साधना के पथ पर

अद्य की स्याही

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मेरी सदा-एक सजा

Posted On: 6 Jan, 2013 Others में

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मेरी सदा-एक सजा कुछ दिनों पहिले अन्जानी और मैं दिल्ली की लम्बी और चौड़ी परन्तु संकुचित सडकों से होते हुए एक गली से गुजरे तो तभी हमारी नज़र दिवार से लटकते हुए एक पिजड़े पर पड़ी जिसमे एक तोता कैद था. नज़र पड़ते ही मेरे होठों पर हसीं की कुछ फुलझड़िया फुट पड़ी. बिलकुल वैसे ही जैसे कि पुरानी और सड़ी हुई काठ पर बारिश के बूंदों के पड़ते ही कुकुरमुत्ते उग आते हैं. मेरे चेहरे की अकस्मात् हसीं को देखकर अन्जानी बोली, ” इसमे हँसने वाली कौन-सी बात है.” पर मैं अपनी ही दुनिया में लीन होने के कारण उसके सवालों को नज़रअंदाज करते हुए आगे बढ़ गया. ऐसे ही एक दिन का वाकया है; जब हम दोनों क़ुतुब मीनार की सैर करके अपनी कालोनी में प्रवेश किये तो तभी हमारी नज़र एक मदाड़ी वाले पर पड़ी जिसके हाथों में रस्सियों से बंधा एक बन्दर उसके इशारे पर नाचे जा रहा था.एक बार फिर मेरे होठों की हसीं को देखकर अन्जानी के होठों से निकलकर वही सवाल मेरे कानों पर दस्तक दिए. जिसे नज़रअंदाज करते हुए एक बार फिर मैं आगे बढ़ गया. मैं उस दिन रात को बिस्तर पर पड़ा छत से लटकते हुए सीलिंग फैन को देखे जा रहा था परन्तु दिल और दिमाग अब भी कहीं उन बन्दर और तोते पर लटका हुआ था. तभी गर्म कम्बल में मेरे बदन से लिपटती हुई अन्जानी के ठंडें हाथों ने मुझे चौका दिया. मेरे तरफ अपनी नज़र करते ही वह बोली, ” अनिल, तुम रो रहे हो.” मैं भी आश्चर्यचकित था खुद को रोते हुए पाकर नहीं बल्कि अचानक अपने आखों में आसुओं को देखकर क्योंकि मैं जानता हूँ कि मैं इस कदर रोता हूँ कि आखों से एक सैलाब गुजरता है परन्तु बेहोश, बेवक्त और बेवजह नहीं……………………………………………

