशों, विशेष रूप से पाकिस्तान से लड़ना देशभक्ति समझते हैं जबकि राष्ट्र विरोधी क्रिया-कलाप जैसे भ्रष्टाचार, जात-पात, धर्म और आत्म मान-सम्मान के लिए सेवा इत्यादि को बढ़ावा देकर इस देश को अन्दर ही अन्दर खोखला कर रहे हैं. अब इससे बड़ा देश देशद्रोह का उदहारण क्या हो सकता है? परन्तु मेरा दोस्त ऐसा नहीं था और न ही हैं फिर भी चूँकि ऐसे लोगो के साथ था तो मेरी नज़र में वह देश द्रोही था. अतः मैं उसका साथ छोड़ दिया. परन्तु मुझे अपने गलती का एहसास एक साल के बाद हुआ क्योंकि ९९ % देश-द्रोहियों की वजह से १% देश-प्रेमियों से दुश्मनी तो नहीं की जा सकती. वैसे भी यह देश इन्ही देशभक्तों के कारण तो बचा हूँ. उन १२ महीनों के अन्दर अपने दोस्त को बहुत मिस किया और उन दिनों उसके प्रति मेरी नाराज़गी ने एक ग़ज़ल को जन्म दिया था. आज वह ग़ज़ल आप सभी के बीच रख रहा हूँ…..आशा करता हूँ …आप सभी को पसंद आएगी……………

इस कदर वतन से बेवफाई किया है वह
कि आखों में तूफ़ान लिए घुमता हूँ.
कुछ मेरी भी ऐसी मजबूरियां हैं वरना
हाथ में एक हथियार लिए घूमता हूँ.
उसको मैं क्योंकर भूल जाऊ यूँ ही
दिल में उसकी याद लिए घूमता हूँ.
इन गलियों में नज़र आता हूँ और
जुबां पर एक बात लिए घूमता हूँ.
अबकी मिले तो उड़ा दूंगा उसका सर
ऐसा सिने में ज़ज्बात लिए घूमता हूँ.
इस धरती का एक क़र्ज़ है मुझ पर
सो मिटटी माथ लिए घूमता हूँ.
आज वतन की शीतलता के लिए
अपने जीवन में रात लिए घूमता हूँ.

एक मुलाकात  की जरुरत



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48 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

seemakanwal के द्वारा
June 21, 2012

ख़ुदा करे आप को वो दोस्त फिर मिले .

sinsera के द्वारा
June 13, 2012

अनिल जी नमस्कार, अच्छे वक़्त से ज्यादा अच्छे रिश्तों को कीमत देना , वो नहीं बदलें गे गर वक़्त बदल जायेगा….. अच्छी रचना….पढ़ कर ख़ुशी हुई…

    June 14, 2012

    सादर प्रणाम! क्या दीदी, आप भी हरवक्त मजाक करती रहती हैं…………..इसे अच्छी रचना बोलेंगे तो फिर अच्छी को क्या बोलेंगे……………मेरी सारी अच्छी रचनाएँ डायरी में बंद पड़ी है…….मात्र एक कारण कॉपी राइट नहीं है…………..और आज के ज़माने में साहित्य चोर बहुत है………….और इस मंच पर पूछों ही मत……………हम तो बीमार को देखकर पता लगा लेते हैं कि हाल क्या है………………!……….अबे इसे मेरा इगो मत समझिएगा………आदत है……….!

June 13, 2012

सादर प्रणाम! फिर उम्मीद ……………दीदी, आखिर हम किसी से उम्मीद करते ही क्यों है जब उसे समझ ही नहीं पाते………..सच्चाई तो यह है कि हमें खुद के अलावा किसी से कुछ भी उम्मीद करना ही नहीं चाहिए………! उम्मीदें टूटती है तो बहुत ही तकलीफ होता है……….

minujha के द्वारा
June 12, 2012

अलीन जी आपसे यही उम्मीद है और रहेगी …..,पर  जिसे दोस्त कहा है उसके प्रति भी आपके फर्ज   है,बात पुरानी है तो यकीनन अब तक  आप अपने दोस्त को सही राह  दिखा चुके होंगे.. ढेर सारी शुभकामनाएं

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
June 11, 2012

मान्य भाई अलीन जी, स्नेहिल नमन ! रचनाओं का जन्म दोनों ही परिस्थितियों में सामान ढंग से होता है या तो तब जब रचनाकार परमानंद की स्थिति में होता है या फिर तब जब वह दुक्ख की घोर काली छाया का साक्षात्कार कर लिया होता है या फिर विश्वाशघात की स्थिति में | आप की ग़ज़ल का जन्म भी परिस्थित्यानुकूल है ! बधाई !! पुनश्च !

