साधना के पथ पर

अद्य की स्याही

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ईश्वर निंदक सब जग सारा-१

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ईश्वर निंदक सब जग सारा.
फिर क्यों ? केवल दोष हमारा.
एक अदृश्य, असीमित, अतुलनीय, अलौकिक शक्ति जो आदि भी है और अनंत भी, जो कल भी है और आज भी. जो लाभ-हानि, यश-अपयश, जनम-मरण, ज्ञान-अज्ञान, मंदिर-मस्जिद, अन्दर-बाहर, अपना-पराया, जीत-हार सबसे परे है. फिर भी हम उसे रिश्तों, सीमाओं और आस्थाओं में जकड़ने की नाकाम कोशिश करते रहते हैं. इस प्रकार हम ईश्वर की निंदा करते हुए एक ऐसे तत्व और विश्वास को ईश्वर का नाम देते हैं जो ईश्वर कदापि हो ही नहीं सकता. वो परम पिता परमेश्वर श्रृष्टि के आरम्भ से पहले भी था और विनाश के बाद भी होगा. श्रृष्टि सृजन के साथ या बाद जो भी जन्मा है, उसकी मृत्यु भी निश्चित है. ब्रह्माण्ड, आकाश गंगाएं, तारें, ग्रह, उपग्रह, नक्षत्र, पिंड, धरती, प्रकृति और प्रकृति पर निर्भर सभी जीवित और मृत तत्व सबको एक दिन ख़त्म होना हैं. परन्तु इस सत्य को समझना उतना ही मुश्किल है जितना ईश्वर के होने से इंकार करना हैं. यह भी सत्य है कि इस श्रृष्टि का हरेक अवयव एक दुसरे से जुड़ा हुआ है. एक का होना और न होना दुसरे को प्रभावित करता है. यदि पृथ्वी की बात की जाय तो इस पर विद्यमान जीवन एक-दुसरे और वातावरण के साथ-साथ पिंडो, नक्षत्रों, उपग्रहों, ग्रहों और तारों से प्रभावित रहा है. यही कारण हैं कि दिन-रात, बिजली-बारिश और जीवन-मृत्यु जैसे क्रिया और प्रतिक्रिया का सही ज्ञान न होने के कारण मनुष्य और अन्य जीवों के अन्दर इसके प्रति भय और डर ने जन्म लिया. समय के साथ-साथ हम मनुष्यों के मस्तिष्क का विकास तेजी से होता गया और हम अपने सोच और विवेक से धीरे-धीरे रहस्यों से पर्दा हटाते गए और जिस से पर्दा नहीं हटा पाए उसके आगे नतमस्तक होते गये और उसे ईश्वर मानते गए. इस प्रकार हम ईश्वर की निंदा और तिरस्कार करते हुए डर और अज्ञान से जन्मे तत्व को ईश्वर की संज्ञा देते आये. साथ ही प्रकृति पर हमारी निर्भरता ( स्वार्थ ) ने उसके अवयवों को ईश्वर मानने के लिए प्रेरित किया. इस प्रकार डर, अज्ञान और स्वार्थ से जन्मे तत्व ने ईश्वर की जगह ले ली और शुरू हुआ ईश्वर की निंदा का सिलसिला जो आज भी मानव के मानसिक और बौदिक विकास होने के बाद भी रुकने का नाम नहीं ले रहा. इसी डर, अज्ञान और स्वार्थ ने अनेक देवी और देवताओं को जन्म दिया. जिसको ईश्वर मानकर हम ईश्वर का अपमान और निंदा करते जा रहे हैं.

हमारे डर, अज्ञान और स्वार्थ ने प्रकृति के अवयवों और क्रियाओं को विभिन्न प्रकार के देवी और देवताओं का नाम देकर समाज में अन्धविश्वास और आडम्बर फैलाते रहा तथा हम हकीकत को नजर अंदाज करने का खेल खेलते आये. ईश्वर जो इन अंधविश्वासों और मान्यताओं से परे एक ऐसा सत्य है जिसका आरम्भ ही अंत है और अंत ही आरम्भ अर्थात हम मानवों और इस ब्रह्माण्ड के किसी अन्य विकसित तत्व के समझ और पकड़ के बाहर. इस ब्रह्माण्ड का अत्यंत सूक्ष्म कण जिसके आगे आज की नैनो टेक्नोलाजी भी असफल है और आने वाली हर टेक्नोलाजी असफल रहेगी. उसमे ईश्वर की पूरी शक्ति नीहित है. साथ ही इस अपरिभाषित और अतुल्य ब्रह्माण्ड जिसके आगे प्रकश-वर्ष जैसा मापक भी असफल है, में उसकी पूरी शक्ति फैली हुई है. एक ऐसा सच जो हम सबकी सोच और परिकल्पना से बाहर है. यक़ीनन यह बात हम लोगो को अजीब लगती है कि एक छोटे से बिंदु में पूरा ब्रह्माण्ड कैसे नीहित हो सकता है जबकि वह बिंदु इसी ब्रह्माण्ड का एक अभिन्न अवयव है. यदि ऐसे मैं कोई व्यक्ति उसे जानने और समझने की बात कर रहा है तो वह खुद के साथ-साथ दूसरों को भी धोखा दे रहा है. साथ ही निंदा कर रहा है उस परम सत्य ईश्वर की. इस बात को एक छोटे से उदहारण के साथ रखना चाहूँगा. ब्रह्माण्ड में पाए जाने वाले ब्लैक होल के संपर्क में आने वाला हरेक छोटा या बड़ा पिंड अस्तित्व विहीन हो जाता है. यहाँ तक कि वह प्रकाश को भी अवशोषित कर लेता है. ब्रह्माण्ड के अन्दर पाए जाने वाला यह ब्लैक होल अपने अन्दर ब्रह्माण्ड को भी समाहित करने का सामर्थ्य रखता है जिसका कि वह स्वयं हिस्सा है. मैं समझता हूँ कि यह सबसे बड़ा उदहारण है ईश्वर के आदि और अनंत होने का. जो हम सबके सोच और समझ से परे है. यदि कुछ समय के लिए मान लिया जाय कि अज्ञान, डर और स्वार्थ से जन्मा तत्व ही ईश्वर है तो उसको लेकर इतनी अज्ञानता, डर और स्वार्थ क्यों? यदि यही सच है तो फिर इसे ईश्वर का नाम देकर उसकी निंदा क्यों? बाकि बाते अगले अंक में….
और अंत में, मैं उनके लिए कुछ कहना चाहूँगा जिनकी तकलीफे मेरी बाते सुनकर बढ़ गयी होंगी….

ईश्वर निंदक सब जग साराहैरान हूँ उसकी बातों पर,
मकान शीशे का है और
वह पत्थर की बात करता है.

जाने क्या सूझी है उसको
कांपते है हाथ और
तलवार की बात करता है.

यही नहीं, आज-कल सुना है;
नेवलों की शहर में घुसकर,
साँप की बात करता है.

रोना आता है उसकी किस्मत पर,
गुनाहों के दलदल में पलने वाला
‘अलीन’ से परिणाम की बात करता है.

कितनी गलत फहमी है उसे;
समंदर की लहरों से,

कमबख्त आग की बात करता है….

हाँ….हाँ…हाँ..

आशा करता हूँ आपकी और मेरी मुलाकात जल्द ही होगी तबतक के लिए अनुमति चाहूँगा……………….अनिल कुमार ‘अलीन’



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102 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

swadhapandey के द्वारा
March 30, 2014

सत्य वचन मित्र

abhishek shukla के द्वारा
March 29, 2014

घोर चिंतन का विषय है, आपने बेहद सलीके से लिखा है, बधाई…!

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
December 22, 2013

ये हुई न बात ! गूढ़ विषय पर इतना सुस्पष्ट विवेचन वाकई श्लाघनीय है | अलीन जी! आप इसी तरह लिखते चलिए पूरा मैदान खाली है | गीतों की खेती करने को पूरा हिंदुस्तान मिलेगा | पुनश्च !!

ajay kumar pandey के द्वारा
April 30, 2012

अलीन भैया मैंने संतोष भैया और दिनेश भैया को अपना विचार दिया था वोह इस सेना के सैनिक बनने को तैयार हैं संतोष भैया ने इस संगठन के लिए अपनी शुभकामनाएं भेजी हैं क्या अब हम इस सेना के गठन को औपचारिक गठन कर दें इस सेना का गठन करने की अनुमति दीजिये अब हम इस सेना का गठन कर देना चाहते हैं और इस सेना का कार्य जल्द ही शुरू होना चाहिए आपके कथनानुसार इसका कार्यालय नहीं होगा धन्यवाद

    May 1, 2012

    भाई जी कब क्या और कैसे करना है यह तो सिर्फ दिनेश भैया और संतोष भैया ही बताएँगे. मैं तो उनका बस अनुज हूँ, उनसे सिर्फ विनती ही कर सकता हूँ ….आदेश नहीं……वैसे भी कोई काम जल्दी में नहीं होता, plaaning aur organising karana padata hain. जो दिनेश भैया आपको बोले है वही करिए ….!