अगली सुबह, मेरा आसमान में सूरज का इंतज़ार था. अन्जानी ने कहाँ, ” अब यहाँ बैठकर आसमान को क्या देखे जा रहे हो.” मैंने उसका हाथ अपनी तरफ खींचते हुए उसे अपने पास बैठाया. फिर हम दोनों एक सर-सरी निगाह से सूरज को निकलते हुए देखे जा रहे थे. तभी एक बार फिर उसके जुबान पर वही सवाल, “अनिल, तुमने बताया नहीं.” मैं अपनी निगाह सूरज से हटाकर उसके तरफ करते हुए कहाँ, ” वो, हाँ! क्यों नहीं. वो तोता पिंजरें में घुट-घुट कर एक-एक पल इस आस में काटता चला जाता है कि एक दिन वो पिंजरें से आजाद हो जायेगा और जिस दिन आजाद होता है. उस दिन उसके पंखों में इतनी जान नहीं रह जाती कि वह खुले आसमान में उड़ सके. नतीजतन वो किसी बाज़ का शिकार हो जाता है. मानों उसकी कोई अपनी जिंदगी ही नहीं. वो बन्दर मदाड़ी वाले के इशारे पर इस लिए नाचता रहता है कि उसके हाथों की रस्सी ढीली पड़ते ही वो भाग जायेगा. और जिस दिन वह भागने में कामयाब होता उस दिन उसके गल्ले में पड़े पट्टे को देखकर उसके अपने ही नोच-नोच कर मार देते हैं. अन्जानी, जानती हो, कुछ अपनी भी जिंदगी इस पिन्ज़रें में कैद तोते और रस्सियों से बधें बन्दर जैसी ही है. झूठी शान, मर्यादा और इज्जत के नामक रस्सियों से बाँधकर अपनों के द्वारा ही हम बच्चों के अधिकारों का हनन किया जाता है और इससे आजाद हो भी गए तो समाज द्वारा हमें दोषी ठहराकर मार दिया जाता है या फिर मरने के लिए मजबूर किया जाता है, हमारा समाज एक तरफ कहता है कि धर्म, व्यवस्था और न्याय के अनुसार चलों. परन्तु जब इससे उसके स्वार्थ और वर्चस्व को धक्का लगता है तो फिर कहता है कि नहीं मेरे अनुसार चलो क्योंकि धर्म, व्यवस्था और न्याय को जन्म हमने दिया है. इससे तो स्पष्ट होता है कि इस सड़ी-गली सामाजिक व्यवस्था के लिए स्वार्थ, सत्ता और वर्चस्व ही सब कुछ है तथा इसका धर्म, व्यवस्था और न्याय से दूर-दूर तक कोई सरोकार नहीं. एक तरफ हमारे समाज का धर्म और कानून कहता है कि एक लड़की की उसकी मर्ज़ी के बगैर उसका शादी करना गुनाह है और दूसरी तरफ हमारा समाज झूठे शान, इज्जत और मर्यादा के लिए यह गुनाह करते हुए उसके अरमानों की अस्थियाँ सजाता है. एक तरफ एक लड़की द्वारा अपनी मर्ज़ी से शादी करने पर उसके बाप द्वारा उसे वैश्या का नाम दिया जाता है और दूसरी तरफ सबकुछ जानते हुए उसका हाथ किसी और के हाथ में देकर उसे वैश्या बनाया जाता है. हद तो तब होती है जब एक सगी माँ अपनी मर्ज़ी से शादीशुदा लड़की को इज्जत और समाज की दुहाई देकर उसके पति से रिश्ता तोड़ने को कहती है और दूसरी शादी करने के लिए प्रेरित करती है. इससे भी हद तब होती है जब उस लड़की के पेट में पल रहे बच्चे को गिराकर उसकी दूसरी शादी करने के लिए उस लड़की को मानसिक रूप से मजबूर करती है.”
इस पर अन्जानी का सवाल, ” मतलब”. ……………” मतलब तो बस इतना है, अन्जानी! इस दोगले समाज के लिए स्वार्थ, सत्ता और वर्चस्व के आगे धर्म, मर्यादा, न्याय और इज्जत का कोई मोल नहीं……..या है तो सिर्फ इसलिए ताकि धर्म, मर्यादा, न्याय और इज्जत के नाम पर इसका स्वार्थ, सत्ता और वर्चस्व की फसल लह-लहाती रहे……….
( नोट- समाज के सच को और बेहतर ढंग से जानने के लिए मेरा अगला आलेख “मछली, मेढक और समाज” पढ़ना चाहें. )
चित्र गूगल इमेज साभार.

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34 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
January 19, 2013

प्रभावोत्पादक ! बधाई !!

Santosh Kumar के द्वारा
January 13, 2013

आदरणीय अनिल जी ,..सादर नमस्कार आप मूरख के विचार जानते हैं ,… न तुम दोषी न वो दोषी नही दोषी ज़माना है ,.. दोष सिर्फ दोष का है छुपा दुश्मन पुराना है…..मूरख लोग इस विषय पर बहुत दिन से लिखना चाहते हैं ,..शायद जल्दी कुछ लिखें ,…..अच्छी पोस्ट के लिए बहुत आभार .सादर

    January 13, 2013

    ….हार्दिक आभार………………..आपका आगमन मेरे उद्देश्य को बल प्रदान करता है……………..

