साधना के पथ पर

अद्य की स्याही

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गीता उतनी झूठी जितना कृष्ण सच्चा

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मान्यवर,
गीता को लोगो पर थोपने को आप परम कर्तव्य कह रहे हैं. इससे बड़ा दुष्कर्म हो ही नहीं सकता. आप कह रहे हैं कि गीता में सब प्रश्नों के जवाब है और दूसरी तरफ गीता को मानने की बात कर रहे हैं. इससे स्पष्ट है कि आप गीता से कोषों दूर है और आप पर भी गीता थोपी गयी है और जो थोपा गया हो वो कभी धर्म या सत्य हो ही नहीं सकता. कृष्ण जितने सत्य है गीता उतनी ही झूठी है क्योंकि वो कृष्ण का अनुभव या अनुभूति है. उसमे आपका क्या है सिवाय सुननाने या रटने के. इसको कुछ ऐसे समझे कि कोई किसी पक्षी को एक पिजड़े में बंद करके उसे लाख उड़ने के गुण सिखाये उसे उड़ने की अनुभूति और अनुभव कभी नहीं हो सकता है. धर्म या गीता कोई धारण कराने की चीज नहीं है बल्कि हम स्वयं अपने जीवन में अनुभूति करते है. परन्तु जीवन से मुड़कर जब हम अपना ध्यान उसकी( ग्रंथों के सिंद्धांतों की ) तरफ करते है तो हम जीवन से मुख मोड़ लेते है, हम धर्म से मुख मोड़ लेते हैं.
दूसरी बात आप गीता को मानने की बात करते है. इससे बड़ा मूर्खता क्या हो सकता है? माना तो उसे जाता है जिसका अस्तित्व नहीं हो या फिर हो और दिखायी नहीं देता हो. क्या आपको गीता के शब्द दिखायी नहीं देते या फिर आप पढ़ नहीं पाते. आपका कहना,
“ये तो वही बात हुई कि कोई कहे कि मै अपनी माँ को नहीं मानता.”
मतलब कि आप अपने माँ को मानते है. जो साक्षात् सामने हो उसे मानने की बात मतलब उसे मृत घोषित करना है या फिर उसके अस्तित्व से इंकार करना है. आप तो जीते-जीते माँ को मार दिए. किसी ज्ञानी के सामने ये बात मत रखियेगगा नहीं तो मूर्खों के लिए हसीं के पात्र बनेंगे. आपका हाल पंडितों की तरह है जो सुनी-सुनायी और पढ़ी-पढाई बातों को रखकर खुद को ज्ञानी साबित करने में लगे रहते है. यह सीखी हुई बातें उतनी ही झूठी है, मृत है जितना तालाब का जल. जो चारों तरफ से घिरा है और उसका स्वामी हर आते-जाते हुए लोगों को दिखाकर कहता है कि देखों यह जल है जिसमे प्रवाह होता है, शीतलता होती है एवं इससे प्यास बुझती है और कोई व्यक्ति उसकी अनुभूति करने के लिए तालाब के जल के निकास के लिए नाली बनाता है तो तालाब के स्वामी को कष्ट होता है क्योंकि वह डरता है कि मेरा इकठा किया हुआ जल ख़त्म न हो जाए और इस तरह से वह खुद और दुसरों को भी जल के गुणों के अनुभव और अनुभति से अलग रखता है. इस प्रकार समय के साथ-साथ वह जल दूषित होता चला जाता है और उसमे कीड़े पड़ जाते हैं. जल के गुणो का अनुभव एवं अनुभूति करना है तो बहने दो उसे बिल्कुल नदी की धारा की तरह . किसी की प्यास बुझा के उसको जल की अनुभूति कराओं. फिर आपको जल के गुण बतलाना नहीं पड़ेगा, सिखाना नहीं पड़ेगा. यही धर्म है.
अंत में आप फिर भगवान् को मानने की बात कहकर उसके होने से इंकार न करें…….यहाँ यह मत समझियेगा की मैं ज्ञानी या गुरु बनने की कोशिश कर रहा हूँ क्योंकि यह सब एक बचपना और मूर्खता के सिवाय कुछ नहीं क्योंकि यह एक सत्य है कि कोई भी किसी का विशेष गुरु या शिष्य नहीं हो सकता. यदि गुरु के बारे में कुछ नया जानने के इच्छुक हो, यदि आप गुरु के बारे पढ़ी-पढ़ाई बातों को सड़ने से बचाना चाहते है तो उसमे प्रवाह लाये………….और अनुभूति और अनुभव स्वयं प्राप्त करें. एक बार फिर आपको सलाह दूंगा कि आप जे-जे से विनती करें की मेरे ब्लॉग के सॉफ्टवेयर का सुधार करें. गुरु के बारे में जानने के लिए वहाँ मेरा आलेख “मुझ जैसा गुरु या फिर गुरु जैसा मैं”- भाग(१-२) पढ़िए और फिर उसे अपने दिमाग से निकाल दीजिये और फिर नए अनुभूति और अनुभव की तरफ मुड़िये यही धर्म है और यही गीता

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55 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Bhagwan Babu 'Shajar' के द्वारा
November 27, 2013

