साधना के पथ पर

अद्य की स्याही

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सफ़र में हो तो याद रहे .........

Posted On: 1 Jul, 2012 Others में

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सफ़र में हो तो याद रहे .........सफ़र में हो तो याद रहे .........

सुख भी होगा और दुःख भी. सवाल यह नहीं कि सफ़र में सुख-दुःख होगा, सवाल इस बात का है कि क्या सचमुच संसार में सुख-दुःख जैसी कोई चीज है? मैं समझ सकता हूँ कि मेरी बाते आप सभी को कुछ अजीब लग रही होगी. यदि जिंदगी की तुलना एक सफ़र से की जाय तो इसमे कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. सफ़र जिसका अपना एक आरम्भ और अंत होता है. इन दो बिन्दुओं के बीच ऐसे तमाम पल जो किसी को सुख देते हैं तो किसी को दुःख. क्या हम कह सकते हैं कि ये पल सुख और दुःख के स्रोत हैं? या यह सुख और दुःख से परे कुछ और? आइये इस पर एक सफ़र के उदहारण से विचार करते हैं.मान लीजिये कि मैं और आप किसी ट्रेन से बलिया से आजमगढ़ की यात्रा पर हैं जो कि कुल तीन घंटे का सफ़र हैं. मुझे हरेक हाल में तीन घंटे के अन्दर आजमगढ़ पहुँचना है जबकि आपको किसी कारणवश एक घंटे के लिए इन दो स्टेशनों के बीच के मऊ जिले में एक घंटे के रुकना है. संयोग से ट्रेन मऊ में ख़राब हो जाती है तो क्या यह समय मेरे लिए भी संयोगी होगा. संभवतः नहीं क्योंकि मैं समय से आजमगढ़ नहीं पहुँच पाउँगा जबकि आपका काम समय से हो जायेगा. इस प्रकार एक ही ठहराव मेरे लिए दुःख का सबक और आपके लिए सुख का सबक बन जायेगा.
हकीकत तो यह है कि संसार में सुख-दुःख जैसी कोई चीज है ही नहीं. यदि परिस्थिति हमारे अनुकूल है तो सुख वरना दुःख. इस प्रकार सुख-दुःख न ही स्थायी है और न ही समानान्तर. बरसात की बात की जाय तो यह किसानो के लिए सुखदायी है तो कुम्हारों के लिए दुःखदायी. यह सुख-दुःख परिस्थितियों से जुड़े हमारे इच्छाओं का परिणाम हैं.जब इस सफ़र में सुख और दुःख हैं ही नहीं तो इसे स्थायी बनाकर रोना और हँसना क्या? तो क्यों न इस जीवनरूपी सफ़र में आने वाले ठहराव और बेशकीमती समय को कुछ ऐसे कामों में लगाया जाय जो जिंदगी से बहुत करीब हो. जैसे किसी रोते को हँसाया जाय, किसी जरुरतमंद की जरुरत पूरी की जाय, अँधेरे में दीप जलाया जाय और भी बहुत कुछ जो सुख और दुःख से कहीं दूर हो, जो इच्छाओं से परे हो. यह सफ़र है अपने मान्यताओं, उम्मीदों, बंधनों और विश्वासों से ऊपर उठने का, यह सफ़र है सतत कुछ नया करने का, यह सफ़र है………….. और सफ़र में हो तो याद रहे……………

सफ़र में हो तो याद रहे .........




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42 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
July 9, 2012

मित्रवर अलीन जी , आप हमेशा दिल की गहराइयों से लिखते हैं जिसकी वज़ह से आपके लेख हमेशा ही पढने में रुचिकर और अच्छे लगते हैं ! बहुत बढ़िया लेख इस बार भी हमेशा की तरह

    July 10, 2012

    ये तो आपके मन की बात है ….आपसे बेहतर कौन समझ सकता हैं…………….मैंतो वही लिखता हूँ जो देखता हूँ……………..और महशुस करता हूँ……

Chandan rai के द्वारा
July 7, 2012

मित्र , मेरी अनुपस्थिति में आपने गजब की चर्चा की ,आपके विचारों को पढ़ बड़ा ही आनंद मिला , आप एक बेहद सुलझे हुए ,सपष्ट इंसान है आपमें वो गरिमा और साहस है की आप अच्छे को अच्छा और बुरे को बुरा कह सके , और यह काम आप बेहद मार्यादित रूप में करते है में आपकी कही बातो से शब्दश सहमत हूँ ! ==================== रही बात आपके आलेख की तो आपने मनुष्य के भीतर की छालिक परवर्ती को बड़े ही सुन्दर तथ्यात्मक रूप में प्रकट किया और समझाया है , अत्यंत प्रभावित करता आलेख !