smtpushpapandey के द्वारा
January 12, 2013

प्रिय बेटा अनिल नववर्ष की शुभकामनाओं सहित तुम्हें और अंजना को बहुत बहुत प्यार अजय ने तुम्हे जो जवाब भेजा है उसने मुझे पढ़कर सुनाया उसने जो भी आपको लिखा आपको बुरा भी लग सकता है मैंने उसे समझाया वो तुमसे बड़े हैं उनका अनुभव तुमसे ज्यादा है तुम बड़े भाई की बात को मानकर अपना जीवन सफल बनाओ हाँ में तुमसे बड़ी हूँ और तुम्हारी माँ समान हूँ तुम्हारा लेख मैंने पढ़ा उसमें तुमने समाज के सभी लोगों को एक नज़रिए से देखा है ऐसा नहीं है की समाज में सबके विचार एक जैसे हों हाँ ये बात और है की बच्चा जब एक विशेष वर्ण व्यवस्था में जन्म लेता है तो माता पिता उसे अपने समाज के रीती रिवाजों के बारे में बताते हैं और अपने ही समाज में बनायीं गयी व्यवस्था के अनुसार उसको उचित संस्कार देते हैं लेकिन बड़े होकर जब बच्चे अपनी मर्जी से दुसरे समाज को अपना लेते हैं तो जरुरी नहीं है की सभी उनके इस कार्य का विरोध करें कुछ लोग इसे भगवान् की मर्जी समझकर और इश्वर द्वारा बनाये गए उनके इस जोड़े को मान्यता दे देते हैं क्योंकि वह ये समझते हैं की जो शक्ति सृष्टि को चला रही है उस शक्ति के आगे कोई बड़ा छोटा नहीं है सब एक जैसे हैं और में भी येही कहूँगी की सबसे पहले हम सब भारतवासी हैं उसके बाद हम समाज के हैं तुमने जो भी किया वो गलत नहीं मेरा तुमको येही आशीर्वाद है तुम सुखपूर्वक अपना जीवन व्यतीत करो आगे कब आना होगा सूचित करना धन्यवाद तुम्हारी मात्र तुल्य श्रीमती पुष्पा पाण्डेय

    January 12, 2013

    सदर चरण स्पर्श! आपकी सारी बातों से इत्तेफाक रखता हूँ. मैं पुरे समाज को दोषी कतई नहीं ठहराया हूँ…..बस मैं शरीर के उस हिस्से पर चाकू चलाया हूँ जहाँ फोड़ा हो गया है. अतः आपरेशन अत्यंत आवश्यक है…………वरना पूरा शरीर इसके चपेट में आ जायेगा. हाँ ऐसा करने से जुबान से आह और दर्द तो निकलेगा ही पर इसके लिए हाथ, पैर, नाक, कान, ह्रदय की फिक्र तो बंद नहीं किया जा सकता………… …………और यहाँ महत्वपूर्ण यह नहीं है कि मैं सही किया कि गलत बल्कि यहाँ यह महत्वपूर्ण है कि बुद्धिमान लोगों को सजग और सावधान करते हुए नव निर्माण के लिए प्रेरित किया जाय ताकि ………………..अंत में आपकी सारी बातों से सहमत हूँ………….आपका प्यार और आशीर्वाद मिला…………उसके लिए हार्दिक आभार………आपकी बहु आपकी बहुत याद करती है. उसके तरफ से आपको सादर चरण स्पर्श और अजय को शुभ आशीर्वाद ………..आप सभी का , अनिल