अनिल जी… आपने जिस बहस में सभी को शामिल किया है.. और जो आप लिख रहे है ये भी उधार का है…. कुछ अपनी बात कीजिए… कुछ सच्ची बात कीजिए…. मुझे पता है ये बात आप कहाँ से लिख रहे है… उधार की बातो में मिर्च-मसाला लगाकर यहाँ सभी को अपनी नाक भौ दिखाकर खुद को ढ़्कने की कोशिश  मत कीजिए…

November 26, 2013

जब हम खुद को भुत से जोड़ते हैं तो उस समय के लये वर्तमान से मुंह मोड़ लेते हैं. चाहें वो एक पल के लिए हो या एक लम्बे समय के लिए. यदि हम खुद को भविष्य में ले जाते हैं जिसके बारे में हमारा कोई अनुभव नहीं. इसका मतलब कि हम खुद को उस रूप में देखना चाहते हैं जो हम हैं ही नहीं. एक शराबी शराब के नशे में एक साधू को साधू को जी भर गाली बकता रहा परन्तु साधू उससे कुछ नहीं बोला. अगले दिन जब शराबी उस साधू से मिला तो बोला प्रभु शराब के नशे में बहुत बड़ी गलती हो गयी. आपको गाली दे दिया मुझे माफ़ कर दीजिये. हँसतें हुए उस साधू ने कहाँ कहाँ जिसे तुम गाली दिए थे वो कोई और था, और मैं कोई और तो माफी का सवाल ही नहीं उठता. इसी प्रकार जो गाली दिया था वो कोई और, और तुम कोई और. तो फिर मैं तुमसे नाराज क्यों होऊ? यदि तुम वही हो तो जाओ उससे मीलों जिसे तुम गाली दिए क्योंकि मैं तो अब वो नहीं रहा………………महोदय क्या संभव है उस शराबी के लिए उस साधू के अतीत से मिलना और यदि वो इस प्रश्चाताप के लिए उसे भुत में ही खोजता रहा तो क्या उसका जीवन स्थिर नहीं हो गया? क्या वो जीते जी नहीं मे गया? एक व्यक्ति के पिता बहुत बीमार थे. उसके पास इलाज के लिए पैसा नहीं था. वह व्यक्ति अपने कर्म को भूलकर हमेशा यही सोचता रहता कि इतने पासे कहाँ से प् सकूँगा क्योंकि कोई भी व्यक्ति उसकी मादा करने को तैयार नहीं था. एक रात एक सपने में देखता है कि एक महीने बाद मैं लखपति बनाने वाला हूँ. अतः सबकुछ छोड़कर अपने भविष्य में खो गया. १५ दिनों के बाद उसके पिता की मृत्यु हो गयी. परन्तु वो आज भी उसी वक्त इंतज़ार कर रहा है कि वह लखपति बन सके. इसप्रकार खुद को भविष्य में कैद कर स्थिर कर दिया, मृत कर दिया.

November 26, 2013

सुस्वागतम………………… आपका आगमन बहुत ही सुखद रहा. कारण जेजे पर आप ऐसे दुसरे व्यक्ति हैं जो इधर-उधर की बातें न करके सीधे उस पॉइंट से बात शुरू कर रहा हैं. जहाँ पर मैं ख़त्म कर रहा हूँ. वैसे देखा जाए तो आपके अन्दर उठ रहे हैं सारे सवालों का जवाब मेरे आर्टिकल में है. फिर आप छह रहे हैं कि आपके अन्दर उठ रहे सवालों को साल्व करूँ तो इसमे जरुर योगदान करूँगा.

drshyamgupta के द्वारा
November 25, 2013

अनुभूति और अनुभव स्वयं प्राप्त करें. फिर उसे अपने दिमाग से निकाल दीजिये और फिर नए अनुभूति और अनुभव की तरफ मुड़िये यही धर्म है और यही गीता —- क्या अनुभूति व अनुभव आसमान से आती है ……वह तो आपके पढ़े हुए, सीखे हुए, जाने हुए, सुने हुए तथ्यों के मनन से आती है…..जब पहले से व्याप्त व प्राप्त ज्ञान को पढेंगे ही नहीं तो आगे कैसे सोच पाएंगे ……..क्या बच्चा पैदा होते ही स्वयं के अनुभव से …वर्णमाला समझ सकता है  ( माँ , बावा, पापा ) आदि मुख से निकलने की बात पृथक है …यह मशीनी तथ्य है प्राकृतिक ..यह ज्ञान नहीं )

    November 26, 2013

    महोदय…………….वर्णमाला सीखना बाह्य क्रिया-कलाप है. यदि इसे नहीं भी सीखे तो वो अपना एक अपना माध्यम विकसित कर लेगा परन्तु धर्म एक आंतरिक गुण है उसे सिखाने की जरूरत नहीं……………एक बच्चा जो पांच साल तक सिर्फ मान का दूध पी रहा हो. उसे पानी के बारे में लाख बताये परन्तु उसके लिए वह झूठ है क्योंकि उसके बारे में उसकी कोई अनुभूति नहीं……..किताबी बाते पढ़कर या सीखने से वो कभी जल को नहीं जान सकता……………

drshyamgupta के द्वारा
November 25, 2013

——- कुछ लोग नदी की धारा य तालाब देखकर भी यह नहीं जान पाते कि कि यह जल है ..अनुभवसिद्ध ज्ञानियों का यह कर्तव्य है ….उन्हें यह बताना कि यह जल है……