ajay kumar pandey के द्वारा
April 29, 2012

बड़े भाई अलीन जी मेने दिनेश भैया को कह दिया है और अब में थोड़ी देर बाद संतोष कुमार जी के ब्लॉग पर ही जा रहा हूँ धन्यवाद आपका भाई अजय कुमार पाण्डेय

ajay kumar pandey के द्वारा
April 29, 2012

बड़े भाई अलीन जी आप आलेख छपने की चिंता छोड़िए अगर कोई मेरा आलेख छपाने की तैयार न हो तो किसी के पीछे मत पढना क्योंकि इस दुनिया में कोई किसी की मदद नहीं करना चाहता कोशिश भी कितनी करोगे आलेख छपाने की अगर आपसे कोई कहे की आलेख छाप नहीं सकते तो पीछे मत पढना छोड़ देना और यह सोच लेना की जब मेरा भाई एक अच्छा पत्रकार बनेगा तो आलेख खुद ही छप जायेंगे बस आप यह ब्लॉग लिखना मत छोड़ना और मेरी पोस्ट भी पढना मत छोड़ना और में अपने ब्लॉग के जरिये लेखन करता रहूँगा और आप अपने ब्लॉग में आवाज उठाते रहना हाँ आपसे एक बार मिलना चाहता हूँ वो भी कभी हो जाएगा लेकिन आप अपने काम पर लगे रहना और में अपने काम पर आप आलेख छपाने की चिंता छोड़कर अपने काम पर लग जाओ में भी अब आपसे नहीं पूछुंगा की आलेख छपाने का क्या हो रहा है आप किसी के आगे झुकना भी मत क्योंकि अब हम दोनों भाई स्वाभिमानी बने रहेंगे किसी के आगे झुकेंगे नहीं और हाँ सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध आपका साथ तो दूंगा ही बस आपकी अनुमति की जरुरत है हम एक संगठन बनाने जा रहे हैं जिसका नाम होगा सामाजिक कुरीति दल इसमें जागरण के सभी ब्लोग्गेर्स आपका साथ देंगे यही उम्मीद है और हाँ इस सेना में में जागरण के सब ब्लोग्गेर्स को एकजुट करूँगा और आपको भी अपनी लेखनी के जरिये सशक्त प्रयास करना होगा और में अपनी तरफ से प्रयास करूँगा इस सेना की रणनीतियां निम्न होंगी १. सामाजिक कुरीतियाँ जड़ से हटाना २. बेटी बचाना ३. अन्धविश्वास को ख़त्म करना ४. कन्या भ्रूण हत्या रोकना यह संगठन इन्ही चीजों पर प्रमुखता से काम करेगा बस आपको सब ब्लोग्गेर्स को इसके लिए एकजुट करना होगा यह संगठन का मुख्या कार्यालय आजमगढ़ होगा जहाँ आप रहते हैं इस संगठन का अध्यक्ष किसे बनाना है यह आप तय करेंगे अगर आप मुझे इसका अध्यक्ष बनाते हैं तो में तैयार हूँ मेने दिनेश आस्तिक जी को इस सेना का योग्य व्यक्ति माना है और इसके अध्यक्ष वोही ठीक रहेंगे यह सेना एक बार निर्मित हो गयी तो ही यह सामाजिक कुरीतियाँ ख़त्म होंगी बस आप इस संगठन को बना ही लें तो बढ़िया हो और आप इस का एक पेज facebook पर बना लें तो अच्छा होगा धन्यवाद

    April 29, 2012

    बहुत अच्छी बात है कि आप कुछ समझदार हो गए है. पर यह मैं जानता हूँ कि यह आपकी समझदारी कुछ ही पल की है. अभी आपको कई परीक्षाओं से गुजरना होगा जिस दिन आप समझदार हो जायेंगे उस दिन आपको अपने बारे में कुछ कहना नहीं होगा. उस दिन मैं स्वयं आपसे कहूँगा…… और आप जो नाम सुझाएँ हैं उससे तो स्पष्ट पता चलता है कि आप सामाजिक कुरीतियों को हवा देने वाले हैंन कि ख़त्म ……….वैसे जो आपने चार बिंदु दिए हैं वह निश्चय ही विचारणीय हैं. एक चीज स्पस्ट करना चाहूँगा कि हमें कार्यालय खोलकर मुर्गी फार्म नहीं बनाना है और न ही किसी को मरना-पिताना हैं बल्कि अत्याचार को सहते हुए उसका विरोध करना हैं. इसके लिए हम सभी को बरषत, गर्मी और ठंडी में नंगी सडको पर उतरना होगा….और इस बुराई के संघर्ष में हममे से कुछ लोग अपनो के, कुछ प्रकृति के और कुछ वक्त के हाथों मारे जायेंगे….यह एक सतत प्रक्रिया होगी. आप समझ रहे हैं कि लाल्पप है जो मुंह में डालने पर घुल जायेगा…अरे यह आग है और यदि इस आग में तपने का सामर्थ्य है तभी आगे चलकर कुछ हो पायेगा…..वो भी एक दिन की यह बात नहीं है….हो सकता है कि यह हमारा प्रयास तब सफल हो जब हम और आप इस दुनिया में न रहें….पर हाँ हमारे बदन पर पड़ने वाले हरेक चोट और घाव के किस्से होने चाहिए न कि मुर्गी पालन के…………मैं तो अपनी बात स्पष्ट कर दिया….आगे आप दिनेश भैया और संतोष भैया दोनों के सामने अपनी यह बात रखिये क्योंकि आने वाले दिनों में इस सेना के प्रमुख सैनिक वही होने वाले हैं……. देखिये वो क्या कहते हैं…

satish3840 के द्वारा
April 29, 2012

अनिल जी आप दर्श्मिकता , वैज्ञानिकता की बात बहुत खूब समझते हें / अंत में कविता दिल छू गयी – हैरान हूँ उसकी बातों पर, मकान शीशे का है और वह पत्थर की बात करता हें / बहुत ही गहरा अर्थ /

    April 29, 2012

    सुस्वागतम, सर! ……………………………………………………………………………………………………….हार्दिक आभार.

RAHUL YADAV के द्वारा
April 29, 2012

अलीन जी प्रणाम मै तो एक साधारण सा मानव हूँ इतनी जटिल चीजे जल्दी नहीं समझ पाता । ईश्वर को एक सकारात्मक रूप मंे स्वीकार करता हूँ , किसी चीज की उससे इच्छा नहीं रखता हूं क्योंकि हर पल वह हमारे साथ है और जो भी करता है वह हमारे अच्छे के लिए करता है।…………रचना से परिचित कराने के लिए आपका आभार……….धन्यवाद

    April 29, 2012

    सुस्वागतम! जी वह तो अच्छे और बुरे से परे हैं. वो हम ही हैं जो बुरा और अच्छा करते रहते हैं….. आपका ब्लाग विजित करने के बाद आपके विचारों से अवगत हुआ था, बहुत अच्छा लगा…..और आशा करता हूँ ….आगे भी आप ऐसे ही अपने विचार बनायें रहेंगें…..हार्दिक आभार.

ajay kumar pandey के द्वारा
April 29, 2012

dear brother please read my post human life on my blog thank you

pawansrivastava के द्वारा
April 28, 2012

खूबसूरत रचना ….अब जरा यह भी बता दीजिये की कविता की शमशीर किस बेचारे पर चलायी गयी है ?

    April 29, 2012

    शुक्रिया पवन जी, शमशीर तो किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं है….बस वही पर वार किया हूँ जहाँ आप करते हैं……यदि किसी व्यक्ति विशेष को कहना होता तो स्पष्ट उसके सम्मुख कहता…..हार्दिक आभार.!

ajay kumar pandey के द्वारा
April 28, 2012

बड़े भैया आप मेरी पोस्ट नैतिक काव्य रचना को भी समय दे और ब्लोग्गेर्स ने तो समय दिया पर आपने नहीं दिया आप मेरे भाई जैसे हैं तो मेरे ब्लॉग पर भी आगमन करे मुझे आपका आगमन अपने ब्लॉग पर अच्छा लगता है और मुझे भी यह आलेख अच्छा लगा इस आलेख से मुझे प्रेरणा मिल गयी बस आप मेरे ब्लॉग पर आने की कृपा करे धन्यवाद

Rajkamal Sharma के द्वारा
April 26, 2012

प्रिय अलीन जी मैं राजनीति और धर्म पर चर्चा नहीं करता हूँ क्योंकि यहाँ पर आकर हर कोई बेलगाम और अनियंत्रित हो जाया करता है हर कोई खुद को सही और दुसरे को गलत कहता और समझता है इसलिए आज बस सिर्फ इतना ही (यह इश्क बेदर्दी – किसी को बनाये रोगी – किसी को बनाये भोगी तो किसी को बना देता है योगी )

    April 26, 2012

    सादर प्रणाम! बहुत समय के बाद आपका आगमन सुखद रहा………जी बिलकुल सही फ़रमाया आपने. इसीलिए तो इसका स्वरुप इतना गन्दा हुआ है ………हार्दिक आभार.