yogi sarswat के द्वारा
June 11, 2012

अपने दोस्त के प्रति आपका लगाव और ग़ज़ल पढ़कर अच्छा लगा ! बढ़िया प्रस्तुति !

ajay kumar pandey के द्वारा
June 11, 2012

अलीन भैया नमन इस पोस्ट के बाद मेरी कोई रचना शायद ही इस ब्लॉग पर आये क्योंकि में कही शादी में जा रहा हूँ २२ जून की रात वाली गाडी से २६ जून को ही lotunga और ब्लॉग पर आ नहीं पाऊंगा क्योंकि वहां नेट की सुविधा नहीं होगी और सब शादी में व्यस्त होंगे आप अपना मोबाइल नंबर दे दो ताकि आपसे वहां से बातें कर सकू धन्यवाद

ajay kumar pandey के द्वारा
June 10, 2012

अलीन भैया सादर नमन एक बार गाँव गया था तो दादा जी की primary की किताब में यह कविता पढ़ी उस किताब को में लाने को था पर मम्मी ने मना कर दिया की यह बुजुर्गो की धरोहर है इसे गाँव में ही रहने दो लेकिन में उस कविता को एक कॉपी के पन्ने पर लिख लाया आज अचानक मेरे को याद आया की उस समय तो वास्तव में वातावरण सुखद हुआ करता था पर आजकल ठीक इसके विपरीत वातावरण प्रदुषण युक्त है तो मैंने सोचा क्यों न में विपरीत ही लिख डालूं इसलिए मैंने यह रचना स्वयं ही बनाकर लिख डाली क्योंकि सकारात्मक को नकारात्मक करना मैंने अपनी पढाई के दौरान विलोम शब्दों को करते हुए बहुत कुछ सिखा है धन्यवाद

ajay kumar pandey के द्वारा
June 9, 2012

अलीन भैया नमन में २२ जून की रात की गाडी से दिल्ली से बाहर कही जा रहा हूँ में २६ की रात को दिल्ली वाली गाड़ी में वहां से रात को बैठकर सवेरे दिल्ली पहुचुन्गा फिर आराम करने के बाद ही श्याम को मुलाकात होगी धन्यवाद

allrounder के द्वारा
June 9, 2012

बहुत अच्छी रचना अलीन जी …. बधाई !

    June 9, 2012

    सुस्वागतम! बहुत तो अच्छी नहीं है पर अच्छी जरुर है………………….शुक्रिया………….1

yamunapathak के द्वारा
June 9, 2012

आपके ज़ज्बात अपने दोस्त के प्रति जानकर ऐसा महसूस हुआ की सच में हम दूसरों को समझने में सिर्फ अपने दृष्टिकोण का प्रयोग करते हैं कभी भी उस व्यक्ति के दृष्टिकोन को समझने की कोशिश नहीं करते. अच्छी अभिव्यक्ति के लिए शुक्रिया अलीनजी

    June 9, 2012

    सादर प्रणाम! अपने बहुत ही सही बात कही……………………….हार्दिक आभार…………..1

    jlsingh के द्वारा
    June 11, 2012

    बिलकुल सही बात है – ऐसा प्राय: हम सभी करते हैं!

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
June 8, 2012

सुन्दर गजल अनिल जी. उसको क्यूं कर भूल जाऊं यूँ ही दिल में उसकी याद लिए घूमता हूँ बहुत सुन्दर.

akraktale के द्वारा
June 7, 2012

प्रिय अनिल जी नमस्कार, कुछ मेरी भी ऐसी मजबूरियां हैं वरना हाथ में एक हथियार लिए घूमता हूँ. है यार मेरा एक अनमोल हीरा तभी दुआएं और मोहब्बत भरा दिल लिए घूमता हूँ. दिल से निकाली ही नहीं जाती यादें उसकी संग बिताये जज्बात पल चार लिए घूमता हूँ. है आजाद कराना दुश्मनों के चंगुल से उसे हाथ में एक हथियार प्यार लिए घूमता हूँ.

