साधना के पथ पर

अद्य की स्याही

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जिन्दा! मर गया

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जिन्दा! मर गयायकीन नही होता न. कुछ पल के लिए मुझे भी यकीन नहीं हुआ था. ऐसा लगा मानों आसमान को जमीन मिल गयी हो या फिर दो समान्तर रेखाएं कहीं दूर जाकर एक हो गयी हो. बात है परसों रविवार सुबह १० बजकर ५१ मिनट की. पिछले १५ दिनों से अँधेरे को लेकर अपना अनुभव शब्दों में व्यक्त करना चाह रहा था. वैसे ही जैसे कोई प्यासा अपनी प्यास को शब्दों में व्यक्त करना चाह रहा हो. इसका जिक्र मैं अपने मित्र संदीप झा से भी सेलफोन वार्ता में किया था. उसने कहाँ कि कोशिश करके देख लो. परन्तु समय के आभाव के कारण खुद को इसके लिए वक्त नहीं दे पा रहा था. परसों रविवार की छुट्टी थी और कुछ वक्त भी; माँ के लिए, मिसेज के लिए, अलीना के लिए और निश्चय ही कुछ खुद के लिए. अतः कागज़ और कलम की तलाश लिए बेडरूम में प्रवेश किया जहाँ मिसेज रो रही हमारी बेटी अलीना को चुप कराने में लगी हुयीं थी.अतः कागज और कलम को भूलकर वहीँ बैठ गया. तभी बेडरूम से लगे हुए बालकनी के रेलिंग से होते हुए एक आवाज आई, “राम-नाम सत्य है.”
सुबह के १० बजकर ५५ मिनट हो रहे थे. रेलिंग पर जहाँ मेरी माँ पहले से ही मौजूद थी, जाकर देखा चार व्यक्ति किसी एक को कंधे पर उठाये हुए चले जा रहे है और उनके पीछे तक़रीबन ७०-८० लोग भागे जा रहे हैं. ऐसा लग रहा था जैसे जिंदगी और मौत की घुड दौड़ लगी हो एक ऐसी दौड़ जिसमे किसी की जितने की कोई उम्मीद नहीं. एक सिरे पर जीत और दुसरे सिरे पर हार, पर क्या यह संभव है कि जीत हार में बदल जाए या हार जीत में बदल जाए? असंभव! या तो जीत होगी या फिर हार. कहीं कोई ऐसी बात तो नहीं जो इस जिंदगी और मौत से भी महत्वपूर्ण हो. खैर, इस बात से बेफिक्र था. अचानक मेरा ध्यान अपनी माता जी पर गया जो बगल में रखे मेरी तौलिया को अपने सर पर रखी हुई थी. मुझे भी जाने क्या हसीं-मजाक सूझी की, मैं उनसे बोला, “आप अपना तौलिया अपने सर पर रखिये, आप खुद को उस व्यक्ति के आत्मा से बचा लीं परन्तु यदि उस व्यक्ति की आत्मा तौलिये के सहारे मेरे सर पर सवार हो गयी फिर मैं तो गया काम से.” यह कहकर जोर-जोर से हँसने लगा. तभी निचे से किसी की आवाज आई, “जिन्दा! मर गया और आपको हसीं सूझ रही है. पर जिस बात पर मैं हँस रहा था उसे बताना मेरे लिए मुश्किल था क्योंकि मुझे पता था कि वह बात उसके समझ के बाहर है.

इससे बड़ी हास्यपद बात क्या होगी कि कोई जिन्दा हो और वह मर जाए, कोई प्रकाश हो अँधेरा हो जाए, या तो वह जिन्दा है या फिर मर गया हो, या तो प्रकाश है या फिर अँधेरा या यह दोनों एक झूठ हो और सत्य इससे अलग कुछ और. परन्तु सत्य यह भी है कि हम मृत्यु को सत्य मानकर जिंदगी को झूठ कर दिए हैं और सदियों से मृत्यु के इंतज़ार में मरे जा रहे हैं. सत्य तो यह है कि यह जीवन और मृत्यु किसी एक की दो अवस्थाएं वरना यदि यह सत्य होता तो दोनों का एक अपना अलग स्वरुप होता. ऐसे में कभी जिंदगी मौत में तब्दील नहीं होती. सत्य तो यह है कि यह बिलकुल झूठ है जैसे सुबह का शाम होना झूठ है. यह तो सूरज है जिसकी रोशनी धरती के जिस-जिस कोने पर पड़ेगी वहाँ सुबह और ठीक उसके विपरीत शाम होती है. परन्तु इन दोनों के बोच में ऐसी कई अवस्थाएं भी होती है जो सुबह से शाम की ओर अग्रसर होती है और फिर शाम से सुबह की ओर. आइये इसे एक और उदहारण से समझते हैं. जीवन और मृत्यु को यदि एक तराजू के दो पलरा मान लिया जाय तो हम देखते हैं कि कभी कोई पलारा भारी पड़ता है तो कभी कोई. दोनों में ही विरोधाभाष है और जहाँ नहीं है दोनों बराबर हो जाते हैं वहाँ विरोधाभास ख़त्म हो जाता है. परन्तु कभी भी एक पलरा दुसरे में तब्दील नहीं होता. यह जीवन-मृत्यु भी किसी तराजू के दो पलरे है जो कभी एक हो ही नहीं सकते, कभी एक दूसरा में तब्दील हो ही नहीं सकता और यदि हो जाए तो एक ख़त्म हो जाएगा. जैसे ही एक ख़त्म हुआ कि दुसरे को भी ख़त्म होना ही है. या नदी के दो किनारे जो कभी एक हो ही नहीं सकते. कभी भी कहीं भी मिल नहीं सकते. यह तो कोई मुसाफिर है जो इस पर से उस पार जाने का साक्षी होता है. यह सफ़र कुछ ऐसा है जैसे कोई यात्री एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन तक जाने के लिए उतनी दुरी का टिकट कटा कर बैठ जाता है और फिर सफ़र ख़त्म होते ही, टिकट की वैलिडिटी ख़त्म. फिर एक नए सफ़र के लिए नयी वैलिडिटी.ऐसा ही कुछ जीवन-मृत्यु है……एक खूबसूरत झूठ!……….सत्य तो कोई और है जो इससे होकर गुजरता है…. …………
बस यूँ समझ लीजिये परसो जिन भाई का राम-नाम सत्य हो गया. उनका सफ़र वही ख़त्म हो गया. फिर एक नए सफ़र के लिए उन्हें एक नयी वैलिडिटी की जरूरत पड़ेगी. भैया, अब उनके लिए आप लोग इस स्टेशन पर क्यों उतर गए? आपका स्टेशन अभी आना बाकी है. अतः आप सभी अपनी-अपनी बोगी में जाकर अपना स्थान ग्रहण करें. ट्रेन को हरी झंडी हो गयी है ……….आप सभी की यात्रा मंगलमय हो!

(चित्र गूगल इमेज साभार)

जिन्दा! मर गया



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53 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
December 8, 2013

वाह भाई अलीन जी , बात-बात में आप ने बड़ी ही सहजता से इस रहस्यात्मक सत्य से परदा हटा दिया ! यही तो आप की लेखिनी की खूबी है | बधाई ! पुनश्च !!

    December 9, 2013

    सादर आभार!…………………………..दरअसल लिखने और लिख जाने में बहुत अंतर होता है. यहाँ मैं लिखा नहीं बल्कि मुझ द्वारा लिख गया है………………….इसमे मेरी कोई अपनी सोच नहीं सिवाय अनुभव के………………यदि लिखना चाहूँ तो हर १० मिनट में एक कहानी लिख डालूं. कुछ लोग मेरे इस गुण से भलीभांति परिचित है. जैसे कि कविता का सृजन कर पोस्ट करता है तो कमेन्ट के रूप में मैं तत्काल एक कविता का सृजन करता हूँ…………..परन्तु वह कविता उतनी ही झूठी है जीतनी की जिसको कमेन्ट किया हूँ उसकी कविता……………………हम जो कुछ भी सोचते हैं, लिखते हैं खुद( भ्रम, अहंकार, सम्मान, विश्वास इत्यादि) को बचाकर. इस प्रकार जो लिखते है अपना की भावना से ग्रसित होता है परन्तु जब कुछ हम द्वारा लिख जाता है. वहाँ अपना ख़त्म हो जाता है. हम सिर्फ माध्यम रह जाते हैं किसी रहस्य या सत्य को पहुँचाने के ……………………..हार्दिक आभार!

sadguruji के द्वारा
December 7, 2013

अनिल जी,मै चाहता हूँ कि इस मंच पर एक स्वस्थ वैचारिक आंदोलन चले-ईश्वर है और ईश्वर नहीं है के बीच.बुद्ध के एक वचन से मै बहुत प्रभावित हूँ.बुद्ध कहते हैं कि जो कहता है-ईश्वर है,उसे भी खोज करना चाहिए और जो कहता है कि ईश्वर नहीं है,उसे भी खोज करना चाहिए.और ये खोज सत् जरी रहना चाहिए,जब तक कि सत्य की अनुभूति न हो जाये.यही वजह है कि आप के कमेंट के ठीक विपरीत मै कमेंट करता हूँ.मेरा आशय समझ जाइयेगा और बुरा मत फील कीजियेगा.

