साधना के पथ पर

अद्य की स्याही

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तुमसे बेशकीमती कोई चीज नहीं

Posted On: 22 Jun, 2012 Others में

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तुमसे बेशकीमती कोई चीज नहीं बशर्ते कि तुम, तुम हो और जहाँ तुम हो वहाँ कीमत का सवाल ही कहाँ. तुम जो अपनी कीमत कभी गुणात्मक तो कभी मात्रात्मक लगाते रहते हो जिसके लिए समाज में रोटी, कपड़ा, धन, दौलत, सेक्स, सुरक्षा और सम्मान की चाह में नाना प्रकार की सीमायें और व्यवस्थाएं बनाते रहते हो. इन्ही सीमाओं और व्यवस्थाओं की आड़ में तुम, तुम को गिरवी रखते हुए अपने स्वार्थ के वशीभूत मानवीय-ईश्वरीय सीमओं और व्यवस्थाओं को तार-तार करते रहते हो. तुम वह बनने की कोशिश करते हो जो तुम हो ही नहीं…. कभी तुम, तुम से बड़ा बनने की कोशिश तो कभी छोटा बनने की कोशिश, कभी अच्छा बनने की कोशिश तो कभी बुरा बनने की कोशिश और हरेक कोशिश में तुम्हें, तुम को भुलाने की कोशिश. कभी सोचा है तुमने इन सबके बीच तुम कहाँ हो? तुम्हें नहीं लगता कि तुम तुम्हारे साथ-साथ पूरी दुनिया को एक धोखे में रखने की कोशिश करते हो. तुम जो सिर्फ तुम हो यदि समझते हो कि तुम, तुम नहीं तो तुम, तुमसे बेईमानी कर रहे हो. एक ऐसे पहचान को स्थायी बनाने की कोशिश कर रहे हो जो स्थायी है ही नहीं क्योंकि यह पूरी श्रृष्टि गतिमान है. ऐसे में तुम यदि तुमको स्थायी या बंधन में बाँधने की कोशिश करते हो तो विक्षोभ होना अवश्यम्भावी है और जहाँ मन में विक्षोभ पैदा हुआ तो उसमे असंतोष, घृणा, क्रोध जैसे विकार उतपन्न होना स्वाभाविक है. दरअसल तुम अपनी इच्छाओ के अधीन जो अंधाधुध भागे जा रहे हो, तुम जो इस दौड़ को गति मान रहे हो, तुम जो बाह्य वातावरण को अपने अधीन करना चाह रहे हो; वही तो तुम्हारी स्थिरता का प्रतीक है. तुम्हारी गति उस पतंगे की तरह है जो किसी दीपक के चारो तरफ मंडराता रहता और खुद को उससे जलाकर अपना अस्तित्व खो बैठता है. उसका अस्तित्व विहीन होना एक परम सत्य है और तुम्हारा भी. तुम जब कभी भी इस गतिशील श्रृष्टि में किसी तरह की स्थिरता लाने की कोशिश करोगे तो विक्षोभ पैदा होना स्वाभाविक है. फिर तुम्हारी तुम को बदलने की तमाम कोशिश बेकार हो जाती है. या यूँ कहे कि तुम इस दुनिया में खुद की पहचान भुलाकर, किसी अन्य ऐसे पहचान को तुम का नाम देना चाहते हो जो की वह तुम है ही नहीं. यदि तुम, तुम हो तो फिर तुम्हें तुम कहने की जरूरत कैसी? ……………………क्रमशः

तुमसे बेशकीमती कोई चीज नहीं (चित्र गूगल इमेज साभार)




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11 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Ajay Kumar Dubey के द्वारा
July 2, 2012

पहले तुम बताओ कि तुम कौन हो………..हा..हा..हा.. लगता है आजकल दर्शन का अध्ययन हो रहा है. चलो अच्छा हुआ….एक भटकती आत्मा रास्ते पर आने लगी.

yamunapathak के द्वारा
June 27, 2012

अनिलजी,बहुत दिनों बाद आपका लेख मिला.रजनीश के भाव से मिलता जुलता. यह दार्शनिकता सभी के मन में होती है जायज़ है “मैं कौन हूँ” पर मैं यह मानती हूँ की इस प्रश्न पर ज्यादा विचार ना कर ज़िन्दगी को इश्वर का एक उपहार समझ अपने हिस्से में आयी ज़िम्मेदारी,और कर्त्तव्य को सर्वोत्तम ढंग से निभाया और पूरा किया जाए तो ज़िन्दगी का मकसद पूरा हो जाए और हम भ्रमित नहीं हप पायेंगे. अगली कड़ी के इंतज़ार में शुक्रिया