ajay kumar pandey के द्वारा
January 12, 2013

आदरणीय अनिल भैया आज बहस कर ही लेते हैं पता चल ही जाएगा कौन सही है और कौन गलत आप सही हैं तो भी ठीक में गलत हूँ तो भी ठीक अब आप जरा सोचिये जब आप अंजना सिंह जी से शादी करने वाले थे तो समाज ने भी ऊँगली उठाई होगी और आपने जाती से बाहर प्रेम विवाह किया तो भी ऊँगली उठी होगी हाँ में मानता हूँ की आप समाज को बदलना चाहते हैं पर समाज को दोषी करार नहीं दिया जाता समाज को जागरूक करके बदला जा सकता है जब आपने अंजना से शादी करी तब भी तो समाज चौतरफा वार कर रहा होगा थु थु हो रही होगी कह रहे होंगे की देखो अनिल कितना गलत है प्रेम विवाह कर रहा है में अंजना जी को कुछ नहीं कह रहा हूँ क्योंकि वह मेरी भाभी हैं और मुझे हक़ नहीं बनता की में कोई गलत बात उनके लिए कहूं और आपको नाराज करना भी मेरा मकसद नहीं आपने भी गलत ही किया है अपनी जाती से बाहर शादी करके कोई सही काम नहीं किया है जो आप इतना इतरा रहे हैं सोचिये आप किस किसका मुह बंद करते समाज में याद कीजिये आप मान्यता पाने के लिए कैसे समाज से लड़ रहे थे इस शादी के लिए फिर समाज ही काम आया आपको मान्यता दिलवाने के लिए तब फिर इस शादी को आपके माता पिता ने स्वीकारा अब आगे को आपके बच्चे के लिए परेशानी होगी समाज ही कहेगा यह बच्चा गुप्ता समाज का नहीं है इसमें सिंह समाज का खून दौड़ रहा है समाज ही आपके बच्चे की शादी अपने गुप्ता समाज में नहीं होने देगा फिर आपके बच्चे को परेशानी होगी वह सोचेगा की किस समाज को अपनाए उसके लिए यह समस्या खड़ी होगी में ऐसे ही नहीं कह रहा हूँ मैंने यह खुद देखा है प्रेम विवाह के बाद क्या होता है बाकी आप खुद समझें लेख में आपकी बातें गलत हैं आप मानें या न मानें आप खुद ही अपने विषय पर ध्यान दें और समझें में क्या कहना चाहता हूँ बाकी आप खुद समझदार हैं धन्यवाद अजय कुमार पाण्डेय

    January 12, 2013

    जी, माफ़ करिए मैं समाज को बदलना नहीं चाहता बल्कि मैं उन बेकसूर लोगों को बचाने की कोशिश करता हूँ जो आये दिन इस समाज की मुर्खता से अपना अमुल्य जीवन गवा बैठते हैं…………जहाँ तक रहा सवाल मेरी और अन्जानी की शादी का तो मूर्खों और स्वार्थ की वजह से गलत परंपरा का सपोर्ट नहीं करूँगा ……………और यह सिंह और गुप्ता इन्हीं मूर्खों का बनाया हुआ है. आपको लगता है कि मैं अपने संतानों की शादी इन मूर्खों में करूँगा नहीं बल्कि वहां करूँगा जहाँ वो बेहतर समझते हैं. वैसे भी यह जाति कुत्ते और बिल्लियों की होती है जैसे कि कुत्ता, बिल्ली, सूअर, चूहा, गदहा…………..यह सब अलग-अलग जाति के हैं…..पर हम सबका एक जाति है और वो है मानव जाति ……………….और आपने जो खुद समाज में प्रेम विवाह को देखा है उसे मैं आज से २० साल पहिले ही देख लिया था और यह सब-कुछ सोचसमझकर किया हूँ.हाँ यह जरुर चाहूँगा कि आप हमें भी देखिये …………दूसरी बात मैं अन्जानी से विवाह इसलिए नहीं किया कि मुझे उससे प्यार था बल्कि इसलिए किया क्योंकि यह समय और सत्य की मांग है………..क्योंकि यह हमारा धार्मिक और क़ानूनी अधिकार है जीवन साथी चुनने का……..क्योंकि यह समाज की रुढ़िवादी परम्पराएँ फोड़े का रूप लेकर सडन पैदा कर रही हैं…………….अतः आपरेशन जरूरी हो गया है…………….!