    December 7, 2013

    आपको क्या लगता है कि मैं बुरा मानता हूँ नहीं बिलकुल नहीं क्योंकि मैं अच्छा और बुराई से परे हूँ. अब आप जानना चाहेंगे कि फिर मैं इतना-अनाप सनाप क्यों बोलता रहता हूँ? कारण हम दुनिया से खुद को छुपाने के लिए भले ही कोई भी आवरण लगा ले परन्तु जब खुद के साक्षी होंगे तो यह खुद से नहीं छुपा पाएंगे. मैं जो कुछ दूसरों को कहता हूँ अप्रत्यक्ष रूप से अनिल कुमार “अलीन” को कहता हूँ जितना दुसरे तिलमिलाते है मेरी बातों से उससे कहीं ज्यादा अनिल कुमार “अलीन” तिलमिलाता है. क्योंकि वह समझता है कि मैं उसे जानता ही नहीं बल्कि मैं तो उसके नश-नश से वाकिफ हूँ और मुझे देखकर अक्सर भागने की कोशिश करता है मगर अफ़सोस दुसरे तो भागने में कामयाब हो जाते हैं पर यह मुझसे कैसे भागेगा? मैं तो दूसरों के बारे में बहुत कम जान पाता हूँ क्योंकि वो तो किसी न किसी तरह भाग जाते हैं और बेटा अनिल कुमार “अलीन” मेरी पकड़ में आ जाते हैं. अतः जोर-जोर से हँसने लगता हूँ कि अनिल कुमार अलीन से गन्दा, अहंकारी, मुर्ख तो कोई है ही नहीं. इस प्रकार खुद के अच्छे होने की गलतफहमी दूर करता हूँ……………………………. हाँ………………हाँ……………………………… ‘ ट

    December 7, 2013

    क्या बुद्ध कहे, क्या कृष्ण कहे, क्या क्या राजेंद्र कहे और क्या अनिल कहे……………………उससे मेरा कोई मतलब नहीं……………! क्योंकि यह चारो ही मेरे लिए झूठ है? या एक भ्रम है जो मैं पैदा किया हूँ खुद के होने या न होने का……………………सत्य यह कि सिर्फ मैं ही हूँ……………ईश्वर का होना और न होना, दोनों पर ही बात करने का मतलब है खुद को धोखा देना, भ्रमित करना, ………………………………………………………..और सबसे बड़ा भ्रम है अनिल कुमार ‘अलीन” के होने का. वो समझता है कि वो है जबकि मैं उसे बहुत बार कोशिश कर लिया बताने कि उसका कोई अस्तित्व नहीं सिवाय मेरे. सिर्फ मैं ही हूँ ………………….देखिये कबतक यकीं होता है इस मुर्ख को………………….

Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
December 7, 2013

नेति-नेति…., न शरीर न ही मन, न आत्मा न ही परमात्मा…न जनम न मृत्यु….!!! Keep saying netither this nor that.

sadguruji के द्वारा
December 7, 2013

दिनेश आस्तिक जी,आप सृष्टि का सम्पूर्ण सत्य नहीं जानते हैं.जितना जानते हैं,उसी आधार पर कह रहे हैं,इसीको पाखंड कहते हैं.पाखंड का अर्थ है-सत्य का एक खंड़मात्र जिसने पाया हो.सम्पूर्ण सत्य नहीं.यदि सम्पूर्ण सत्य आप जानते तो ईश्वर की तरह मौन हो जाते.आप फिर किसी सत्य की तलाश में नहीं निकलते बल्कि कोई खोजी व्यक्ति आप की तलाश में निकलता.मई भी सम्पूर्ण सत्य नहीं जानता हूँ,लेकिन जो मैंने अपनी आँखों से देखा है,उसपर मै अटूट विश्वास करता हूँ.आप मेरे विश्वाश पर विश्वास करें या न करें,उससे मेरे ऊपर कोई फर्क नहीं पड़ता है.आप ने अज्ञानता,मानसिक बीमारी और नशे कि बात की है तो सौभाग्य से मुझे ऐसा कोई रोग नहीं है.बल्कि मै तो जिन्हे ये रोग लगा है,उसकी हेल्प करता हूँ कि वो रोगमुक्त हो जाये.जहाँ तक आप ने ईश्वर की बात की है तो ईश्वर,जीव और माया तीनो का अस्तित्व इस सृष्टि में सदैव से रहा है और सदैव रहेगा.ये कभी सूक्ष्म रूप में रहते हैं तो कभी स्थूल रूप में.मै अपना रिसर्च जरी रखता हूँऔर आप अपना.बीच बीच में मिलते रहेंगे.याद करने के लिए आभार.

    dineshaastik के द्वारा
    December 8, 2013

    मान्यवर, क्या आप बतायेंगे कि सृष्टि का सम्पूर्ण सत्य क्या है और इसे आजतक कौन कौन जान पाया है? लोगों ने इसी तरह के शब्दों का प्रयोग करके गुरु, सदगुरु, धर्मगुरु, पैगम्बर, मसीह आदि बनकर ठगा है। लोगों ने ठगने के लिये अपने अपने अपने ईश्वर की कल्पना भी कर ली और उस ईश्वर से मिलने का दावा भी किया। अपने अपने नियम और कानून बनाकर उन्हें ईश्वरीय नियम घोषित कर दिया। मान्यवर, पाखंड का वास्तविक अर्थ सत्य का खंड करना यानि  को झूठ की हथोड़ी से तोड़ना। तर्क और बुद्धि को अस्वीकार कर, आस्था, अंधश्रद्धा और अंधविश्वास आदि को उनपर आरोपित करना। मान्वयर, आप मुझे वह क्यों बनाना चाहते हैं जो है ही नहीं।  आप जिसपर विश्वास करके उसे दुष्प्रचारित करते हैं उससे  आपको फर्क पड़े या न पड़े, लेकिन उसका समाज एवं विश्व  पर किसी न किसी रुप में दुष्प्रभाव जरूर है। आप जिन आँखों बात कर रहे हैं वह संभवतः अज्ञान ही है। मान्यवर श्रद्दा और विश्वास स्वतंत्र चिंतन में बाधक होते हैं। मान्यवरस, क्या आप बतायेंगे कि समय किसने और कब बनाया?

sinsera के द्वारा
December 6, 2013

भाई अनिल जी,हमारा सफ़र अभी चल रहा है, वैलिडिटी बाकी है, आजकल तो लाइफ टाइम वैलिडिटी भी कभी कभी धोखा दे जाती है…चलो सो जाते हैं अब फिर किसी सच की तलाश में. कल फिर, सुबह उठ कर फिर इस झूठी दुनिया का दीदार करना है………..और हाँ , अगर ये कहानी सच्ची है तो …आपकी माताजी को आपके साथ देख कर बहुत ख़ुशी हुई………

    December 7, 2013

    दी, आपने सही कहाँ………………सच तो यही है कि अक्सर लाइफ टाइम वैलिडिटी ही धोखा दे जाती है…अतः धोखा हैम सबके लिए इतना बड़ा हो गया है वरन यह तो एक मामूली चीज है. जो कौड़ियों की भांति हर गली और मोहल्लों में मिलती है………………………………. दी! सच तो यह है कि मैं कभी किसी से दूर हुआ ही नहीं था और न ही होना चाहता था. यह बात अपनी प्रेम कहानी में स्वीकार भी किया हूँ. मैं तो बस एक नया रिस्ता जोड़ने में लगा हुआ था…..वैसे भी रिस्ते जोड़ने के लिए होते हैं और तोड़ने के लिए……………..वे लोग मुर्ख और जाहिल होते हैं जो माता-पिता के लिए प्रेम को, या फिर प्रेम के लिए माता-पिता का त्याग करते हैं……………….दो साल पहले माता जी की रीढ़ की हड्डी टूट जाने के कारन ठीक से चल-फिर नहीं पाती थी और हाथ से एक गिलास पानी भी नहीं उठता था. पिछले एक सालो से उनके साथ एक और समस्या हो गयी कि उनके पेशाब में जलन होने लगा. अतः शादी के ७-८ महीने बाद उनको अपने पास ही बोला लिया और यहीं से इलाज कर रहा हूँ. जांच के बाद पता चला कि उनके दाहिने किडनी में २२ एमएम का सिस्ट है. दवा चल रहा है………………और काफी सुधार हैं उनके हालत में. यह अनजानी के दिन-रात सेवा का असर है कि आज वो ठीक से चल-फिर पाती है. इतना ही २५-३० किलो वजन भी उठा सकती है और पहले की तरह मेरी धुलाई भी कर सकती हैं. वैसे ही अपने पैरों के निचे मुझे दाबकर………..परन्तु अब उतना नहीं कर सकती क्योंकि कुछ बड़ा हो गया हूँ मैं न. इसलिए मैं भी अपने बड़ा होने कुछ फायदा उठता हूँ उनको उनको हाथी उपनाम से चिढ़ाकर और वो मुझे चूहा कहकर चिढ़ाती हैं. कहती हैं, ” चूहा! यदि पकड़ में आ गए तो पैर से मसल दूंगी” परन्तु उनको क्या मालुम कि यह चूहा समय से आगे निकल गया है……………हाँ…………हाँ…………..हाँ………………बहुत दिनों के बाद इधर का रुख हुआ………..उसके लिए हार्दिक आभार!

