साधना के पथ पर

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मुझ जैसा गुरु या फिर गुरु जैसा मैं……2

Posted On: 26 Oct, 2012 Others,न्यूज़ बर्थ में

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मुझ जैसा गुरु या फिर गुरु जैसा मैं……2आइये अब कुछ बात करते हैं कुछ घटनाओं की जिसके माध्यम से गुरु के घटित होने की घटना आसानी से समझी जा सकती है. उम्मीद करता हूँ की आपके अन्दर उठने वाले सवालों और फिर उनके जवाबों की तलाश से………….मेरा यह आलेख सार्थक रूप ले पायेगा……….
शुरुवात करना चाहूँगा माँ के गर्भ से जिसमे जीवन का एक अंकुर फूटता है , पोषण पाता है और एक दिन हमारे बीच जन्म लेता है. क्या यहाँ गुरु के घटित होने से इनकार कर सकते हैं ? जहाँ एक अदृश्य व्यवस्था के अंतर्गत माँ के गर्भ में अंकुर फूटता है और एक दिन वो माँ के गर्भ से बहार निकलता है और एक सम्पूर्ण वृक्ष का रूप धारण करता है. क्या यह किसी एक विशेष गुरु की देन है? यदि सचमुच ऐसा ही है तो.क्या वो गुरु हमारे स्वार्थ, सत्ता और वर्चस्व को उद्देलित करने वाले मन की ऊपज है या फिर वो हमारे अंतः मन में निहित वो परम शक्ति है जिसका हमारे मानसिक प्रवृतियों से कोई सम्बन्ध नहीं या फिर वो हमारे आस-पास घटित होने वाली घटनाओं से ऊपजा एक सीख है. प्रथम बिंदु कि बात करे अर्थात स्वार्थ, सत्ता और वर्चस्व वश किसी को गुरु बनाने की तो निश्चय ही हास्यप्रद, मूर्खतापूर्ण और एक बेईमानी है. दूसरा बिंदु अर्थात अंतः मन में निहित अदृश्य, अतुल्य और अलौकिक परमशक्ति जिससे अन्दर और बाहर की घटायें नियंत्रित होती है, की बात करना मेरे सोच और समझ दोनों के बाहर है…हो सकता है उसे आप मुझसे बेहतर समझते हो. अतः मैं बात करना चाहूँगा तीसरे बिंदु पर जो हमारे आस-पास घटित होती रहती परन्तु उसका सच और झूठ से कोई सम्बन्ध नहीं बल्कि हमारी यह मानसिक स्थिति पर निर्भर करता है कि किस घटना को कैसे लेते है. एक बच्चा जो अभी खड़ा होना सीख रहा है…गिरता है संभलता है…..तो क्या हम उस पत्थर के गुरु होने से इनकार करेंगे जिससे वो ठोकर खाकर संभलना सीखता है. उसका पहली बार दीपक से जलना और फिर उससे दूर जाना क्या गुरु के घटित होने कि घटना नहीं है?
अपनी बात एक उदहारण से स्पष्ट करना चाहूँगा. एक शराबी का गुरु शराब बनाने वाला बन जाता है और एक साधू का गुरु शराब से दूर करने वाला. मगर इनमे से किसी एक को सच्चा और दुसरे को झूठा कहना निश्चय ही यह हमारा स्वार्थ और स्वभाववश है. क्या हम इस शराब को गुरु कहने से इंकार करेंगे जिसका प्रभाव एक शराबी के ऊपर देखकर अलग-अलग व्यक्तियों पर अलग-अलग पड़ता है? मेरे कहने का मतलब यह है की सिर्फ राम सच्चा गुरु है रावण नहीं, कहना एक बेईमानी और मुर्खता होगी क्योंकि निश्चय ही गुरु सच और झूठ से परे है. आपके बीच एक छोटी सी कहानी रखना चाहूँगा जिसे विद्यार्थी जीवन के दौरान हमारे एक परम आदरणीय गुरु श्री मनीष चतुर्वेदी जी सुनाया करते थे. एक शराबी के दो बेटे थे जो अक्सर अपने बाप को शराब के नशे में माँ को मारते-पीटते देखा करते थे. इस घटना को देखकर एक सोचता था कि शराब बहुत बुरी चीज है क्योंकि इसे पीने के बाद आदमी होश में नहीं रहता कि वो क्या कर रहा है. दूसरा सोचता था कि बड़ी ही मजेदार चीज है पीने के बाद आदमी क्या चौके-छक्के लगाता है. वो समय भी आता है जब दोनों बड़े होते है और वैसा ही बनते है जैसा वो सोचा करते थे. एक घटना का दो अलग व्यक्तियों पर अलग-अलग प्रभाव यह दर्शाता है कि गुरु सच्चा और झूठा नहीं होता………..या तो वो सिर्फ सच्चा होता है या सिर्फ झूठा या फिर गुरु के घटित होने कि घटना सच और झूठ से परे है………….