munish के द्वारा
January 11, 2013

आदरणीय अनिल जी शायद १९९८ – ९९ की बात है कानपुर में भारत और आस्ट्रेलिया का क्रिकेट मैच हो रहा था, और सचिन तेंदुलकर ताबड़ तोड़ बैटिंग कर रहे थे …………. ! उनकी बैटिंग से ऐसा लग रहा था की अभी उनका शतक लगा और अभी भारत जीता परन्तु जब सचिन करीब ८० रन के पास होंगे की बारहवां खिलाड़ी उनके लिए एक बोतल में पानी लेकर आया, और उसके बाद से सचिन अचानक ऐसे खेलने लगे जैसे टेस्ट मैच खेल रहे हों ……..जो ८० रन उन्होंने ४० गेंदों में बनाए थे तो बाकी बीस रन बनाने में वो पूरी ६० गेंद खा गए……….! बाद में अखबारों के माध्यम से पता चला की तत्कालीन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मैच देखने आने वाले थे और सचिन के खेलने से ऐसा लग रहा था की कहीं भारत उनके आने से पहले ही न जीत जाए तो सचिन को थोडा धीरे खेलने को कहा गया था……………… ! ऐसा ही आपके लेख को पढ़कर लगा आपने शुरुआत बड़े ही प्रभावी ढंग से की लेकिन ये कौन मुख्यमंत्री है जिसके लिए आप का लेख प्रभावित हुआ……….!, और भैया आपकी हमसे क्या दुश्मनी है जो अपने अनुज को हमारे ब्लॉग पढने को नहीं कहा …….. ये कहिये की हमारे ही लेख पढें बस …….. :) बाकी सब बढ़िया है लगे रहिये……..

    January 11, 2013

    परम आदरणीय munish जी शायद बाबा आदम के ज़माने की बात है ……जब हमारे पुर्वज मुर्ख, असभ्य और नंगे हुआ करते the ………..उनके बीच कोई शारीर ढककर आया जो कि उन्हें अजीब लगा. अतः सब मिलकर उसे भी नंगा कर दिए………………..ऐसा ही कमेन्ट कुछ आपका लगा …..खैर कोई बात नहीं अच्छा लगा…………………जी, मैं पाहिले भी कह चूका हूँ कि मेरा ब्लॉग उनके लिए नहीं है जो नैतिक शिक्षा ले रहे हैं बल्कि उनके लिए हैं जो नैतिक शिक्षा ले चुके हैं अर्थात आप और मुझ जैसे लोग और उसके आड़ में अनैतिकता फैलाये हुए हैं……………अब यह alag बात है कि आप इस सत्य को स्वीकारना नहीं चाहते हैं……………………………….मजा आ गया. और कोई आये या न आये आप आते रहिये……………..

Sandeep Kumar के द्वारा
January 11, 2013

ab koi bataye ki hum batayen kya…????

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
January 9, 2013

प्रिय नाती श्री सस्नेह क्या ठीक है क्या गलत , अलग अलग सोच और नजरिया होता है लड़के लड़की के शादी के पूर्व कहाँ करना है विवाह पूंछना अच्छा होता है लेख विचारणीय है. बधाई.

yogi sarswat के द्वारा
January 9, 2013

एक तरफ एक लड़की द्वारा अपनी मर्ज़ी से शादी करने पर उसके बाप द्वारा उसे वैश्या का नाम दिया जाता है और दूसरी तरफ सबकुछ जानते हुए उसका हाथ किसी और के हाथ में देकर उसे वैश्या बनाया जाता है. हद तो तब होती है जब एक सगी माँ अपनी मर्ज़ी से शादीशुदा लड़की को इज्जत और समाज की दुहाई देकर उसके पति से रिश्ता तोड़ने को कहती है और दूसरी शादी करने के लिए प्रेरित करती है. इससे भी हद तब होती है जब उस लड़की के पेट में पल रहे बच्चे को गिराकर उसकी दूसरी शादी करने के लिए उस लड़की को मानसिक रूप से मजबूर करती है.” मित्रवर अनिल जी , ऐसे कई सवाल उभरते हैं समाज में , लेकिन निदान बहुत मुश्किल हो जाता है ! लेकिन अगर आप जिंदगी के हर लफ्ज़ में सवाल देखेंगे तो आपको हर जगह एक नया सवाल मिलेगा लेकिन उसका जवाब नहीं !

    January 10, 2013

    सुस्वागतम! जी, यह सवाल नहीं है बल्कि यह मेरे और आपके सवालों का जवाब है……………..स्पष्टता के लिए …………………आदरणीय विनीता मैम के कमेन्ट पर मेरे कमेन्ट का अवलोकन करें………………..