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
December 6, 2013

प्रिय अलीन जी …शीर्षक कोई रखे तो आप सा ….ख़ास ….जीवन और मृत्यु सच में है ही ऐसे मरा मरे तो कैसे …..जिन्दा ही तो मरेगा ….अँधेरा न हो तो उजाला करे क्या ..आप खुद हँसे… हंसाये कुछ दार्शनिक भाव उभरे अच्छा लगा ….तौलिया की झाड़ फूंक करा लेना .. भ्रमर ५

    December 7, 2013

    आदरणीय,                    शीर्षक की जरुरत तब पड़ती है जब हम जबरदस्ती लिखते हैं. यहाँ तो बस मुझसे लिखा गया है. एस लेख में बताया भी हूँ कि मैं पेन और कापी धुंध रहा था “अँधेरे” पर कुछ लिखने के लिए परन्तु मुझसे कुछ और हो गया….जो मेरे दिमाग में था ही नहीं……………………………….. तौलिया…………………हाँ………………हाँ……………………….सोचा तो मैं भी यही था पर मेरे साथ एक समस्या ये है कि जिस एरिया में मेरी पोस्टिंग है यहाँ झाड फूंक करने वाले बहुत है. पर मैं सबसे अनजान हूँ यदि मैं अपने कर्मचारियों से कहता हूँ तो किसी बाबा को लेते आओ……………….तो पता चला कि दस बाबा दरवाजे पर आकर चिल्लाने लंगेंगे कि साहब मुझसे झाड-फूंक करवा लो………….तब तो हुई बहुत बड़ी समस्या. दस झाड फूंक वालों का सामना करने से बेहतर है कि एक आत्मा का सामना कर लिया जाय……………………आप आये बहार आई ……….हार्दिक आभार!

rekhafbd के द्वारा
December 6, 2013

अनिल जी , सत्य तो यह है कि यह जीवन और मृत्यु किसी एक की दो अवस्थाएं वरना यदि यह सत्य होता तो दोनों का एक अपना अलग स्वरुप होता. ऐसे में कभी जिंदगी मौत में तब्दील नहीं होती. सत्य तो यह है कि यह बिलकुल झूठ है जैसे सुबह का शाम होना झूठ है. यह तो सूरज है जिसकी रोशनी धरती के जिस-जिस कोने पर पड़ेगी वहाँ सुबह और ठीक उसके विपरीत शाम होती है. परन्तु इन दोनों के बोच में ऐसी कई अवस्थाएं भी होती है जो सुबह से शाम की ओर अग्रसर होती है और फिर शाम से सुबह की ओर. सुन्दर आलेख ,बधाई

sadguruji के द्वारा
December 6, 2013

Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा December 4, 2013 मुनिवर आप मामले की गंभीरता को समझ नहीं रहे हैं.. ख़राब टेप रिकॉर्डर की तरह एक ही धुन सुनाने लगते हैं आप..मुझे मेरे बचपन के मित्र चमन की याद आ रही है वो रोज़ मेरे यहाँ ताश खेलने आता था रोज़ लड़ाई हो जाती थी उसकी किसी न किसी से, रोज़ बोल के जाता था कि अब कल नहीं आऊंगा, लेकिन फिर अगले दिन तय समय पर आ जाता था…!! ज्ञानी को इतनी गंभीरता शोभा नहीं देती है…!! मैं आपकी दिल से इज्ज़त करता हूँ…आप बेकार में क्रोधित हो जाते हैं… ब्रह्म चर्चा सुंदर है लेकिन हर वक़्त ब्रह्म चर्चा उचित नहीं है…!! और आप को बता दूं जो मैं कर रहा हूँ वो अति प्राचीन तिब्बतन ध्यान विधि है ‘अतिशयोक्ति’ किसी बात को उस पॉइंट तक पहुंचा दो जहाँ उसका रूपांतरण हो जाये…जैसे पानी का कोथनांक 100 d c होता है जहाँ पहुँच पर पानी भाप बन जाता है उसकी तरह विवाद का भी कोथनांक होता है…!! लगता है तिब्बत के बारे में आप बहुत कम जानते हैं…!! खैर..!! “मुझे आप से बात करने में कोई रूचि नहीं है.इसीलिए आप भी जबदस्ती बातचीत न करें.” रूचि कैसे होगी आपकी, लेकिन क्या करें…मेरी भी मज़बूरी है… कल अनील कह रहा था ‘ये कैसे सद्गुरु हैं यार…?’ मैंने कहा जैसे भी अच्छे हैं…इनको इनके जैसे बने रहने दो…जैसे आसाराम के बात लोगों की साधू शब्द पर से श्रधा उठ गया उसी तरह धीरे धीरे सद्गुरु शब्द का जो सम्मोहन है लोगों के भीतर हो भी इनके मद्ध्यम से टूट जाएगा…मैं भी जानबुझ कर अपने नाम में सूफ़ी जोड़ लिया… लोग शब्द से सम्मोहित हो जाते हैं… ज़रुरत है कि शोब्दों को नए अर्थ दे दिए जाएँ…ताकि लोग इसके भार से मुक्त हो जाए… शायद आप नहीं जानते आप का सद्गुरु होना मेरे लिए कितना उपयोगी है…ये सब मेरा ही कमाल है कि सोनम जी ने आपको डांट दिया था…वर्ना इस देश के लोगों में इतनी कहां हिम्मत की सदगुरुओं को डांट दे…अगर होता तो आज इस देश की ये दुर्दशा नहीं होती….!! ………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………..प्रिय सूफी जी,सादर प्रेम,=१=सबसे पहले आप ने अपने बचपन के मित्र चमन की बात की है.न मै अब बचपने में हूँ.न ही मै ताश खेलता हूँ और न ही लड़ाई करता हूँ.इसीलिए चमन की बात छोड़िये.=२=आप ने कहा है,ज्ञानी को इतनी गंभीरता शोभा नहीं देती है…!! मैं आपकी दिल से इज्ज़त करता हूँ…आप बेकार में क्रोधित हो जाते हैं… ब्रह्म चर्चा सुंदर है लेकिन हर वक़्त ब्रह्म चर्चा उचित नहीं है…!! और आप को बता दूं जो मैं कर रहा हूँ वो अति प्राचीन तिब्बतन ध्यान विधि है ‘अतिशयोक्ति’ किसी बात को उस पॉइंट तक पहुंचा दो जहाँ उसका रूपांतरण हो जाये…जैसे पानी का कोथनांक 100 d c होता है जहाँ पहुँच पर पानी भाप बन जाता है उसकी तरह विवाद का भी कोथनांक होता है…!!=क्रोधित आप भी हो जाते हैं.लेकिन आप स्वीकार नहीं करते हैं.आप अपने क्रोध पर बड़ी चालाकी से ध्यान विधि का आवरण चढ़ा देते हैं.जबकि अनिल जी क्रोध है भी तो जाहिर कर देते हैं.रही बात दिल से इज्जत करने तो इस मंच पर जितने भी ब्लॉगर है,सबकी दिल से मै इज्जत करता हूँ.=४=आप ने कहा है-कल अनील कह रहा था ‘ये कैसे सद्गुरु हैं यार…?’मैंने इस बात को आपसे कई बार कहा है कि मै किसी से नहीं कहता हूँ कि मुझे सद्गुरु मानो.जो मानते हैं सो मानते हैं.आप से या अनिल जी से या दिनेश जी से कौन कहता है कि मानिये.इसीलिए ये प्रश्न ही मूर्खतापूर्ण है.आप सूफी हैं या नहीं हैं,इस पर मैंने कभी बहस की है.करना भी नहीं चाहता,क्योंकि मुझे इस बात में कोई दिलचस्पी नहीं हुई की आप वास्तव में सूफी हैं या नहीं हैं.जो बात आप की पसंद आएगी,उसकी मै तारीफ करूँगा,जो नहीं पसंद आएगी,उसकी आलोचना करूँगा.आप निश्चिन्त रहिये मै “सद्गुरु” शब्द का मान हमेशा कायम रखूँगा.आप अपनी चिता कीजिये.=५=अपने कमेंट में आप ने कहा है-आसाराम के बाद लोगों की साधू शब्द पर से श्रधा उठ गया.एक आसाराम के गलत होने से सरे साधू गलत नहीं हो जाते हैं.जिनकी साधुओं पर श्रद्धा वो हमेशा रहेगी.ऐसी बातें केवल वो लोग कर रहे हैं जिनकी साधुओं पर श्रद्धा पहले भी नहीं थी.आप को याद होगा कि आसाराम को गलत मैंने शुरू में ही कहा था.आपने तो बाकायदा एक लेख लिखा था-”गलत नहीं हैं आसाराम” आप ने उन्हें भगवत्ता को उपलब्ध बताया था,जिसकी मैंने आलोचना की थी.आप जो कहे वो ठीक,दूसरे जो कहें वो गलत,पहले ये बचपना छोड़िये.=6=आप ने अपने कमेंट में कहा है-सोनम जी ने आपको डांट दिया था…आप हमेशा लड़ने-भिड़ने वाली बात क्यों करते हैं.सोनम जी ने मुझे क्या कहा और मैंने सोनम जी को क्या कहा ये दो चार बार पढ़ लीजिये.मैंने कभी आप से कहा कि सोनम जी ने आप को क्या कहा.आप कहते हैं कि सोनम जी ने सद्गुरुओं को डांट दिया.आप जैसा झूठा आदमी मैंने नहीं देखा.सोनम जी ने सूफी को क्या कहा ये आप क्यों नहीं बोलते हैं.आप सब ने सोनम जी अच्छे लेख की बुराई की,जबकी मैंने सच्चाई की तारीफ की और जागरण परिवार को भी बहुत अच्छा लगा तभी तो “बेस्ट ब्लॉगर आफ दी वीक” चुना है,वो न चुनते तो मुझे आश्चर्य होता.अंत में आप सबसे मेरा निवेदन है कि इतना बहस करने की बजाय मै यहाँ आकर प्रिय अनिल जी का कोई लेख पढ़ लूँ वो बेहतर है.उनका लेख जितनी बार पढ़िए कुछ न कुछ विचारने को मिलता है.उनके नए लेख की मुझे प्रतीक्षा है.