    November 26, 2013

    महोदय, यदि कोई जल को नहीं जानता कि जल है तो उसे बतलाने से भी कभी नहीं जान पायेगा………..जबतक कि उसे उसकी अनुभूति न हो……बिलकुल अन्धें की तरह जिसे प्रकाश के बारे में लाख बताये पर वह वो अनुभूति नहीं कर सकता जो आँख वाले को है…………

    dineshaastik के द्वारा
    December 8, 2013

    आदरणीय श्याम गुप्ता जी, प्रथम तो गीताकार के संबंध में विद्वानों में मतभेद हैं  दूसरा उसके श्लोंको की संख्या के संबंध में विद्वानों में मतभेद हैं सबसे बड़ी अड़चन  तो यह है कि इसके पढ़ने पर इतने प्रश्न खड़े हो जाते हैं कि उन प्रश्नों की ही एक  गीता बन जाती है।

    dineshaastik के द्वारा
    December 8, 2013

    मान्यवर गीता तो बहुत सी हैं। एक आसाराम जी ने भी गुरुगीता लिखी है। जिसकी आजकल बहुत चर्चा है।

    dineshaastik के द्वारा
    December 8, 2013

    महाभारत के अशवमेघ पर्व में लिखा है कि जब महाभारत युद्ध समाप्त हो गया तो पाडण्व लोग सुख पूर्वक राज्य का उपभोग करने लगे तो कृष्ण जी ने द्वारका वापस जाने का विचार अर्जुन को बताया। तब अर्जुन ने श्रीकृष्ण को दुबारा गीता सुनाने के लिये निवेदन किया। परन्तु श्रीकृष्ण ने कहा कि अब दोबारा वही ज्ञान सुनाना उनके लिये संभव नहीं है। ऐसा ज्ञान जो अर्जुन जैसा विद्वान सुनने के बाद भूल गया और स्वयं भगवान भी सुनाने के बात याद न रख सके। गीताकार ने कैसे लिखा होगा?

    dineshaastik के द्वारा
    December 8, 2013

    महोदय, अधिकाँस धार्मिक पुस्तकों की तरह गीता में भी कहा गया कि इस गीता रुपी परम रहस्य को किसी काल में भी तपरहित मनुष्य के प्रति न कहना चाहिये और न भक्ति रहित के प्रति। अतः यह गीता का ज्ञान धृतराष्ट्र को सनाना ही नहीं चाहिये था, क्योंकि वह तो भक्ति रहित एवं तप रहित ही था। यह सब इसलिये कहा जाता गै कि जिससे कोई तार्किक व्यक्ति इस पर प्रश्न न उठाये और लोग इसकी सभी बातों को भी सही मानते रहें।

November 22, 2013

सादर प्रणाम दी! यदि ऐसा है तो वह आपका परसेप्शन है, अनुभूति या अनुभव नहीं. यदि है तो यक़ीनन वह फैशन इधर नहीं. यहाँ तो आस्तिक होने या न होने का सवाल नहीं उठाया गया. कहीं आप यह तो नहीं कहना चाहती कि किताबों और ग्रंथों को सत्य कहना आस्तिकता है. कहीं आपका कहना यह तो नहीं कि सूरज के निकलने पर अँधेरा फ़ैल जाता है. तो मैं यह बात दूसरों के मानाने वाली हो सकती है मेरी नहीं. मैं कोई लेखक नहीं हूँ और न ही किसी दिए हुए टोपिक पर लिखता हूँ और न ही किसी लेखन प्रतियोगिता में भाग लेता हूँ. मैं बस वही लिखता हूँ जो मेरी अनुभव और अनुभूति है. क्या अटल है गीता और ग्रन्थ ….यह एक झूठ और गलतफहमी के सिवाय कुछ नहीं…….यह बस एक साधन है मात्र है ताकि इसके आड़ में हमारा स्वार्थ, सत्ता और वर्चस्व का कायम रहे हैं. जिसकी होड़ में दिन पर दिन अँधेरा फैलता जा रहा हैं, लोग एक-दुसरे को मार रहे हैं, काट रहे हैं, ……! यह एक आवलंबन हैं खुद को छुपाने का. जिसके आड़ में आसाराम जैसे साधू मानवीय भावनाओं के साथ-साथ देह से भी खिलवाड़ कर रहे हैं………………….आप थ्योरी की बात ही मत करिए क्योंकि हर थ्योरी एक झूठ है ………………..

