साधना के पथ पर

अद्य की स्याही

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बंद आखों से ....( यादों का सुहाना सफ़र )

Posted On: 14 Jan, 2013 Others में

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बंद आखों से …

बंद आखों से
वो आसमान का दिखना,
सारे जहाँ का दिखना.

माँ का प्यार दिखना,

पिता का दुलार दिखना,

दादा-दादी का टकरार दिखना,

बचपन का यार दिखना,

गुरु जी का मार दिखना.

बंद आखों से

वो आसमान का दिखना,

सारे जहाँ का दिखना.

वो माँ के सिने से चिपके रहना,

पिता के कन्धों से खेत-खलिहान का दिखना,

सबसे रूठकर चौखट पर बैठना,

माँ के मनाने पर भागकर नीम के छाँव में जाना,

वो दिन भर की भाग दौड़ और शरारते,

शाम के होते ही शिकायतों का आना,

अपनों के डाट-फटकार पर फुट- फुट के रोना.

बंद आखों से

वो आसमान का दिखना,

सारे जहाँ का दिखना,

कड़ी धुप में नंगें पाँव टहलना,

सर पे पटरी रखे स्कूल जाना,

गुरु जी का पैर दबाना,

स्कूल के पीछे बगिया में जाना,

झोला भर अमियाँ तोड़ लाना,

माँ से कहकर खट-मिठियां बनवाना,

भाई-बहनों के साथ छीन-झपट कर खाना,

खोने पर रोना और मिलने पर गाना,

बंद आखों से

वो आसमान का दिखना,

सारे जहाँ का दिखना.

वो कौड़ियों का खोना और पाना,

सावन के बारिश में खुलकर नहाना,

सडकों से पानी का चौखट तक आना,

कागज की कश्ती का उसमे बहाना,

आस-पास गड्ढों में मेढक की टर्र-टर्र,

कीचड़ सने पाँव आँगन में आना,

फिर चाची का पलटा दिखना.

बंद आखों से

वो आसमान का दिखना,

सारे जहाँ का दिखना.

वो मधुमक्खियों के छत्तों पर ढेले चलाना,

भैया के गुस्से पर भाभी का मनाना,

ठंडी रातों में सिकुड़ कर सोना,

दोस्तों के साथ घाम तापना,

आग को घेर कर बैठना,

आंच लगते ही सरकाना,

दोस्तों के पकड़ से दूर भगना,

पानी की ठंडक से राम-राम जपना.

बंद आखों से

वो आसमान का दिखना,

सारे जहाँ का दिखना.

चुपके से पटनी से आचार चुराना

और इलज़ाम छुटकी पर लगाना,

देखते ही देखते कुछ बड़ा हो जाना,

पडोशी की लड़की का खुद पर इतराना,

सबसे छुपके उससे आखें मिलाना,

फिर शरमा के घर के किसी कोने में जाना,

खुली आँख से सपनों का आना.

बंद आखों से

वो आसमान का दिखना,

सारे जहाँ का दिखना.

वो कक्षाओं में अव्वल आना,

पापा का सबको मिठाइयाँ खिलाना,

बेरोजगारी में यहाँ-वहां भटकना,

बड़े संघर्षों बाद नौकरी पाना.

फिर घर बनाने के सपने संजोना,

जीवन साथी के तलाश में दूर निकल जाना.

बंद आखों से

वो आसमान का दिखना,

सारे जहाँ का दिखना.

वो अन्जानी का पाना जैसे पंख का लगना,

देर रात तक उससे सेल फोन पर बतियाना,

ठंडी-गहरी रातों में उससे मिलने जाना,

मुझे देखकर उसका खिड़की पर आना,

फिर शरमा के खिड़की से जाना,

पूरी रात प्लेटफोर्म पर बिताना,

सुबह पहली गाडी से ऑफिस जाना.

बंद आखों से

वो आसमान का दिखना,

सारे जहाँ का दिखना.

वो अन्जानी के माँ का मुझे गरियाना,

वही दिलों के रिश्तों में जाति-बंधन का आना,

अन्जानी को पाना और पाकर खोना,

रो-रो कर सबसे हाल-ए-दिल बताना,

सबका मुझसे झूठी हमदर्दी जताना,

एक दिन अपनों से दूर भाग जाना,

कहीं जाकर अपनी दुनिया बसाना,

अपनों की यादों का दस्तक देना,

फिर नादान दिल को समझाना.

बंद आखों से

वो आसमान का दिखना,

सारे जहाँ का दिखना.

खुली आखों से देखा था कभी,

वो सब बंद आखों से दिखना.

वो आसमान का दिखना,

सारे जहाँ का दिखना.



