साधना के पथ पर

अद्य की स्याही

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मसीहा मोहब्बत का

Posted On: 7 Jul, 2012 Others,न्यूज़ बर्थ में

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मोहब्बत का मसीहा वीराने में,
ज़िन्दगी से थका,
हारा,
सो रहा था,
लम्बी नींद में,
वह
मसीहा,

मोहब्ब्बत का ,
मोहब्बत में,
जाने किसके.

वह विराना,
जो गवाह है,
चंद चीखों
और सैकड़ों प्रहारों के,
जो पड़े थे कभी,
ख़ामोशी पे जिसके.

सर कुचलने वाले,
अपनी बदसलूकी
और बेरहमी पर,
सर झुकाए,
खड़े थे,
आगे जिसके,
गवाह थे,
बेगुनाह होने के उसके.

मोहब्बत का मसीहा

 

वह,

रात की ख़ामोशी,
जीने की चाह,
पर दर्द भरी आह,
आह,
जिसे सुनकर,
सितारे भी,
अश्क बहाए,
नभ के.

दुआएं,
लाखों लबों की,
कुबूल होती वहाँ,
जहाँ पड़ी,
एक अधूरी दुआ,
लब पे जिसके.

यक़ीनन,
जिंदगी से,
वो नहीं,
बल्कि जिंदगी,
हारी उससे,
अबतलक,
पूरी कायनात,
दोषी है जिसके.




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45 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
January 18, 2014

सघन भावपूर्ण कविता , अलीन जी बधाई !

aman kumar के द्वारा
January 15, 2014

लगता है कही कोई ज्वाला मुखी है जो फटता नही है रिसता रहता है …..आपके लेखन मे !

sadguruji के द्वारा
January 13, 2014

यक़ीनन, जिंदगी से, वो नहीं, बल्कि जिंदगी, हारी उससे, अबतलक, पूरी कायनात, दोषी है जिसके.अच्छी कविता.दस साल पुरानी कविता लेकिन आज भी नई और प्रासंगिक.बधाई.

harirawat के द्वारा
January 10, 2014

अनिलकुमार जी, मसीहा मोहब्बत का ‘या जल्हाद दो जख का ! सुन्दर कविता ! साधुवाद हरेन्द्र जागते रहो

    January 11, 2014

    हाँ………………हाँ………………. हमने तमाम उम्र अकेले सफ़र किया हमपर किसी ख़ुदा की इनायत नहीं रही

yogi sarswat के द्वारा
January 10, 2014

वाह ! क्या बात है

abhishek shukla के द्वारा
January 9, 2014

दर्द भी क्या खूब है हौले-हौले कई दास्ताँ बन पड़ते हैं…जुबान खोलने कि देर होती है बस…..ऐ मोहब्बत तू जिंदाबाद….

    January 11, 2014

    न जिस्म कोई, न दिल न आँखें, मगर ये जादूगरी तो देखो, हर एक शै में धड़क रहा है, हर एक मंज़र से झाँकता है।

ranjanagupta के द्वारा
January 9, 2014

बहुत बहुत बधाई ,अलिंन जी आपके सीने में दर्द का ऐसा तूफान है जो रचना को एक ऐसी आद्रता प्रदान करता है ,कि दुसरो का मन भी आहत हो जाये !!आभार्र !!!

Madan Mohan saxena के द्वारा
January 9, 2014

मन मोहक कबिता सदर मदन

Mohinder Kumar के द्वारा
January 9, 2014

सुंदर भावअभिव्यक्ति…… मन की पीडा का सुंदरता से उकेरा है 

    January 9, 2014

    जी शुक्रिया…………………………………यह सिर्फ मन की पीड़ा नहीं बल्कि यथार्थ भी है जिसका शिकार आये दिन बहुत से युवा हो रहे हैं……………

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
October 30, 2012

priy nati shree, sasneh वह, रात की ख़ामोशी, जीने की चाह, पर दर्द भरी आह, आह, जिसे सुनकर, सितारे भी, अश्क बहाए, नभ के sundar, badhai

    October 30, 2012

    सादर चरण स्पर्श, नाना जी…………………….हार्दिक आभार…………………

yamunapathak के द्वारा
September 14, 2012

बहुत करुण भाव हैं अनिल जी.

yogi sarswat के द्वारा
July 10, 2012

वह, रात की ख़ामोशी, जीने की चाह, पर दर्द भरी आह, आह, जिसे सुनकर, सितारे भी, अश्क बहाए, नभ के. क्या गज़ब का लिखते हो भाई ! वाह , सुन्दर अभिव्यक्ति !