    sinsera के द्वारा
    November 22, 2013

    जब आपने ये ठान रखा है कि हर बात को काटना है तो फिर आपकी अडिगता की सफलता को नमस्कार….आप किसी बैनर तले प्रतियोगिता में भाग नहीं लेते या कभी नहीं लेते ??कृपया स्पष्ट कीजिये क्योंकि फ़िलहाल तो आप तर्क -कुतर्क की प्रतियोगिता में बढ़ चढ़ के हिस्सा लेते हुए दिख रहे हैं.. अरे हार-जीत से क्या डरना , हर कोई विजयी थोड़े ही हो जाता है..पर भाग ज़रूर लेना चाहिए , इससे अपना स्तर पता चल जाता है और हिम्मत बढ़ती है …हाँ कोई साधू मानवीय देह से खिलवाड़ तभी कर पाता है जब देह खुद उसको ये अवसर मुहैया कराती है. ..जिसे नहीं कराना होता है वो विरोध में आवाज़ उठाता है..आसाराम के ऊपर इतने घिनौने आरोप के बाद भी कितनी औरतें उसके पक्ष में बोली थीं…आप उन्हें क्या नाम देंगे…??और थ्योरी कभी भी झूठ नहीं होती..अगर होती तो हम इस लैपटॉप द्वारा आपने विचारों का सेकंडों में आदान प्रदान न कर पाते…

    dineshaastik के द्वारा
    November 23, 2013

    आदरणीया सरिता जी, सादर। जहाँ तक आसाराम का समर्थन करने वाली महिलाओं की बात है, तो उसका मनोविज्ञान अगर समझने बैठेंगे तो  वह बहुत ही कुत्सित एवं भयावह निकलेगा। केवल आसाराम का ही नहीं जितने भी पाखंडी पोप हैं इनकी लीलायें    बहुत ही कुत्सित निकलेगीं। आसाराम की तो पोल खुल गई हैं, इसलिये वह भगवान बनने से बंचित हो गया। लेकिन जिन जिन की नहीं खुली है वह सब भगवान बन गये। यह भगवानों का इतिहास है।

    November 23, 2013

    जे-जे परिवार के इतिहास में संभवतः, पहली बार है जब आपकी बातों से लग रहा है कि आप अपना बचाव कर रहीं है. शायद भाग रहीं है मुझसे नहीं पर यक़ीनन खुद से. आप कहना, “आप किसी बैनर तले प्रतियोगिता में भाग नहीं लेते या कभी नहीं लेते ??कृपया स्पष्ट कीजिये.” इसमे स्पष्ट करने वाली कोई चीज नहीं. मेरी बाते स्पष्ट है फिर उस पर ध्यान द्जिये. हाँ मैं इतना जरुर कहना चाहूँगा कि मेरी प्रतिस्पर्धा खुद से है न कि औरों से. सफलता-असफलता, हार-जीत मेरे लिए कोई मायने नहीं रखता. यह एक सत्य है कि न मैं कभी हारा हूँ और न ही जीता हूँ. न कभी हार सकता हूँ न कभी जीत सकता हूँ. जी मैं सवाल देह के समर्थन या असमर्थन में नहीं उठाया हूँ. अतः इसकी बात करना एक बेईमानी होगी. मैं सवाल उठाया हूँ उस मानसिकता पर जो खुद को संस्कारी एवं पाक समझता है, मैं सवाल उठाया हूँ उस मानसिकता पर जो सच के आड़ में झूठ को सहारा देता है……………..मैं सवाल उठाया हूँ गीता के सहारे सारे धार्मिक ग्रंथों पर जिसके दम पर लोग दावा करते है एक सभ्य और मर्यादित समाज की स्थापना का जो आज तक नहीं पूरा हुआ.

    sinsera के द्वारा
    November 23, 2013

    हद है…..प्रेम से बात करो तो बच रही हैं, भाग रही हैं, छुप रही हैं..और डांटडपट करो तो काली मैया त्राहिमाम त्राहिमाम….इसी को तो कहते हैं..”जबरा मारे रोवे न दे…”

    sinsera के द्वारा
    November 23, 2013

    दिनेशजी नमस्कार , आपसे सहमत हूँ लेकिन एक हद तक….क्योंकि आपने लिखा है …” लेकिन जिन जिन की नहीं खुली है वह सब भगवान बन गये….और “मैं “सब ” शब्द का प्रयोग जल्दी नहीं करती ….कुछ लोगो के कृत्यों के आधार पर सभी का सामान्यीकरण नहीं करना चाहिए…

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    November 24, 2013

    जिनको पच्छिम में पागलखाने में डाल दिया जाता है उस तरह के लोगों को हमने यहाँ भारत में धर्मगुरु और ज्ञानी बना रखा है…माना की भारत एक उदार देश है लेकिन उदारता की भी एक हद होती है, अब ये सब बर्दाश्त से बहार की बात है…!! ‘अपना अपना सोच’ होना गलत नहीं है लेकिन जब आप अपने दिमाग के कूड़ा-कचड़ा को दुसरों के दिमाग में डालने लगते हैं तो दिक्कत पैदा हो जाती है, और जब सद्गुरु जी, अनील जी, जवाहर जी, दिनेश जी, मनोज जी या फिर रंजना जी जैसे उच्य स्तर के लोग इस तरह का काम कर रहे हो तो और भी मुश्किल पैदा हो जाती है…लोग आपको पढ़ते हैं आपको सम्मान देते हैं इसका ये मतलब तो नहीं कि आप लोगों के अज्ञानता का फायदा उठाएंगे…??? ‘गीता को गलत कहना, समझ रहे हैं आप कितनी बेहूदगी की बात है’, बोलने की आजादी है लेकिन गाली देने की नहीं…मैं किसी भी प्रकार के पागलपन के विरोध में हूँ, चाहे वो धार्मिक पागलपन ही क्यों न हो…!! मैं इस देश के प्रतिभावान युवकों और बुद्धिजीवियों से निवेदन करता हूँ कि वो आगे आएं और इन सड़क छाप पंडितों और ज्ञानियों को रास्ता दिखाने में मेरी मदद करें…!!! 