नोट:- कृपया इस आलेख को पढ़ने से पहिले इसका प्रथम भाग पढ़ना चाहें………….मुझ जैसा गुरु या फिर गुरु जैसा मैं……१

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26 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

smtpushpapandey के द्वारा
December 29, 2012

बेटा अनिल तुमने जो प्रतिक्रिया दी उसका आभार तुम्हें और तुम्हारी बीवी अंजना को आने वाला नया साल बहुत बहुत मुबारक हो आने वाला नया साल तुम दोनों के जीवन में खुशियाँ लेकर आये इन्ही कामनाओं के साथ धन्यवाद तुम्हारी मात्र तुल्य श्रीमती पुष्पा पाण्डेय

ajay kumar pandey के द्वारा
December 20, 2012

अनिल भैया नमन आपने समर्थन दिया उसका आभार मैंने अभी तो बस सिर्फ यह लेख लिखा ही है मेरा मकसद दिल्ली को आपराधिक राजधानी होने से बचाना है मैंने अभी बस इस हकीकत को खोला है जब सरकार अमल करेगी और पुलिस को सुधारेगी न्याय प्रणाली सुद्रढ़ करेगी तभी यह दर्द दवा तक पहुचेगा आपने समर्थन दिया उसका हार्दिक धन्यवाद ऐसे ही मेरी लेखनी पर उत्साह बढ़ाते रहिये और मेरी कलम को आशीर्वाद दीजिये तभी यह लेखन सार्थक होगा आपका आभार धन्यवाद

rekhafbd के द्वारा
November 5, 2012

आदरणीय अनिल जी ,हमारे जीवन में अनेक घटनाएँ घटती रहती है ,और हर घटना से हमे कुछ न कुछ सिखने को मिलता रहता है ,बढ़िया आलेख और सुंदर प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई

pritish1 के द्वारा
October 30, 2012

अपने मन के विचार सहजता से लिखना कोई आपसे सीखे ॐ……….. प्रीतीश http://pritish1.jagranjunction.com/2012/10/28/bharat-ka-swarnim-atit/

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
October 30, 2012

priya nati shree , sasneh जिससे भी साद ज्ञान की प्राप्ति हो वो ही गुरु है. बधाई, विचारों से अवगत करने हेतु.

    October 30, 2012

    सादर चरण स्पर्श, नाना जी…..! जी, ऐसा कुछ भी नहीं है………..समाज में व्याप्त, सच्चा और झूठा गुरु की मान्यता और उसके कारण पर प्रकाश डाला हूँ……………मैं किसी भी ऐसे निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा हूँ जैसा की आप मेरे इस आलेख को पढ़ने के बाद व्यक्त किया है…………….हाँ इतना जरुर कहना चाहूँगा कि यदि ज्ञान देने वाला ही गुरु है तो संसार कि हरेक चीज और घटना गुरु है, वो चाहें अच्छी हो या बुरी हो……………..क्योंकि संसार की हरेक चीज और घटना ज्ञान की स्रोत है……..यदि ऐसे में हम किसी एक पर विचारों को स्थायी करके उसे श्रेष्ठ कहने लगे या पूजने लगे तो निश्चय ही हम उस परमपिता परमेश्वर की बाकि चीजों को तिरस्कृत कर रहे हैं……………ऐसे में यह हमारी प्रवृति हमारी मुर्खता और अज्ञानता की द्योतक है…………..आपका प्यार और आशीर्वाद मिला…………..हार्दिक आभार………..!