MAHIMA SHREE के द्वारा
April 26, 2012

अनिल जी नमस्कार … बहुत बढ़िया … बहुत चितंन मनन करे के आपने लिखा ………………… जब तक ये धरती और आसमान और जीवन का अस्तित्व रहेगा इश्वर का अस्तित्व भी रहेगा चाहे वो आम जन के अन्धिवास में या बुधिजीविओ के तार्किक वार्तालाप में …………… वैदिक काल से साकार और निराकार अस्तित्व की चर्चा होती रही है …. पहले इंद्र -वर्षा , वायु , कुबेर, आदि वैदक देवताओ की पूजा होती थी उन्हें प्रसन्न करने के लिए यज्ञं किये जाते थे क्योंकि उस वक्त कृषि आश्रित समाज था तो सिर्फ वर्षा और अच्छी फसल की कामना थी उसके बाद …. बह्मा , विष्णु , महेश की उतपति हुयी . क्योंकि समाज अब व्यपार भी करना जान गया था धन वैभव की समझ विकसित होने लगी .. इछाये बढ़ने लगी .. तो शिव और विष्णु से वरदान मांगे जाने लगे सुख समृधि की तो लक्ष्मी जी भी आ गयी .. इस तरह जीतनी जीवन के वैभव की लालसा बढ़ी उतने देवी देवता बढ़ने लगे ………………………. समुदाय बन्ने लगा किसका देवता ज्यादा ताकतवर है …. इसको साबित करने के लियें अशंखय किस्से कहानिया बढ़ चढ़ कर गढ़ने लगे ……… और तरफ -२ आम जन में भय उत्पन किये जाने लगे …. इतना दान करो नहीं तो ये हो जायेगा … वो हो जायेगा , और इसतरह तरह -२ कर्म काण्ड की उत्पत्ति हुयी……… उफ्फ्फ्फ़… बहुत लम्बा विषय है …… फिर कभी …………………….. पर इतना तो तय है असीम शक्ति है जिसके आगे हम मजबूर है ……….. और जब तक ये जीवन रहेगा ….. अपने अपने तरीके से लोग उसे आजमाते रहेंगे …………… आपको इस खुबसूरत लेख के लिए… उस असीम को फिर से परिभाषित करने के लए बधाई…….

    April 26, 2012

    हार्दिक आभार मित्र………………… विशेष रूप से माहौल को खुशनुमां बनाने के लिए…..

akraktale के द्वारा
April 26, 2012

प्रिय अनिल जी सादर नमस्कार, बहुत सही प्रश्न है इश्वर.जिसका हम कुछ बिगाड़ नहीं सकते, उसका दखल हम अपने जीवन में लगातार पाते भी हैं. फिर यही अनुभव हमें उसका उपासक बना देते हैं. अब हम उसे किस रूप में पूजें यह हमारी आस्था पर ही निर्भर करता है.सभी की आस्था का रंग रूप भिन्न हो सकता है.

    April 26, 2012

    सादर प्रणाम! जहाँ तक मेरी समझ है आस्था से आत्म संतुष्टि की जा सकती है सच से इंकार नहीं………हार्दिक आभार.

ajay kumar pandey के द्वारा
April 25, 2012

अलीन भैया अब मेरी सामाजिक कुरीतियों वाली किताब भी आपको ही छापनी है जैसे मेरा लेख छाप रहे हो चलो आप पहले एक निश्चिंत मन से लेख छपा लो फिर किताब का प्रारूप आपके सामने रखूँगा उसके लिए आपको मेरे घर आना होगा जब लेख की प्रति आ जाए तो मेरे घर आकर अपने हाथ से देना क्योंकि आपने कहा है में आपसे मिल भी लूँगा और किताब का प्रारूप भी आपको दे दूंगा यह तो बताओ की लेख छपने का क्या हुआ धन्यवाद आपका भाई अजय पाण्डेय

    sinsera के द्वारा
    April 25, 2012

    भैया अजय कुमार पाण्डेय जी,, सादर नमस्कार, एक महीने से आप के लेख और किताब छपने की चर्चा सुन रही हूँ…देखिये , जब आप के लेख और किताबें छपने लगे गी तो आप बड़े आदमी बन जायें गे…कहीं हम लोगो को भूल न जाइएगा….एक प्रति मेरे पास भी भिजवा दीजियेगा…

    April 26, 2012

    भाई जी, पाहिले आप दूसरों के विचार पढ़िए और समझिये फिर विचार रखिये. आपकी आदतों से लगता है की आप ८-९ साल के बच्चे हो……आप मेरे अनुज हो इसलिए आपकी इच्छा को पूर्ण करना मेरा कर्तव्य है पर आपकी हर इच्छा को पूर्ण करना मेरी मुर्खता होगी. आगे से आप मुझ से किसी भी प्रकार के किताब का नाम नहीं लेंगे. हाँ अब मैं भी कोई अपनी किताब प्रकाशित नहीं करवाने वाला…..आपका आलेख छपवाने की कोशिश में लगा हूँ यदि कामयाब हो जाऊंगा तो वह आपतक पहुँच जायेगा…….भैया आखिरी नसीहत दे रहा हूँ मेरा सफ़र तुफानो का है ज्यादा संपर्क में रहोगे तो उधिया जाओगे….पता चला कि कल मुझे जेल का चक्कर काटने के साथ-साथ कहीं पुलिस का डंडा पड़े और एक-दो डंडे आपको पड़ गए तो फिर आपका सारा नशा उतर जायेगा…आप क्या सामाजिक कुरीति से लड़ेंगे आपकी बातों से स्पष्ट पता चलता है कि आप मान-सम्मान के लिए जीना चाहते हैं….नहीं तो बार-बार आलेख छपवाने और किताब प्रकाशित करने की बात नहीं करते……

    akraktale के द्वारा
    April 26, 2012

    सरिता जी सादर, आभार.

    sinsera के द्वारा
    April 26, 2012

    मान्यवर अशोक जी, आप ने किस बात का आभार प्रकट किया , वास्तव में समझ में नहीं आया..मैं तो कुछ करने लायक भी नहीं हूँ. खामखा में लोगो के ऊपर काली माता की तरह सवार रहती हूँ.कृपया स्पष्ट कीजिये तो ज़रा मैं भी खुश हो लूँ….

    April 26, 2012

    दीदी , कृपया सर की बातों को अन्यथा न ले…..

    akraktale के द्वारा
    April 26, 2012

    सरिता जी सादर, आपने जो अजय जी को शुभकामना सन्देश दिए यह आभार उसी का है.

    sinsera के द्वारा
    April 26, 2012

    :-) वो शुभकामना सन्देश तो बहुत आवश्यक हो चला था…

Jayprakash Mishra के द्वारा
April 25, 2012

अलीन जी ईश्वर को आपने वाकई सही परिभाषित किया है. आभार

    April 26, 2012

    हार्दिक आभार, प्रकाश जी. जो परिभाषा-अपरिभाषा से परे है उसे मैं क्या परिभाषित करूँगा ……..

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
April 25, 2012

सुन्दर आलेख अनिल जी.ईश्वर का अस्तित्व और अंधविश्वास दो अलग चीज हैं.हम किसी भी साकार या निराकार शक्ति में विश्वास कर सकते हैं.हिन्दू धर्म में विभिन्न देवी देवताओं की कल्पना एवं पूजन इसी का हिस्सा हैं.सदियों से हम इसी संस्कृति का हिस्सा रहे हैं.सभी धर्म अपने मिथकों और ईश्वरीय शक्ति की आराधना करते रहे हैं.

    April 26, 2012

    सादर प्रणाम, सर! कल्पना, पूजा और विश्वास का ईश्वर से कोई सम्बन्ध ही नहीं……… हार्दिक आभार!

vinitashukla के द्वारा
April 25, 2012

अलीन जी, हमारी सद्प्रवृत्तियों का नाम ही ईश्वर है और इन्हीं के बल पे दुनियां टिकी है. एक चिंतनीय मुद्दे को उठाने हेतु धन्यवाद.

    April 26, 2012

    सादर प्रणाम,…………….धर्म, सद्प्रवृति और ईश्वर का आपस में कोई ताल-मेल नहीं तीनो अलग-अलग विषय-वस्तु है…..

minujha के द्वारा
April 25, 2012

अलीन जी ईश्वर के अस्तित्व पर प्रश्न उठाने लायक मै अभी अपने आपको नही समझती….,इसलिए उस मुद्दे पर आपका समर्थन नही कर सकती हां ढोंग ,पाखंड का विरोध करने में आपके साथ हुं,क्योकिं  दोनों अलग अलग हैं आपने अच्छा लिखा है बधाई

sinsera के द्वारा
April 25, 2012

काफिर के दिल से आया हूँ मैं यह देख कर , खुदा मौजूद है वहां , पर उसे पता नहीं ..(फ़राज़ ) “ग़ालिब ” बुरा न मन जो विज बुरा कहे ऐसा भी कोई है के सब अच्छा कहे जिसे …. न था कुछ तो खुदा था , कुछ न होता तो खुदा होता .(ग़ालिब ) ये सब महानुभाव सौ साल पहले इसी विषय पर मगजमारी कर के उसी को प्यारे हो गये, जिस पर शक करते रहे, हम सब का भी यही होना है…ईश्वर है या नहीं है…इस की चिंता कर के या अपना पॉइंट सिद्ध कर के क्या मिलेगा…अरे छोटा सा जीवन मिला है, पता नहीं किस ने दिया है लेकिन हम जीवित हैं , सोच समझ रहे हैं,ये तो सत्य है न…तो परोपकार परमार्थ कर के जीवन को क्यूँ न सार्थक बनाएं… औघड़ बन के कपडे फाड़ कर , छोटे बड़े का लिहाज़ भूल कर नंगा नाचना एक तरह का पलायनवाद है…क्या आप बता सकते हैं की इस नंगनाच से समाज में कौन सा सुधार आ रहा है…कुछ राह सुझाइए….कुछ काम करने की सोचिये…

    vikramjitsingh के द्वारा
    April 25, 2012

    समझे बाबा जी, माता जी क्या कह रही हैं? सत्यवचन हैं आपके ज्ञानसरिता………. (पहले ही प्रवचन बहुत हो रहे थे, अब आप भी इनमें शामिल हो गयीं) लगे रहो…..बन्दों का उद्धार जरूरी है……. ईश्वर मिले न मिले, उपासना तो जरूरी है………..