    November 24, 2013

    मियां, चूँकि गीता और कृष्ण की बात आ गयी है. तो चलो कुछ उदहारण गीता से लाकर अपनी बात रखता हूँ. मैं अर्जुन की तरह बुजदिल और कायर नहीं कि अपनी जीत के लिए निहत्थे कर्ण पर हथियार चलाऊ. आज तुम बिलकुल निहत्थे दिख रहे हो क्योंकि तुम्हारे हाथ में न कोई हथियार है और नहीं वो तेज व धार है जिसके लिए तुम जाने जाते हो. और यह अलीन कभी निहत्थों पर हथियार नहीं उठाता. अतः मेरे प्रहार को सहने के लिए अपना हथियार लेकर आओ. वरना यदि इस जेजे मंच रूपी युद्ध भूमि में उतरा तो फिलहाल तुम तो नहीं किन्तु कई निर्दोष मेरी हुंकार से ही बेमौत मारे जायेंगे. अतः अपनी नहीं उनकी रक्षा का तो कुछ प्रबंध करके आये होते.

    November 24, 2013

    तुम्हारा कहना, “मैं इस देश के प्रतिभावान युवकों से निवेदन करता हूँ कि वो आगे आएं और इन सड़क छाप पंडितों और ज्ञानियों को रास्ता दिखने में मेरी मदद करें…!!! “…………हाँ………….हाँ………..हाँ………………यह तुम किनसे कह रहे हो. अँधेरे को बोल रहे हो प्रकाश का सामना करने के लिए……..!है किसी अँधेरे में यह साहस कि इस प्रकाश का सामना कर सके. Comment

sinsera के द्वारा
November 22, 2013

भाई अनिल जी, नमस्कार, आजकल नास्तिक होने का एक फैशन सा चल निकला है..लेकिन आस्तिक होना बुरी बात नहीं..बस आस्था और धर्मान्धता के बीच की विभाजन रेखा को समझना चाहिए..शब्दों का खेल खेल कर तो कुछ भी सच या झूठ साबित किया जा सकता है खास कर के हैम लेखकों को बस टॉपिक मिलने भर की देर है….लेकिन अगर हज़ारों बरस से कोई बात अपनी जगह पर अटल है इसका मतलब उसमे कुछ दम है..वर्ना कितने पंथ, विचार आये चले गए ..यहाँ भी सर्वाइवल की थ्योरी काम करती है इसलिए खामखा कुछ सिद्ध करने से अच्छा कि जो है उसे सुनने गुनने कि कोशिश करें…

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    November 23, 2013

    मेरी सहमति प्राप्त है आपको, गीता समस्त ग्रंथों का सार निचोड़ है, जैसे हीरों में कोहिनूर है वैसे गर्न्थों में गीता…! गीता के बारे में मैं बस इतना कहूंगा, ‘अगर ये ग्रन्थ आपको समझ न आए तो समझिये आपकी समझ कमज़ोर है, ग्रन्थ का इसमें कोई दोष नहीं है’. जब भी कोई गीता की निंदा करता है मैं व्यथित तो ज़रूर हो जाता हूँ, लेकिन निराश नहीं होता, आज न कल अनिल को भी गीता की महिमा समझ में आ जायेगी..क्योंकिं झूठ नपुंसक होता है, ज्यादा देर नहीं टिक सकता है,..!!! मनुष्य के दुर्भाग्य की कोई सीमा नहीं है, अँधा वजाय इसके की अपनी आँख ठीक कराये, प्रकाश को ही इंकार करने लगता है..!! अनील जी, सदगुरजी, दिनेश जी, रंजना जी, जवाहर जी जैसे लोगों का पुरजोर विरोध होना चाहिए, ये असामाजिक तत्व हैं..अपने शब्दों की जादूगिरी के दम पर लोगों को गुमराह कर रहे हैं, और लोगों के धार्मिक भावना को ठेस पहुंचा रहे हैं…!! हाथी बैठा भी रहेगा तो घोडा गधा से ऊँचा रहेगा, भारत कितना भी गिर गया आज भी धार्मिक मामलों में समस्त संसार का बाप है…’कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी’ ..नास्तिकता रोग है…इसका इलाज़ होना चाहिए…!!!!

    November 24, 2013

    हाँ………..हाँ………….हाँ……………….!सुबह को पढ़ा था तुम्हारा लेख. बिजली न होने कारण लैपटाप की बैटरी डिस्चार्ज हो गयी. सो कमेन्ट नहीं कर पाया. पढ़ने के बाद ऐसा लगा कि सुबह-सुबह भांग चढ़ा ली हो तुमने. सबकुछ ठीक है सिवाय तेज और धार के जो तुम्हारे आलेख की प्रमुख विशेषता होती है.

dineshaastik के द्वारा
November 21, 2013

शाँति योग से युक्त ज्ञान था, ऐसा कहते हैं विद्वान। अर्जुन हुआ युद्ध को प्रेरित, बतलायें कैसे भगवान। एक बार में समझ गया था, कितने जटिल कहे श्लोक? शोर अधिक था कैसे तुमने, उसे दिया गीता का ज्ञान??