sadguruji के द्वारा
December 6, 2013

आदरणीय अनिल जी,सूफी जी और दिनेश आस्तिक जी,आप लोग मेरी पूरी बात सुन लिया कीजिये,फिर आप लोग कमेंट करें तो ज्यादा अच्छा होगा.मैंने संक्षेप में कहा था-”आदरणीय सूफी जी,आप भले आत्मा के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते हों,परन्तु मैंने अपनी इन आँखों से आत्मा को देखा है.आप को विश्वास हो न हो उससे मुझ पर कोई फर्क नहीं पढता है,परन्तु मै १०० प्रतिशत यकीन करता हूँ,और सदैव करता रहूँगा,क्योंकि मै आँखों देखि कह रहा हूँ.” १=आत्मा-परमात्मा को आँखे बंद करके समाधी की अवस्था में महसूस करना.आत्मा के द्वारा आत्मा-परमात्मा का साक्षत्कार.इस विषय को छोड़ दीजिये.मै इसकी बात नहीं कर रहा हूँ. २=मैंने इन आँखों से आत्मा को देखा है,इसीलिए मै मृत्यु के बाद भी जीवन और आत्मा के अस्तित्व पर उतना ही यकीन रखता हूँ,जितना कि नज़र आते हुए इस संसार पर.अब मेरी पूरी बात सुन लीजिये.मैंने अपनी आँखों से एक भटकती हुई आत्मा को देखा था,तबसे मृत्यु के बाद भी जीवन है ,इस पर मेरी उतनी ही दृढ आस्था हो गई है,जितनी कि अपने अस्तित्व पर.पूरी घटना मै जल्द ही ब्लॉग पर लाऊंगा. ३=मै जानता हूँ कि विज्ञानं अभी मत्युपरांत जीवन जारी रहने की बात स्वीकार नहीं करता है.विज्ञानं कहता है कि मरने के बाद शरीर और मन नहीं रहता है,इसीलिए मरने और शरीर जला दिए जाने के बाद जीवन असम्भव है.परन्तु विज्ञानं की बात सही नहीं है.मरने और शरीर जला देने के वावजूद भी सूक्ष्म शरीर,मन,बुद्धि,चित्त,अहंकार और आत्मा आदि रहते हैं.मरता-जलाता पंचतत्व है सूक्ष्मतत्व विदयमान रहता है.हमारा स्थूल जीवन भले ख़त्म हो जाये ,परन्तु सूक्ष्म रूप से जीवन जारी रहता है.वो चलता,फिरता,बोलता,बतियाता है,परन्तु उसकी इच्छा है कि किसको दिखाई देगी और किससे बात करेगी.लोग इसे भूत-प्रेतों का अस्तित्व कहते हैं,परन्तु मै इसे जीवात्मा का अस्तित्व कहता हूँ,जबकि इस समय जबकि इस समय शरीर और जीवात्मा दोनों साथ हैं. ४=प्रिय सूफी जी,आप कोशिश करते है प्रयोग करने कि,परन्तु असफल रहते हैं.सरिता जी के ब्लॉग पर मै और टिपण्णी नहीं करना चाहता,लेकिन आप की कुछ बातों का जबाब आप की ग़लतफ़हमी दूर करने के लिए मै जरुर देना चाहूंगा.प्रिय अनिल जी से क्षमा चाहते हुए क्योंकि ये उनका ब्लॉग है,मै सूफी जी का एक कमेंट यहाँ सरिता जी के ब्लॉग पर का दे रहा हूँ.

    dineshaastik के द्वारा
    December 7, 2013

    आदरणीय राजेन्द्र जी, आपने कहा कि मैंने आत्म एवं परमात्मा को देखा है।  तीन कारणों से यह सच हो सकता हैप्रथम अज्ञानता, द्वितीय मानसिक बीमारी  और तृतीय किसी तरह के नशे का प्रभाव। आपने इन्हें जिन आँखों से देखा है  वह आँखे पू्र्व में मरे पास भी थी जिन्हें दुनियाँ अज्ञानता की आँखों के नाम से  जानती है किन्तु ्अब में उनसे मुक्त हो चुका हूँ।

    dineshaastik के द्वारा
    December 7, 2013

    मन, तर्क, विचार, चेतना, आत्मा, इच्छा और सत्य ये सब कोरी कल्पनायें हैं। मनुष्य के परिपेक्ष्य (Pespectives) के बाहर कुछ नहीं हैं। -फ्रेडरिक नीत्शे

    dineshaastik के द्वारा
    December 7, 2013

    मनुष्य ईश्वर को संसार का सृष्टा इसलिये मानता है क्योंकि वह संसार में यह अनुभव करता है कि प्रत्येक वस्तु किसी न किसी की बनाई हुई होती है। मनुष्य संसार में अनेक वस्तुओं का उपकरण के रूप में प्रयोग करता है और इन वस्तुओं को बनाता है। इसी अनुभव के आधार पर हम ईश्वर की एक बड़े कलाकार के रूप में कल्पना कर लेते हैं जो इस संसार की रचना करता है।

    dineshaastik के द्वारा
    December 7, 2013

    धर्म में ईश्वर को स्वयं-भू कहा जाता है। क्योंकि वह स्वयं अपनी रचना करता है। जगत ईश्वर की रचना करता है। किन्तु ईश्वर किसी की रचना नहीं है। प्रश्न यह उठता है कि यदि ईश्वर स्वयं अपनी रचना करता है तो उसे अपने से अगल होकर यह कार्य करना पड़ेगा और ऐसी स्थिति में उसकी सत्ता पराश्रित हो जायेगी तथा किसी भी पराश्रित सत्ता को ईश्वर नहीं कहा जा सकता। अतः ईश्वर है ही नहीं।

    sadguruji के द्वारा
    December 7, 2013

    आदरणीय दिनेश आस्तिक जी,आप सृष्टि का सम्पूर्ण सत्य नहीं जानते हैं.जितना जानते हैं,उसी आधार पर कह रहे हैं,इसीको पाखंड कहते हैं.पाखंड का अर्थ है-सत्य का एक खंड़मात्र जिसने पाया हो.सम्पूर्ण सत्य नहीं.यदि सम्पूर्ण सत्य आप जानते तो ईश्वर की तरह मौन हो जाते.आप फिर किसी सत्य की तलाश में नहीं निकलते बल्कि कोई खोजी व्यक्ति आप की तलाश में निकलता.मई भी सम्पूर्ण सत्य नहीं जानता हूँ,लेकिन जो मैंने अपनी आँखों से देखा है,उसपर मै अटूट विश्वास करता हूँ.आप मेरे विश्वाश पर विश्वास करें या न करें,उससे मेरे ऊपर कोई फर्क नहीं पड़ता है.आप ने अज्ञानता,मानसिक बीमारी और नशे कि बात की है तो सौभाग्य से मुझे ऐसा कोई रोग नहीं है.बल्कि मै तो जिन्हे ये रोग लगा है,उसकी हेल्प करता हूँ कि वो रोगमुक्त हो जाये.जहाँ तक आप ने ईश्वर की बात की है तो ईश्वर,जीव और माया तीनो का अस्तित्व इस सृष्टि में सदैव से रहा है और सदैव रहेगा.ये कभी सूक्ष्म रूप में रहते हैं तो कभी स्थूल रूप में.मै अपना रिसर्च जरी रखता हूँऔर आप अपना.बीच बीच में मिलते रहेंगे.याद करने के लिए आभार.

    dineshaastik के द्वारा
    December 8, 2013

    मान्यवर, क्या आप बतायेंगे कि सृष्टि का सम्पूर्ण सत्य क्या है और इसे आजतक कौन कौन जान पाया है? लोगों ने इसी तरह के शब्दों का प्रयोग करके गुरु, सदगुरु, धर्मगुरु, पैगम्बर, मसीह आदि बनकर ठगा है। लोगों ने ठगने के लिये अपने अपने अपने ईश्वर की कल्पना भी कर ली और उस ईश्वर से मिलने का दावा भी किया। अपने अपने नियम और कानून बनाकर उन्हें ईश्वरीय नियम घोषित कर दिया। मान्यवर, पाखंड का वास्तविक अर्थ सत्य का खंड करना यानि को झूठ की हथोड़ी से तोड़ना। तर्क और बुद्धि को अस्वीकार कर, आस्था, अंधश्रद्धा और अंधविश्वास आदि को उनपर आरोपित करना। मान्वयर, आप मुझे वह क्यों बनाना चाहते हैं जो है ही नहीं। आप जिसपर विश्वास करके उसे दुष्प्रचारित करते हैं उससे आपको फर्क पड़े या न पड़े, लेकिन उसका समाज एवं विश्व पर किसी न किसी रुप में दुष्प्रभाव जरूर है। आप जिन आँखों बात कर रहे हैं वह संभवतः अज्ञान ही है। मान्यवर श्रद्दा और विश्वास स्वतंत्र चिंतन में बाधक होते हैं। मान्यवरस, क्या आप बतायेंगे कि समय किसने और कब बनाया?

sadguruji के द्वारा
December 4, 2013

आदरणीय अनिल जी,सबसे पहले तो आप को बधाई और जागरण जंक्शन को धन्यवाद,अब आप के नाम पर क्लीक करने से आप की साईट खुल रही है.ये पाठकों के लिए बहुत अच्छा है.आप ने आदरणीय शब्द पर जो बात कही है,वो सबके लिए नहीं लागू होती है.पूरा संसार इस शब्द को प्रयोग करता है.ये एक शिष्टाचार और विनम्रता की बात मानी जाती है.अर्थ का अनर्थ तो कुछ भी किया जा सकता है.आप कह रहे हैं कि आदर बातों से ,आँखों से झलकता है.क्या आदरणीय शब्द से नहीं झलकता है.सभी इस मंच पर एक जैसी बुद्धि के नहीं हैं.मेरी समझ से आदरणीय शब्द पर आप लोगों की आपत्ति ब्यर्थ है और जो उसका अर्थ आप ने लगाया है वो भी अर्थ का अनर्थ किया गया है.आप लोग करें या न करे लेकिन जो लोग इस शब्द का प्रयोग कर रहे हैं उन्हें करने दीजिये,इसमें आप की आपत्ति में मुझे कोई बुद्धमानी नज़र नहीं आती है.आप ने स्वयं जागरण जंक्शन के संपादक महोदर के लिए आदरणीय शब्द का प्रयोग किया है.व्यक्तित्व में दोहरा मापदंड मत अपनाइये.शब्दों की बाजीगरी मुझे पसंद नहीं है.आप लोगों से अनावश्यक बहस करने से अच्छा है कि मैं आप लोगों के लेख पढ़कर चुपचाप चलें जाऊँ.