ANAND PRAVIN के द्वारा
July 5, 2012

सफ़र में तो सभी है मित्र …………..चलना ही जिन्दगी है याद रखना पोस्ट क्यूँ हटाया……………पढ़ना था मुझे

    July 5, 2012

    तू मित्र, न बोला कर….तकलीफे बढ़ जाती हैं…………….अपनी शादी में मुझे बुलाया भी नहीं……..और अकेले ही अकेले कर लिया सब कुछ और …………यहाँ मित्रता निभा रहे हैं………….! कौनसी पोस्ट हटाया हूँ…………कोई तो नहीं…………….दुश्मन जी मैं उन तारों में से हूँ जो टूटकर बिखर जाना पसंद करते हैं पर बुझना नहीं……….और एक बार जो लिख दिया सो लिख दिया…………..फिर उसे डीलेट नहीं करता….चाहें कीमत कुछ भी हो…………..!

seemakanwal के द्वारा
July 4, 2012

अलीन जी सफर में कभी अंग्रेजी वाला सफर भी हो जाता है .सुन्दर लेख . सफर में धुप तो होगी ,जो चल सको तो चलो सभी हैं भीड़ में ,तुम भी निकल सको चलो .

rekhafbd के द्वारा
July 4, 2012

अनिल जी , यह सफ़र है अपने मान्यताओं, उम्मीदों, बंधनों और विश्वासों से ऊपर उठने का, यह सफ़र है सतत कुछ नया करने का, बहुत खूब ,सुख और दुःख तो आतेजाते रहते है ,उससे उपर उठने की प्रेरणा देता हुआ आलेख ,बधाई

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
July 4, 2012

किसी से अपेक्षा न हो तो न सुख न दुःख.

Mohinder Kumar के द्वारा
July 3, 2012

अनिल जी, किसी ने कहा है “Happiness and Sadness are two state of mind”. मैं इस बात से सहमत हूं. जो व्यक्ति इस बात को समझ लेते हैं और जीवन में उसका पालन करते हैं वह जीवन में किसी भी घटना को एक सहज रूप में स्बीकारते हैं उससे न तो बहुत अधिक खुश होते हैं न ही दुखी. यह एक कटु सत्य है कि जो व्यक्ति अपने “भूतकाल” से ग्रसित रहते हैं वह अपने भविष्य से नाइंसाफ़ी करते हैं. सार्थक लेख के लिये बधाई.

    July 3, 2012

    यह एक कटु सत्य है कि जो व्यक्ति अपने “भूतकाल” से ग्रसित रहते हैं वह अपने भविष्य से नाइंसाफ़ी करते हैं….जी बहुत खूब………..!

ajaykr के द्वारा
July 2, 2012

बहुत खूब ,प्रेरक लेख http://avchetnmn.jagranjunction.com/2012/07/02/आधुनिक-शिक्षा-का-यह-रूप-भी/

shashibhushan1959 के द्वारा
July 2, 2012

आदरणीय अनिल जी, सादर ! “” इस जीवनरूपी सफ़र में आने वाले ठहराव और बेशकीमती समय को कुछ ऐसे कामों में लगाया जाय जो जिंदगी से बहुत करीब हो. जैसे किसी रोते को हँसाया जाय, किसी जरुरतमंद की जरुरत पूरी की जाय, अँधेरे में दीप जलाया जाय और भी बहुत कुछ जो सुख और दुःख से कहीं दूर हो, जो इच्छाओं से परे हो.”" अच्छा सन्देश ! केवल कहना नहीं, करना भी चाहिए ! सादर !