    September 14, 2012

    सुस्वागतम……………….. हम जब भी दर्द-ए-जहाँ में होते हैं…………….लोग हसकर कहते हैं…………..” क्या बात है”…………………. हार्दिक आभार!…..

rekhafbd के द्वारा
July 10, 2012

आदरनीय अनिल जीयक़ीनन, जिंदगी से, वो नहीं, बल्कि जिंदगी, हारी उससे, अबतलक, पूरी कायनात, दोषी है जिसके,अति सुंदर अभिव्यक्ति ,बधाई

    September 14, 2012

    सुस्वागतम……………….. हम जब भी दर्द-ए-जहाँ में होते हैं…………….लोग हसकर कहते हैं…………..” क्या बात है”…………………. हार्दिक आभार!

Mohinder Kumar के द्वारा
July 10, 2012

अनिल जी, खूबसूरत ख्यालात का मुजाहिरा किया है आपने अपनी रचना में. मेरे शब्दों में. तेरी मुहब्बत में ये जिन्दगी लुटाई मैंने दर्द, अश्क, तन्हाई बदले में है पाई मैंने

July 10, 2012

प्यार अगर थामता न पथ में उंगली इस बीमार उम्र की हर पीड़ा वैश्य बन जाती, हर आँसू आवारा होता ! मन तो मौसम सा चंचल है सबका होकर भी न किसी का अभी सुबह का, अभी शाम का, अभी रुदन का, अभी हंसी का और इस भौरे की गलती क्षमा न यदि ममता कर देती ईश्वर तक अपराधी होता पूरा खेल दुबारा होता! प्यार अगर थामता न पथ में उंगली इस बीमार उम्र की ++++++++++++++++++++++++++++++++++++++ जीवन क्या हैं एक बात जो इतनी सिर्फ समझ में आये- कहे इसे वह भी पछताए सुने इसे वह भी पछताए मगर यही अनबुझ पहेली शिशु सी सरल सहज बन जाती अगर तर्क को छोड़ भावना के संग किया गुजारा होता प्यार अगर थामता न पथ में उंगली इस बीमार उम्र की ++++++++++++++++++++++++++++++++++++ जाने कैसा अजब शहर यह कैसा अजब मुसाफिरखाना भीतर से लगता पहचाना बाहर से दीखता अनजाना जब भी यहाँ ठहरने आता, एक प्रश्न उठता है मन में कैसा होता विश्व कहीं यदि कोई नहीं किवारा होता प्यार अगर थामता न पथ में उंगली इस बीमार उम्र की +++++++++++++++++++++++++++++++++++ हर घर आँगन रंग मंच है औ’ हर एक साँस कठपुतली प्यार सिर्फ वह डोर कि जिसपर नाचे बादल, नाचे बिजली तुम चाहे विश्वास न लाओ, लेकिन मैं तो यह कहूँगा प्यार न होता धरती पर तो सारा जग बंजारा होता…..! गोपालदास ‘ नीरज’

akraktale के द्वारा
July 9, 2012

प्रिय अनिल जी नमस्कार, सर कुचलने वाले, अपनी बदसलूकी और बेरहमी पर, सर झुकाए, खड़े थे, आगे जिसके, गवाह थे, बेगुनाह होने के उसके. एक अच्छी रचना की प्रस्तुति के लिए बधाई.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
July 8, 2012

bahut khoob. badhai.

Rajkamal Sharma के द्वारा
July 8, 2012

राजकमल उर्फ कसाई जी , आपका आभार प्रकट करने के लिए मेरे पास फंड की बेहद कमी हो गई है जल्द ही लोन के लिए अप्लाई करके + अरेंज करके आपका कर्ज चुकता करने की पुरजोर कोशिश करता हूँ – अलीन कुमार अनिल :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| ( जहाँ तक मेरी जानकारी है , जागरण जंक्शन कायनात में नहीं आता इस लिए सभी ब्लागरो को मैं निर्दोषता का प्रमाणपत्र प्रदान करता हूँ -* उत्तम रचना !!! ) जय बोलो भगवान शंकर महादेव महाराज जी की सदाशिव जी की

jlsingh के द्वारा
July 8, 2012

प्रिय अनिल जी, सादर! कविता नयी है या डायरी के पन्नो से उड़ेली गयी है …. जिज्ञाषा वश पूछ रहा हूँ! प्रशंशा के लिए शब्द नहीं हैं मेरे पास. नीचे विद्वानों ने अपनी भावना प्रकट कर दी है … बस!