    sinsera के द्वारा
    April 25, 2012

    प्रवचन करने योग्य नहीं हूँ विक्रम जी न ज़िन्दगी ने इतनी फुर्सत दे रखी है…दो रोटियां खाने के पहले सौ रोटियां बनानी पड़ती हैं…सजी हुई थाली अपने आप जिस के सामने आ जाती है उसके मुंह से प्रवचन फूटता है…. बस इतना जानती हूँ कि ज़िन्दगी बहुत कम है और काम बहुत ज्यादा…बातों में वक़्त बर्बाद हो रहा है..

    dineshaastik के द्वारा
    April 26, 2012

    आदरणीय  विक्रम जी बहिन सरिता में संतों के गुणों के साथ  साथ एक  योग्य नेत्री के गुण  भी हैं।आप  इनसे बहस  में नहीं  जीत  सकते, हाथ  कंगन को आरसी क्या, कभी भी आजमा लेना। यह मंच  की  आलराउन्डर  खिलाड़ी हैं।

    April 26, 2012

    परोपकार करने वाले महर्षि दधिची, कंस, भोज और गाँधी भी तो मर गए दीदी तो क्या हम इसे भी छोड़ दे. नहीं न……और रहा मेरे प्रति आपकी शिकायत का तो वो जायज है. पर यह मेरा ढंग है बातों को रखने का………दीदी राह तो नहीं सुझाऊंगा बल्कि राह जरुर बनाऊंगा और पहला कदम मैं उस पर मेरा ही होगा….. बस आपका आशीर्वाद बना रहे….यहाँ लेखक, कवि और बाबा नहीं बनने आया हूँ……अपने विचारों और आप सबके सपनों को साकार रूप देना है…..और वह भी जल्दी.

    April 26, 2012

    समझ गया वत्स………………………………….! हार्दिक आभार आपका आगमन सुखद रहा………! नहीं तो सुना हूँ कि आप जहाँ जाते हैं वहां गोलिया पहिले पहुंचती हैं…….ठायं…..ठायं ……ठायं …….! अरे भाई हम तो मजाक कर रहे थे. आप तो ख़ामो ख़म सीरियस हो गए. अब बाबा मजाक भी न करें…..अरे मिडिया वाले तो पहिले ही पीछे पड़े हुए हैं. अब तो बस आप भक्तों का ही सहारा है…..तुम्ही हो माता, तुम्ही पिता…..तुम ही हो बंधू, तुम ही सखा हो…..!

    April 26, 2012

    विक्रम भैया, नंगा नाच किये हुए बहुत दिन हो गया. बहुत दिल कर रहा है नंगा हो के नाचने का. पर क्या करूँ यह जो सर के ऊपर काली जी काल बनकर मंडरा रही है उनकी दृष्टि इधर-उधर हो तो मैं अपना नाच शुरू करूँ…..जरा देखिये उनका ध्यान किधर तबतक मैं थोडा नाच लूँ……नाचो रे भाई नाचो रे नंगा होके नाचोरे……जी शुक्रिया. मजा आ गया……अच्छा तो हम चलते हैं……जय हो काली मैया….

    sinsera के द्वारा
    April 26, 2012

    दीदी के भैया….सब को एक दिन यहाँ से चले जाना है, ये सोचने वाली बात नहीं है, सोचने वाली बात ये है की हम आये हैं तो कुछ कर के जाते हैं या यूँ ही ज़बानी जमा खर्च है..आपके पास विचार प्रवाह है, उत्साह है, आस पास काम भी बहुत है , रही बात नाचने की तो चाहे कपडे पहन के नाचिये या फाड़ के…बस ये न हो कि जंगल में मोर नाचा किस ने देखा… विक्रम जी को अब आपकी रखवाली करने की फुर्सत नहीं रही……अपनी ज़िम्मेदारी पर नाचियेगा…

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    April 26, 2012

    सरिता दी बस मजा आगया आप तो बाबा को सुधार देंगी पक्का .. :)

    April 26, 2012

    दीदी आप तो खामोखां गुस्सा हो रही है. उ का है कि हम कुवें पर नहा रहे थे तो पैर फिसल गया और हम धड़ाम से गिर पड़े. अब यदि रोता लोग हम पर हँसते न….उ इसीलिए हम नाच रहे थे औरी कोई बात नहीं है…मैं तो नंगा नाचना कबका छोड़ दिया हूँ….कान पकड़ के बोल रहा हूँ. हम सुधर गए हैं. विक्रम भैया दीदी को आप बतैएँ न कि हम एकदम सुधर गए हैं….. दीदी-दीदी एक राज की बात बताये. पाहिले i विक्रम भैया को यहाँ से भगाइए न…यही हम लोगों में झगडा लगा रहे हैं. नहीं तो हम तो एक दम जिलेबी के माफिक सीधे हो गए हैं…इ देखिये…! हो गए हैं न….! अच्छा अब अपनी राज की बात बताये …अब हम एक नया खेल सिखकर आये है……हु-लू-लू ग्रह से जल्दी खेलूँगा…….!

    April 26, 2012

    दी की बच्ची, अभी दीदी को यहाँ से जा लेने दो फिर देखों तुम्हारा कैसे हम पोस्ट मार्टम करते हैं……!

    sinsera के द्वारा
    April 26, 2012

    ए महिमा, यहाँ काहे आयी???मेरी ऊँगली पकड़ कर चुपचाप यहाँ से चलो और फिर न आना..ये बाबा और डाकू लोग सुधरने वाले जीव नहीं हैं…अच्छे बच्चों को इन की छाया से भी दूर रहना चाहिए…राम राम राम ….

    April 27, 2012

    विक्रम भैया, उ दिनेश भैया तो कह रहे थे कि दीदी से बहस में कोई नहीं जीत सकता. हम तो इंहा…बिना बहस के ही जीत गए……उ देखिये दीदी और दी की बच्ची एक-दुसरे का हाथ पकड़ कर चले जा रहे हैं…..मजा आ गया. दीदी हार गयी, मैं जीत गया……दीदी हार गयी, मैं जीत गया……नाचो रे भाई ……..नहीं, नाचना तो मना हैं…sorry.

    sinsera के द्वारा
    April 27, 2012

    जा नही रही हूँ ,महिमा छोटी बच्ची है, उसे घर पंहुचा के , खाना खिला के , सुला के , अभी आती हूँ फटे में टांग अड़ाने….

    April 27, 2012

    ठीक है जल्दी आईएगा, मुझे भी भूख लगी है. तबतक घर हो आता हूँ, मम्मी अभीतक खाना नहीं खायी होंगी…..

rekhafbd के द्वारा
April 25, 2012

आदरनीय अनिल जी ,ईश्वर की परिभाषा इस विशाल ब्रह्माण्ड से भी उपर है ,दुःख होता है जब लोग अंधविश्वासों के चक्कर में पड़ जाते है ,”कितनी गलतफहमी है उसे ,समन्दर की लहरों से ,कमबख्त आग की बात करता है ”बहुत ही बढ़िया प्रस्तुति,आपसे अगली मुलाकात का इंतज़ार रहे गा ,शुभकामनाएं

    April 26, 2012

    सादर प्रणाम! यह तो आप लोगों का बड़प्पन है कि मुझे आप सभी के प्यार साथ-साथ आदर भी मिलता है नहीं तो मैं इसके लायक नहीं और न ही इच्छा रहती है…हार्दिक आभार.!

krishnashri के द्वारा
April 25, 2012

मान्यवर अलीन जी , सादर , बहुत तथ्यपरक , शोधपूर्ण , गहन विचारों से युक्त आलेख , बहुत ही अच्छा लगा . औरों से हट कर आपने लिखा , मेरी बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामना .

Santosh Kumar के द्वारा
April 25, 2012

अनिल जी ,.सादर नमस्कार आदरणीय निशा जी की बात दोहराऊंगा ,.गहन विचारों से परिपूर्ण लेख ..हार्दिक बधाई ..अगले भाग की प्रतीक्षा रहेगी ,..साभार

    April 26, 2012

    सादर नमस्कार, भैया! आपसे भी वही कहना चाहूँगा किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं हैं. बस विचार धारा पर हैं जो मानवता के खिलाफ है….हार्दिक आभार!

nishamittal के द्वारा
April 25, 2012

गहन विचारों से परिपूर्ण ये आलेख प्रभावित कर गया अलीन जी,साथ ही रचना बी ही परन्तु क्या गोरख धंधा है,समझ नहीं सकी ,किस पर वार है?