    July 2, 2012

    सादर चरण स्पर्श! सही कहा आपने जैसे कि भारत और पाकिस्तान के बीच दूरियां पैदा करके बार-बार दोनों देशों को लड़ाया जाय और हजारों जिंदगियों की बलि दी जाय, जैसे देश में हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर दिलों में नफ़रत पैदा किया जाय, जैसे झूठी शान और मर्यादा के नाम पर मानवता को रौंदा जाय और भी बहुत कुछ …………..यही न कहना चाहते हैं….आप……………!

Ajay Kumar Dubey के द्वारा
July 2, 2012

अनिल भाई नमस्कार, भाई जी….मऊ स्टेशन पर समोसे और पकोड़े बहुत बिकते हैं. आगे से ध्यान रखियेगा…. ट्रेन यहाँ ख़राब हो तो उसका आनंद लिया कीजियेगा…

    July 2, 2012

    सादर नमस्कार! इच्छा नहीं होती खाने की…………..हाँ….हाँ….हाँ..!

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
July 2, 2012

अच्छी विचारधारा वाली पोस्ट के लिए बधाई अनिल ‘अलीन ‘ जी ….यह सुख-दुःख परिस्थितियों से जुड़े हमारे इच्छाओं का परिणाम हैं.जब इस सफ़र में सुख और दुःख हैं ही नहीं तो इसे स्थायी बनाकर रोना और हँसना क्या? तो क्यों न इस जीवनरूपी सफ़र में आने वाले ठहराव और बेशकीमती समय को कुछ ऐसे कामों में लगाया जाय जो जिंदगी से बहुत करीब हो. भरोदिया जी ने समझाया आप ख़ुशी हुए सुख हुआ क्योंकि जो आप चाहते हैं वही कोई बोला या हुआ जब चीजें अपने मुवाफिक हो जाएँ सुख उपजता है …. उन्होंने कहाँ दिमाग से सिग्नल मिलते हैं जैसे वही बन जाता है कभी सुख कभी दुःख ….पर ऐसा नहीं है बंधू उस कुम्हार को अच्छे सिग्नल क्यों नही मिल जाते बरसात में ताकि सुखी हो जाए ?? क्यों आप या हम अच्छे अच्छे अहसास कर ख़ुशी नहीं रह लेते जीवन भर ….कभी दुखी हो खिन्न मन फिर क्रोध गुस्सा और न जाने क्या क्या …………… इस सफ़र में सुख दुःख है ही नहीं ये मिथ्या है ….सुख दुःख कोई पदार्थ नहीं है जो हमें दिखे ये हमारे अहसास हैं …..हम जैसा भोगते हैं वही अनुभव हमारा मष्तिष्क हमें कराता है …एक तरफ आप ही उदाहरण दे कर समझा रहे हैं की ये सब हैं आप इसे इच्छाओं का परिणाम बता रहे हैं ऐसा नहीं है ये परिस्थितिजन्य है और कोई कारक है इसका परिस्थितियाँ स्वतः पैदा होती हैं काल प्रभावी बाई बलशाली है और किसी के लिए ये लाभ दायक तो किसी के लिए हानिकारक हो जाता है एक ही कारक दो लोगों के लिए अलग है ये सत्य है एक के लिए दुःख दूजे के लिए यही i सुख बन जाता है , दो लोग साथ में पढ़ते हैं खाते हैं रहते हैं एक खुश हो जाता है कुछ बन जाता है दूजा कुछ सारे संसाधन सामान हों तब भी भिन्नता …कुछ तो है जो अलग अलग निर्देशित कर रहा है हमारे आप के लिए इन सब को …यदि नहीं तो क्यों हम नियंत्रित कर के समान नहीं हो जाते.. यदि इच्छाओं का परिणाम है तो आओ अच्छी इच्छा करना सब को कहें सब आज सुखी हो जाएँ ….हाँ सुख दुःख में समान रहने की चेष्टा कर सहना –झेलना सीख जाएँ हम तो कुछ बात बने …जैसे इंजेक्शन लगायें दर्द का दर्द तो होता है अहसास नहीं होता वही अनिल जी ………काल फिर अपनी स्थिति बदल देता है तब तक काल चक्र तो चलता रहता है ….. ये दुःख सुख और धुप छाँव यों ही होती रहेगी ………प्यारे दोस्त ……… सूखे दुखे समे कृत्वा लाभा लाभौ जया जयो ..आओ ऐसे बनें भ्रमर 5