    July 8, 2012

    सादर प्रणाम! जी, आपकी जिज्ञासा अकारण नहीं है, मैं समझ सकता हूँ क्योंकि जिस तरह से इस समय मेरी सोच जा रही हैं. यह रचना बिलकुल इससे हटकर है…………….. यह मेरी पुराणी रचना ही है………………..जो 17/02/2004 को लिखा था मैं ………

dineshaastik के द्वारा
July 7, 2012

शब्दों में अपनी पीड़ा को तुमने अनिल उड़ेला है। पीड़ा का तो यहाँ लगाया तुमने कोई मेला है। पीड़ा के जो भूल खिलाये, सुन्दर भी औ खुश्बू भी; पढ़करके बैचेन हुआ मैं तुमने कैसे झेला है।।

    July 8, 2012

    सादर प्रणाम! यह सिर्फ मेरी समस्या नहीं बल्कि मेरे जैसे तमाम लोगो की हैं जो जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं या फिर कब्र में निश्चिन्त होकर सो रहे हैं…………मेरे साथ तो अभी इतना कुछ हुआ ही कहा हैं………….आप मेरी चिंता छोडिये ……….बस काम पर लगिए………….!

    dineshaastik के द्वारा
    July 9, 2012

    भूल को भूल पढ़ने की भूल न करे, कृपया आप  फूल पढ़े।  भूल से फूल को भूल लिख गया। आप ऐसी भूल न करें।।

    July 9, 2012

    मैंने तो उसे फूल ही पढ़ा था…..जब आप बताये तब ध्यान आ कि यह भूल है…………….हा….हा…हा…!

ajay kumar pandey के द्वारा
July 7, 2012

अनिल भैया नमन आप तो अभी से हार मानने लग गए हो आपको आपकी प्रेमिका जरुर प्राप्त होगी ऐसा मेरा मानना है भगवान् आपकी प्रार्थना जरुर सुनेगा ऐसा मेरा मानना है आप शिवजी का व्रत कर लो सावन के सोमवार का मुझे लगता है की आपको प्रेमिका जरुर प्राप्त होगी धन्यवाद

    July 8, 2012

    भाई जी, प्रेमी और प्रेमिका……बहुत बड़े शब्द हैं …….और वो हम दोनों नहीं हैं………..मैं बस अनिल हूँ और वो मेरी अनजानी ………….इसके सिवा कुछ नहीं…………! एक बार आपको बताया था कि स्वार्थ और मान्यता से परे हैं…अतः जिससे हम स्वार्थ वश जुड़े हैं वो इश्वर हो ही नहीं सकता…………… अतः आप इस विचारधारा से ऊपर उठिए …………..और अपना चिंतन विकसित करिए इश्वर को जानने और समझने में ……………..सुनी-सुनाई बातों की अपेक्षा अपना दिमाग इस्तेमाल करिए …………….

Ajay Kumar Dubey के द्वारा
July 7, 2012

यह क्या हो गया प्यारे….हार मान ली….ऊपर से खुद को तसल्ली देते हो… यक़ीनन, जिंदगी से, वो नहीं, बल्कि जिंदगी, हारी उससे, अबतलक, पूरी कायनात, दोषी है जिसके. दोस्त… हौसला रखो……सब्र करो… मुहब्बत के इम्तिहां और भी हैं….. इस ज़ालिम दुनिया के आगे, जहाँ और भी हैं…. वैसे जब भी दिल से लिखते हो, लाजबाब लिखते हो….. बहुत दिनों बाद एक शानदार प्रस्तुति हमारे सामने पेश की.. आभार…..

    July 8, 2012

    भैया जी, बहुत पुरानी रचना है……………अब तो मेरे पास दिल रहा ही नहीं ………………क्या खाक दिल से लिखूंगा………….?

Chandan rai के द्वारा
July 7, 2012

अलीन मित्र , इक इक शब्द अपना सीना चिर जैसे उसमे से दर्द निकाल रोप रहा है मेरी ही आँखों और सिने में , हर शब्द पुरे प्रयास से कविता के स्तर को जागरण के नभमंडल पर किसी ध्रुव तारे की तरह चमका रहा है बेहद बेहतरीन निशब्द करती रचना !

    July 8, 2012

    चन्दन जी, यही तो हमारे समाज का दुर्भाग्य है कि प्रेम कहानिया किताबों और गीतों में बहुत अच्छी लगती हैं………..पर असल जिंदगी में …यह एक गुनाह……… एक ऐसा गुनाह जिसकी सजा के रूप में …बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ती हैं……………… और हाँ यह दर्द को रोपने के लिए नहीं लिखा गया है बल्कि समस्या को उठाने के लिए लिखा गया है………जिसमे आप जैसे साथियों का साथ अपेक्षित हैं………….


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