October 30, 2012

अनिल जी बहुत ही अच्छी प्रस्तुति सार्थक आलेख की बधाई ,,,,,,,,,,,,,

yogi sarswat के द्वारा
October 30, 2012

एक शराबी के दो बेटे थे जो अक्सर अपने बाप को शराब के नशे में माँ को मारते-पीटते देखा करते थे. इस घटना को देखकर एक सोचता था कि शराब बहुत बुरी चीज है क्योंकि इसे पीने के बाद आदमी होश में नहीं रहता कि वो क्या कर रहा है. दूसरा सोचता था कि बड़ी ही मजेदार चीज है पीने के बाद आदमी क्या चौके-छक्के लगाता है. वो समय भी आता है जब दोनों बड़े होते है और वैसा ही बनते है जैसा वो सोचा करते थे. एक घटना का दो अलग व्यक्तियों पर अलग-अलग प्रभाव यह दर्शाता है कि गुरु सच्चा और झूठा नहीं होता………..या तो वो सिर्फ सच्चा होता है या सिर्फ झूठा या फिर गुरु के घटित होने कि घटना सच और झूठ से परे है…………. आपने जो उदहारण दिया है मित्रवर अलीन जी , सार्थक बात कहता है ! जैसा हम सोचते हैं , हमेशा तो नहीं किन्तु अधिकांशतः हम वैसे ही बनते हैं ! बहुत प्रभावी लेखन ! शादी के बाद तो आपके लेखन में दिनोदिन निखार आ रहा है , हहाआआआआआ

Santosh Kumar के द्वारा
October 30, 2012

श्री अनिल जी ,..सादर अभिवादन आपका चिंतन उच्चकोटि का होता है ,…मूरख बुद्धि से गुरु का अर्थ समझ आता है ,..बहुत भारी/सबसे भारी /जो नीचे बनाये रखे ,..गुरु का घटित होना या सच्चा झूठा होना समझ नहीं आ सकता ,……..”"गुरु के घटित होने कि घटना सच और झूठ से परे है…………. “”..निःसंदेह सहमत हूँ !……..आप चिंतन शिखर को छुवें यही कामना है ….हार्दिक आभार और ढेरों शुभकामनाएं

    October 30, 2012

    सादर प्रणाम! ………………………..आखिर गुरु को समझने की आवश्यकता ही क्यों…………………जबकि यह सीमाओं और संबंधों से मुक्त है तो फिर क्या हम पूरी प्रकृति को धन्यवाद नहीं दे सकते?, क्या उसके हम आभारी नहीं हो सकते? क्या समझने और समझाने से मुड़कर ….चिंतन की तरफ अग्रसर नहीं हो सकते………………..

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
October 29, 2012

कुछ बातें ऐसी हैं जो स्वभावतः प्रकीर्तितित हैं unmen गुरु की कोई आवश्यकता नहीं होती | सत्य और असत्य दोनों ही शाश्वत हैं | निश्चय ही aap का चिंतन पराकाष्ठा की उन ऊँचाइयों par है जहां से मनन-मंथन और गुणन की प्रक्रिया प्रारम्भ होती है ! साधुवाद !! अलीन जी !

    October 30, 2012

    सादर प्रणाम! ……………………..गुरु की आवश्यकता यह दर्शाती है कि ……………..गुरु का होना हमरी स्वार्थ की उपक है…………पर गुरु का हमारे विश्वास और स्वार्थ से कोई लेनादेना नहीं…………..आपके अमूल्य विचारों और प्रतिक्रियाओं का सदैव ……..सुस्वागतम……………….हार्दिक आभार……!

