साधना के पथ पर

अद्य की स्याही

50 Posts

1446 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 8647 postid : 677191

अब शहर और गलियों में बेशुमार बैठे हैं

Posted On: 27 Dec, 2013 social issues,कविता,Career में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

 

अब शहर और गलियों में बेशुमार बैठे हैं

तालीम लेकर लोग बेकार बैठे हैं,
घर-घर में लोग बेरोजगार बैठे हैं,
शराफ़त की तन पर ओढ़े हुए चादर,
बड़ी आस लगाए होशियार बैठे हैं.
दूसरों की खबर नहीं अपनी गरज लिए,
अब शहर और गलियों में बेशुमार बैठे हैं,
काफिलो सी आज गुजरी है जिंदगी,
चौखट पे दस्तक दिए हजार बैठे हैं,
कहने को है बहुत पर कैसे कहे कोई,
गर्दन के ऊपर अब तो तलवार बैठे हैं,
एक बात तुमसे कहनी है हमको ‘अलीन’
एक अनार पर हजार बीमार बैठे हैं

……….०६/१२/२००४ अनिल कुमार ‘अलीन’

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (12 votes, average: 4.92 out of 5)
Loading ... Loading ...

12 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
December 30, 2013

मान्य अनिल जी , नमस्कार ! क़ाफिया और रदीफ का बेजोड़ संगम ! ” गर्दन के ऊपर बन के वो तलवार बैठे हैं ” अति सुन्दर ! आप की तलवार ( ग़ज़ल ) की धार तो बड़ी ही पैनी है | पुनश्च !!

    December 31, 2013

    हार्दिक आभार, आदरणीय! काफिया और रदीफ़ क्या होता है………………क्या होता है मुझे नहीं पता……………क्योंकि मैं प्रोफेसनल कवि नहीं हूँ…………………और हमेशा कोशिश करता हूँ……………..जो प्राकृतिक रूप से मन तक आता है बस वो लिख जाता है…………………..आपका आगमन एक बार भी सुखद रहा…………………..

abhishek shukla के द्वारा
December 30, 2013

बेहतरीन….परिस्थिति पर करारी चोट..

    December 31, 2013

    चोट………………….हाँ……………….हाँ………………………….यह तो पुराना तरकीब है…………………अब कुछ नया होना चाहिए. क्यों?

December 28, 2013

हिंदुस्तान में इसी बात का रोना है कि हम सभी बहुत अच्छा लिखते हैं, अच्छा बोलते हैं और अच्छा बनते हैं……………….काश हम जो आवरण अपने ऊपर धारण करके रखे हैं उसे हटा देते तो फिर सिर्फ हम होते और वो किसी अच्छे और बुरे से कहीं बेहतर हैं…………..आपको अच्छा लगा शुक्रिया…………. ………………….

    Santosh Kumar के द्वारा
    December 30, 2013

    आदरणीय अनिल जी ,..सादर प्रणाम सुन्दर सार्थक रचना के लिए हार्दिक अभिनन्दन !… काश …काश …..काश …….हा हा हा ……काश इसकी जरूरत हटेगी !…..प्रभु आवरण में ढकी मानवता को अनावृत्त अवश्य करेंगे …..शायद वो कर रहे होंगे …..लेकिन हम मूरखों को इसका भान नहीं होता !…अच्छे इंसान की अच्छी रचना को सलाम !…सादर वन्देमातरम !

    December 31, 2013

    सादर प्राणाम! संतोष भैया छोटे भाई को प्रणाम करकर काहे शर्मिंदा कर रहे हैं…………………….प्रभु…………प्रभु…………………..हाँ…………………..हाँ…………….प्रभु यह करेंगे, प्रभु वो करेंगे …………………तो सबसे पहले यह निश्चित हो जाए कि हम क्या करेंगे……………..आपका आगमन सुखद रहा ………………..हार्दिक आभार!

December 28, 2013

सुस्वागतम! मुझे यह पूरी गजल अच्छी नही लगी क्योंकि मुझ द्वारा लिख नहीं गया बल्कि जबरदस्ती लिखा गया है ……और जबरदस्ती की लिखी हुई रचना एक झूठ के सिवा कुछ नहीं………………….आपका हार्दिक आभार!

jlsingh के द्वारा
December 27, 2013

मुझे तो वाह! वाह! करने को दिल चाहता है!

    December 28, 2013

    और मुझे शुक्रिया-शुक्रिया कहने को दिल कर रहा हैं…….पर करूँगा नहीं क्योंकि आपने भी वाह-वाह नहीं किया………………….हाँ……………..हाँ…………….हाँ………………

ranjanagupta के द्वारा
December 27, 2013

अलीन जी बहुत बहुत बधाई ! इतनी सच्चाई के करीब गजल लिखने के लिए ,अच्छा लिखते है !!

sadguruji के द्वारा
December 27, 2013

अच्छी कविता,आप को बधाई.ये पंक्तियाँ लाजबाब हैं-काफिलो सी आज गुजरी है जिंदगी, चौखट पे दस्तक दिए हजार बैठे हैं.


topic of the week



latest from jagran