    April 26, 2012

    सादर प्रणाम! फिर वही बात कहना चाहूँगा किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं हैं. बस विचार धारा पर हैं जो मानवता के खिलाफ है….हार्दिक आभार!

dineshaastik के द्वारा
April 25, 2012

अनुज  अनिल  जी प्रथम  तो आपका आभार जो आपने मेरे हृदय  के भावों को अपने बौद्धिक  कौशल  पर  पोस्ट   किया। आपके प्रत्येक  शब्द में मुझे  अपनी  झलक  दिखी।  आपको विदित  होगा कि हमारे आपके अभिय़ान  से उन्हें हानि हुई है जिन्होने धर्म  को व्यापार  बनाकर हम  सबको सच्चे ईश्वर  से दूर करने  का प्रयत्न  किया है। मेरे संबंध  में वह  दो या तीन  आलेख  अशिष्ट  भाषा  में पोस्ट  कर चुके हैं। अब  उन्ही विद्वान  ने शिष्ट  का छद्म  नाम  रख  कर मेरे विचारों  की आलोचना करने के लिये लेख  लिखना आरंभ  कर  दिये हैं। मुझे  उनके प्रथम  आलेख  से शंका  उत्पन्न हो गई थी। मैने  उनके में प्रतिक्रिया देते समय  आशंका व्यक्त  की थी। मुझे विश्वास  है कि उनके आलोचनात्मक  आलेख हमें ऩिश्चित  ही शक्ति प्रदान  करेंगे। हमें नकारात्मक  सोच  को अपने अंदर  से निकाल  कर उनकी आलोचनाओं से उर्जा ग्रहण  करना है। विचलित  होकर  अपने पग  पीछे नहीं धकेलना है। 

    dineshaastik के द्वारा
    April 25, 2012

    कृपया इसे इस तरह पढ़े- अपने बौद्धिक कौशल से पोस्ट किया।  तथा इसे भी इस तरह पढ़े- उन्ही विद्वान ने शिष्य का छद्म

    April 26, 2012

    सादर प्रणाम, भैया! भैया जी जब सफ़र तूफानों का है तो आँधियों से क्या डरना. किसी शायर ने कहा है…”कोई कहता है हमें बुरा तो कहने दो किसको मालूम है हालात चलो सो जाएँ…..” पर यहाँ इसे मैं कुछ इस प्रकार कहना चाहूँगा…कोई कहता है हमें बुरा तो कहने दो, जो हैं अच्छे उन्हें अच्छे रहने दो…..बस हम लोगों को बस इतना ध्यान देना है कि हम किसी को बुरा कहकर अपनी ही नज़र में शर्मिंदा न हो..क्योंकि हमारी लड़ाई बुराई से….. वह कमेन्ट पोस्ट करते समय हिंगलिश के कारण त्रुटियाँ तो होती ही रहती. आप निश्चिन्त रहें..आप जो मुझे सन्देश देंगे वही मुझतक पहुचेगा. वैसे आप अपने सन्देश का कोई एक मूल शब्द लिख दीजियेगा, आपके आशीर्वाद से आपकी दिल की बात समझ जाऊंगा. भैया जी पीछे क्या हटना पीछे तो वो हटते है जो बिना विचारे कदम उठाते हैं और जिनको आने वाले तूफानों का अंदाजा नहीं होता…या फिर जिनको मान-सम्मान की चिंता होती हैं……….आप बस लड़ाई के लिए तैयार रहिये….इन्कलाब…………………………………………….!

ANAND PRAVIN के द्वारा
April 24, 2012

मित्र, नमस्कार पता नहीं कौन सत्य है और कौन निराकार ……………….प्रभु है या हम बस यूँही लगे है………… मुझे पहले प्रथा का भी ज्ञान हो तब में कुप्रथा का ज्ञान भी लेलुन्गा ………. सुन्दर सटीक रचना…………………शुरू के दो शेर में दम नहीं गुरु…………….घिसेपिटे है…………. बाकी तो जैसे आप वैसी ही आप की बात……………………..बहोत सुन्दर

    dineshaastik के द्वारा
    April 25, 2012

    भाई आनंद जी एक  बार  सत्यार्थ  प्रकाश  जरूर  पढ़े। किताब  बहुत  ही बहुमूल्य  है और कीमत  है मात्र 10 रुपये। ईश्वर क्या है, धर्म  क्या है, सब कुछ  बहुत  ही तार्किक  ढ़ंग  से बाताया गया है। 

kalia के द्वारा
April 24, 2012

सारे उत्तर आपके अनन्त प्रश्नों में ही निहित हैं, और आप आश्चर्यजनक रूप से फ़िर भी उत्तर तलाशते से लग रहे हैं । आप मानते हैं कि पिंड ब्रह्माण्ड की ही इकाई है, तो फ़िर हर आत्मा भी स्वत: परमात्मा का ही अंश है, यही सत्य है । नदी को सागर में मिलना ही है, उसी प्रकार आत्मा को भी परमात्मा में ही विलीन होना है । भावनाएँ मष्तिष्क की सूक्ष्म तरंगें हैं, जो परमात्मा से जीते जी जोड़ने का कार्य करती हैं । उसको कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि कौन उसे किस रूप में देख रहा है, और मान रहा है । बस उसे इतना ही प्रिय है, कि उसकी संतान उसे भूले नहीं । हर पिता संतान से यही चाहता है । पिता से डरने की क्या आवश्यकता है ? बशर्ते कि मन साफ़ हो । जो पापी होता है, वही पिता के सामने पड़ने से डरता है, कि कहीं बाप उसकी चोरी पकड़ न ले । निश्छल अबोध पुत्र तो पिता की गोद में ही मलमूत्र त्याग देता है, फ़िर भी पिता को प्रिय ही होता है । कोई राम के रूप में माने या शिव के, जीसस के रूप में माने या अल्लाह के । कोई किसी गोल पत्थर को ही मान ले, या वह भी न मानकर शून्य में ही उसका निराकार रूप ढूँढ कर उसे देख ले, उसको इन बातों से कोई मतलब नहीं होता । उसे अपनी संतान से सिर्फ़ पिता के रूप में अपनी मान्यता की भूख है, बस इसी से प्रसन्न हो जाता है । और उसे क्या चाहिये ? सबकुछ तो उसी का दिया हुआ है । हम उसे मुफ़्त में उसी से प्राप्त भावनाएँ तक प्रदान कर पाने में कंजूसी करते हैं, इससे अवश्य दुखी होता है ।

    dineshaastik के द्वारा
    April 25, 2012

    आदरणीय कालिया जी आप संभवतः आलेख  को दूसरे परिपेक्ष्य में पढ़ा है। यह आलेख ईश्वर की स्थापना के लिये लिखा गया हैं। ईश्वर क्या है, ईश्वर कैसा है, यह जानना हमारे लिये जरूरी है। ईश्वर  विशाल  से भी विशाल  है, उसकी कोई प्रतिमा नहीं बन  सकती। इसका कारण  यह भी है कि ईश्वर से सादृश्य कोई नहीं है। ईश्वर को किसी मंदिर या मस्जिद  में समाहित  किया जा सकता है। ईश्वर जन्म और मृत्यु से परे है। ईश्वर सत्य है कोई चमत्कार नहीं। ईश्वर सगुण  एवं निर्गुण  दोंनो है। ईश्वर अज्ञेय  है। ईश्वर  किसी व्यक्ति विशेष को अपना एजेन्ट  नियुक्त नहीं कर करता है। क्योंकि ऐसा करने से उसका न्याय का  सिद्धांत  तिरोहित हो जायगा। क्योंकि ईश्वर न्याय कारी है। ईश्वर कभी किसी पर क्षमा या क्रोध  नहीं करता, क्योंकि ऐसा करने से उसके न्याय के सिद्धांत  का उल्घंन  होता है। ईश्वर  सर्वशक्तिमान है परन्तु कुछ  कार्य  है कि वह नहीं कर करता, जैसे अपने जैसा दूसरा ईश्वर बनाना। हमारा ईश्वर वेद  वर्णित  है, जो  संभवतः  ईश्वरकृत  प्रथम और अंतिम  रचना है। राम, कृष्ण, बौद्ध, महावीर, ईसा, मुहम्मद साहब, गुरुनानक  देव आदि महापुरुष  थे, तथा इनमें देवीय गुण  भी हो सकते हैं, किन्तु वेदानुसार ये ईश्वर नहीं थे। हम सब वेदों के ज्ञान को भूल  गये हैं। और मानव रचित  भागवत  पुराणों की मिथ्या बातों को ही धर्म  मानने  लगे हैं। और अनेकानेक  कर्म  काण्ड करने लगे हैं।  इस  संबंध  में स्वामी दयानंद  सरस्वती जी ने एक  महान  पुस्तक  सत्यार्थप्रकाश  लिखी है। मुझे लगता है कि यह पुस्तक  प्रत्येक  व्यक्ति को पढना चाहिये। फिर  अपने विवेकानुसार जो उचित  लगे मानना चाहिये।

    kalia के द्वारा
    April 25, 2012

    श्रद्धेय दिनेश जी, आपकी मात्र एक टिप्पणी से ही बहुत सारा ज्ञान प्राप्त हुआ, इस हेतु आभार स्वीकार करें । मैंने भी वही कहा है, बस शब्दों और समझ का फ़र्क़ है । मैं कहाँ कह रहा हूँ कि ईश्वर का कोई निश्चित रूप है ? जो जिस रूप में उसका प्रत्यक्षण कर पाए, वही उसका असली रूप है । क्या हमारे कुछ महापुरुषों ने जिस पत्नी के साथ समागम किया, कालान्तर में उसी पत्नी में माँ शक्तिस्वरूपा का दर्शन नहीं किया ? ईश्वर मात्र एक बोध है, परन्तु उसके अस्तित्व को नकारना खुद अपने आप को नकारने जैसा ही माना जाएगा । ईश्वर का जब अपना ही कोई रूप नहीं है, तो हमरूप कहाँ से आ जाएगा । किसी की न्यायोचित मीमांसा के प्रति पूर्वाग्रह पालना विद्वानों का कार्य नहीं है । हमारे वेद ईश्वररचित हैं, हो सकता है कि बहुत सारे लोग इससे भी इत्तफ़ाक़ न रख पाएँ । हमारे हिन्दू धर्म से ही कई पंथ मतभेदों के आधार पर अलग हो गए । क्यों ? इसलिये कि यह ‘मानना’ बड़ा पेचीदा मामला है । क्या स्वामी दयानन्द सरस्वती ईश्वर के एजेंट कहे जाएंगे ? कुछ सिरफ़िरे जिन्हें आर्यसमाजी विचार रास नहीं आते, यदि ऐसा कहें, तो हमें कैसा लगेगा ? मेरा मानना है कि ईश्वर का अस्तित्व सभी धर्म मजहबों से ऊपर है । यदि ऐसा ही है, तो फ़िर किस ईश्वर ने वेदों की रचना की थी ? क्या दूसरे धर्मावलम्बियों की आस्था वेदों में है ? यह बहस कभी समाप्त नहीं हो पाएगी । बस मैं तो सिर्फ़ इतना ही मानता हूँ, कि उस संसार रचने वाले के प्रति यदि मेरे मन में प्रेम के अंकुर नहीं फ़ूट पाए, तो मेरा अपने माता-पिता, भाई-बहन, पुत्र-पुत्री तथा पत्नी और प्रेमिका से प्रेम कर पाना असम्भव होगा । इस प्रेम को उत्पन्न करने के लिये मुझे कुछ प्रतीकों, माध्यमों तथा चूँकि सर्वज्ञ नहीं हूँ, इसलिये एक अदद गुरु की भी आवश्यकता पड़ती है, जिसकी तलाश में आजतक भटक ही रहा हूँ । प्रतीक तो बहुत हैं, सीता और राम, राधे और कृष्ण, उमा और शिव, जिनसे प्रेरणा प्राप्त कर प्रेम प्रस्फ़ुटित होता रहता है, परन्तु वह ईश्वर, वह ब्रह्म मेरे लिये गुरु के अभाव में आजतक छलावा ही साबित हुआ है । गुरु की तलाश ज़ारी है ।