yatindranathchaturvedi के द्वारा
October 29, 2012

अद्भुत यथार्थ

ajay kumar pandey के द्वारा
October 28, 2012

अनिल भैया नमन सबसे पहले तो आपने प्रतिक्रिया दी उसका बहुत बहुत आभार प्रकट करता हूँ में कही बाहर गया हुआ था किसी आवश्यक कार्य से तो नहीं देख पाया था मुझे आपकी यह पोस्ट बढ़िया लगी आपने बहुत अच्छा लिखा है प्रतिक्रिया का हार्दिक आभार धन्यवाद अजय कुमार पाण्डेय

akraktale के द्वारा
October 27, 2012

प्रिय अनिल जी                  सादर, आपका आलेख मुझे यह समझने को मजबूर कर रहा है कि जिससे सबक मिले वही गुरु है.अब मेरे लिये प्रश्न खडा होता है कि प्रत्येक सबक देती घटना के कारण को गुरु मानू या कि प्रकृति को. मेरा अपना असमंजस है किन्तु आपने अपना भाग सुंदरता से प्रस्तुत किया इसके लिए आप बधाई के पात्र हैं.

    October 30, 2012

    सादर प्रणाम सर!…………………. इस आलेख का एक मात्र उद्देश्य इतना है कि गुरु को लेकर जो भी भ्रांतियां और मान्यताएं हमारे बीच है संभवतः वो हमते स्वार्थ या अज्ञानता वश है……..गुरु को विशिष्ट करना या विशेष कहना दोनों ही स्वार्थ और अज्ञानतावश है………! किसी घटना को गुरु या प्रकृति को गुरु मानने कि आवश्यकता आखिर क्यों जबकि यह सीमाओं और मान्यताओं से परे है…………………आशा करता हूँ कि हम सबका चिंतन गुरु को लेकर भ्रांतियों और मान्यताओं से ऊपर उठ पायेगा…………….आपके आगमन से यह आलेख कि सार्थकता सिद्ध हुई …..हार्दिक आभार!

pitamberthakwani के द्वारा
October 26, 2012

अनिल आलीन जी, नमस्कार! जैसा की हमने आपकी पहली पोस्ट में वादा किया था की दूसरे भाग के आने और पढ़ने के बाद अपनी बात लिख रह़ा हूँ! सो आज कहना चाह रहा हूँ—आपकी यह बात बहुत अच्छी लगी कोई आदमी ‘जैसा सोचता है वैसा ही हो जाता है!’ या इसे और सुधार कर कहे की ‘जैसा सोचता है,वैसा ही करता है,और वैसा ही हो जाता है!’ बाकी गुरु के बारे में आपके विचारों से अलग नहीं हूँ,पर सकुच्चित और विस्तृत परिभाषा करनी होगी स्वार्थों के संबंधों के कारण जिस आदमी से हमारा कारज संपन्न हो जाता है हम आजकल ऊसी को गुरु मानते है,जब काम निक्कल जाता है तो काहे का गुरु और कैसा गुरु ? अब के गुरु, गुरु न होकर ‘गुरु घंटाल’ ही है या फिर ‘गूरूऊऊऊ …”

    October 30, 2012

    “बाकी गुरु के बारे में आपके विचारों से अलग नहीं हूँ,पर सकुच्चित और विस्तृत परिभाषा करनी होगी”……………………आपके विचारों से शत प्रतिशत सहमत…………………….हार्दिक आभार!

Santlal Karun के द्वारा
October 26, 2012

नवीन विचारों की प्रभावपूर्ण प्रस्तुति; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! ” मेरे कहने का मतलब यह है की सिर्फ राम सच्चा गुरु है रावण नहीं, कहना एक बेईमानी और मुर्खता होगी क्योंकि निश्चय ही गुरु सच और झूठ से परे है.”

    October 30, 2012

    आपके समर्थन से मेरे चिंतन को बल मिला …………………हार्दिक आभार!

October 26, 2012

नोट:- कृपया इस आलेख को पढ़ने से पहिले इसका प्रथम भाग पढ़ना चाहें………….मुझ जैसा गुरु या फिर गुरु जैसा मैं……१ http://merisada.jagranjunction.com/2012/09/13/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%9D-%E0%A4%9C%E0%A5%88%E0%A4%B8%E0%A4%BE-%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%81-%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%AB%E0%A4%BF%E0%A4%B0-%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%81-%E0%A4%9C/


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