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27 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

alkargupta1 के द्वारा
January 24, 2013

अनिल जी , आपकी यादों के सुनहरे सफ़र की अति सुन्दर भावपूर्ण अभिव्यक्ति बहुत ही बढ़िया लगी

minujha के द्वारा
January 20, 2013

अनिल भाई ,सच कहुं तो आज आपकी इस रचना के लिए मन चाह रहा है कि आपकी दिल खोलकर तारीफ करुं,बहुत ही सुंदरता से अपनी यादों को आपने शब्दों से सजाया है,मेरी ओर से बहुत बहुत बधाई

    January 21, 2013

    ACTUALLY D, SAAL ME EK DIN AISA HOTA HAI JIS DIN MAIN SNAN NAHIN KARATA……….AUR WO DIN HAI HAI MAKAR SAKRANTI.ATAH US DIN SNAN NAHIN KARANE SE MAN VYAKUL HO RAHA THA. ATAH AANKH BAND KARATE HI BACHPAN SE ABTAK KA SAFAR MAN-MASTISHK MEN UMADANE LAGA JISE…..KUCHH SHABDON KA NAAM DE DIYA………………PAR SOCHA NAHIN THA KI AAP SABHI KO ITNA PASAND AAYEGA………………. JISAKE LIYE AAP SABHI KA HARDIK ABHAR……….

rekhafbd के द्वारा
January 19, 2013

आदरणीय अनिल जी , खुली आखों से देखा था कभी, वो सब बंद आखों से दिखना. वो आसमान का दिखना, सारे जहाँ का दिखना.,अति सुंदर अभिव्यक्ति ,हार्दिक बधाई

Sushma Gupta के द्वारा
January 18, 2013

अनिल जी, बंद आँखों से ध्यान-पूर्ण अवस्था में जाकर ही जीवन के हर पल को स्मृति -पटल रुपी कैनवास पर उकेरा जा सकता है, जो आपकी रचना में मुखरित हो रहा है, इसके लिए बहुत साधुबाद ….

aman kumar के द्वारा
January 17, 2013

“यादों का सुहाना सफ़र” बहुत सुन्दर, बहुत भावपूर्ण क्रम बद्ध यात्रा सा लगा ! सच है ………..

akraktale के द्वारा
January 16, 2013

प्रिय अनिल जी सादर, बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति. सच है जब आँखे बंद करके बीते लम्हों के दरवाजे खोल लो फिर देखो कहाँ से कहाँ तक कि सैर हो जाती है.यादें जो भूली भी नही जा सकती. इस सुन्दर प्रस्तुति के लिए बधाई स्वीकारें.

Santlal Karun के द्वारा
January 16, 2013

आदरणीय अलीन जी, बाल-मन से लेकर यौवन के मानसिक संजाल तक एवं माँ के प्यार से लेकर जवानी के दिले नादां की असफलता तक के विराट स्मृति-फलक से चुनिन्दा, मर्म-स्पर्शी बिंब-गुच्छ; हार्दिक साधुवाद एवं सदभावनाएँ !

seemakanwal के द्वारा
January 16, 2013

बहुत सुन्दर रचना .सादर आभार . दिन जो पखेरू होते ,पिंजरे में मैं रख लेता .

vinitashukla के द्वारा
January 15, 2013

मासूम यादों का सुहाना सफर. सुन्दर अभिव्यक्ति.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
January 15, 2013

प्रिय नाती जी सस्नेह अब क्या दीखता है. शानदार अभिव्यक्ति. नवीनता लिए हुए बधाई

yogi sarswat के द्वारा
January 15, 2013

बंद आखों से वो आसमान का दिखना, सारे जहाँ का दिखना. वो माँ के सिने से चिपके रहना, पिता के कन्धों से खेत-खलिहान का दिखना, सबसे रूठकर चौखट पर बैठना, माँ के मनाने पर भागकर नीम के छाँव में जाना, वो दिन भर की भाग दौड़ और शरारते, शाम के होते ही शिकायतों का आना, अपनों के डाट-फटकार पर फुट- फुट के रोना. यादें हैं मित्रवर अनिल जी ! यादें बड़ी सुखद भी होती हैं ! सुन्दर शब्द

shashibhushan1959 के द्वारा
January 15, 2013

आदरणीय अनिल जी, सादर ! “यादों का सुहाना सफ़र” बहुत सुन्दर, बहुत भावपूर्ण लगा !

jlsingh के द्वारा
January 14, 2013

प्रिय अनिल जी. सादर! बंद आँखों से सब कुछ साफ़ दिख जाता है जो खुली आँखों से धुंधला सा लगता है! बहुत ही रोचक यादें आपने सहेज कर रक्खी है! आगे सुनहरा भविष्य आपकी प्रतीक्षा कर रहा है! शुभकामना सहित!

nishamittal के द्वारा
January 14, 2013

आपका बचपन से अब तक का खट्टी मीठी यादों से जुड़े सुहाने सफ़र की रोचक दास्ताँ .शुभकामनाएं


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