    July 2, 2012

    सादर प्रणाम! आप अभी-तक सुख-दुःख में ही पड़े हुए हैं और पड़ा रहना चाहते हैं…अतः इसे समझना उतना ही मुश्किल हैं जितना की अँधेरी रात में किसी को सूरज को देखने का दावा करना……………..आप क्यों जबरदस्ती किसी बात को कहना चाहते हैं? ______________________________________________________________________ यहाँ सुखी और दुखी रहने की बात तो किया ही नहीं तो फिर आपकी बाते साडी अन्याय संगत हैं………..मैं मल्हार राग गा रहा हूँ तो आप राग भैरवी………….! यह क्या बचपना हैं…..? ______________________________________________________________________ “उस कुम्हार को अच्छे सिग्नल क्यों नही मिल जाते बरसात में ताकि सुखी हो जाए ?? ” क्योंकि वह अपने इच्छाओं और स्वार्थ से बंधा हैं…… ______________________________________________________________________ “परिस्थितियाँ स्वतः पैदा होती हैं काल प्रभावी बाई बलशाली है और किसी के लिए ये लाभ दायक तो किसी के लिए हानिकारक हो जाता है ” कुछ परिस्थितिया स्वतः पैदा होती हैं और कुछ पैदा की जाती हैं……यदि इच्छा हैं ही नहीं तो लाभदायक और हानिकारक होने का सवाल ही नहीं पैदा होता…..चाहें परिस्थितियां कैसी भी हो …… _______________________________________________________________________ “यदि इच्छाओं का परिणाम है तो आओ अच्छी इच्छा करना सब को कहें सब आज सुखी हो जाएँ…हाँ सुख दुःख में समान रहने की चेष्टा कर सहना –झेलना सीख जाएँ हम तो कुछ बात बने …जैसे इंजेक्शन लगायें दर्द का दर्द तो होता है अहसास नहीं होता वही अनिल जी ………” ………और हमारे इस इच्छा से यदि सभी सुखी नहीं हुए तो फिर क्या? दुःख होगा कि नहीं………..! आप अब भी वही राग अलाप रहे हैं…और यह इंजेक्शन एक्सपायरी डेट का हो तो फिर……दर्द बढ़ जाना असंभावी हैं…….क्यों? और मैं कहीं भी सुख और दुःख में रहने कीबात किया ही नहीं तो फिर आप सबको सुखी क्यों बनाना चाहते हैं………. _______________________________________________________________________. ‘काल फिर अपनी स्थिति बदल देता है तब तक काल चक्र तो चलता रहता है …’ कल अपनी सामान गति से चलता रहता हैं तो इसे स्थिति बदलने का सवाल ही कहाँ उठता यह सब हमारे सोच और इच्छाओं का परिणाम हैं………..यह दो बिन्दुओं का अन्तराल हैं जिसे हम असमानता का नाम देते हैं वरना …………….समय कभी असमान हो ही नहीं सकता …………………………………………………………………………………… आपके राधे-कृष्ण का कहीं जिक्र नहीं हुआ क्या बात हैं…………लगता हैं मुझे देखकर उनका दर्द बढ़ जाता हैं………….हाँ……हाँ……. ________________________________________________________________________