    November 22, 2013

    आदरणीय! हाँ……………हाँ…………………..! आप इन सब झूठ के चक्कर में पड़ेगे तो दिमाग घूम जाएगा. बेहतर है सत्य की बात करें और सत्य यही है कि गीता एक झूठ है. जब झूठ है तो उसमे वर्णित अवयवों को सत्य कीकसौटी पर तौलना एक बेईमानी होगी…………..! आप चर्चा में शामिल हुए हार्दिक आभार!

    drshyamgupta के द्वारा
    November 25, 2013

    ——-शान्तियोग से ही कर्म में प्रेरित हुआ जा सकता है …आज के कानफोडू स्वयं जोडू शोर से नहीं…..श्लोक आपके लिए जटिल हैं आज…अर्जुन के लिए नहीं थे……गीता ज्ञान मन के अन्दिर प्रवाहित होता है तथा यह युद्ध प्रारम्भ से पहले की स्थिति है……समझिये तत्व को….

    November 26, 2013

    यहाँ, आप कुछ हद तक सही है. परन्तु आप यहाँ फंस गए फिर क्यों आप इसे बाहर किताबों में ढूंढ रहे हैं………………………..

    dineshaastik के द्वारा
    December 8, 2013

    महाभारत के अशवमेघ पर्व में लिखा है कि जब महाभारत युद्ध समाप्त हो गया  तो पाडण्व लोग सुख पूर्वक राज्य का उपभोग करने लगे तो कृष्ण जी ने द्वारका  वापस जाने का विचार अर्जुन को बताया। तब अर्जुन ने श्रीकृष्ण को दुबारा गीता  सुनाने के लिये निवेदन किया। परन्तु श्रीकृष्ण ने कहा कि अब दोबारा वही ज्ञान  सुनाना उनके लिये संभव नहीं है। ऐसा ज्ञान जो अर्जुन जैसा विद्वान सुनने के  बाद भूल गया और स्वयं भगवान भी सुनाने के बात याद न रख सके। गीताकार  ने कैसे लिखा होगा?

dineshaastik के द्वारा
November 21, 2013

कौरव, पाण्डव, व्यास जरासँघ, कृपाचार्य औ द्रोणाचार। जन्म हुआ जिस ढंग से इनका, नहीं है संभव किसी प्रकार।। महाभारत के पात्र प्रमुख यह, क्या लगते हैं स्वभाविक?  बतलाये कोई मुझको भी, क्या यह सब हैं इतिहासिक??

    November 22, 2013

    सम्भव है यह सब उसके पात्र हो…………….परन्तु इनका जन्म …………..को लेकर सारी अवधारणाएं………गलत है…………..

    drshyamgupta के द्वारा
    November 25, 2013

    ——आज कल के नए वैज्ञानिक आविष्कारों से अनजान हो क्या…… परखनली शिशु के बारे में नहीं पता ….बस वही सब था …….इतिहास व ज्ञान बार बार अनाचार, अज्ञान के अन्धकार में डूब कर बार बार प्रकाशित होता है …यही संसार-प्रकृति चक्र है …. —– तात्विक रूप से, श्र द्धा भाव से , वैज्ञानिक दृष्टि से देखिये सब जान जायेंगे ….

    December 7, 2013

    मतलब आपके कहने का मतलब है कि सूरज, हवा इत्यादि का बीज निकालकर परखनली में डाल दिया गया, और उससे क्रमश कर्ण और भीम इत्यादि पैदा हुए. ……….हाँ……………हाँ…………भैया आदमी के बीज की फिर तो कोई आवश्यकता ही नहीं………………….

dineshaastik के द्वारा
November 21, 2013

शाँति के दाता, प्रेम के सागर, और पतित पावन भगवान। अर्जुन को जो दिया था तुमने, श्रीकृष्ण गीता का ज्ञान। कैसे हुये युद्ध को प्रेरित, अर्जुन बतलायें श्रीकृष्ण; ज्ञान दिव्य वह शूक्ष्म बहुत था, करता जो आनन्द प्रदान??

    November 22, 2013

    ज्ञान……और युद्ध……………………दोनों एक साथ…………….! एक प्रश्न चिन्ह है यह?

    drshyamgupta के द्वारा
    November 25, 2013

    ——वास्तविक ज्ञान होने पर ही व्यक्ति कर्म-युद्ध में  या युद्ध-कर्म में उतर सकता है …… ज्ञान कोइ कर्म से भागकर जंगल में बैठने को नहीं कहते , शान्ति-शान्ति जपने को ज्ञान नहीं कहा जाता …… ज्ञान यदि कर्म में परिणत न हो तो उसका कोइ अर्थ नहीं है…. —- यही तो गीता का मूल विचार है……..हे मानव!  पढ़ , अध्ययन कर , विचार कर , मनन कर ….मनन को समझ तो सही …..  