akraktale के द्वारा
January 9, 2013

प्रिय अनिल जी सादर,निरीह पक्षियों को क्यों पिंजरे में कैद किया होगा पता नहीं शायद किसी के एकांत को कम करने के लिए इसका उपयोग किया हो जिसका बाद में दुरूपयोग होने लगा. बन्दर को नचाना मदारी कि आजीविका है.फिर उसमे और हममे एक पट्टे का ही तो अंतर है हमारे गले में पट्टा नहीं है वरना तो हम भी उसी तरह उछल कूद कर रहे हैं.बुढापे में जो उसकी स्थिति है वही हमारी भी है. बात हम मुद्दे कि करें कि धर्म समाज किस तरह शोषण कर रहा है.समाज और धर्म सबका निर्माण का उद्देश्य अवश्य ही अपना वर्चस्व बढाने और अनुयाईयों को सुरक्षा देना, यही मकसद रहा होगा.मगर उसका दुरुपयोग होने लगा उसमे रुढिवादिता जुड गयी और फिर दुहाईयों का जोर हो गया. इसको हम आज के राजनेताओं को देखकर भलीभांति समझ सकते हैं.जिनको क्यों चुना जाता है आदि आदि.आज जन उनके विरुद्ध खडा होने लगा है कल समाज के विरुद्ध भी बातें होंगी. वक्त के साथ बदलाव भी होंगे.हाँ मगर मजबूरियाँ आज भी हैं मजबूरियाँ तब भी होंगी.

    January 10, 2013

    हार्दिक आभार सर………………….यह राजनेता हमारी ही देन है……….. आसमान से तो आये नहीं ……….मतलब कि असली जड़ कहाँ है ? यह तो आप समझ ही गए होंगे……………

vinitashukla के द्वारा
January 8, 2013

“इस दोगले समाज के लिए स्वार्थ, सत्ता और वर्चस्व के आगे धर्म, मर्यादा, न्याय और इज्जत का कोई मोल नहीं……..या है तो सिर्फ इसलिए ताकि धर्म, मर्यादा, न्याय और इज्जत के नाम पर इसका स्वार्थ, सत्ता और वर्चस्व की फसल लह-लहाती रहे……….” विचारणीय पोस्ट. काश कि हम समाज को बदल पाते!

    January 10, 2013

    जी, समाज या किसी एनी व्यवस्था को बदलने की जरुरत क्या है………………………………….हम खुद को बदल ले सब कुछ……….अपने आप बदलता चला जायेगा…………..मैं यहाँ समाज को गलत साबित करने के लिए नहीं लिखता बल्कि मैं उस व्यवस्था की असिलियत सामने रखता हूँ जो खुद को अच्छा कहकर अन्य व्यवस्थाओं को दोषी ठहरा रही है. खुद परदे के पीछे नंगा नाच मचाई हुई है और अन्य व्यवस्थाओं को नंगा कह रही है …………….जबकि हकीकत तो यह है कि सारी व्यवस्थाएं सामाजिक व्यवस्था से जन्मी हैं…………………..तो स्वाभाविक सी बात है कि यदि किसी व्यवस्था में कमी है तो वो समाज की देन है……मतलब.वो हमारी दें है ……………..और आगे हम जाना चाहें तो ………………मतलब मेरी देन है…………….पर इस सत्य को स्वीकार करना कौन चाहता ? आप, मैं या थर्ड पर्सन ………..शायद कोई नहीं तो फिर सामने वाले को दोष देना खुद से एक बेईमानी होगी………………………..आपका आगमन सुखद रहा ……..हार्दिक आभार………………….!

seemakanwal के द्वारा
January 8, 2013

विचारणीय लेख . हार्दिक आभार . सादर .