    December 5, 2013

    जी, शुक्रिया! आपत्ति आदरणीय शब्द पर नहीं बल्कि उसके उपयोग पर हैं. जब हम किसी के पोस्ट पर जाते हैं तो उससे सीधे रूबरू होते हैं.  जैसे मैं आपकी पोस्ट पर गया तो या तो आपको मुझे आदरणीय बोलना चाहिए या फिर राजेंद्र जी. परन्तु यदि मैं आपको आदरणीय राजेंद्र जी बोल रहा हूँ तो आपका सम्मान नहीं बल्कि अपमान है. यदि किसी को सीधे सम्मान दे रहे हैं तो उसके नाम के साथ आदरणीय लगाना अनौचित्य है. हाँ यदि किसी थर्ड व्यक्ति के सामने हो या फिर कई लोगो के साथ हो तो किसी स्पेसिफिक व्यक्ति के लिए कोई चीज है तो ऐसा कर सकते हैं. जागरण जंक्शन पर सम्पादक महोदय के पहिले आदरणीय उपयोग किया क्योंकि वहाँ आप, सम्पादक महोदय और मैं तीन लोग थे. मेरा संबोधन सम्पादक महोदय को था, अतः वहाँ ऐसा कहना उचित था. परन्तु यह तो और अशोभनीय हो जाता है जब हम कहते है कि फलाने-फलाने मेरे लिए आदरणीय है. इसका मतलब कि वह आदरणीय नहीं है और सिर्फ हम कर रहे हैं या फिर औरों से खुद को श्रेष्ठ साबित करने के लिए कर रहे हैं. आप बार-बार भागने की बात क्यों करते हैं? बहस हमेशा अनावश्यक ही होती है और यहाँ बहस नहीं बल्कि शिष्टाचार और विनम्रता क्या है? इस पर प्रकाश डाला जा रहा है.

sadguruji के द्वारा
December 4, 2013

आदरणीय सूफी जी,आप भले आत्मा के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते हों,परन्तु मैंने अपनी इन आँखों से आत्मा को देखा है.आप को विश्वास हो न हो उससे मुझ पर कोई फर्क नहीं पढता है,परन्तु मै १०० प्रतिशत यकीन करता हूँ,और सदैव करता रहूँगा,क्योंकि मै आँखों देखि कह रहा हूँ.शब्दों की बाजीगरी में आप माहिर हैं.अपनी ही कही हुई बात को अपनी सुबिधानुसार आप उलटते-पुलटते रहतें हैं और मात्र बौद्धिक कसरत करते रहते हैं.मेरे पास जो है वो मेरा अनुभव है और आपके पास जो है वो आप का ज्ञान है और वो भी आधा सच है और आधा झूठ.मेरा अनुभव यदि आप के लिए अन्धविश्वास है तो आप का कहा हुआ सारा ज्ञान भी मेरी दृष्टि में सच नहीं है.अपने अनुभव से परखने पर जो सच लगेगा सिर्फ वही मेरे कम का है.इस विषय पर बहस करने से कोई फायदा नहीं है.

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 4, 2013

    मुनिवर, मुझे दादा-ए-सुखन असदउल्ला खां मिर्ज़ा ग़ालिब की याद आ रही है, “बक रहा हूँ जूनू में क्या क्या कुछ, कुछ न समझे ख़ुदा करे कोई” …. मुनि उवाच, “परन्तु मैंने अपनी इन आँखों से आत्मा को देखा है.” ये तो ऐसा हो गया जैसे कोई कुत्ता कहे कि मैंने अपने इन मुंह से अपनी पूछ को पकड़ा है… अगर आपने आत्मा को देखा है तो फिर आप कौन हैं…??? आपने आत्मा को देखा मतलब आत्मा ‘ऑब्जेक्ट’ हुआ फिर सब्जेक्ट कौन है…??? जिसने देखा वो कौन है…आँख है…? शरीर है…?? कौन है…आप कौन हैं…??? “शब्दों की बाजीगरी में आप माहिर हैं.” क्यों सुनी सुनाई बातों को दोहरा रहे हैं…??? “मात्र बौद्धिक कसरत करते रहते हैं” मैंने कहीं मज़ाक में कह दिया और आप गाँठ बांध कर बैठ गए…?? वही बात मुझे क्यों सुनते हैं जो मैं खुद कहता हूँ…?? मेरी ही बातों को दोहराने लगे हैं आप आज कल…!! जैसे, “वो भी आधा सच है और आधा झूठ.” …. “मेरा अनुभव यदि आप के लिए अन्धविश्वास है” पहले तो आप किताबी बातों को दोहराने में कुशल थे लेकिन आज कल वो भी ठीक से नहीं हो रहा है आप से….बौखलाहट में कुछ से कुछ बोल रहे हैं…!! “इस विषय पर बहस करने से कोई फायदा नहीं है” ये बात अगर समझ में आ गयी है तो एक महीने से आप इसे दोहरा भी रहे हैं और बहस भी किये जा रहे हैं…ऐसा क्यों…??

    December 5, 2013

    जी, आत्मा को मैंने भी देखा है परन्तु मुझे मेरी आखों पर भरोषा नहीं क्योंकि वह भी मन से संचालित होती है और मन की एक अपनी सीमायें है जिससे बाहर जाना नामुमकिन है मजा तो तब है जब हम खुद किसी का साक्षी हो जाए,……………..

    dineshaastik के द्वारा
    December 6, 2013

    महाशय, आप जैसे लोगों की बातों में बड़ा विरोधाभास है,  कभी कहते हैं कि आत्मा को आँखों से देखा नहीं जा सकता। अब कहते हैं कि मैंने अपनी इन  आँखों से आत्मा को देखा है। हाँ मान्यवर, आपने जरूर देखो होगा आत्मा हो, लेकिन इन  आँखों से नहीं देखा होगा, बल्कि अज्ञानता रूपी आँखों से देखा होगा। क्षमा करना सत्य में कड़वाहट होती है। लेकिन होता लाभाप्रद है।

    December 6, 2013

    हाँ………………..हाँ…………………..

December 4, 2013

राजेंद्र जी, आपके ब्लॉग पर एक बार फिर गया था परन्तु अब भी जाने क्यों मेरे कमेंट पब्लिश नहीं हो रहा. हो सकता है स्पैम में चला गया…………….एक बार चेक कर लें.

sadguruji के द्वारा
December 3, 2013

आदरणीय सूफी ध्यान मुहम्मद जी,आप अपनी मर्जी से जो चाहे कहें लेकिन इस मंच के सभी ब्लोगेर मेरे लिए आदरणीय हैं,वो चाहे आप हों,सरिता जी हों,अनिल जी हों या कोई भी क्यों हो.ये मेरे संस्कार हैं.आप के संस्कार आप के कमेंट से झलक रहा है.ये आप कि भाषा हो सकती है,मेरी नहीं.अपने भीतर कुछ प्रेम पैदा कीजिये.आप ही के भीतर बैठकर कोई आप को खाये जा रहा है,जिसका आप को पता भी है और नहीं भी है.आदरणीय अनिल जी की “मेरी सदा-एक अधूरी परन्तु सच्ची प्रेम कहानी” वही पढ़ लीजिये.मै तो बहुत भावुक हो गया था पढ़कर.एक अच्छी प्रेम कहानी से मुड़ फ्रेश हो जायेगा और कुछ प्रेममय स्मृतिया भी आप की ताजी हो जायेगीं.अब मै जा रहा हूँ गीता पर कुछ लिखने.आप की आलोचना का इंतजार रहेगा,जिसमे कभी-कभी कोई कीमती चीज भी मिल जाती है.

    December 4, 2013

    जी, आपने मेरी प्रेम कहानी पढ़ी उसके लिए शुक्रिया……………….परन्तु यह सिर्फ मेरी ही नहीं बल्कि लाखों हज़ारों युवाओं की हैं जो जीवन की तलाश में मरे जा रहे हैं…………….वैसे अब यह कहानी मेरे लिए कहानी कहाँ रह गयी? अब तो यह हकीकत बन गयी है……….और आज मेरी अनजानी मेरे साथ और साथ मेरी कोशिश भी ताकि हरेक अनजानी से बिछड़ा अनिल मिल जाए…………..सबकी मुहब्बत मुकम्मल हो जाए…………………..आमीन!

Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
December 3, 2013

अनील बाबू, आप लतारणीय (लात खाने योग्य) कब से हो गएँ…??? सद्गुरु जी कह रहे हैं आदरणीय सरिता जी के ब्लॉग पर इस तरह की बातें न करें…यही बेहतर है…अब सवाल ये है कि अगर सरिता जी उनकी नज़र में आदरणीय हैं तो क्या आप लतारणीय (लात खाने योग्य) हैं…?? अनील बाबू खुद कसम, हमें पता नहीं था कि आप इतने गिरे हुए इंसान हैं…!!