    bharodiya के द्वारा
    July 3, 2012

    भ्रमर भाई नमस्कार मैंने जो कहा वो सब मेरा ही कहा हुआ नही है । जो टेक्निकल बातें है वो प्रि-सायंस की किताबों की बात है । ११+४ के समय सब डिग्री का पहला साल प्रि- होता था आज १०+२+३ के जमाने में १२वीं कक्षा हो गई है । कुंभार वाली बात तो अनिल भाई ने समजा दी । और मेरी नीचे की टिप्प्णी में –अनुकुल बाते— लिखा है उस में बात का विस्तार कर दो । बात सिर्फ बोलने सुनने वाली बात नही है । आदमी के आसपास का पूरा परिवेश है । –काल का पहिया घुमें भैया —ये कवियों की कल्पना है । और माया संस्क्रुति का केलेंडर भी समय के पहिये पर था जो २१/१२/२०१२ खतम हो गया । उनके पहिये ने २१/१२/२०१२ को एक पूरा चक्र काट लिया । ईस तारिख के बाद मौजुदा ब्रह्मांड का नाश और नव निर्माण हो जाना चाहिए था पर नही हुआ । ज्यादा जानना हो तो ईस विषय का मेरा लेख पढ लो । –टाईम वेव थियरी —-कभी ये सच नही हुई और ईस के चक्करमें कई सटोरियों के घर बरबाद हो गये । —टाईम लाईन या समय की रेखा—- ये अबतक सही रही है । गोल गोल नही गुमती । गुजरा समय वापस नही आता है । जो गुजर गया वो गया, भूल जाओ । मेरा एक पात्र ईस लाईन को ले के कुदरत से उलज पडा था । धरती-पुत्र ;- हे मित्र, हम मानवियों ने एक “समय रेखा” बनाई है । अनंत से शुरु होती है अनंत पर खतम होती है । बिच में शून्य है जीसे हम वर्तमान कहते है, शून्य से माईनस साईड में भूतकाल है, प्लस साईड भविष्य है । भूतकाल की लाईन ईतनी लंबी है की उस के कोइ ना कोइ एक बिंदु पर आप का जनम हुआ होगा, आपने ये ब्रह्मांड रचाया होगा । और भविष्य लाईन भी ईतनी लंबी है की कोइ एक बिंदु पर आप ये ब्रह्मांड मिटा देंगे और खूद भी मिट जायेंगे । हम लोगों ने आप को भी समय के दायरे में ले लिया है । हमने साबित कर दिया “समय बडा बलवान” । कूदरत ;- अरे ओ चींटी, कुए के मेंढक, तालाब की मछली । जो चीज है ही नही उस से मुझे अपने दायरे में लेना चाहते हो ? अरे ओ महाबली, तू अपनी ही लाईन देख, जीरो पे खडा है । आधी सेकंड पिछे देखता है तो भूत है, आधी सेकंड आगे देखता है तो भविष्य है । तेरा वर्तमान किधर है । टर्निंग पोईंट है सिर्फ जीरो सेकंड का ? अगली एक सेकंड में तू जीएगा या मरेगा तूझे पता ही नही । धरती-पुत्र ;- मुझ पर गुस्सा करने से काम नही चलेगा,मित्र । आपको मुझे समजाना पडेगा सही क्या है । कुदरत ;- क्या सही क्या गलत तूम मानव ही तय कर लेते हो फिर मैं क्यों ? धरती-पुत्र ;- हम तो क्षण-जीवी जंतु है, हमारी बात छोडीये, अपनी कहें, विश्वास तो आप की बात का ही करुंगा । कुदरत ;- समय है ही नही तो ये समय रेखा नही है सिर्फ घटनाक्रम दर्ज करने का पैमाना मात्र है । घटनाये जो घटती है वो पूर्व घटना का परिणाम है । मैजुद घटना आनेवाली घाटना का बीज है । ईस में मेरा या समय का कोइ रोल नही है । धटनाओं पर तो किसीका अधिकार नही । मेरा या ब्रह्मांड का जन्म घटना ही तो थी । आप को कोइ घटना अच्छी नही लगती तो मुझे दोष देने दौडते हो, “ कुदरत का कहेर”, “कुदरत रुठ गई”, “कुदरत का खेल” । क्या मैं बच्चा हुं जो खेलने लगुं ? क्या मैं शैतान हुं जो कहेर करुं ? मुझे किस से रुठना है ? अब ये लंबा और विषयांतर हो जाता है रुकता हुं ।

yamunapathak के द्वारा
July 2, 2012

अनिलजी,आपका यह ब्लॉग बहुत सुन्दर लगा. शुक्रिया

    July 2, 2012

    सादर प्रणाम! अच्छा इसलिए लगा क्योंकि यह आपके सोच के अनुकूल होगा वरना…………अच्छा-बुरा का यहाँ सवाल ही कहाँ…..आइये इससे कुछ हटकर सोचे…………

munish के द्वारा
July 2, 2012

अनिल जी नमस्कार मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया हर फिक्र को धुयें में उड़ाता चला गया……….! आप यहाँ तो काफी दार्शनिक वाले अंदाज में हैं ……. ये चन्दन जी वाले ब्लॉग पर क्या हो गया था ……. हाहाहा :)