ajay kumar pandey के द्वारा
January 7, 2013

अनिल भैया नमन आपने लेख की शुरुआत तो अच्छी की पर जो आपने समाज के बारे में लिखा की समाज कहता है की एक लड़की की उसकी मर्जी के बगेर उसकी शादी करना गुनाह है और दूसरी तरफ हमारा समाज उसे वैश्या का नाम देता है और सब कुछ जानते हुए भी उसे दुसरे के हाथ में देकर उसे वैश्या बनाया जाता है हद तो तब होती है जब सगी माँ अपनी मर्जी से शादीशुदा लड़की को इज्जत और समाज की दुहाई देकर उसे रिश्ता तोड़ने को कहती है अनिल भैया यह बात सही है जो माँ उसे कहती है शादी अपने ही समाज में होनी चाहिए नहीं तो आगे चलकर बच्चों के लिए समस्या आ जाती है समाज कहता है की यह इस जाती का है हमारी जात का नहीं तो समाज स्वीकार ही नहीं करेगा अपने समाज के बाहर शादी करना तो गलत माना जाता है शादी अपने ही समाज में होनी चाहिए दुसरे समाज की लड़की हमारे अपने समाज में खप नहीं पाती हमारे रीति रिवाज अलग हों और उसके अलग यह तो उसके लिए भी खराब बात होगी खैर इसका में आपको एक उदाहरण देकर बताना चाहता हूँ पहाड़ी और देशी का अंतर पहाड़ियों में जनेउ संस्कार होता है विधिविधान से और जन्मदिन पर पूजा होती है और शादी के भी विधिविधान होते हैं देशी कहेगी हमारे रीती रिवाज करो यहाँ तो पहाड़ी के लिए समस्या होगी हाँ में मानता हूँ की आप मेरे प्रेरणास्त्रोत हैं ब्लॉग पर आने में आप ही ने मुझे मार्गदर्शन दिया उसी का नतीजा है की में आज अच्छे लेख लिख पा रहा हूँ सब आप की ही कृपा है और में आपको नाराज ही नहीं करूँगा पर आपने लड़की की माँ और समाज के बारे में जो भी बात लिखी है वह सरासर गलत है हिम्मत है तो सामने आकर बोलिए पीठ पीछे मत लिखिए बाकी आप खुद समझदार हैं मेरा मकसद आपको नाराज करना नहीं है बल्कि समझाना है यदि कोई ठेस पहुचे तो शमा कीजियेगा धन्यवाद आपका भाई अजय पाण्डेय

    January 8, 2013

    अनुज,…………पहले तो आप यह निश्चय करें कि आप को सच का साथ देना है फिर झूठ का………………..आप जिस बात का समर्थन कर रहे हैं वो स्वार्थ और वर्चस्व से प्रेरित है जो कभी सच हो ही नहीं सकता…………….दूसरी बात इस आलेख मरें मैंने कहीं भी कुछ अपने तरफ से नहीं कहाँ…………..बस वहीँ रखा हूँ सामने घटित हो रहा है ……………आप कि समस्या यह है कि आप अपने उम्र से कभी बहुत आगे चले जाते हैं और कभी बहुत पीछे………….आपको कितनी बार बोला हूँ कि आप वही विषय वास्तु पर ध्यान दीजिये जो आप के समझ के अन्दर है……………………आपको बोला था न कि आप यमुना जी और आशीष जी के आलेख पढ़िए क्योंकि आपके लिए वह बहुत जरुरी हैं…………………. चलिए अच्छे बच्चों कि तरह बड़े भाई की बात मानिये और काम पर लग जाएँ…………………..और हाँ रश्मि मैडम से ध्यान हटाकर पढाई पर लगायें वरना जिस दिन आऊंगा पिटाई होगी……………………शुभाशीष………………….आपका भाई, अनिल

jlsingh के द्वारा
January 7, 2013

प्रिय अनिल जी, आपने सही दृष्टान्त देकर समझाना चाहा है … अंतिम पैराग्राफ में उत्तर भी है …संदीप कुमार की प्रतिक्रिया तार्किक है … आप स्वयम समझदार हैं …

    January 8, 2013

    हार्दिक आभार सर! जी तार्किक ही नहीं सही भी है………………………………….इसिलए जब यह कुछ लिखते है तो यहाँ हंगामा मच जाता है…………क्योंकि लोगों को सच बर्दाश्त नहीं होता………………….