    April 26, 2012

    सुस्वागतम! मान्यवर माना तो उसे जाता है जिसका अस्तित्व नहीं हो, जो है उसको क्या मानना. आप जो उसके प्रसन्न करने की बात कर रहे है तो वह प्रसन्न-अप्रसन्न से परे है. आपकी इस बात का समर्थन करता हूँ कि शिव, अल्लाह, god और भगवान एक ही हैं. यहाँ यह अलग-अलग मन्यता का सवाल नहीं है बल्कि अलग-अलग भाषा का सवाल क्योंकि ये उसी के पर्यावाची शब्द हैं. परन्तु राम, शंकर, विष्णु, ब्रम्हा, मुहम्मद, ईसामसीह इत्यादि एक ही नहीं और न ही यह ईश्वर हैं. कोई व्यक्ति विशेष है तो कोई परिकल्पना विशेष हैं. यदि आप इन्हें ईश्वर कह रहे हैं तो ईश्वर का अपमान कर रहे हैं. जहाँ तक उसके अंश की बात हैं वो तो सबमें है ही…..अपनी बात को अगले अंक में और बेहतर ढंग से रखना चाहूँगा ….हार्दिक आभार…….!

    kalia के द्वारा
    April 26, 2012

    अलीन जी, विनम्रतापूर्वक कहना चाहूँगा, कि आपके विचार और मान्यताएँ हैं क्या, बिल्कुल भी स्पष्ट नहीं हो पा रहा । अस्तित्वविहीन चीज को भी माना जाता है ? परिकल्पना या सुविधानुसार काल्पनिक चित्र-प्रतीक उसी वस्तु का बनाया जाता है, जिसका अस्तित्व तो है, परन्तु वह दृष्टव्य अर्थात विजिबुल नहीं है । जैसे हवा, जो दिखती तो नहीं है, परन्तु उसका सदृश्य आभास कराने हेतु हम चित्रों में वेगमय रेखाओं एवं पेड़ की हिलती डालियों को प्रतीकस्वरूप डालकर हवा का एहसास कराने का प्रयत्न करते हैं । मैंने तो खुद ही स्पष्ट कर दिया है कि मेरे विचार से हमारे आराध्य या अवतार ईश्वर के प्रत्यक्षण हेतु प्रतीक मात्र हैं, साक्षात ईश्वर नहीं । ईश्वर को मैं धर्म और मजहब से जब ऊपर मानता हूँ, तो कोई भी अवतार या पैगम्बर स्वत: उसके आगे छोटा साबित हो जाता है । परन्तु हम जीवित मनुष्य हैं कोई आत्मा नहीं, अत: किसी भी अभीष्ट की सिद्धि के लिये हमें भौतिक माध्यमों की आवश्यकता पड़ती ही है । हमारी परिकल्पनाओं के आराध्य इष्ट आदि वही माध्यम हैं, जिनके प्रतीकों का सहयोग हमें ईश्वर के सान्निध्य की प्राप्ति हेतु लेना ही पड़ता है । अब जिसकी जैसी मान्यता है, वह अपना वैसा ही माध्यम चुनता है । कोई मन्दिर जाता है, कोई मस्ज़िद । कोई चर्च, तो कोई गुरुद्वारे । इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि किसने कौन सा रास्ता चुना । परन्तु मंज़िल सबकी एक ही है । मुझे नहीं लगता कि आपने ईश्वर के अस्तित्व को समझाने का जो तरीका चुना है, उससे आपकी बातें किसीके पल्ले भी पड़ेंगी । लोग सिर्फ़ आपके समझ में न आने वाले तथाकथित गूढ़ ज्ञान की तारीफ़ करते हुए आगे बढ़ जाएंगे, और अपनी पीठ आपको खुद ही थपथपा कर संतोष करना पड़ेगा । मुझे आपकी अगली कड़ी की प्रतीक्षा रहेगी । यदि उसमें कुछ सार्थक लगा, तो सत्संग भी होगा । धन्यवाद ।

    April 26, 2012

    सादर आभार! जी अब आप मेरी ही बातों को सिद्ध कर दिए. हवा को चित्रों के माध्यम से व्यक्त कर देने से उसमे हवा के गुण विकसित नहीं हो पाएंगे……और न ही उससे आक्सीजन ले पाएंगे जीने के लिए……और कोई बेहतर उदहारण लाइए न अपनी बात रखने के लिए. मैं बस इतना कहूँगा कि मुझे अपनी बात सिद्ध करने के लिए किसी उदहारण की जरुरत नहीं पड़ेगी वो आपका ही का उदहारण काफी होगा…..और यहाँ मैं किसी को क्या समझाऊंगा क्योंकि वह परमपिता न ही मानने की चीज है, न ही जानने की चीज है और न ही समझाने की चीज हैं. और यदि आप जबरजस्ती इसको इन शब्दों से नवाजना चाह रहे हैं तो इसका मतलब की सत्य पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहे हैं. वह तो परम सत्य है जो इन सबसे से ऊपर और परे है……. हाँ एक बात और यदि मान-सम्मान की चाहत होती तो आपकी जुबान बोलता और दो-तीन हाथ की सफाई दिखा देता और यह नासमझ लोग फिर मेरा अंधाधुंध अनुकरण करने लगते. और फिर पैसों और मान-सम्मान की बारिश होने लगती. पर धर्म और ईश्वर के नाम पर इतना घटिया काम मैं कदापि नहीं कर सकता. जो चमत्कार करने का दावा करते हैं. उनसे कही बेहतर चमत्कार दिखा सकता हूँ….पर मैं जानता हूँ की चमत्कार केवल परम पिता ही कर सकता है. इंसान नहीं …..!

    kalia के द्वारा
    April 27, 2012

    जी सर, अब सब समझ गया । कुछ भी बाक़ी नहीं रहा । यह भी समझ में आ गया कि कुछ लोग अपनी किताबें छपवाने के लिये आखिर आप ही के पीछे क्यों पड़े हुए हैं । आश्चर्य है कि कुछ लोग मखौलबाजी के लिये भी ईश्वर के नाम को सब्जेक्ट के रूप में पेश कर सकते हैं । वह है भी, नहीं भी । वाह, क्या सिद्धान्त है । यानी गाना आए या ना आए, गाना चाहिये, फ़िसल-फ़िसल कर गिरते हुए नहाना चाहिये । ऐसा कीजिये जनाब, इस बार नहाने के लिये कुएं के पास जाने की ज़रूरत नहीं है, किसीसे चुल्लू भर पानी उधार मांग कर उसी में…… !

    April 27, 2012

    जी बहुत खूब! शुक्रगुजार हूँ जो आप मुझको जान पाए. फिर भी मुझे लगता है कि मेरे शान में बहुत सी कमी रह गयी है……उसे भी पूरा कर देते आप तो क्या बात होती……….हार्दिक आभार……..और आशा करता हूँ कि भविष्य में ऐसे ही अनमोल वचनों द्वारा मुझे नवाजते रहेंगे ……………….

    kalia के द्वारा
    April 27, 2012

    अभी का अभी लीजिये मालिक, कालिया को उधार रखने की आदत नहीं— मन ना रंगायो, रंगायो जोगी कपरा, बिन होरी गाए, रंगाय लियो चेहरा । रात-दिन भंग पी के, नेट पर मतंग हो के, फ़ारि-फ़ारि लुंगी जोगी नाचि रह्यो लबरा । भंग की तरंग चढ़ी, तभी याद आयो हरि, ऊपर से गांजा टानि जोगी गइले घबरा । कूप पर फ़िसर-फ़िसर के हैं नहात-धोत जोगी, पर कभी ना धोय पाए निज हिया के कचरा । बनत हैं विद्वान जोगी, पर घमंड के हैं रोगी, बहस में जोगाड़ से देखाय रह्यो नखरा । हरि के संग यह ठिठोली छोड़ि बाज आ जा जोगी, यम दरवजवा बांधल जइबे पकरा ॥

    April 27, 2012

    हाँ….हाँ…..हाँ…हार्दिक आभार! अब भी बहुत सी कमी रह गयी है………फिर प्रयास करिए ना.