    July 2, 2012

    नकाब पहनकर कभी रूबरू न होना ऐ अलीन, मैं एक शीशा हूँ और शीशा झूठ नहीं बोलता……………

Santosh Kumar के द्वारा
July 2, 2012

अनिल जी ,..सादर नमस्कार बहुत सुन्दर विचारशीलता आपकी ,..एक ही कारक दोनो अनुभूतियाँ दे सकता है ,..जैसा की आपने पहले भी कहा है और यही सच है की सुख दुःख हमारे अन्दर उपजते हैं कहीं बाहर नहीं,..लेकिन इसबात से इनकार करता हूँ की सुख दुःख नाम की चीज इस संसार में नहीं है ,..वो है और हमेशा रहेगी हालांकि प्रत्येक व्यक्ति के लिए इसकी परिभाषा और महत्त्व अलग होता है ,..कभी कभी एक की बुनियाद पर दुसरे की इमारत बनती है ,.. मित्र ,..इच्छाओं से परे जाना भी एक इच्छा का ही परिणाम होता है ,..जो सुख सेवा में मिलता है वो अन्यत्र कहीं नहीं मिल सकता है ,..बढ़िया पोस्ट के लिए haardik बधाई और शुभकामनाये ,..साभार

    July 2, 2012

    सादर प्रणाम! इच्छा तभी होगी जब हमें किसी भौतिकता की चाह होगी और और जहाँ भौतिकता है वहां परिणाम तो होना निश्चित हैं……….पर जहाँ इच्छा है ही नहीं वहां भौतिकता की चाह हो ही न सकता . जब भौतिकता है ही नहीं तो तो परिणाम उठाने का सवाल ही नहीं उठता…..इस प्रकार………… इच्छाओं से परे जाना इच्छा का ही परिणाम हो ही नहीं सकता……….!

jlsingh के द्वारा
July 2, 2012

प्रिय अनिल जी, सादर! बाबा का प्रवचन चलता रहे तो ट्रेन लेट होने से भी समय आराम से कट जाता है नहीं… जिन्दगी एक सफ़र है सुहाना, यहाँ कल क्या हो किसने जाना! यूं ही कट जायेगी जिन्दगी साथ चलते चलते….. अगर ट्रेन इस वजह से लेट हो, क्योंकि नक्सलियों ने पटरियां उड़ा दी है और ‘वे’ (नक्सली) बोगियों में चहल-कदमी कर रहे हों…… जरा सोच कर देखिये!

    July 2, 2012

    सादर प्रणाम! तो ऐसे में अपनी चिंता छोड़कर उनके बारे में सोचिये जो आपके सहयात्री हैं………….डरे हुए हैं और सहमे भी………..!क्यों न उन्हें हौशला दिया जाय…………………फिर नक्सलवादी भी तो आदमी ही हैं…………..बस अंतर इतना हैं कि हम व्यवस्था के अन्दर रहकर व्यवस्था तोड़ते हैं और वो व्यवस्था के बाहर जाकर व्यवस्था तोड़ते हैं……………