dineshaastik के द्वारा
June 24, 2012

यह दर्शन, अध्यात्म  विषय है रोग  भायनक, लग  न जाये अनिल  तुम्हें मैं हूँ आशंकित। जो तलाशते भटक  रहे हो तुम  इस  जग  में, उसका तो अस्तित्व नहीं है , यह है निश्चित। ऐसी ऐनक  कौन लगा रक्खी है तुमने, देख  और की कमियाँ जो तुम  हुये अचंभित। सत्य झूठ  को तुम  उल्टा ही समझ  रहे हो, शब्द और परिभाषाओं में उलझे किंचित। तुम  आरोप लगा देते हो जो मन आये, चाह पूर्णतः हो सच्चाई से वह वंचित। यह चुराई क्या रचना तुमने प्रश्न  किया था? यह आरोप आपको क्या देता है शोभित? तुम  अलोचना करते मन खुश  होता मेरा, दुख  होता आधार  बिना करते आरोपित। तुमको दिखती सभी जगह कमियाँ ही कमियाँ, कमियाँ क्यों हैं कर न पाते तुम  निर्धारित। कभी कभी सच  कहते हो मन मान  रहा है, कहीं कहीं भाषा लिख  देते  आमर्यादित। चाह रहा मैं, क्या? तुम  इसकी जरा न सोचो, चाह तुम्हारी क्या है? इसको करते इंगित! मेरे तुम  भटकन  की चिन्ता करों अनिल  न, भटक  रहे तुम  इससे मैं ज्यादा हूँ चिंचित। रूढ न जाओ   डर है यह प्रतिक्रिया पढ़कर, निश्चित  और स्वाभाविक  है कि होना क्रोधित।

Santosh Kumar के द्वारा
June 23, 2012

अनिल जी ,.सादर नमस्कार भाई आपकी दार्शनिक विद्वतापूर्ण पोस्ट पर मूरख क्या लिख सकता है ,.अच्छा लगा ,…अगली किश्त का इन्तजार रहेगा …साभार

akraktale के द्वारा
June 23, 2012

प्रिय अनिल जी नमस्कार, बात अभी वहीँ पर अटकी है और इंटरवेल हो गया है चलिए रिफ्रेश होकर फिर आते हैं अगला भाग देखकर ही पूरी फिल्म समझ आएगी अभी कुछ भी बोलना ठीक नहीं. इन्तजार भी है क्रमशः,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, चित्र सुन्दर लगाए हैं उनकी तारीफ़ तो बनती है. बधाई.

vikramjitsingh के द्वारा
June 22, 2012

ना ‘तुम’ हमें जानो…ना ‘हम’ तुम्हें जाने…. मगर लगता….है कुछ ऐसा…. मेरा हम-दम मिल गया….. (रास्ता सही है…….बढे चलो….बढे चलो….)

sadhna srivastava के द्वारा
June 22, 2012

Oh my God!!! So Confusing…. मैं …. तुम….तुम…मैं…. !! क्या है ये सब….. ???

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
June 22, 2012

प्रिय नाती श्री, सस्नेह अब आनंद आया. बधाई. ढूँढ़ते रह जाओ. मैं कौन हूँ.

चन्दन राय के द्वारा
June 22, 2012

अनिल जी , इस तुम और मै पर गहन गूढ़ ,सूक्षम चिंतन की आवश्यकता है , मुझे नहीं लगता आदिकाल से इस पंच्वात्स्रात्मक यग तक कोई इसके मायने और मूल की तह तक पहुचा हो , क्यूंकि कोई भी इसके पाश से मुक्त नहीं हो पाया दार्शनिक आलेख !

Mohinder Kumar के द्वारा
June 22, 2012

अनिल जी, मुझे भी सिंह साहिव की राय से इत्तेफ़ाक है कि मैं मैं हूं कि तुम तुम हो या कि मैं तुम हूं और तुम मैं हो… (मजाक). आपने सही कहा.. इस संसार में हर आदमी एक मुखोटा लगा कर जी रहा है जिसे वह समय व अपनी सुविधा के अनुसार बदल लेता है. किसी भी व्यक्ति को पूर्ण रूप से समझ पाना अत्यन्त कठिन है.

jlsingh के द्वारा
June 22, 2012

प्रिय अनिल जी, सादर! ऐसा लगा किसी आध्यत्मिक संत का प्रवचन सुन रहा हूँ ….. शायद मेरी समझ बड़ी छोटी है बस इतना ही समझ पाया – तुम, तुम न रहो, मैं, मैं न रहूँ ……. अगली किश्त का इंतज़ार रहेगा…..


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