Sandeep Kumar के द्वारा
January 6, 2013

‘(Friend Anil, starting (of your article) is quite interesting and amazing, but I have got to condemn you. hahahahaha…)’ When it comes to society, two people always slip out of it; they are never part of it. The whole society ‘(Friend Anil, starting (of your article) is quite interesting and amazing, but I have got to condemn you. hahahahaha…)’ When it comes to society, two people always slip out of it; they are never part of it. The whole society consists of everybody and anybody but these two. The First is one who speaks about (for or again) society, the second is one who listens to. Neither speaker ever considers himself to be part of the establishment nor does listener. Hence, society always remains there as 3rd person ‘the talked about’ means one who is not there while conversation is taking place…. And if it is so, then, ‘the very conversation’ becomes tale-bearing (backbiting). If you have really got courage then, talk face-to-face; address your talk/Lekh to one whom you would like to criticize… why backbiting?????????? Only an individual can be changed, not society, either ‘I’ changes or ‘YOU’, ‘HE/SHE/They’ can never be changed for there are never there…who cares..???. So, whenever to you have to criticize or condemn, please be specific, (as I am with you right now). ‘Sandeep Kuamr’

    January 8, 2013

    अब तू हिंदी लिखते-लिखते …………….ई कौन सी भाषा लिख दिया…………….वैसे बता दू…………..आईटी इज वेरी मुश्किल तो समझिंग ……………………..BY THE WAY शुक्रिया…………शुक्रिया……………हाँ…….हाँ…………….

sureshjayswal के द्वारा
January 6, 2013

मतलब तो बस इतना है, अन्जानी! इस दोगले समाज के लिए स्वार्थ, सत्ता और वर्चस्व के आगे धर्म, मर्यादा, न्याय और इज्जत का कोई मोल नहीं……..या है तो सिर्फ इसलिए ताकि धर्म, मर्यादा, न्याय और इज्जत के नाम पर इसका स्वार्थ, सत्ता और वर्चस्व की फसल लह-लहाती रहे………आपने ही सारे भावो और विचारो को बता दिया है,अब कोई शब्द नहीं है कैसे प्रतिक्रिया दू, पर कहीं न कहीं गलतियाँ हमारे द्वारा ही की जातो है,इन सामाजिक कुरूतियों पर आवाज हमारे द्वारा नहीं उठाई जाती है और अगर उठाई जाती है टी उसे दबा दी जाती है किसी अपने के द्वारा.

    January 8, 2013

    जी, आवाज उठाने की क्या जरुरत है……………जरुरत है उदहारण बनाने की, जरुरत है समर्पण( झूठ के सामने नहीं सच के सामने ) करने की, जरुरत है कुछ नया करने की, जरुरत है अँधेरे में एक दीप जलने की,………………समझ सकता हूँ मेरी बात आप तक पहुँच गयी होगी…..जहाँ तक आवाज दबाने की बात है तो आवाज कभी दबती नहीं………….आदमी दबता है स्वार्थ, सत्ता, वर्चस्व और डर के आगे……………इअक मतलब की हम सही हैं है नहीं तो सही का साथ क्या देंगे……………….आप का सवाल अच्छा लगा………हमेशा स्वागत है !

Sandeep Kumar के द्वारा
January 6, 2013

मित्र अनिल, लेख की शुरुआत बहुत ही अच्छी और रोचक थी….पर कुछ शिकायत है तुम से वो भी सुनो.. हा हा हा हा हा हा हा …… जब भी बात समजा की होती है…तो उस में से दो लोग बहार हो जाते हैं…एक समाज के विरोध में या कभी-कभी सपोर्ट में बोलने वाला और दूसरा सुनने वाला, न तो बोलने वाला कभी ख़ुद को समाज का हिस्सा मानता है और न ही सुनने वाला ….समाज always remains as 3rd person…means जो वहां बात-चीत के दौरान मौजूद नहीं है…. और जो मौजूद नहीं उसके बारे में बोलना means पीठ पीछे शिकायत करना है..अरे हिम्मत है तो सामने आके बोलों न …ये चोर की तरह पीठ पीछे क्यों बोलते हो…. हिम्मत है तो जिससे शिकायत है उससे सीधा बोलो… व्यक्ति को बदला जा सकता है समाज को नहीं .. या तो ‘I’ बदलता है या फिर ‘YOU’, He/she/they कभी नहीं बदलते हैं….इसीलिए जब भी आलोचना, शिकायत या फिर तारीफ़ करनी हो तो व्यक्ति की करो समाज की नहीं….जैसे मैं अभी तुमसे कर रहा हूँ….!!!!!

    January 6, 2013

    शुक्रिया…………….शुक्रिया…………………शुक्रिया………………………….शुक्रिया…………………………हाँ…………हाँ…………………हाँ…………………


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