akraktale के द्वारा
July 1, 2012

प्रिय अनिल जी नमस्कार, आपके आलेख लिखने का उद्देश्य बहुत अच्छा था किन्तु आपके आलेख की भूमिका सराहनीय नहीं कही जा सकती क्योंकि इसमें विरोधाभास आपके लिखे इस वाक्य से साफ़ झलकता है.”हकीकत तो यह है कि संसार में सुख-दुःख जैसी कोई चीज है ही नहीं. यदि परिस्थिति हमारे अनुकूल है तो सुख वरना दुःख. इस प्रकार सुख-दुःख न ही स्थायी है और न ही समानान्तर.” मेरा तो स्पष्ट मानना है की संसार में सुख और दुःख दोनों मौजूद हैं. मगर सुख दुःख सबके अपने होते हैं हाँ ये हो सकता है की आपका सुख मेरा ना हो और मेरा दुःख आपका ना हो. जीवन एक सफ़र ही तो है और मै आपकी बातों से पूरी तरह सहमत हूँ की जीवन सफ़र में हम किसी की भलाई के लिए जो भी कर सकते हैं जरूर ही करना चाहिए यह किसी के लिए संतोष की बात हो सकती है और हमारे लिए सुकून की. यह सब सफ़र में ही करना है किसी ठहराव का इन्तजार नहीं करना है. आपके मन में आयी इस सुन्दर भावना के लिए आपकी मानवता के लिए. आभार.

    July 1, 2012

    सादर प्रणाम! क्या संसार में सूरज, चाँद, पृथ्वी अपने हैं …….नहीं न…………. बल्कि सबके हैं और सबके लिए मौजूद हैं. मेरे कहने का मतलब जो अपना है सिर्फ अपना है संसार का नहीं हो सकता. आपका सुख- दुःख संसार का सुख-दुःख नहीं हो सकता …………………तो फिर कैसे हम कह सकते हैं कि यह संसार में हैं…………………….

    bharodiya के द्वारा
    July 2, 2012

    दुख या सुख कोई पदार्थ नही जो जमीन पर हो और कीसी को लग जाये । संसार में तो क्या प्राणी के अंदर भी नही है । जीसे हम दुख सुख समजते वो हर प्राणी के दिमाग के एक छोटे से खाने में उत्पन्न हुआ एहसास मात्र है । और ये एहसास ईन्द्रियो द्वारा भेजे गये संदेश( आंदोलन ) द्वारा उत्पन्न होता है । नीम का पत्ता खा लिया तो तकलिफ या दुख का एहसास । कान द्वारा आते संगीत के सुर के आंदोलन सुख पहुचाता है , भैंसासुर दुख पहुंचाता है । रोते हुए बालक को उठा कर एक लय से उसे हिलाते हैं तो जो आंदोलन उस के दिमाग तक जाता है वो उसे सुकुन दिलाता है । वो शान्त हो जाता है या सो जाता है । काम क्रिडा तो शुध्ध आंदोलन ही है, ज्यादा बताने की जरूरत नही । आदमी नाम के प्राणी में उस के दिमाग के मेमरी विभाग में छुपी पूरानी यादें, ईच्छा, उस की मानसिकता भी असर करती है । कोइ बात सामने आती है तो दिमाग का विस्लेषण विभाग ईस बात को मेमरी मे रही बातों से तुलना करता है । और उस के अनुसार सिगनल भेज देता है सुख दुख विभाग को । तो ये एहसास टेमपररी है । पोजिटिव सिगनल मिलता रहता है तब तक सुख होता है । सिगनल नेगेटीव मिलता है तब दुख होता है । ये लो चलता ही रहेगा । क्यों की आदमी के सामने अनुकुल बाते आती रहे वो संभव नही ।

    July 2, 2012

    जी, सही कहा आपने…………………..

ajay kumar pandey के द्वारा
July 1, 2012

अलीन भैया नमन सही कहते हैं सफ़र में reservation होना चाहिए में शादी से देहरादून से दिल्ली रेल से नहीं आया में बस से दिल्ली आया और deluxe बस से आया बहुत मजा आया शादी में सभी बड़े लोगो से आपके बारे में चर्चा हुई और आपका लिंक भी बताया है उम्मीद है सभी लोग आपके लेख जरुर पढेंगे में शादी से थककर आया था अब थकान दूर हुई है तो ब्लॉग पर आया हूँ धन्यवाद