    December 3, 2013

    अब, यह तो राजेन्द्र जी ही बताएँगे……………..परन्तु मैं तो बस इतना ही कहूंगा कि हाँ मैं लातरणीय हूँ…….वो भी बचपन से………………..कभी मान बाप लात मरते थे ……….अभी मैं खुद को लात मरता हूँ………………

    December 3, 2013

    इंसान गिरा हुआ ही होता है……………वो भी जन्म से ……..मैं भी कोई इससे अछूता नहीं………….

    sadguruji के द्वारा
    December 3, 2013

    आदरणीय सूफी ध्यान मुहम्मद जी,आप अपनी मर्जी से जो चाहे कहें लेकिन इस मंच के सभी ब्लोगेर मेरे लिए आदरणीय हैं,वो चाहे आप हों,सरिता जी हों,अनिल जी हों या कोई भी क्यों हो.ये मेरे संस्कार हैं.आप के संस्कार आप के कमेंट से झलक रहा है.ये आप कि भाषा हो सकती है,मेरी नहीं.

    December 4, 2013

    माफ़ करियेगा………………………………………..राजेंद्र जी……………………………………….किसी के प्रति यदि आदर है तो उसे हरेक जगह चिल्ला-चिल्लाकर कहने की कोई जरुरत नहीं……………वो तो बातों से, आखों से झलकता है……………….यदि आदरणीय सभी है तो इस बात को कहकर अनादर करने की क्या जरूरत………! इसका मतलब यह कि सामने वाला आदर के योग्य नहीं है हम जबर्दस्ती उसकी आदर कर रहे हैं या फिर यह हमारा अहंकार है जो कहता हैं कि हम आदर करते हैं और दूसरे नहीं. यह भी तो कहाँ जा सकता है कि सभी आदरणीय हैं. अब इस वाक्य में सामने वाला मोहताज़ नहीं कि उसे कोई आदरणीय कहें या न कहें. जैसे कि माता-पिता हम उनके आदर करे या न करें………..परन्तु वो हमारे लिए आदरणीय है. जब हम किसी को यह कहते है कि हम आदर करते है उनका तो जाने-अनजाने में अनादर करते हैं क्योंकि हम दिखाना चाहते हैं कि जिसका आदर कर रहे हैं हम उससे श्रेस्ठ है जबकि दूसरे वाक्य से यह इंगित होता है कि सामने वाला हमसे श्रेष्ठ है…..आप तो सवयम बुद्धिजीवी है…….खुद इस बात निर्णय लीजियेगा.

sadguruji के द्वारा
December 3, 2013

यह तो कोई मुसाफिर है जो इस पर से उस पार जाने का साक्षी होता है. यह सफ़र कुछ ऐसा है जैसे कोई यात्री एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन तक जाने के लिए उतनी दुरी का टिकट कटा कर बैठ जाता है और फिर सफ़र ख़त्म होते ही, टिकट की वैलिडिटी ख़त्म. फिर एक नए सफ़र के लिए नयी वैलिडिटी.ऐसा ही कुछ जीवन-मृत्यु है……एक खूबसूरत झूठ!……….सत्य तो कोई और है जो इससे होकर गुजरता है…. …………अच्छा विचारणीय लेख.

    December 3, 2013

    अच्छा कभी विचारणीय नहीं हो सकता और जो विचारणीय है वो अच्छा नहीं हो सकता…………..अभी तक आप यह बात समझ गए होंगे कि हरेक विचार झूठ होता है. इसका कहने का मतलब कि आपकी नज़र में मेरा लेख झूठ है?……………तो फिर सत्य क्या है? कृपया स्पष्ट करें……….

    sadguruji के द्वारा
    December 3, 2013

    अच्छा मैंने इसीलिए कहा क्योंकि ये लेख मुझे अच्छा लगा और विचारणीय मैंने इसलिए कहा क्योंकि लेख को पढ़कर या पढ़ते हुए इसकी सत्यता पर विचार किया जाये तो इसमें सच्चाई नज़र आती है.

    December 4, 2013

    आदरणीय! आपको अच्छा लगा यह बात तो समझ में आती है. परन्तु आप का कहना, “लेख को पढ़कर या पढ़ते हुए इसकी सत्यता पर विचार किया जाये तो इसमें सच्चाई नज़र आती है.” मान्यवर सत्यता पर कभी विचार नहीं क्या जाता जो सत्य है उस पर विचार करने की क्या जरूरत? क्या सूरज को देखने का बाद कोई यह कहेगा कि इस पर विचार करूँगा. नहीं न………………………… सत्य तो यही है कि यह लेख या फिर दुनिया का कोई भी बाह्य ज्ञान( चाहे किताबों से, ग्रंथों से या व्यक्तियों से) सब झूठ है जब तक कि आप खुद उसके साक्षी नहीं हो जाते. जब तक कि वह आपका अनुभव या अनुभूति नहीं बन जाता. चूँकि यह लेख मेरी अनुभूति है. अतः यह सिर्फ मेरे लिए सत्य है और आपके लिए एक झूठ …………………………………………

    dineshaastik के द्वारा
    December 6, 2013

    जीवन में स्थायित्व नहीं है। वह अनिश्चित है। जबकि मुत्यु निश्चित है। वह अंतिम सत्य है। जीवन के बाद मुत्यु है यह तो प्रमाणित है लेकिन मुत्यु के बाद जीवन है, यह केवल कपोल कल्पना है। यह डर हुये धर्मांध लोगों को स्वाभाविक कल्पना है। मृत्यु के बाद जीवन नहीं है, नहीं है, नहीं है।

    December 6, 2013

    मृत्यु के बाद जीवन है या नहीं………………और जीवन के बाद मृत्यु है कि नहीं …………………..दोनों ही भ्रम है……….झूठ है…………………यदि कोई व्यक्ति अपने जन्म और म्रत्यु का साक्षी हो तो यह बात स्वीकार करने योग्य है. यदि जन्म लिया हुआ बच्चा यह बताये कि मैं जन्म लिया हूँ तो बात समझ में आती है. यदि बात जन्मे को नहीं पता (जो अपने जन्म का साक्षी नहीं), वो दूसरों कैसे पता हो सकता है. अतः यह भ्रम है……झूठ है……………..! यदि मृत्यु है तो इसके बारे में जो जिन्दे है वो कैसे बताएँगे यह तो बात किसी मुर्दे से पूछनी चाहिए. क्योंकि अपनी मृत्यु का साक्षी तो वही है न. अतः किसी दुसरे को मरता हुआ देखकर हम स्वीकार करें की मृत्यु है या फिर हमें भी मरना है तो यह एक झूठ है, खुद के साथ धोखा है. हकीकत तो यह है कि हम पैदा ही नहीं हुए तो मरने का सवाल ही नहीं उठता,…………….

Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
December 3, 2013

१.)मृत्यु को झुठलाना मतलब जीवन का इंकार करना, जो मृत्यु को झूठ मानेगा उसका जीवन भी थोथा हो जाएया, उथला-उथला हो जाएया…जीवन का सारा मज़ा इसी बात में है कि एक दिन मरना है…आपका ये कहना कि ‘जीवन या मृत्यु एक खूबसूरत झूठ है- निराशावादी लोगों को थोडा सुख ज़रूर पहुंचेगा…लेकिन सान्त्वना सत्य नहीं होता… इस तरह की जीवन और मृत्यु विरोधी धारणा ने इस देश को काहिल, आलसी और शिथिल बना दिया….लोगों को सुस्त बना दिया… २.) मेरे देखे जीवन और मृत्यु एक निरंतर साथ चलने वाली प्रिक्रिया है…हम प्रति पल मर रहे हैं और प्रतिपल नए हो रहे हैं, जीवन एक परवाह है जहाँ निर्माण और विध्वंस साथ चलता रहता है…३) ज़रुरत है कि हम मृत्यु के प्रति सजग हों, उसका चिंतन करें…क्योंकि जो शरीर हमें मिला हुआ है उसका मरना एक दिन तय है, तो उचित ये होगा कि हम इस शरीर का उपयोग कर लें…और इसका एक ही उपयोग है कि हम इससे आत्मवान हो जाएँ… ये बात बिलकुल गलत है “सत्य तो कोई और है जो इससे होकर गुजरता है” कोई इससे हो कर नहीं गुज़रता है, जो गुज़र सकता है उसका जन्म अभी नहीं हुआ है, जैसे बीज पेड़ हो सकता है, उसमे फूल खिल सकते हैं, खूशबू उठ सकती है, ये सब उसकी सम्भावना है लेकिन ज़रूरी नहीं कि हर बीज पेड़ हो जाए, उसी तरह हर मनुष्य आत्मवान हो सकता है, ये बस पॉसिबिलिटी है…सत्य नहीं…Hence, death or life cannot be taken for granted. और जो आत्मवान है उससे ये कहना कि तुम नहीं मरोगे बकवास है क्योंकि जब तक कोई होश पूर्वक मृत्यु में खुद न उतर कर देख ले वो आत्मवान नहीं हो सकता है, जो आत्मवान है वो सत्य को जनता है वो सत्य को जान कर ही आत्मवान हुआ है….हम अभी नींद में बेहोश हो जाते है मौत तो बड़ी बात है, नींद तो नींद दिन में भी विचारों से आच्छादित रहते हैं…, ४) उचित हो कि हम ये कहें कि ऐसा उपाय है ऐसी साधना है जिसके तहत ‘हम होश पूर्वक मृत्यु में उतर सकते है…हम जान सकते हैं कि मौत क्या है, हम जान जान सकते हैं कि नींद क्या है, नींद में हमारे साथ क्या होता है… और एक बार जिसने नींद में होश कायम रख लिया वो मृत्य़ु को भी जान सकता है…ये देख सकता है कि मैं शरीर नहीं हूँ, ये बात मानने की नहीं है कि मैं शरीर नहीं हूँ मानने से खुछ नहीं होगा, बीज अगर मान भी ले कि मैं पेड़ हूँ उससे हो पेड़ नहीं हो जाएगा… ५) आपने सम्भावना को सत्य मान लिया है…जो खतरनाक है… लोगों को भटका सकता है, आम जीवन के संवेदनाओं को समाप्त कर सकता है…लोगों को उदासीन बना सकता है, हम पहले से ही बहुत ही सुस्त और उदासीन है… ‘ये सच है कि आत्मा अमर है’ लेकिन अभी हम आत्मा नहीं है, हम शरीर हैं, इसीलिए शोक मनाना उचित है…मौत से डरना तर्कसंगत है, डर समाप्त होने से आत्मअनुभव नहीं होता है अनुभव से डर समाप्त हो जाता है…!!! और हमेशा ज़िंदा ही मरता है, जो जितना ज़िदा होता है उतनी आसानी से मरता है, मुर्दे नहीं मारा करती अनील बाबू…मुर्दे नहीं मारा करते…!!