    November 26, 2013

    आपके कहने का मतलब है कि कर्म ही युद्ध है और युद्ध ही कर्म है………………….? या फिर कुछ और कृपया स्पष्ट करें………… आपका कहना, “शान्ति-शान्ति जपने को ज्ञान नहीं कहा जाता.” मतलब कि अशांति ज्ञान है? जहाँ ज्ञान है वहाँ अशांति का क्या काम? जहाँ प्रकाशा है वहाँ अँधेरा सम्भव नहीं…………….?

dineshaastik के द्वारा
November 19, 2013

अज्ञानी ढ़ोगी बड़े, रखते “सतगुरु” नाम। और वास्तविक हैं यही, सच्चे “आसाराम”।। लोगों को भरमा रहे, रच झूटे श्लोक। मानवता लहू चूसते, बन करके यह जौंक।। अपने गुरु खुद ही बने, खुद ही बनिये संत। ठगने का व्यापार यह, करिये इसका अंत।। फँसें न ‘सतगुरु’ जाल में, फैले यहाँ तमाम। ‘आसूमल’ से बन गये, कितने ‘आसाराम’।। कहते जिसको धर्म यह, सच में वही अधर्म। आश्रम में जा देखिये, करते बढ़े कुकर्म।।

    November 22, 2013

    आश्रम में जाने कीजरुरत ही नहीं…………….बस आदमी अपने स्वार्थ, सत्ता और वर्चस्व रूपी दिवार को गिरा दे …वास्तविकता अपने आप नज़र आने लगेगी……………परन्तु हम सब धर्म और भगवान् को उपभोग का साधन बना लिए हैं.

    drshyamgupta के द्वारा
    November 25, 2013

    सच कहा ..दोषी हम ही हैं जो …आश्रमों में घूमते फिरते हैं ….. शास्त्रों को पढ़ने समझने की जहमत न उठाकर सब कुछ सरलता से पकापकाया मिल जय इस आशा में …आशारामों के शिकार होते हैं……और शास्त्रों की निंदा करने वाले अज्ञानी इस में सहायक होते हैं ..वे अधिक दोषी हैं….

    November 26, 2013

    बस यही कारण है कर्म हीनता का. जो गीता या किसी विशेष गुरु को अपनाकर भी नहीं मिलता. कारण हैम बाह्य रूप से उद्देलित हो रहे हैं कर्म के लिए जबकि हमारा मन आंतरिक रूप से तैयार नहीं. बिना-भूख, बिना प्यास के खाना चाहते हैं और वो भी पकापकाया हुआ. यही तो कर्महीनता है. यदि हम भूखे है तो कोई किताब नहीं कहेगा कि तुम भूखे हो चलो खाना खाओ. यह चीज अंदर से आती है. और हम यदि खाते है तो उसकी अनुभूति सिर्फ हमें ही हो सकता है. ऐसा कुछ नहीं है कि जब किताब पढ़कर आयेंगे तब हमें अनुभूति होगा खाने कि तृप्ति………….

shakuntlamishra के द्वारा
November 19, 2013

उलूक को नहीं पता कि सूरज क्या है ,वो सदियों से यही समझता आया है कि सूरज कुछ नहीं है .

    dineshaastik के द्वारा
    November 19, 2013

    आदरणीया शकुन्तला जी, लेकिन यहाँ तो अधिकाँश मानव ऐसे उल्लू बने हुये हैं जो बादल हो जाने पर सूरज को     चन्द्रमा समझ कर उसकी पूजा करने लगते हैं। और चन्द्रमा को सूरज समझने लगते हैं। ये अंधभक्त भारत में कुछ ज्यादा ही होते हैं। यदि कोई उनका भ्रम दूर करने की कोशिश करने का प्रयास करता है तो उसे उलूक, विधर्मी, काफिर, नास्तिक, अज्ञज्ञानी, ईश्वरद्रोही आदि की सुशोभित करने लगते हैं।

    November 22, 2013

    आदरणीया! यह आप क्या मूर्खों की तरह बाते कर रही हैं? क्या सूरज पता करने की चीज है? यह किताबों की बाते छोड़िये. वास्तविकता के धरातल पर कदम रखिये वरना यूहीं जिंदगी पन्ने पलटने में व्यतीत हो जायेगी…………….! आपने अपना समय निकाला उसके लिए हार्दिक आभार!

    drshyamgupta के द्वारा
    November 25, 2013

    यदि गीता आदि शास्त्रों का इसे की निंदा होती है तो मानव उल्लू ही बन जाता है …आँख का अंधा….. —-शकुन्तला जी उल्लुओं को सूरज का पता नहीं कह रहीं हैं जो सच तथ्य है….. स्वयं के लिए या आँखों वाले के लिए नहीं …..जन्मांध क्या जाने सूरज क्या है …. कुछ तो समझ की बात करो…..

    November 26, 2013

    मान्यवर मैं आपसे यही कहना चाह रहा हूँ………….कि जो जन्मांध है उसे लाख सूरज के बारे में बताये वह उसकी अनुभूति नहीं कर सकता …………….और जो आख वाला है उसे नहीं भी बताया जाय फिर वह जानता है सूरज क्या हैं…………..किताबे पढने कोई कर्मशील नहीं हो जाएगा………….