    July 1, 2012

    आप का तो प्रवचन ही कुछ और होता हैं…………………कभी जनरल बोगी, और साधारण बस में यात्रा करिए तब आपको पता चलेगा की जिंदगी क्या होती हैं……………….पैर जमीं पर रखिये आकाश में नहीं तब जा के एक अच्छा पत्रकार बन पाएंगे वरना यदि पतंग बनाने की कोशिश करेंगे तो कोई काट देगा…………….

sinsera के द्वारा
July 1, 2012

अनिल जी बहुत अच्छी फिलोसफी है.. …. जिस तरह नींद ठीक से न आती हो तो ऊटपटांग सपने आते हैं उसी तरह सफ़र में अच्छी सीट न मिलने पर ऐसे ही …….विचार आते हैं .आगे से जल्दीबाज़ी में कोई यात्रा न करियेगा ताकि रिज़र्वेशन रहे और आप की यात्रा आराम से कटे… आप की आगे की यात्रा के लिए शुभकामनाएं ….

    July 1, 2012

    सादर प्रणाम, काली मैया! यदि जिंदगी के फिलोसफी को समझना है काली मैया जी तो रिज़र्वेशन की बजाय साधारण बोगी में सफ़र कीजिये. किसी का इंतजार महलों में करने के बजाय ठंडी रात में प्लेटफोर्म पर कीजिये, किसी के दर्शन की चाहत लिए हुए आग की तरह तपते फर्श पर रात भर बिता कर देखिये…….कभी दूसरों को समझना हैं तो खुद को भुलाकर देखिये…………..लगता है ………..आप तो सच में गंभीर. अरे दी, टेंशन मत लीजिये…………मैं तो मजाक कर रहा था और पूरी जिंदगी मजाक में ही बिताता हूँ पर औरों की नज़र में यह गंभीर हो जाता हैं तो इसमें मेरी क्या खता………….लगता है आप फिर गंभीर हो गयी. हे भगवन ! आपका तो ऊपर वाला ही मालिक है…………चलिए जल्दी से चाय उठाइए वरना ठंडी हो जाएगी………………

    sinsera के द्वारा
    July 2, 2012

    अनिल जी, अप मजाक मजाक में ही कुछ गंभीर बात कह गए.. अगर कोई किसी के इंतजार में तपते फर्श पर रात बिताता है तो आप शायद नहीं जानते कि उसका निशान फर्श पर न छूट कर कहीं और ही रह जाता है…खैर….एहसास तो एहसास ही है,कोई महल में हो या सड़क पर, इससे फर्क नहीं पड़ता..

    July 2, 2012

    बस इसी से निकलने की तो बात कर रहा हूँ……………..! यहाँ इच्छाओं से परे जाने की बात कह रहा हूँ और आप को अपनी सीट और रिज़र्वेशन की पड़ी हैं…………वही बात कि जहाज का पक्षी…………………………..! एहसास शब्द इसी लिए उपयोग किया ताकि मैं अपनी बात को सिद्ध कर सकू………….जबकि हकीकत तो यह है कि जहाँ दुःख और सुख होगा वहां एहसास होना संभावी हैं………….ऐसे में हमें खुद को भुलाना ही होगा वरना दाग तो कहीं और पड़ेगे ही …………….इस संसार में, सुख और दुःख से भी बहुत कुछ हैं क्यों न उसकी तलाश किया जाय ………………..और यदि हमें लगता हैं कि उसकी तलाश में कहीं भी कोई एहसास है तो समझ जाना चाहिए कि हम अपने सुख-दुःख से नहीं निकल पाए हैं……… मतलब इच्छाओं से परे नहीं जा पायें हैं……….मतलब स्वार्थ ही स्वार्थ…………………….. गंभीरता…………….और जहाँ गंभीरता हो वहां जीवन तो बनावटी फूल की तरह हैं…………!

अजय कुमार झा के द्वारा
July 1, 2012

वाह क्या खूब बयां किया आपने जिंदगी के दोनों पहलुओं को ।

    July 1, 2012

    जी, स्वागत है आपके विचारों का…….! पर जिंदगी के तो कई पहलू हैं वशर्ते कि हम उसे विकसित करना चाहें…………..PURI जिंदगी को सुख और दुःख का नाम देना, मेरे हिशाब से जिंदगी के साथ बेईमानी होगी……………


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