    dineshaastik के द्वारा
    April 28, 2012

    आदरणीय नागदेवता सादर प्रणाम, आपने क्या बचा रखा है जल  बचाओ   अभियान, अनिल जी ने केवल  ईश्वर के जानने का प्रयास  किया है, लेकिन आपने तो सचमुच  ईश्वर का उपहास  किया है, वेद वर्णित ईश्वर में हमारी है पूरी आस्था, सांसारिक  ईश्वर से हमारा नहीं है वास्ता, आप कहते हैं चुल्लू भर पानी काफी है नहाने के लिये, आपका बहुत बहुत  आभार जल  बचाने के लिये,

    kalia के द्वारा
    April 28, 2012

    हे दिनेश्वर, ईश्वर के भी ईश्वर, हम क्या जल बचाएंगे, कल को सपेरे हमें बीन की धुन पर नचाएंगे, डूबने भर जल तो उन्हें चाहिये, जो जल के बीच रह कर भी, प्यासे हैं जैसे जलधि विच मीन, कहते हैं खुद को ‘अलीन’, पर रागरंग, भंग-तरंग और मस्ती में हैं, सराबोर और पूरी तरह ‘लीन’ । ब्रह्माण्ड, चाँद और तारों में जग को भटकाकर, अँखियाँ मटकाकर, कमरिया झटकाकर, गुजरिया भटकाकर, क्या किसीने कभी पाया है उस अखिलेश्वर को, जगदीश्वर को, परमेश्वर को ? ना ! कभी नहीं !! कदापि नहीं !!! क्योंकि, यह मात्र एक खगोलीय अनुसंधान है, पाखंडों में भी ‘महापाखंड’ का संधान है !

    April 29, 2012

    आप हरेक जगह अपनी ही बात में स्वयं फँसते हुए नज़र आये है. आप स्वयं इश्वर के होने और न होने से इंकार किये हैं. मैं यदि क की बात कर रहा हूँ तो आप ख की बात कर रहे हैं और जब ख की बात कर रहा हूँ तो ग की बात. आप अपनी ही बात पर कायम नहीं रह पा रहे हैं. कुछ समझ में नहीं आ रहा तो आप मुझ पर व्यक्तिगत टिप्पड़ी कर रहे हैं. आप तो सामने वाले को हराने की कोशिश में खुद हारते गए हैं. अभी आप मुझे नचनिया बोल के मेरी निंदा कर रहे थे जबकि यही शब्द अपने लिए भी आप इस्तमाल किये है और वो भी खुद को लाचार और मजबूर दिखाते हुए कि एक दिन सपेरों की धुन पर आप नाचेंगे. इसका मतलब की यह काम आप भी करते हैं, इसे स्वयं स्वीकारें है. वैसे इसमें कोई बुराई नहीं, बुराई तो नाचने के मकसद को लेकर होता है….जो ईश्वर को आपने पाने और बांधने की बात आपने कही है…बहुत ही हास्यप्रद है क्योंकि वह तो पाने-खोने से परे है. ..और हाँ…यदि कोई आपके गुरु हो उन्हें बोलिए मेरी तारीफ़ करने के लिए शायद वो कामयाब हो जाएँ…. आपके बस की बात नहीं है मेरा चरित्र-चित्रण करना. कुछ न कुछ कमी सी रह जा रही है…….

    dineshaastik के द्वारा
    April 29, 2012

    मन सत्य रँग  रँग्यों, उर में तरंग  भर्यो, नाग  देवता बतायें, काहे रँग्यूँ कपरा(कपड़ा)। रंग  मुस्कान छवि, सब रँगे रंग  हँसी, रँग  इन बनावटी से, काहे रँगूँ चेहरा। भंग  सत्य न्याय की पी, गाँजा ले दयालुता की, मानव की एक  जाति वामन का(क्या) चमरा। पहने भारी परिधान, नंगे दिखे श्रीमान, दूसरे को झूठा कहे, वही होता लबरा। काली देखे सब काली, सोच  हमें दिखे ख्याली, ऐसी सोच  मेरे भाई,यहाँ पे न  बगरा(फैला)। काजर है नैन शान, आप उर में हैं मान, ऐसे दिल  को नमन, मैं तो गया घबरा। बहस  में कहाँ करूँ, बहस  से दूर रहूँ, मोमे(मुझमें) मोती नहीं जड़े, कहे करूँ नखरा। करम  के फल  यहीं, मिले नहीं  और कहीं, यमलोक  वाली बात,  झूठ  नहीं बिखरा(फैला)। हरि को न जाने कोई, कैसे फिर  ठिठोली होई, समझ  न आये कैसे, आप हरि पकरा(पकड़ा)। मानते हैं हम  वेद, बाकी सबमें है भेद, श्रुति हैं अनेक  यहाँ, औ   पुराण  अठरा। यदि कहीं तुक , लय एवं गति के लिये किसी ऐसे शब्द का प्रयोग  हुआ   हो जो किसी के या आपके हृदय  को दुखी करता हो, तो उसके  लिये क्षमा प्रार्थी हूँ।

shashibhushan1959 के द्वारा
April 24, 2012

मान्यवर अनिल जी, सादर ! बहुत गहन अध्ययन और मानसिक मंथन के बाद लिखी गई इस तथ्यपरक रचना में बहुत कुछ है ! हार्दिक शुभकानाएं !

ajaydubeydeoria के द्वारा
April 24, 2012

अनिल भईया नमस्कार, आदमी बनाने में जब दुश्वारियां नज़र आयीं, कोई हिन्दू हो गया , कोई मुसलमान बन गया . स्वामी अलीनानंद महाराज की जय……. प्रथम अध्याय समाप्त, दूसरे की प्रतीक्षा कीजिये……..

    April 26, 2012

    नमस्कार! भैया जी स्वामी अन्जनानंद जी महाराज की उपाधि केवल ‘नंगों की बस्ती में नंगापन-एक गुनाह’ series के लिए ही पेटेंट हैं………………अलीन को बस अलीन ही रहने दीजिये क्योंकि मैं स्वामी नहीं हूँ एक सेवक हूँ जो परमपिता परमेश्वर की आज्ञा अनुसार इस जीवन को इस संसार की सेवा में लगाने वाला है और हाँ यह आदेश सिर्फ मुझको ही नहीं बल्कि हम सबको….उसके आदेशों को और बेहतर ढंग से अगले अंक में रखना चाहूँगा…………..

चन्दन राय के द्वारा
April 24, 2012

आलीन जी , मित्र में तो इश्वर के गहरी ज्ञान की बातो को समझ ही नहीं पाता, मुझे तो बस ये बात पता है की भगवान् है , बस में सीधा रास्ता जानता हूँ और आपके लिए तेरे प्यार में जाए कंहा हम दीवाने लोग , जाने क्या क्या पूछ रहे हैं हम से जाने लोग

    dineshaastik के द्वारा
    April 25, 2012

    चन्दन जी ईश्वर क्या है यह बताने के लिये ही तो अज्जानंद महाराज  का जन्म हुआ  है जागरण  जक्शन  के शहर  में। आगे तो महाराज  जी और  गहरे गहरे रहस्यों को उद्घाटन  करेंगे।

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
April 24, 2012

अलीन जी, आप ने अनुत्तरित और अनसुलझे प्रश्न को सुलझाने का एक सफल प्रयास किया है , बड़े ही तार्किक और तथ्यपरक दृष्टान्तों को अपनी खोजी मनस्विता के माध्यम से रहस्यात्मक , अलौकिक व अदृश्य सत्ता की ओर पहुंच की पूरी कोशिश की है | बहुत ही सशक्त भाषा -सश्लिष्ट, किन्तु पारदर्शी भाव से से युक्त हृदयस्पर्शी आलेख की प्रस्तुति के लिए आप को कोटिशः साधुवाद !! एक अलग से निवेदन ………… मेरे ब्लौग पर …. बिताये खट्टे -मीठे पल , की प्रतिक्रिया वाली जगह में अजय पाण्डेय का मेरे प्रति प्रेषित निवेदन में कुछ समस्याएँ रखी गयीं है , जिसका निदान आप ही कर सकते हैं | कृपया समय निकलकर देखें | पुनश्च !!

    April 26, 2012

    सादर प्रणाम! ……………..आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया का हार्दिक आभार.