    sadguruji के द्वारा
    December 3, 2013

    आप की बाते आधा सच और आधा झूठ हैं.मृत्यु को झूठ मानने का अर्थ है कि कोई हमेशा के लिए नहीं मरता है.मृत्यु के उस पार फिर जीवन है.दिन भर की थकान के बाद हम गहरी निद्रा में जाते हैं.गहरी निद्रा में जाकर कोई हमेशा के लिए मर नहीं जाता है,वो जागने के बाद फिर होश में आकर जीवन को देखता है.मृत्यु के बाद का जीवन भी कुछ इसी तरह का है.इसीलिए आत्मा को अमर कहा गया है.इसीलिए कहा गया है कि आत्मा एक शरीर छोड़कर दूसरा नया शरीर धारण करती है.

    sadguruji के द्वारा
    December 3, 2013

    आदरणीय सूफी मुहम्मद जी,आप हमेशा ग़लतफ़हमी में क्यों जीते हैं.कहते हैं की विचार इसान की छवि होते हैं.अगर आप के विचारों को मै आप की छवि मान लूँ तो मुझे अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है की वो बेहद ख़राब है.आप ये बताइये की मैंने अनिल जी से लड़ाई कब की ? और अनिल जी से मै क्यों डरूंगा ? मै नहीं भी ये सब करता तो भी चलता रहता,उससे क्या फर्क पड़ता ? जागरण जंक्शन से आग्रह मैंने अपने विवेक से दिया था.अपने कुछ कमेंट में अनिल जी ने ऐसा करने का सुझाव भी दिया था.आप को विश्वास न हो तो मेरा लेख “जागरण परिवार से निवेदन” में उनके कमेंट पढ़ लें.आप हमेश आपस में लड़ाने-भिड़ने वाली बात क्यों करते हैं ?आप ने मेरे कमेंट में ये पढ़ा होगा-”बचपन से मेरी आदत है कि पांच रुपये की हांड़ी (मिटटी का बर्तन) भी लेता था खूब ठोंक बजाकर.आज भी वही आदत बरकरार है.किसी के ज्ञान को परखने का मेरा अपना ही एक अलग तरीका है.चाहे सूफी जी हों या अलीन जी,कुछ बातें उनकी सही होती हैं और कुछ गलत भी.उनकी सही बात का समर्थन करना चाहिए और गलत बात का विरोध.दुश्मनी क्या चीज होती है मै नहीं जानता.” और जागरण जंक्शन वाले कमेंट में ये भी पढ़ा होगा-”उनके किसी लेख में कोई आपत्तिजनक बात होगी तो जरुर आप से शिकायत करेंगे और आप कार्यवाही भी कीजियेगा.” आप कमेंट ध्यान से पढ़कर तब कमेंट किया कीजिये.आपस में लड़ना-भिड़ना ही आप का शौक और घटिया राजनीती है.आखिर में एक बात और वो ये की हम लोग ऐसे कमेंट आदरणीय सरिता जी के इस ब्लॉग पर न करें ,यही बेहतर है.

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 3, 2013

    “आप की बाते आधा सच और आधा झूठ हैं.मृत्यु को झूठ मानने का अर्थ है कि कोई हमेशा के लिए नहीं मरता है.मृत्यु के उस पार फिर जीवन है” महानुभाव- मैं कोई तार्किक, विचारक या पंडित नहीं हूँ, जो झूठ और सच का खेल खेलूं…’न तो बातें आधी सच होती हैं न ही आधी गलत’… बात की उपयोगिता उसके सन्दर्भ पर निहित होता है… यहाँ न तो इस बार है न उस पार है… आप कहते खुद को भक्त हैं और फेक रहे हैं कवियों की तरह- बच्चन जी कहते हैं, ‘इस पार प्रिय तुम हो मधु है, उस पार न जाने क्या होगा…’ कवि की अज्ञानता क्षमा योग्य है, लेकिन आपको क्षमा नहीं किया जा सकता है…जब मैं कहता हूँ कि आप सुनी सुनाई बातों को दोहरा रहे हैं तो आब बुरा मान जाते हैं, मुंह फुला लेते हैं…जीवन और मृत्यु अभी और यहीं है, ‘हम हमेशा वहीँ रहते हैं जहाँ कोई भविष्य कभी हमें ले कर जाएया…’ अस्तित्व में कोई भविष्य नहीं होता, अस्तित्व खंडो में नहीं बंटा है, कोई इस पार या उस पार नहीं है, जो है यही है और यहीं है…सब नगद है…कल कोई नहीं मरता है, ऐसा नहीं है कि किसी दिन आप मौत से किसी मोड़ पर मिलेंगे…सब यहीं पर है, मिला ही हुआ है… न तो यहाँ बाद है और न ही पहले..मृत्यु के बात और मृत्यु के पहले ये सब हिन्दुओं की काव्यात्मक धारणा है…सुन्दर है, लेकिन सत्य नहीं…!! न जानना गलत नहीं है लेकिन न जानने की कोशिश करना खतरना है… आपकी ज्ञान ही आपको भटका रही है …!! दूसरी बात- अगर आपकी तैयार हो तो थोड़ी और गहरी बात कह दूं- आत्मा जैसी कोई चीज़ नहीं होती है, सदियों से बुद्धों को आत्मा के झूठ का सहारा लेना पड़ा है…और सहारा इसलिए लेना पड़ा क्योंकि ये सहायक है, अगर किसी से ये कह दिया जाये कि कुछ नहीं बचेगा तो घबरा जाएगा…चलेगा ही नहीं, इसीलिए गुरु करुणावश साधक से आत्मा के बचने की बात करता है…| “आत्मा एक शरीर छोड़कर दूसरा नया शरीर धारण करती है” ये तो नितांत अज्ञानता वाली बात हो गयी…क्या आप सोचते हैं कि कहीं कोई बना बनाया शरीर का पुतला रखा होता है जिसमे आत्मा प्रवेश कर जाती है…?? शरीर और आत्मा दो चीज़े नहीं है..वो एक ही हैं…कहीं कुछ नहीं बचता है…और जो बचता है वो आप नहीं हैं, न ही आत्मा है…’वो बस है’ वो सदा था सदा रहेगा….उसका आपसे कोई लेना देना नहीं है…अस्तित्व में पुनुरुक्ति नहीं होता है…जब एक लहर गिरती है तो वो सदा के लिए समाप्त हो जाती है…सागर फिर नए लहर के रूप में उठता है…जैसे सागर के लिए कोई लहर ख़ास नहीं है उसी प्रकार आप भी अस्तिव के लिए ख़ास नहीं है…यहाँ आपको बचाने की चिंता किसी को नहीं है…’आपके होने या न होने से कोई भेद नहीं पड़ता’, बचाने की आकांक्षा अहंकार की आकांक्षा है…अहंकार ने ही आत्मा की इज़ाद की है, दिल बहलाने के लिए ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है ‘चलो ऐसे नहीं तो वैसे तो बचेंगे’, … ये जो पुनर्जन्म की धारणा है वो भी missunderstood concept है..कभी बाद में इस विषय पर चर्चा करूँगा…!!