    June 8, 2012

    सुस्वागतम!…………….बहुत खूब सर………………….आपने अपनी रचना से मेरी रचना के भावों को सपष्टता प्रदान की ………………..हार्दिक आभार!

smtpushpapandey के द्वारा
June 7, 2012

प्रिय बेटे अलीन एक मुलाकात की जरुरत शीर्षक की कहानी पढ़ी पढ़कर बहुत अच्छा लगा मुझे भी अपनी कॉलेज लाइफ याद आ गयी तुम्हारे दोस्त की देशभक्ति हो सकता है कभी उचित मुकाम पर पहुच जाए इतने अच्छे लेख से अवगत कराने के लिए धन्यवाद धन्यवाद

ajay kumar pandey के द्वारा
June 7, 2012

अलीन भैया नमन बहुत अच्छा अलीन भैया आपकी गजल से मुझे प्रेरणा मिली है में भी आपके और आपके दोस्त की तरह एक अच्छा देशभक्त बनना चाहता हूँ धन्यवाद

    June 8, 2012

    जी, मैंने तो कहीं यह नहीं लिखा कि मैं देश भक्त हूँ…………………

Santosh Kumar के द्वारा
June 7, 2012

अनिल जी ,.सादर नमस्कार रचना अच्छी और भावनाओ का भण्डार लिए है ,..मित्र को छोड़ना ठीक नहीं था …अब फिरसे मिलिए ,.मुलाकात सुखद हो यही कामना है ..साभार

follyofawiseman के द्वारा
June 7, 2012

लखना- राख़ लगा के खीच लूँगा जी पापी पाकिस्तान की सितीया- भैया जी, राख़ लगा के क्यों….. लखना- ऊ इसलिए बे, क्योंकि जी स्लिप भी तो कर सकता है…..राख़ लगा देंगे तो स्लिप नहीं न करेगा…..

    June 9, 2012

    अबे यार, मैं तो एक ऐसे थूक का निर्माण कर रहा हूँ जिसे यदि अपने बोर्डर से पाकिस्तान पर थूक दिया जाय तो पूरा पाकिस्तान, हिंदुस्तान में तब्दील हो जायेगा……………………यदि इसका मतलब कुछ मूर्खों को समझ में नहीं आया हो तो सिर्फ तुम्ही समझा सकते हो…………हाँ…हाँ….हाँ…………….!

nishamittal के द्वारा
June 7, 2012

जब जागे तभी सवेरा आलिं जी परन्तु दोस्त को किसी भी गलत राह पर जाने से रोकना एक दोस्त का फर्ज है न कि छोड़ देना

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
June 7, 2012

स्नेही अनिल नाती श्री जी, शुभाशीष आपके भाव और संवेदना ठीक हैं. टाइप त्रुटी भी है. थोडा पढ़ लिया करें, बेहतर होगा. anytha n lenge. बधाई.

    June 8, 2012

    सादर चरण स्पर्श! नाती भी बोलते हैं और अन्यथा न लेने की बात भी करते हैं…कुछ अजीब लगता है……………………… अब तो हम अन्यथा जरुर लेंगे…………..!

Mohinder Kumar के द्वारा
June 7, 2012

अनिल भाई, गर्म दल के सदस्य लगते हैं आप… कूल डाऊन.. प्यार से भी देश के गद्दारों को उनकी नीयती तक पहुंचाया जा सकता है.. लिखते रहिये.

    June 8, 2012

    सुस्वागतम! कभी-कभी हम किसी चीज को जैसा देखते हैं वो वैसी नहीं होती………………..!

चन्दन राय के द्वारा
June 7, 2012

अनिल मित्र , दोस्त दोस्त होता है ,अच्छा हो या बुरा , वो दोस्त ही होते है सायद माँ के बाद जो आपके गलती पर आपको कोसते नहीं है ,सहारा देते है , बुरे में भी समझाते है नहीं समझने पर साथ देते हैं , आपको उस दोस्त की याद आती है इसका मतलब आपकी दोस्ती पक्की है , दोस्त को समर्पित सुन्दर भावना !

    June 8, 2012

    दोस्त तो सिर्फ दोस्ती होती है………….इसमे पक्का और कच्चा का सवाल ही नहीं उठता……………….हार्दिक आभार!

Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
June 7, 2012

अनिल जी, namaskar- आस्तिक जी ke विचारों से सहमत हूँ. आपका आलेख उत्तम है और कविता भी. बधाई……

    June 8, 2012

    नमस्कार! काहे को मजाक कर रहे हैं………………..भलीप्रकार मालुम है कि उत्तम क्या होता है. यह रचना १० साल पहले की लिखी है जिसमे…..अभिव्यक्ति के हिशाब से बहुत कमी है……….!