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
April 24, 2012

इस प्रकार डर, अज्ञान और स्वार्थ से जन्मे तत्व ने ईश्वर की जगह ले ली और शुरू हुआ ईश्वर की निंदा का सिलसिला जो आज भी मानव के मानसिक और बौदिक विकास होने बाद भी रुकने का नाम नहीं ले रहा. इसी डर, अज्ञान और स्वार्थ ने अनेक देवी और देवताओं को जन्म दिया. जिसको ईश्वर मानकर हम ईश्वर का अपमान और निंदा करते जा रहे हैं… ढूँढने और जानने की हमारी कोशिश जारी रखनी चाहिए जितना कुछ ये हमारा अद्भुत मस्तिष्क जानने की कोशिश करेगा उतना ही विकसित होगा और तथाकथित भ्रम भूत प्रेत दूर होते रहेगे ये अलौकिक दुनिया है हम भी उसके अंश हैं उस प्रभु का रचा हुआ एक एक अणु कण जानने में कितनी सृष्टि मिटती बनती रहेगी प्रभु ही जानें …जो कुछ भी खोजा गया कुछ लाभ भी तो दे गया ..ब्लैक होल में सारा ब्रह्माण्ड..ब्रह्माण्ड में सारा ब्लैक होल ..बहुत कुछ ..भ्रम दूर हो इस के लिए आप के अगले लेख का इंतजार रहेगा …. भ्रमर ५

    April 29, 2012

    सादर प्रणाम! मेरी बातों से कुछ हद तक इत्तेफाक रख पाए, उसके लिए आभार. पर भैया जी, मैंने तो कहीं भी यह नहीं बोला कि सारे ब्रह्माण्ड में ब्लैक होल है और ब्लैक होल में सारा ब्रह्माण्ड. शायद किसी विचार को सही अर्थों में समझ नहीं पाने के कारण ही भ्रांतियां और गलतफहमियां फैलती हैं. हाँ यह जरुर है कि इस संसार का अति सूक्ष्म कण जिसकी परिकल्पना हमारे समझ के परे है उसके अन्दर पूरा ब्रह्माण्ड नीहित है जबकि वह ब्रह्माण्ड का एक अभिन्न हिस्सा है……

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    April 29, 2012

    प्रतिक्रिया ब्लैक होल से निकली बड़ी ख़ुशी हुयी रंग मंच जमा हुआ है देख और पढ़ रहा हूँ अर्थ और अनर्थ ये है ईश्वर की महिमा ?….कुछ मै भी बढ़ा दूं शतक लग जाए ……. हमने कहाँ ये लिखा की सारे ब्रह्माण्ड में ब्लैक होल है ? हाँ ब्रह्माण्ड में ही ब्लैक होल है और ब्लैक होल में ब्रह्माण्ड समा सकता है ..ऐसा … ईश्वर बस यही नही है ….हमारी आप की सोच से परे है …हरी ओउम ..जय श्री राधे और और बुद्धि का घोडा दौडाएं शायद कुछ पायें और दिन बचे हैं ……… भ्रमर ५

    April 29, 2012

    मैं समझ रहा था कि आप मेरे साथ कुछ मजाक कर रहे हैं कमेन्ट को लेकर…….वो तो विक्रम भैया के कहने पे स्पैम चेक किया तो आपका कमेन्ट वही मिला……….इसीलिए आपको पहिले ही कहा था कि अपनी बातों को स्पष्ट रखा कीजिये. पर आपकी घुमाकर रखने वाली आदत नहीं जाने वाली……हाँ….हाँ….हां… इसमे घोडा दौड़ाने का सवाल ही नहीं क्योंकि जो आप कह रहे हैं वह मैं पहिले ही कह चूका हूँ….और यह भी कह चूका हूँ कि ब्रह्माण्ड और ब्लैक होल एक उदहारण था अपनी बात रखने के लिए. इसका मतलब यह नहीं कि उसे ईश्वर समझकर आराधना करना शुरू कर दिया जाय……यक़ीनन वह हम सबकी सोच से परे है……जाय श्री…..रावन…

Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
April 24, 2012

हमारे डर, अज्ञान और स्वार्थ ने प्रकृति के अवयवों और क्रियाओं को विभिन्न प्रकार के देवी और देवताओं का नाम देकर समाज में अन्धविश्वास और आडम्बर फैलाते रहा तथा हम हकीकत को नजर अंदाज करने का खेल खेलते आये. ईश्वर जो इन अंधविश्वासों और मान्यताओं से परे एक ऐसा सत्य है जिसका आरम्भ ही अंत है और अंत ही आरम्भ अर्थात हम मानवों और इस ब्रह्माण्ड के किसी अन्य विकसित तत्व के समझ और पकड़ के बाहर. इस ब्रह्माण्ड का अत्यंत सूक्ष्म कण जिसके आगे आज की नैनो टेक्नोलाजी भी असफल है और आने वाली हर टेक्नोलाजी असफल रहेगी. उसमे ईश्वर की पूरी शक्ति नीहित है. अलीन जी नमस्कार …………… आपके आलेख की एक एक बात से सहमत हूँ.

ajay kumar pandey के द्वारा
April 24, 2012

अलीन भैया में आपके ब्लॉग के द्वारा समस्त सदस्यों को बताना चाहता हूँ की में अब सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध एक किताब लिखना चाहता हूँ उसके लिए मुझे इस मंच से अवकाश की जरुरत होगी और मेरे आलेख भी कुछ दिन तक इस मंच पर नहीं आयेंगे क्योंकि में सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध एक किताब पर kaam कर रहा हूँ उसमे आपके आलेख को भी जगह दूंगा बस कुछ वक्त चाहिए इस मंच पर आने का समय नहीं अगर आप मुझे इसके लिए अनुमति दें तो धन्यवाद

    April 24, 2012

    भाई साहब पहिले तो आप चिंतन करिए कि सामाजिक कुरीति और अन्धविश्वास क्या होता है फिर उस पर किताब लिखियेगा. नहीं तो आपकी नादानी में एक और कुरीति पैदा हो जाएगी….जो आप मंदिर में जाकर देवी से इच्छा पूर्ति की सलाह मुझे दे रहे हैं वह भी कुरीति और अन्धविश्वास ही है….. जो कि हमारे स्वार्थ से जन्मा है….. चलिए अभी से चिंतन और मनन में लग जाइये और दस साल के बाद इस पर किताब लिखियेगा….. फ़िलहाल आप फुल, पौधों, नदियाँ, बारिश, स्कूल और घर पर किताब लिखिए…शुभ रात्रि….!

    dineshaastik के द्वारा
    April 25, 2012

    भाई अजय  एक  तरफ  तो आफ  अनिल  जी को अपना बड़ा भाई मानते हो,  और दूसरी तरफ  उनकी सलाह को अनसुना कर रहे हो। भाई वह जो भी  सलाह देंगे आपके हित के लिये देंगे।  किताब  लिखने के लिये तो बहुत  लम्बी जिन्दगी पड़ी है। यह उम्र  पढ़ने एवं पढ़कर कुछ  बनके दिखाने की है। मेरे ख्याल  से आपको इस  पर भी विचार  करना चाहिये।

    dineshaastik के द्वारा
    April 26, 2012

    धार्मिक भ्रष्टाचार से हो जाइये सावधान, इस भ्रष्टाचार के उन्मूलन का जो है हमारा अभियान, इसे नेस्तानामूद करने के लिये वो हो गये हैं संगठित, वही छद्म नाम से जन्म ले रहें है तथाकथित, यह वही हैं जिन्होंने गेलैलियो पर ढ़ाये थे कहर, ये वही है जिन्होंने सुकरात को दिया था जहर, ये वही हैं जिनके कारण भारत विदेशियों की बन गई थी दासी, ये वही हैं जिनके कारण भगत सिंह को हुई थी फाँसी, ये वही हैं जिन्होंने ईसा को चढा़या था सूली, ये वही है जिन्होंने महात्मा गाँधी को मारी थी गोली। हमें नाकामयाब करने के लिये फैलायेगे भ्रम, कहीं हम सबका बेकार न चला जाय श्रम,

    dineshaastik के द्वारा
    April 27, 2012

    एक  ही हैं वह अल ग अलग  दिखते हैं, वो धमकाते हैं तो उन्हें धमकाने दो। ह म एक  रहेंगे इसमें संशय  तो नहीं, राय है कि काला प्रकाश  गिरजाने दो। भू माफियाओं का कब्जा है इस  शहर पर, वो टॉप पर आते हैं तो उन्हे आने दो। मजबूर करेंगे हमें यह शहर छोड़ने के लिये, लाल  पीली आँखें दिखाते हैं तो दिखाने दो। वादा पीछे नहीं हटेंगे हम आगे बढ़कर, वो तिलमिलाते हैं तो उन्हें तिलमिलाने दो। हमें उनकी साजिशों से निकलना है कैसे भी, वो साजिश  रचाते हैं तो रचाने दो। महर्षि दयानन्द को जहर देने वाले लोग  हैं ये, वेश्या पर आरोप  लगाते हैं तो लगाने दो।

    April 27, 2012

    भैया जी आपका सन्देश मुझ तक पहुँच गया. कृपया मेरा सन्देश गोपाल दास ‘नीरज’ जी की इस रचना के साथ लेने की कृपा करें……. सावधान ओ! सावधान लो, अब मैं कदम बढाता हूँ, सावधान ! सुखी सांसों से मैं तूफान उठाता हूँ, सावधान ! लो सात सागरों में मैं आग लगाता हूँ, एक बार मरकर ही युग – युग तक जीने आता हूँ, हुंकारें सुन हिल जाएगी भू , नभ की तस्वीरें, ताज हिलेंगें , राज हिलेंगें , तख्तों की तकदीरें, हिल जायेंगे मंदिर – मस्जिद पराधीन जंजीरें, किन्तु रहेगा अमित लहू से मेरे बनी लकीरें, आज विश्व के वैभव की मैं ईंट हिलाने आया हूँ. मैं विद्रोही हूँ , जग में विद्रोह करने आया हूँ. मुझको गिरी-सागर ने रोका, रोका चट्टानों ने, काँटों के झंखाड़ों ने रोका , रोका तूफानों, फाँसी के तख्ते ने रोका, रोका वीरानों ने, बरसाती आँखों ने रोका , प्यासे अरमानों ने, रोक सका है कौन उसे जिसने बस चलाना ही सीखा, बुझा सका है कौन उसे जिसने बस जलना ही सीखा, मिटा सका है कौन उसे जिसने बस जीना ही सिखा, विष भी तो मधु बना उसे जिसने बस पीना ही सिखा, आज विश्व को यही अमर पाठ पढ़ने आया हूँ. मैं विद्रोही हूँ, जग में विद्रोह कराने आया हूँ. हाँ, हाँ, हाँ,………हा मैं विद्रोही हूँ , जग में विद्रोह कराने आया हूँ. क्रांति, क्रांति का सरल सुनहरा राग सुनाने आया हूँ.


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