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 3, 2013

    मुनिवर क्रोध में आपका विवेक समाप्त हो गया है लगता है…”कहते हैं की विचार इसान की छवि होते हैं” कोई कहता है और आप मान लेते हैं…??? “मुझे अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है की वो बेहद ख़राब है” कब तक अफ़सोस और क्रोध के द्वन्द में फसे रहिएगा…?? या तो क्रोध से मुक्त हो जाइये या अफ़सोस से…!! “और अनिल जी से मै क्यों डरूंगा ?” ये तो आप जाने कि आप उनसे क्यों डरते हैं…इस पर ध्यान कीजिए…!! “मै नहीं भी ये सब करता तो भी चलता रहता,उससे क्या फर्क पड़ता ? ” सवाल सुन्दर है, खुद से पूछें…शयद जड़ तक पहुँच पाएं…. “जागरण जंक्शन से आग्रह मैंने अपने विवेक से दिया था” झूठ बोल रहे हैं आप ऐसा आपने अनील के द्वारा खॊचारे जाने पर किया…उससे त्रस्त हो कर किया…!! “बचपन से मेरी आदत है कि ” सभी आदत बेहोशी से पैदा होते हैं…यही नहीं बहुत आदत आपमें बच्चों जैसी है…बचपना बरक़रार है…बच्चों जैसा होना चाहिए संत को, बचपना अच्छी बात नहीं…!! “ञान को परखने का मेरा अपना ही एक अलग तरीका है.” एक ही इसलिए है क्योंकि तरीका सदैव उधार होता है…बोध को जगाइए…कबतक तरीके की बैशाखी के सहारे चलते रहेंगे…??? “जरुर आप से शिकायत करेंगे ” शौक से कीजिए मेरी साड़ी बातें आपत्तीजनक होती हैं…!! “आदरणीय सरिता जी के इस ब्लॉग पर न करें” सुन्दर राजनीती है, अगर सरिता जी आदरणीय हैं तो क्या अनील जी लतरणीये हैं..लात खाने योग्य हैं जो उनके ब्लॉग पर ऐसी बाते करेंगे आप…??? “आपस में लड़ना-भिड़ना ही आप का शौक और घटिया राजनीती है” मुझे तो किसी से कोई लड़ाई नहीं है, लोग खुद अपनी बचाव में मुझ से लड़ने लगते हैं…!!! राजनीति तो मेरे खून में… I love it.

    December 4, 2013

    अरे सूफी मियाँ, आप स्टेशन पर ही रह गए क्या? आप चिलाये नहीं, मैं कुछ करता हूँ. भाई, कोई ट्रेन की चैन खीचों. सूफी मियाँ गलत स्टेशन पर ही रह गए हैं. ………………………………………….. मियाँ चैन काम नहीं कर रहा है…….तेज दौड़ लगाइए………………..जिंदगी और मौत का सवाल है……

    dineshaastik के द्वारा
    December 6, 2013

    ऐसी कोई अलौकिक वस्तु नहीं है, जिससे यह साबित हो कि परलोक तथा पुनर्जन्म भी है। आत्मा नहीं है क्योंकि उसका न तो जन्म हुआ और न ही उसकी उपलब्धता है।मनुष्य ने अपनी कपोल कल्पना से आत्मा को अमरता प्रदान कर मृत्यु की आशंका से मुक्त होने का एक तरीका खोजा है।

December 3, 2013

यकीन नही होता न. कुछ पल के लिए मुझे भी यकीन नहीं हुआ था. ऐसा लगा मानों आसमान को जमीन मिल गयी हो या फिर दो समान्तर रेखाएं कहीं दूर जाकर एक हो गयी हो. बात है परसों रविवार सुबह १० बजकर ५१ मिनट की. पिछले १५ दिनों से अँधेरे को लेकर अपना अनुभव शब्दों में व्यक्त करना चाह रहा था. वैसे ही जैसे कोई प्यासा अपनी प्यास को शब्दों में व्यक्त करना चाह रहा हो. इसका जिक्र मैं अपने मित्र संदीप झा से भी सेलफोन वार्ता में किया था. उसने कहाँ कि कोशिश करके देख लो. परन्तु समय के आभाव के कारण खुद को इसके लिए वक्त नहीं दे पा रहा था. परसों रविवार की छुट्टी थी और कुछ वक्त भी; माँ के लिए, मिसेज के लिए, अलीना के लिए और निश्चय ही कुछ खुद के लिए. अतः कागज़ और कलम की तलाश लिए बेडरूम में प्रवेश किया जहाँ मिसेज रो रही हमारी बेटी अलीना को चुप कराने में लगी हुयीं थी.अतः कागज और कलम को भूलकर वहीँ बैठ गया. तभी बेडरूम से लगे हुए बालकनी के रेलिंग से होते हुए एक आवाज आई, “राम-नाम सत्य है.” सुबह के १० बजकर ५५ मिनट हो रहे थे. रेलिंग पर जहाँ मेरी माँ पहले से ही मौजूद थी, जाकर देखा चार व्यक्ति किसी एक को कंधे पर उठाये हुए चले जा रहे है और उनके पीछे तक़रीबन ७०-८० लोग भागे जा रहे हैं. ऐसा लग रहा था जैसे जिंदगी और मौत की घुड दौड़ लगी हो एक ऐसी दौड़ जिसमे किसी की जितने की कोई उम्मीद नहीं. एक सिरे पर जीत और दुसरे सिरे पर हार, पर क्या यह संभव है कि जीत हार में बदल जाए या हार जीत में बदल जाए? असंभव! या तो जीत होगी या फिर हार. कहीं कोई ऐसी बात तो नहीं जो इस जिंदगी और मौत से भी महत्वपूर्ण हो. खैर, इस बात से बेफिक्र था. अचानक मेरा ध्यान अपनी माता जी पर गया जो बगल में रखे मेरी तौलिया को अपने सर पर रखी हुई थी. मुझे भी जाने क्या हसीं-मजाक सूझी की, मैं उनसे बोला, “आप अपना तौलिया अपने सर पर रखिये, आप खुद को उस व्यक्ति के आत्मा से बचा लीं परन्तु यदि उस व्यक्ति की आत्मा तौलिये के सहारे मेरे सर पर सवार हो गयी फिर मैं तो गया काम से.” यह कहकर जोर-जोर से हँसने लगा. तभी निचे से किसी की आवाज आई, “जिन्दा! मर गया और आपको हसीं सूझ रही है. पर जिस बात पर मैं हँस रहा था उसे बताना मेरे लिए मुश्किल था क्योंकि मुझे पता था कि वह बात उसके समझ के बाहर है. इससे बड़ा हास्यपद बात क्या होगी कि कोई जिन्दा हो और वह मर जाए, कोई प्रकाश हो अँधेरा हो जाए, या तो वह जिन्दा है या फिर मर गया हो, या तो प्रकाश है या फिर अँधेरा या यह दोनों एक झूठ हो और सत्य इससे अलग कुछ और. परन्तु सत्य यह भी है कि हम मृत्यु को सत्य मानकर जिंदगी को झूठ कर दिए हैं और सदियों से मृत्यु के इंतज़ार में मरे जा रहे हैं. सत्य तो यह है कि यह जीवन और मृत्यु किसी एक की दो अवस्थाएं वरना यदि यह सत्य होता तो दोनों का एक अपना अलग स्वरुप होता. ऐसे में कभी जिंदगी मौत में तब्दील नहीं होती. सत्य तो यह है कि यह बिलकुल झूठ है जैसे सुबह का शाम होना झूठ है. यह तो सूरज है जिसकी रोशनी धरती के जिस-जिस कोने पर पड़ेगी वहाँ सुबह और ठीक उसके विपरीत शाम होती है. परन्तु इन दोनों के बोच में ऐसी कई अवस्थाएं भी होती है जो सुबह से शाम की ओर अग्रसर होती है और फिर शाम से सुबह की ओर. आइये इसे एक और उदहारण से समझते हैं. जीवन और मृत्यु को यदि एक तराजू के दो पलरा मान लिया जाय तो हम देखते हैं कि कभी कोई पलारा भारी पड़ता है तो कभी कोई. दोनों में ही विरोधाभाष है और जहाँ नहीं है दोनों बराबर हो जाते हैं वहाँ विरोधाभास ख़त्म हो जाता है. परन्तु कभी भी एक पलरा दुसरे में तब्दील नहीं होता. यह जीवन-मृत्यु भी किसी तराजू के दो पलरे है जो कभी एक हो ही नहीं सकते, कभी एक दूसरा में तब्दील हो ही नहीं सकता और यदि हो जाए तो एक ख़त्म हो जाएगा. जैसे ही एक ख़त्म हुआ कि दुसरे को भी ख़त्म होना ही है. या नदी के दो किनारे जो कभी एक हो ही नहीं सकते. कभी भी कहीं भी मिल नहीं सकते. यह तो कोई मुसाफिर है जो इस पर से उस पार जाने का साक्षी होता है. यह सफ़र कुछ ऐसा है जैसे कोई यात्री एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन तक जाने के लिए उतनी दुरी का टिकट कटा कर बैठ जाता है और फिर सफ़र ख़त्म होते ही, टिकट की वैलिडिटी ख़त्म. फिर एक नए सफ़र के लिए नयी वैलिडिटी.ऐसा ही कुछ जीवन-मृत्यु है……एक खूबसूरत झूठ!……….सत्य तो कोई और है जो इससे होकर गुजरता है…. ………… बस यूँ समझ लीजिये परसो जिन भाई का राम-नाम सत्य हो गया. उनका सफ़र वही ख़त्म हो गया. फिर एक नए सफ़र के लिए उन्हें एक नयी वैलिडिटी की जरूरत पड़ेगी. भैया, अब उनके लिए आप लोग इस स्टेशन पर क्यों उतर गए? आपका स्टेशन अभी आना बाकी है. अतः आप सभी अपनी-अपनी बोगी में जाकर अपना स्थान ग्रहण करें. ट्रेन को हरी झंडी हो गयी है ……….आप सभी की यात्रा मंगलमय हो! (नोट- यह लेख पोस्ट न होने के कारण कमेंट के रूप में प्रेषित कर रहा हूँ.)

    December 3, 2013

    अरे सूफी मियाँ, आप स्टेशन पर ही रह गए क्या? आप चिलाये नहीं, मैं कुछ करता हूँ. भाई, कोई ट्रेन की चैन खीचों. सूफी मियाँ गलत स्टेशन पर ही रह गए हैं. ………………………………………….. मियाँ चैन काम नहीं कर रहा है…….तेज दौड़ लगाइए………………..जिंदगी और मौत का सवाल है……


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