November 18, 2013

HAM TO KEVAL ITNA JANTE HAIN KI GEETA KARM KA SANDESH DETI HAI AUR YAHI BAT IS GRANTH KEE SACHCHAI KO JANNE KE LIYE पर्याप्त है .और किसी ज्ञान से हमारा कुछ भी लेना देना नहीं .

    dineshaastik के द्वारा
    November 19, 2013

    बात कर्म की ठीक है, हिंसा मगर सिखाय। हिेसा जहाँ पे हो तनिक, धर्म नहीं कहलाय।।

    November 22, 2013

    वकील साहब……………….! आपके कहने का मतलब यह है कि आपको गीता पढने से पहिले पता नहीं था कि आपका कर्म क्या? जो गीता नहीं पढ़ते क्या वो सब कर्महीन हैं……..?

    drshyamgupta के द्वारा
    November 25, 2013

    —शालिनी जी ने सत्य ही कहा है…. —- दिनेश जी हिंसा किसे कहते है क्या पता है………. वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति…….. युद्ध में शत्रु को मारना हिंसा नहीं है…… यदि सारे सैनिक युद्ध से डरकर …सीमा से भागकर आजायें तो आपका क्या होगा…..उचित समय पर उचित कर्म ही कर्म है ……आपको गीता पढ़ने की अत्यंत आवश्यकता है , स्वयं नहीं किसी तात्विक ज्ञानी से इसका अर्थ समझिये …… —–अनिल जी …. सही पूछा है ….गीता चाहे पढ़कर या बडे लोगों के अनुभव से सुनकर, सीखकर , जानकर समझें ..उसके बाद ही कर्म क्या है उसका ज्ञान होता है …..वकालत जानना आदि प्रोफेशनल कार्यों को कर्म नही कहते परन्तु उन्हें कैसे परमार्थ रूप में प्रयोग किया जाए उसे कर्म कहते हैं……….. वास्तव में जिन्होंने किसी भी माध्यम से गीता-ज्ञान को जाना समझा नहीं है( सभी को गीता पढ़ने को न मिल पाती है न आवश्य है कि वे समझ पायें अतः वे अपने अनुभवी लोगों से समझते हैं , गीता पढ़ना आवश्यक नहीं गीता-ज्ञान जानना व उस पर चलना महत्वपूर्ण है )  वे सब कर्महीन ही हैं एवं अकर्म में लिप्त हैं यही तो आजकल के सामजिक द्वंद्वों का कारण है ……

    November 26, 2013

    आपका कहना है कि हम सबको अपने कर्म करने के लिए गीता या किसी अन्य विशेष किताब(अपनी-अपनी मान्यता के अनुसार) की आवश्यकता होती है. आपके कहने का मतलब यह है कि गीता लिखने पहिले सभी कर्महीन थे. वो चाहें कृष्ण के पिता हो या माँ या फिर उनके पूर्वज……………………… क्या हमें भूख लगती है तो कोई दूसरा बताता है भोजन करने के लिए, क्या दर्द होने पर कोई दूसरा कहता है चिल्लाने या रोने के लिए,……….या फिर इसे भी पढ़ा या सिखा जाता है…………….बाहरी कारकों से हम खुद को बांधते हैं, न कि कर्म करते हैं………..! कर्म सीखा या सिखाया नहीं जा सकता………

    November 26, 2013

    महोदय, हिंसा और अहिंसा की बात छोड़िये. विश्व में सबसे अधिक युद्ध धर्म के लिए ही होता आया है और प्रत्येक पक्ष खुद को धार्मिक ही कहता आया है और यह सिलसिला आज भी जारी है तो फिर कौन धार्मिक है और कौन अधार्मिक? ये कैसी शत्रुता तो, यह कैसा युद्ध, यह कैसा नर-संहार,…….आखिर यह सब क्यों? कृपया स्पष्ट करें…………….

    dineshaastik के द्वारा
    December 8, 2013

    @drshyamgupta ji प्रथम तो गीता के रचनाकार के बारे में विद्वानों में मतभेद हैं। दूसरा उसके श्लोंको की संख्या के संबंध में भी मतभेद हैं। इसके बाद पढ़ने पर इतने अधिक प्रश्न खड़े हो जाते हैं कि उन प्रश्नों की ही एक गीता बन जाती है।

harirawat के द्वारा
November 18, 2013

असमंजस, दुविधा, कसमकस, न भूत न भविष्यती

    November 22, 2013

    असमंजस, दुविधा, कसमकस, न भूत न भविष्यती …………………………….बात कुछ समझ में नहीं आयी…………..!असमंजस, दुविधा, कसमकस यह आपके साथ क्यों है यह तो आप ही बता सकते हैं. मैं तो बस इतना ही कहूंगा कि आपका भुत और भविष्य दोनों ही एक झूठ है…………..और कुछ नहीं………….

    drshyamgupta के द्वारा
    November 25, 2013

    अनिल जी……भूत व भविष्य कैसे झूठ है कुछ प्रकाश डालिए तो बात बने…..


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