dineshaastik के द्वारा
June 7, 2012

अनिल जी आपके आलेख  की सभी बातों से सहमत हूँ किन्तु आंकङे से सहमत नहीं  हूँ। आपका  यहा आँकड़ा बाबाओं वाला आधारहीन है। ऐसे ही आधारहीन आँकड़े  बाबा जी देते हैं लेकिन आँकड़ों को कोई श्रोत नहीं बताते। आप अपने आँकड़े के साथ मेरा अनुमान  लिख  सकते थे। खैर… मेरा मानना है कि जाति प्रथा, भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता में रहने वालों लोग  आपको 90 से ऊपर के अनुपात में मिल  जायेगे, लेकिन इन्हें बढ़ावा देने वाले बहुत ही कम संख्या में होंगे यह मेरा अनुमान है।  निखिल  जैसे दोस्त को खोना दुर्भाग्य पूर्ण  है। हो सके तो उसे दुवारा प्राप्त  कीजिये…..

    vikramjitsingh के द्वारा
    June 7, 2012

    आदरणीय दिनेश जी एवं प्रिय मित्र अनिल जी….. और……. हम एक नई बहस की शुरुआत देख रहे हैं…… हा…..हा……हा….. वैसे…अनिल जी हम आपकी बातों से सहमत हैं…… (अब ये मत पूछियेगा कि……क्यों…????…..बाबा जी….)

    June 8, 2012

    सादर प्रणाम! …….और मैं आकड़ों और अनुमान में विश्वास नहीं करता……………मैं जो मनोस्थिति लोगो का पढ़ता हूँ…वही लिख देता हूँ और सच्चाई तो यह है कि यह ९९.९९ % हैं…………..! और कहीं न कहीं से इसमे आप और हम भी है………..! जी, निखिल को मात्र एक साल के लिए खोया था….ऊपर लिखा हूँ…..हम आज भी दोस्त हैं…………!

    June 8, 2012

    सादर प्रणाम! पूछने की जरुरत ही नही………..क्योंकि एक शब्द पढ़कर पूरी कहानी समझा जा सकता है बशर्ते कि कोई समझने वाला हो….हाँ….हाँ….हाँ….!

    dineshaastik के द्वारा
    June 8, 2012

    यह सच है कि अनजाने में या विवशतावश  हम  भी उसमें शामिल  हों। आपने जो कारण  बताये, उनमें तो मैं शामिल  नहीं हूँ। इसके एवज  में मुझे कुछ  हानि का सामना भी करना पड़ा। किन्तु शामिल  होने की हानि से कम। हाँ, पहिले जरूर अज्ञानतावश  इसमें सम्मलित  था। जिसका अपराध  बोध  है मुझे।

    June 9, 2012

    यदि कोई व्यक्ति कहता है कि वह अज्ञानता से दूर है तो अज्ञानता तो यही से शुरू हो गयी….और हम देशभक्त है …यह न हम खुद साबित कर सकते है और न ही दुसरे लोग…………….कुछ विषय साबित करने और कहने से बहुत दूर होता है जिसे तभी समझा जा सकता है जब हम उसके बहुत करीब होंगे………….और हम करीब तबतक तक नहीं होंगे जबतक कि हम उसे समझने और जानने का झूठा दम भरते रहेंगे…………!

    dineshaastik के द्वारा
    June 10, 2012

    सबसे बड़ी समस्या तो यही है, सबकी तराकू अलग  हैं, बट्टे भी अलग  हैं। सबके मापदण्ड अलग  हैं, परिभाषायें भी अलग  हैं। सब ऐसा सोचते है कि जो हम सोच  रहें हैं वही सही है। जो सही है वह कोई नहीं सोचता। यदि हम कोई भूल  करते हैं तो उसका कारण अज्ञानता ही कहलायगा। किन्तु भूल  का अहसास होना और दुवारा भूल  न हो ऐशा संकल्प करना ज्ञान  ही कहलायेगा। मुझे इतना ही  ज्ञान है इसके आगे अज्ञान  ही अज्ञान  है।

    Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
    June 11, 2012

    आप तीनों के शब्द-संधान से विभोर होकर संस्कृत के एक श्लोक का शुमार हो आया ……………….. काव्यशास्त्र विनोदेन कालो गच्छति धीमताम ! व्यसनेन च मूर्खानाम निद्रया कलहेन वा !!….सच कहिये तो विद्वानों और चिंतकों का समय ऐसे ही बीतता है | आनंद आ गया………..

    vikramjitsingh के द्वारा
    June 16, 2012

    आदरणीय दिनेश जी एवं अनिल जी…. क्यायायायायाया हुआ…..१० तारीख के बाद कोई बोला क्यों नहीं……????? हम तो देखने आये थे…..कि बहस अभी तक चल रही होगी……//// अरे थक गए क्या…..????? चलो….चलो…..लगे रहो….अभी रेटिंग भी तो बढ़ानी है……हा…..हा……हा……


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